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नमस्कार मित्रो, 

हमारे मुख पत्र प्रकाशन अपनी माटी त्रैमासिक पत्रिका में आपका स्वागत हैहम अपने नियमित अंकों में बाकी रचनाओं के साथ ही शोध आलेख भी प्रकाशित करते रहे हैं अगर आप भी अपनी माटी में शोध पत्र छपवाने के इच्छुक हैं तो कृपया हमें हमारे नियमति अंक प्रकाशन की तारीखों में आलेख भेजेंहमारे सम्पादक बोर्ड द्वारा अगर आलेख का चयन किया जाता है तो हम आपको यथासमय सूचित करेंगेअपनी माटी ई-पत्रिका और अपनी माटी संस्थान चित्तौड़गढ़ निस्वार्थ और स्वयंसेवा के भाव से संचालित एक संस्थानिक अभियान हैइस पत्रिका और संस्थान को किसी भी तरह से आर्थिक सपोर्ट करने के लिए आप सीधे हमारे निम्न बैंक खाते में चेक/ ड्राफ्ट/ नकद जमा कराके हमें अपना नाम और पता सूचित कर सकते हैं जिन साथियों को यह अनुभव होता है कि वे अपनी माटी की गतिविधियों से सहमत हैं और इसके साथ वैचारिक सम्मति रखते हैं उनका सदस्यता के लिए स्वागत है। आपके सहयोग से यह पत्रिका और संस्थान नियमित रूप से पत्रिका प्रकाशन के साथ ही साहित्यिक आयोजन भी करता रहा है और आगे भी जारी रखेंगेयह महज एक अपील है किसी भी तरह के आर्थिक सहयोग के बगैर भी आप लगातार बेहतर आलेखन के साथ हमें एक बड़ा सपोर्ट कर सकते हैंकर भी रहे हैंआपके इस सभी तरह के सहयोग का हम मान रखते हैंआपका शुक्रिया
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लेखक मित्रों से कुछ ज़रूरी निवेदन 
  1. अव्वल तो आपका स्वागत कि आप 'अपनी माटी' के लिए अपनी रचना भेजना चाहते हैं.हम आपको बताना चाहते हैं कि अप्रैल,2014  से हमारी यह ई-पत्रिका त्रैमासिक रूप से प्रकाशित हो रही है।
  2. यह पत्रिका अपने आरम्भ से ही ISSN CODE ( 'ISSN 2322-0724 Apni Maati' ) प्राप्त है जिसका शोधार्थियों और कॉलेज प्राध्यापकों के लिए खासकर उपयोग होता रहा है/आपको भी हो सकता है।
  3. गौरतलब है कि यह अभी तक ई-पत्रिका ही है इसका कोई प्रिंट वर्जन नहीं छपता है।
  4. आप यहाँ अपनी अभी तक प्रिंट और ई माध्यम में अप्रकाशित रचनाएं ही भेजें।
  5. हम हमेशा सामान्य अंक ही प्रकाशित करते हैं.अभी विशेषांक निकालने की हमारी कोई योजना नहीं है अगर होगी तो हम इस बात की विशेष घोषणा करेंगे ही।
  6. रचनाएं हिंदी के यूनिकोड में टाईप की हुई हों, हमारे पते info@apnimaati.com पर ई-मेल कर सकते हैं। 'देवल्यास-10' फॉण्ट में रचना नहीं भेजें,प्लीज. केवल टाइप की हुयी रचनाएं ही हम उपयोग कर सकेंगे।
  7. छपने लायक सामग्री के बारे में हम आपको आपकी रचना प्राप्ति  के बाद अगले अंक के लिए हमारी पहली बोर्ड बैठक में निर्णय के बाद आपको सूचित करने का वादा करते हैं।
  8. कृपया प्रिंट फॉर्म में रचनाएं हमें डाक से नहीं भेजें।अभी तक हमारे पास उपलब्ध संसाधनों में हम रचनाएं टाइप करवा कर नहीं छाप पायेंगे।
  9. मौलिकता स्वयं रचनाकार की विश्वसनीयता है। अतः इसके अनुपालन के लिए रचनाकार स्वयं ख़याल रखे तो बेहतर होगा।
  10. बहुत ज्यादा ज़रूरी हो तो पूर्व प्रकाशित रचनाओं को भेजते समय प्रकाशन संदर्भ जरुर भेजिएगा।यदि हमें ऐसा आभास होगा कि रचना का प्रचार ज़रूरी है तो उसका पुन: प्रकाशन भी करेंगे।
  11. मुआफ़ करें हमारे इस अव्यावसायिक प्रकल्प में आपकी रचना प्रकाशन के लिए आपको किसी भी तरह का आर्थिक भुगतान नहीं कर पायेंगे।
  12. हम आपके सहयोग का बड़ा मान करते हैं।यहाँ प्रकाशित रचनाओं पर रचनाकारों के सर्वाधिकार सुरक्षित हैं, अनुमति के बाद गैरव्यावसायिक उपयोग संभव होगा। यदि यहाँ प्रकाशित रचना का पुन: प्रकाशन किया जाता है तो वहाँ सौजन्य का उल्लेख ज़रूर करिएगा,कृपया वो भी हमारी जानकारी में हो.
  13. हाँ याद रख कर नए लेखक साथी जो अपनी माटी में पहली बार छप रहे हैं , रचनाओं के साथ अपना परिचय,पता और फोटो भी भेजिएगा।
  14. सामग्री चयन,सम्पादन और प्रकाशन का अंतिम निर्णय सम्पादक मंडल का रहेगा।
  15. रचना छपने और 'अपनी माटी' को आर्थिक सहयोग देने की प्रक्रिया अलग-अलग विषय है इसे एक साथ जोड़कर नहीं देखें।

