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रिपोर्ट:‘'साहित्य की मूल चिंता न्याय की चिंता है’'-डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी


छायावाद: राग और रंग

नई दिल्ली, : ‘कड़ियाँऔर भारतीय भाषा केंद्र, जे.एन.यू. के संयुक्त तत्त्वावधान में 22 फरवरी 2019 को छायावाद के सौ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में दो सत्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया|
गौरतलब है कि छायावादहिंदी साहित्येतिहास लेखन में नामकरण की दृष्टि से अत्यंत विवादास्पद रहा है | अक्सर यह होता है कि छायावाद का नाम सुनते ही हम मूलतः काव्य विधा पर केन्द्रित हो जाते हैं और उसी कालखंड में लिखे जा रहे गद्यविधाओं के साथ न्याय नहीं कर पाते हैं | इस संगोष्ठी के आयोजन का मूल उद्देश्य यही था कि छायावादके सौ वर्ष बाद जब हम छायावादपर दृष्टिपात करें तो उस कालखंड के दौरान रचे जा रहे साहित्य को उसकी सम्पूर्णता में देख सकें और उसकी प्रासंगिकता के साथ-साथ उससे जुड़ें तमाम सवालों के जवाब ढूंढने की एक कोशिश हो | निश्चित तौर पर यह आयोजन इस दृष्टिसे सफल रहा |  

              प्रथम सत्र का आयोजन सुबह 10 बजे प्रारंभ हुआ | भारतीय भाषा केंद्र, जे.एन.यू. के अध्यक्ष प्रो. ओमप्रकाश सिंह जो कि संगोष्ठी के प्रथम सत्र की अध्यक्षता भी कर रहे थे, उनकी एवं अन्य विद्वान वक्ताओं में शामिल प्रो. चंद्रदेव यादव ( जामिया मिलिया इस्लामिया), प्रो.सुधीर प्रताप सिंह (जे.एन.यू.) और डॉ. संदीप रंजन (पी.डी.एफ.)की उपस्थिति में सत्राचीत्रैमासिक पत्रिका (अंक-18) के छायावाद पर केन्द्रित विशेषांक का लोकार्पण भी किया गया |

डॉ. संदीप रंजन ने छायावाद के मुक्तिकामी स्वरपर दृष्टिपात करते हुए कहा कि छायावाद शुद्धतावादी दृष्टिकोण से टकराता है और यह टकराहट भाव और शिल्प दोनों स्तर पर देखा जा सकता है | छायावाद को खड़ी बोली हिंदी की वयस्कता का काव्य बतलाते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि छायावादी काव्य में मुक्ति का प्रश्न-भाषा के स्तर पर, प्रेमाभिव्यक्ति के स्तर पर, रुढियों के नकार आदिस्तरों पर देखा जा सकता है | द्विवेदी युगीन स्थूलता के बरक्स किस तरह छायावादी काव्य सूक्ष्म स्तर पर राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति करता है, इस बात को भी उन्होंने निराला, प्रसाद आदि के काव्य उद्धरणों के माध्यम से स्पष्ट किया | उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि छायावादी कवियों के यहाँ अपर्याप्तता का बोध भी देखने को मिलता है जिसके कारण वे प्रकृति से विमुख हो नारी की तरफ मुड़ते हैं |

प्रो. चंद्रदेव यादव ने छायावाद के उद्भव और अवसानपर अपनी बात रखते हुए ब्रजभाषा बनाम खड़ी बोली विवाद, छायावाद के उद्भव और अवसान के कारणों आदि को स्पष्ट किया | छायावाद में रहस्यवाद का जिक्र करते हुए उन्होंने यह बताया कि छायावाद में जो रहस्यवाद मिलता है वह पारंपरिक अर्थों में नहीं है | छायावादी रहस्यवाद मध्यकालीन रहस्यवाद से भिन्न निर्वृत्तिमूलक रहस्यवाद है | इसी क्रम में उन्होंने विभिन्न कवियों के काव्य उद्धरणों के माध्यम से स्पष्ट किया कि छायावादी काव्य में जो प्रेम है वह विशुद्ध मानवीय और लौकिक प्रेम है | उन्होंने छायावादके नाम की असमर्थता का भी जिक्र किया जिसके अंतर्गत प्रायः गद्य विधाएँ छूट जाती हैं | उन्होंने छायावाद को ऐतिहासिक जरूरत बताते हुए प्रसाद के ऊपर लगे पलायनवाद का भी खंडन किया | छायावाद संबंधी अनेक तथ्यात्मक जानकारी देते हुए उन्होंने छायावादी साहित्यिक-अभिव्यक्ति को आधुनिक स्त्री-चेतना की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्णमाना |  

