शोध आलेख : हिमालयी क्षेत्र में बौद्ध धर्म-संस्कृति और अरुणाचल प्रदेश की मेम्बा जनजाति / डॉ. अभिषेक कुमार यादव

हिमालयी क्षेत्र में बौद्ध धर्म-संस्कृति और अरुणाचल प्रदेश की मेम्बा जनजाति
- डॉ. अभिषेक कुमार यादव

शोध सार : हिमालय के समूचे विस्तार में जहां एक तरफ कई देशों की सीमाएं शामिल हैं तथा उनका सामरिक महत्व है, वहीं इस क्षेत्र को बौद्ध धर्म के लिए भी जाना जाता है। सच तो यह है कि इस क्षेत्र की असली पहचान इसकी जनजातीय संस्कृति और बौद्ध धर्म ही है। बौद्ध धर्म के प्रसार ने इस क्षेत्र में आमूल परिवर्तन किया। राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत की कई यात्राएं की तथा इस बारे में उन्होंने बहुत विस्तार से लिखा है किन्तु उनके लेखन में प्रमुख हिस्सा ल्हासा और उसके पश्चिम का क्षेत्र ही है। ल्हासा से पूरब की तरफ भी बौद्ध धर्म और संस्कृति का विस्तृत प्रसार हुआ। यह लेख इसी बिन्दु को चिन्हित करता है।   

बीज शब्द : बौद्ध-धर्म, बोन, संस्कृति, मेम्बा, तिब्बत, भारत, राहुल सांकृत्यायन, नदियां, जनजातियाँ, गुरु पद्मसंभव, समाज, गोन्पा, अरुणाचल प्रदेश।

मूल आलेख : कहानियाँ खत्म होने की हजारों वजहें हैं दुनिया में, लेकिन शुरुआत हर कहानी की यारगप छूसे ही होती है। इसीलिए जब सामान्य ज्ञान की किताबें और अब गूगल मैप बस एक जानकारी के रूप में सामने लाता है यारगप छू को तो मन अटपटाकर रह जाता है। हर मनुष्य नदियों तक जाना चाहता है। एक नदी तक जाने का रास्ता कई नदियों से होकर गुजरता है। यारगप छू तक जाने से पहले सियांग’, सियोम और योमगो[i] की दहलीज़ तक जाना पड़ता है। मेम्बा लोगों से मिलने की प्रक्रिया में मेचुका घाटी के बीच से गुजरने वाली इस नदी को छुआ, उतरे उसमें और प्यार जताया, साथ ही एहसान भी। उसके किनारे की एक पहाड़ी पर खड़े होकर उसका नाम लेकर पुकारा भी। उत्तर आधुनिक प्यार में डूबा आदमी तो मग्न हो जाए यह सब सुनकर। और वो...? वो सुनती रही और मुस्कुराती रही। उसने तो ऐसे जाने कितने बावलों को देखा होगा। ऐसा ही एक दीवाना कभी उसके किनारों के साथ-साथ चला और आज पूरे हिमालय में अगर सबसे ज्यादा बार किसी का नाम लिया जाता होगा तो वह उसका ही नाम है। गुरु पद्मसंभव। गजब है दुनिया! ज़िंदा दीवानों से लड़ती है और गुजरे दीवानों से इश्क़ करती है। दीवानों की ये बातें दीवाने जानते हैं। 

अरुणाचल प्रदेश, क्षेत्र की दृष्टि से बहुत बड़ा और जनसंख्या की दृष्टि से बहुत छोटा प्रदेश है[ii] कुल दो लोकसभाएं- अरुणाचल प्रदेश (पूर्वी) और अरुणाचल प्रदेश (पश्चिमी) कुल साठ विधानसभाएँ हैं अब तक। ये बढ़ती जाएंगी समय के साथ। आबादी बढ़ने और जनप्रतिनिधित्व के कारण नहीं बल्कि सत्ता और पूंजी के कारण। मेम्बा जनजाति के रहवास का क्षेत्र करीब-करीब अरुणाचल के मध्य में स्थित है। पापुम-पारे जिले (इसी जिले में राज्य की राजधानी ईटानगर स्थित है) से मेचुका तक का रास्ता पासीघाट और आलो से होकर गुजरता है। पासीघाट, ईस्ट सियांग जिले का काफी पुराना शहर है। राज्य का पहला महाविद्यालय 1964 में यहीं खुला[iii]