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देश विदेश के चित्रकार साथियों के लिए 

  1. नमस्कार,अपनी माटी ई-पत्रिका एक प्रतिष्ठित ई पत्रिका है जो एक पंजीकृत संस्थान द्वारा संचालित है.
  2. हमारी ई-पत्रिका में एक अवसर है जहां आप जैसे चित्रकार साथी अपनी पेंटिंग्स के चित्र प्रदर्शित कर सकते हैं.हमारे त्रैमासिक अंक में हर बार हम एक चित्रकार की लगभग पैंतीस पेंटिंग्स को प्रकाशित करते हैं.
  3. इसके लिए आपको हमें अपना बायो डेटा,फोटो और चयनित दस चित्र पहले भेजने होते हैं.हमारा बोर्ड उनका चयन करके आपको चयन की सूचना देता है तो आपको पैंतीस फोटो भेजने होते हैं.
  4. आए हुए चित्रों को हम हमारे प्रकाशित होने वाले अंक में छापते हैं.चित्र अच्छे और बड़े पिक्स़ल में भेजें.
  5. हम आपका बायो डेटा हमारे एक अलग पोर्टल पर छापते हैं जहां आपको देश के नामी लोगों के जीवन परिचय वाले पोर्टल में जगह मिलती है.
  6. अंक में प्रत्येक चित्र के साथ आपकी कोंटेक्ट डिटेल्स छापते हैं ताकि लोग सीधे आपसे संपर्क कर सकें.
  7. इस बाबत हम आपको किसी भी तरह का आर्थिक मानदेय नहीं दे पाएंगे.सिर्फ आपको हमारी पत्रिका संस्थान द्वारा जारी एक प्रमाण पत्र दे पाएंगे जिसमें हमारी पत्रिका का ISSN नंबर छपा है.
  8. अगर आप हमारी इस योजना में जुड़ना चाहते हैं तो हमसे हमारी ई-मेल info@apnimaati.com पर समपर्क करिएगा.