प्रो. सुधीर प्रताप सिंह ने छायावाद के राष्ट्रवादी परिप्रेक्ष्य, पूंजीवादी चिंतन और काव्यभाषा के महत्त्व पर दृष्टिपात करते हुए कई वैचारिक प्रश्नों को हमारे समक्ष रखा | उन्होंने इस बात को भी स्पष्ट किया कि छायावादी कविक्यों खुद छायावाद के अंत की घोषणा करता है और किस तरह बाद में प्रगतिशील आंदोलन से जुड़ता है| उन्होंने छायावाद के अध्ययन हेतु छायावादी आलोचकों के साथ-साथ छायावादी कवि-आलोचकों को पढ़ने पर विशेष बल दिया | उन्होंने अपने वक्तव्य में रेखांकित किया कि छायावादी साहित्य में अप्रत्यक्षरूप से राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति दिखाई पड़ती है | उन्होंने शिवदान सिंह चौहान और शंभुनाथ सिंह की छायावाद संबधी आलोचना दृष्टि का हवाला देते हुए छायावादी काव्य के पूंजीवादी चिंतन को रेखांकित किया | काव्य-भाषा पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि छायावादी कवि समाज की बात सांस्कृतिक शब्दावलियों में करते हुए नजर आते हैं | छायावाद के पतन की पड़ताल करते हुए उन्होंने कहा कि उतरोत्तर काल में नितांत व्यक्तिवादिता और ऐंद्रिकता के प्रति अतिशय आग्रह इसके प्रमुख  कारण हो सकते हैं |

                प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में छायावाद के पुनर्पाठ पर बल दिया | जिसके अंतर्गत उन्होंने बताया कि छायावाद एक काव्य-आंदोलन होने के साथ-साथ एक सांस्कृतिक आंदोलन भी है| रामचंद्र शुक्ल के छायावाद संबधी आलोचना की सीमाओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने शुक्ल जी के कवि व्यक्तित्त्व को जानने और उनके कविता संग्रह मधुस्रोतको पढ़ने की भी बात की जिससे छायावाद संबंधी उनकी दृष्टि को समझ पाना आसान हो जाता है | उन्होंने विभिन्न उद्धरणों के माध्यम से स्पष्ट किया कि छायावाद में नारी को आधुनिक रूप और संबल प्राप्त होता है | निराला की मैंशैली की तारीफ करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया निराला की यह शैली व्यक्ति की सीमा को लांघती है और बहुत व्यापक हो जाती है जो बाद के कवियों में प्रायः नहीं मिलता है | उन्होंने यह भी कहा कि छायावाद के अंतर्गत अतीत के प्रगतिशील तत्त्वों को रेखांकित किया जा सकता है |प्रथम सत्र का संचालन भारतीय भाषा केंद्र, जे.एन.यू. के शोधार्थी बृजेश यादव ने किया और धन्यवाद ज्ञापन परास्नातक हिंदी की छात्रा रेखा जोशी ने किया |

                  संगोष्ठी का दूसरा सत्र दोपहर 2:30 बजे से प्रारंभ हुआ | भारतीय भाषा केंद्र, जे.एन.यू. के पूर्व अध्यक्ष प्रो.गोबिंद प्रसाद की अध्यक्षता में डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी(देशबंधु कॉलेज), डॉ. गोपाल प्रधान(अम्बेडकर विश्वविद्यालय), डॉ. मलखान सिंह(जे.एन.यू.) और भारतीय भाषा केंद्र, जे.एन.यू. के शोधार्थी प्रदीप कुमार ने छायावाद के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला |

                   प्रदीप कुमार ने साहित्येतिहास लेखन और छायावाद पर दृष्टिपात करते हुए कहा कि हमें साहित्येतिहास और आलोचना की भाषा में फर्क करना होगा | उन्होंने खेद जताते हुए कहा कि यह हमारी सीमा ही है जो हम साहित्येतिहास लेखन की भाषा को विकसित नहीं कर पाएं हैं | उन्होंने आगे कहा कि यह आलोचना की ही खामियां है कि छायावाद प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी वर्मा के अर्थ में ही रूढ़ हो जाता है साथ ही अन्य गद्य विधाएँ और छायावाद के अन्य कवि हाशिए पर चले जाते हैं |  इसी क्रम में उन्होंने नामवर सिंह के छायावाद संबंधी आलोचना दृष्टि के अंतर्विरोधों को भी सामने रखा |

                     डॉ. मलखान सिंह ने अपने वक्तव्य में छायावाद और काव्य-भाषा पर अपनी बात रखी | उन्होंने कहा कि खड़ी बोली हिंदी छायावाद में जिस प्रकार ब्रजभाषा का विकल्प बनती है, उसका श्रेय छायावादी कवियों को जाता है | आगे उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि छायावादी कवि आधुनिक भावबोध से आत्मबल ग्रहण करते हैं | यहीं पर उन्होंने कहा कि छायावादी काव्यभाषा आत्मचेतना की तलाश की भाषा है जो छायावादी काव्य में लाक्षणिक अर्थों में अपने सर्वोत्कृष्ट रूप में मौजूद है |            

डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी ने छायावाद के सांस्कृतिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य की मूल चिंता न्याय की चिंता है’ | उन्होंने कहा कि कविता उन प्रारंभिक विधाओं में से है जिसमें मानव जाति ने खुद को अभिव्यक्त किया है | न्याय के प्रश्न को लेकर उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मध्यकालीन कविताओं में अन्याय के विरुद्ध सांस्कृतिक क्षोभ प्रकट हुआ है उस तरह का क्षोभ छायावादी कविताओं में परिलक्षित नहीं होता है | उन्होंने कहा कि छायावादी काव्य देवसत्ता का प्रतिरोध तो करती है लेकिन अन्याय के स्रोत को नहीं पहचान पाती है | ‘अछूत की शिकायतजैसी कविता और हीराडोम सरीखे कवियों का हवाला देते हुए उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यहाँ भी महज क्षोभ व्यक्त हो पाया है, अन्याय के स्रोत की पहचान नहीं हो सकी है | उन्होंने कहा कि अन्याय के स्रोत की पहचान और क्षोभ का प्रखर रूप आगे चलकर हमें प्रगतिवाद में दृष्टिगत होता है |

                      डॉ. गोपाल प्रधान ने अपने वक्तव्य में कहा कि छायावाद उपनिवेशित देश की मुक्ति की आकांक्षा की अभिव्यक्ति है’| उन्होंने नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि की तारीफ करते हुए कहा कि छायावाद को नामवर सिंह ने बोधगम्य बनाया| छायावादी काव्य और रोमांटिसिज्म पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि छायावाद यूरोपीय रोमांटिसिज्म से भिन्न है क्योंकि दोनों जगह की परिस्थितियां भिन्न है | यूरोप में जहाँ औद्योगिकीकरण का विरोध है तो वहीँ भारत में उपनिवेशवाद का | उन्होंने कहा कि छायावाद के अंतर्गत हम लघुमानव के प्रति संवेदना को देख सकते हैं | छायावादी कवियों की दृष्टि के विकास की पड़ताल करते हुए उन्होंने कहा कि छायावादी कवियों की दृष्टि उपनिवेशवाद के विरोध और वामपंथ के गहरे असर से विकसित होती है| इसी क्रम में उन्होंने छायावाद के समय लिखी जाने वाली आत्मकथाओं पर भी अपनी बात रखी | उन्होंने प्रेमचंद के साहित्य पर बात करते हुए कहा कि निराला के साहित्यिक विकास को समझने के लिए प्रेमचंद को समझना आवश्यक है |

 
संगोष्टी के दूसरे सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. गोबिंद प्रसाद ने कहा कि छायावादियों ने एक लंबी छलांग भाषा की दृष्टि से लगाई| उन्होंने यह भी कहा कि छायावादी काव्य में सौन्दर्य की मात्रा अधिक है और संघर्ष की मात्रा कम | प्रसाद के काव्य पर गौर फरमाते हुए उन्होंने कहा कि प्रसाद का काव्य फारसी काव्य परम्परा से प्रभावित दिखाई देता है | ‘लहरके कई गीत ऐसे हैं जिसमें यह प्रभाव परिलक्षित होता है |

संगोष्ठी के दूसरे सत्र का संचालन भारतीय भाषा केंद्र, जे.एन.यू. की शोधार्थी पूनम प्रसाद ने किया और धन्यवाद ज्ञापन परास्नातक छात्र अजीत आर्या ने किया | दोनों सत्रों के अंत में श्रोताओं के मन में जागृत प्रश्नों का भी स्वागत किया गया जिसका जवाब दोनों सत्रों में उपस्थित वक्ताओं ने बखूबी दिया |संगोष्ठी में प्रो. देवशंकर नवीन, प्रो. मुकेश गर्ग सरीखे विद्वानों की गरिमामयी उपस्थिति उत्साहवर्धक रही| संगोष्ठी के दोनों सत्रों में जे.एन.यू., जामिया, डी.यू., अम्बेडकर एवं अन्य विश्वविद्यालयों के छात्रों और शोधार्थियों की उपस्थिति सराहनीय रही | ‘कड़ियाँका यह आयोजन निश्चित तौर पर छायावाद की बोधगम्यता को बढ़ाने वाला और छायावाद संबधी प्रश्नों के जवाब ढूंढने की दृष्टि से काफी सफल रहा |

गौरव भारती
शोधार्थी
भारतीय भाषा केंद्र,जे.एन.यू.

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