5 टिप्‍पणियां:

  1. माननीय सम्पादक महोदय आपके gmail address पर मेल प्रेषित करने पर यह जवाब प्राप्त हो रहा है -There was a temporary problem delivering your message to info@apnimaati.com. Gmail will retry for 45 more hours. You'll be notified if the delivery fails permanently.यह समस्या पहले भी हो चुकी है आपसे सम्पर्क कैसे करें

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    1. नमस्कार,
      अपनी माटी,(ISSN 2322-0724 Apni Maati) त्रैमासिक हिंदी वेबपत्रिका (www.apnimaati.com) के अब तक 24 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। 24 अंकों तक की यह यात्रा आप सभी पाठकों और लेखकों के सहयोग के बिना संभव नहीं थी। यह बताते हुए खुशी हो रही है कि पहले अंक से 24 वें अंक के इस सफर में अपनी माटी का पाठक वर्ग साढ़े नौ लाख की संख्या को पार कर चुका है।

      आगामी अंक अपनी माटी के लिए रजत जयंती अंक है। यह अंक उस समय प्रकाशित होने जा रहा है, जब 'माटी' का सबसे नजदीकी रिश्तेदार संकट की घड़ी में है। इस घड़ी में हमारा यह अंक 'किसान विशेषांक' के रुप में किसान भाई-बहनों के संघर्षों को समर्पित है। नवउदारवादी नीतियाँ और देश की आर्थिक नीतियों की सबसे ज्यादा मार वही झेल रहे हैं। उन्हें अपने उत्पादन का सही मूल्य तक नहीं मिल पा रहा है। एक तरफ सरकारी कर्मचारियों का वेतन तेजी से बढ़ा है किन्तु उस गति से किसान के उत्पादन का उचित मूल्य नहीं मिला है। यह फ़ासला बताता है कि हम और हमारी व्यवस्था किसानों के प्रति कितने असंवेदनशील है। राष्ट्रीय स्तर पर आज कोई किसानों का सर्वमान्य नेता भी नहीं रहा। कम्पनियां अपने उत्पादन का दाम खुद तय करती हैं वहीं किसान के उत्पाद का मूल्य सरकार तय करती है। विदर्भ, बुन्देलखण्ड और तेलंगाना में किसानों की आत्महत्या हमें अब नहीं झकझोरती है। विकास के चकाचौंध में हम किस तरफ जा रहे हैं?

      इस अंक की गंभीरता, व्यापकता और विविधता के मद्देनजर इसके 'अतिथि संपादन' की जिम्मेदारी डॉ.गजेन्द्र पाठक, प्राध्यापक, हिंदी विभाग, हैदराबाद, केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद, संपर्क मो. 8374701410, 8919892935 और डॉ.अभिषेक रौशन, सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद, संपर्क मो. 9441087258, 9676584598 संयुक्त रुप से उठा रहे हैं।

      इस अंक के लिए किसानों से जुड़े सभी पक्षों जैसे सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक, आर्थिक क्षेत्रों से सम्बंधित आपके लेख, साक्षात्कार, चर्चा-परिचर्चा, कहानी, नाटक और संस्मरण आदि साहित्यिक या गैर साहित्यिक रचनाएँ यूनिकोड फॉण्ट में टाइप करके हमारे ई मेल apnimaati.com@gmail.com पर 30 जून 2017 तक भेज दीजिएगा।

      भवदीय
      (जितेन्द्र यादव)
      संपादक,मो. 9001092806
      (सौरभ कुमार)
      सह-संपादक,मो. 9884732842

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  2. Apka no. Dijie plz mujhe kuchh awashyak suchna chahie.

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    1. नमस्कार,
      अपनी माटी,(ISSN 2322-0724 Apni Maati) त्रैमासिक हिंदी वेबपत्रिका (www.apnimaati.com) के अब तक 24 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। 24 अंकों तक की यह यात्रा आप सभी पाठकों और लेखकों के सहयोग के बिना संभव नहीं थी। यह बताते हुए खुशी हो रही है कि पहले अंक से 24 वें अंक के इस सफर में अपनी माटी का पाठक वर्ग साढ़े नौ लाख की संख्या को पार कर चुका है।

      आगामी अंक अपनी माटी के लिए रजत जयंती अंक है। यह अंक उस समय प्रकाशित होने जा रहा है, जब 'माटी' का सबसे नजदीकी रिश्तेदार संकट की घड़ी में है। इस घड़ी में हमारा यह अंक 'किसान विशेषांक' के रुप में किसान भाई-बहनों के संघर्षों को समर्पित है। नवउदारवादी नीतियाँ और देश की आर्थिक नीतियों की सबसे ज्यादा मार वही झेल रहे हैं। उन्हें अपने उत्पादन का सही मूल्य तक नहीं मिल पा रहा है। एक तरफ सरकारी कर्मचारियों का वेतन तेजी से बढ़ा है किन्तु उस गति से किसान के उत्पादन का उचित मूल्य नहीं मिला है। यह फ़ासला बताता है कि हम और हमारी व्यवस्था किसानों के प्रति कितने असंवेदनशील है। राष्ट्रीय स्तर पर आज कोई किसानों का सर्वमान्य नेता भी नहीं रहा। कम्पनियां अपने उत्पादन का दाम खुद तय करती हैं वहीं किसान के उत्पाद का मूल्य सरकार तय करती है। विदर्भ, बुन्देलखण्ड और तेलंगाना में किसानों की आत्महत्या हमें अब नहीं झकझोरती है। विकास के चकाचौंध में हम किस तरफ जा रहे हैं?

      इस अंक की गंभीरता, व्यापकता और विविधता के मद्देनजर इसके 'अतिथि संपादन' की जिम्मेदारी डॉ.गजेन्द्र पाठक, प्राध्यापक, हिंदी विभाग, हैदराबाद, केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद, संपर्क मो. 8374701410, 8919892935 और डॉ.अभिषेक रौशन, सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद, संपर्क मो. 9441087258, 9676584598 संयुक्त रुप से उठा रहे हैं।

      इस अंक के लिए किसानों से जुड़े सभी पक्षों जैसे सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक, आर्थिक क्षेत्रों से सम्बंधित आपके लेख, साक्षात्कार, चर्चा-परिचर्चा, कहानी, नाटक और संस्मरण आदि साहित्यिक या गैर साहित्यिक रचनाएँ यूनिकोड फॉण्ट में टाइप करके हमारे ई मेल apnimaati.com@gmail.com पर 30 जून 2017 तक भेज दीजिएगा।

      भवदीय
      (जितेन्द्र यादव)
      संपादक,मो. 9001092806
      (सौरभ कुमार)
      सह-संपादक,मो. 9884732842

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  3. नमस्कार,
    अपनी माटी,(ISSN 2322-0724 Apni Maati) त्रैमासिक हिंदी वेबपत्रिका (www.apnimaati.com) के अब तक 24 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। 24 अंकों तक की यह यात्रा आप सभी पाठकों और लेखकों के सहयोग के बिना संभव नहीं थी। यह बताते हुए खुशी हो रही है कि पहले अंक से 24 वें अंक के इस सफर में अपनी माटी का पाठक वर्ग साढ़े नौ लाख की संख्या को पार कर चुका है।

    आगामी अंक अपनी माटी के लिए रजत जयंती अंक है। यह अंक उस समय प्रकाशित होने जा रहा है, जब 'माटी' का सबसे नजदीकी रिश्तेदार संकट की घड़ी में है। इस घड़ी में हमारा यह अंक 'किसान विशेषांक' के रुप में किसान भाई-बहनों के संघर्षों को समर्पित है। नवउदारवादी नीतियाँ और देश की आर्थिक नीतियों की सबसे ज्यादा मार वही झेल रहे हैं। उन्हें अपने उत्पादन का सही मूल्य तक नहीं मिल पा रहा है। एक तरफ सरकारी कर्मचारियों का वेतन तेजी से बढ़ा है किन्तु उस गति से किसान के उत्पादन का उचित मूल्य नहीं मिला है। यह फ़ासला बताता है कि हम और हमारी व्यवस्था किसानों के प्रति कितने असंवेदनशील है। राष्ट्रीय स्तर पर आज कोई किसानों का सर्वमान्य नेता भी नहीं रहा। कम्पनियां अपने उत्पादन का दाम खुद तय करती हैं वहीं किसान के उत्पाद का मूल्य सरकार तय करती है। विदर्भ, बुन्देलखण्ड और तेलंगाना में किसानों की आत्महत्या हमें अब नहीं झकझोरती है। विकास के चकाचौंध में हम किस तरफ जा रहे हैं?

    इस अंक की गंभीरता, व्यापकता और विविधता के मद्देनजर इसके 'अतिथि संपादन' की जिम्मेदारी डॉ.गजेन्द्र पाठक, प्राध्यापक, हिंदी विभाग, हैदराबाद, केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद, संपर्क मो. 8374701410, 8919892935 और डॉ.अभिषेक रौशन, सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद, संपर्क मो. 9441087258, 9676584598 संयुक्त रुप से उठा रहे हैं।

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यूजीसी की मान्यता पत्रिकाओं में 'अपनी माटी' शामिल

नमस्कार

अपार खुशी के साथ सूचित कर रहा हूँ कि यूजीसी के द्वारा जारी की गयी मान्यता प्राप्त पत्रिकाओं की सूची में 'अपनी माटी' www.apnimaati.com - त्रैमासिक हिंदी वेब पत्रिका को शामिल किया गया है। यूजीसी के उपरोक्त सूची के वेबसाईट – ugc.ac.in/journalist/ - में 'अपनी माटी' को क्र.सं./S.No. 6009 में कला और मानविकी (Arts & Humanities) कोटि के अंतर्गत सम्मिलत किया गया है। साहित्य, समय और समाज के दस्तावेजीकरण के उद्देश्यों के साथ यह पत्रिका 'अपनी माटी संस्थान' नामक पंजीकृत संस्था, चित्तौड़गढ द्वारा प्राकशित की जाती है.राजस्थान से प्रकाशित होने वाली संभवतया यह एकमात्र ई-पत्रिका है.


इस पत्रिका का एक बड़ा ध्येय वेब दुनिया के बढ़ रहे पाठकों को बेहतर सामग्री उपलब्ध कराना है। नवम्बर, 2009 के पहले अंक से अपनी माटी देश और दुनिया के युवाओं के साथ कदमताल मिलाते हुए आगे बढ़ रही है। इसी कदमताल मिलाने के जद्दोजह़द में वर्ष 2013 के अप्रैल माह में अपनी माटी को आईएसएसएन सं./ ISSN No. 2322-0724 प्रदान किया गया। पदानुक्रम मुक्त / Hierarchies Less, निष्पक्ष और तटस्थ दृष्टि से लैस अपनी माटी इन सात-आठ वर्षों के के सफर में ऐसे रचनाकारों को सामने लाया है, जिनमें अपार संभावनाएँ भरी हैं। इसके अब तक चौबीस अंक आ चुके हैं.आगामी अंक 'किसान विशेषांक' होगा.अपनी माटी का भविष्य यही संभावनाएँ हैं।


इसकी शुरुआत से लेकर इसे सींचने वाले कई साथी हैं.अपनी माटी संस्थान की पहली कमिटी के सभी कार्यकारिणी सदस्यों सहित साधारण सदस्यों को बधाई.इस मुकाम में सम्पादक रहे भाई अशोक जमनानी सहित डॉ. राजेश चौधरी,डॉ. राजेंद्र सिंघवी का भी बड़ा योगदान रहा है.वर्तमान सम्पादक जितेन्द्र यादव और अब सह सम्पादक सौरभ कुमार,पुखराज जांगिड़,कालूलाल कुलमी और तकनीकी प्रबंधक शेखर कुमावत सहित कई का हाथ है.सभी को बधाई और शुभकामनाएं.अब जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ गयी है.


आदर सहित

माणिक

संस्थापक,अपनी माटी

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ई-पत्रिका 'अपनी माटी' का 24वाँ अंक प्रकाशित


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