पासीघाट से आलो के रास्ते में सियांग नदी का साथ मिलता है। सियांग नदी ही वह मुख्यधारा है जिसे असम में ब्रह्मपुत्र कहा जाता है। असम में ब्रह्मपुत्र की कुछ बड़ी सहायक नदियां हैं (मसलन लोहित, दिबांग, कामेंग, सुबनसिरी आदि) जो अरुणाचल प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से असम के विशाल मैदान में उतरती हैं और ब्रह्मपुत्र की मुख्य धारा में मिल जाती हैं। इस नदी का प्राकृतिक महत्व तो है ही, साथ ही पूर्वोत्तर के एक बड़े इलाके के लिए इसका ऐतिहासिक-सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व भी है[iv] पासीघाट से आलो की दूरी है करीब 110 किलोमीटर और आलो से मेचुका की दूरी करीब 190 किलोमीटर। मेचुका के रास्ते में दो उपजनजातियों के रहवास का क्षेत्र है। पाईलिबो और रामो। दोनों को ही आदी जनजाति की उपजनजाति माना जाता है।

मेचुका घाटी के मेम्बा लोगों के घर सामान्य तौर पर लकड़ी के चौड़े पटरों से बने होते हैं। इसके विपरीत तावांग के मोनपा, घर के निचले हिस्सों में पत्थरों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। हालांकि दोनों का ही कारण ठंड है। मेचुका के पुराने गोनपा तक जाने के लिएयारगप छूको पार करना पड़ता है। वहाँ के पूरे धार्मिक-आध्यात्मिक वातावरण में एक देशजता महसूस होती है। बुद्ध, उनके महान धम्म और सबसे ज्यादा उनके हिमालयी शिष्यों के बारे में कहानियों और उनके द्वारा किए गए चमत्कारों का एक पूरा भंडार है वहाँ। एक जमाने में उस गोनपा और इलाके के रिनपोछे रहे तरदीन छेक्लिंग की मूर्ति एक शीशे के बक्से में रखी हुई है। कहा जाता है कि रिनपोछे अपने मन से गोनपा के बाहर चले जाते हैं, मतलब यह कि उनकी मूर्ति अपने आप बाहर चली जाती है। आग लगने और भूकंप आने पर वे बाहर पाये गए हैं कई बार। नतीजतन उन्हें इस शीशे के बक्से में रखा गया है ताकि उनकी यायावरी पर रोक लगाई जा सके। हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक और बौद्ध दार्शनिक राहुल सांकृत्यायन अपनी पुस्तक विस्मृत यात्री[v] में छठवीं सदी के एक बौद्ध भिक्षु-यात्री नरेन्द्रयश के हवाले से बताते हैं कि पूरे हिमालय क्षेत्र में फैले बौद्ध धर्म (बाकी स्थानों के लिए भी ये बातें कमोबेश सही हैं) में बहुत सारी स्थानीय परम्पराएँ शामिल हो गईं हैं और धीरे-धीरे चमत्कारों की ढेर सारी कहानियाँ बौद्ध-भिक्षुओं के साथ जुड़ गईं। यही बात अन्य लेखकों ने भी कही है कि बौद्ध धर्म के इस इलाके में आने से पहले इन जनजातियों की जो मान्यताएं थीं, वे समय के साथ बौद्ध धर्म के साथ मिल गईं और एक नए लोक का निर्माण हुआ[vi] इस नए लोक में परंपरागत जनजातीय मूल्यों के साथ एक संगठित धर्म के मूल्य मिल गए। इसी का नतीजा है कि उस पुराने गोनपा (पहले यह पहाड़ी से नीचे यारगप छू के पास था जिसके जल जाने पर इसे नदी के किनारे ही एक ऊंची पहाड़ी पर बनाया गया है।) में कई सारे देवताओं की मूर्तियाँ हैं। चक्कर और मिर्गी ठीक करने वाले देवतासाह्भी वहाँ मौजूद हैं।

यहाँ इस बात की चर्चा कर लेना प्रासंगिक है कि तिब्बत में बौद्ध धर्म और वहाँ की पारंपरिक जनजातीय मान्यताओं के मिलने की प्रक्रिया के क्या चरण थे। तिब्बत के इस विस्तार में बसी हुई जनजातियों के पारंपरिक विश्वास को बोन[vii] कहा जाता है। बौद्ध धर्म और बोन विश्वासों के बीच बहुत अच्छा संबंध नहीं रहा। इसके बावजूद इन दोनों ने ही एक दूसरे पर बहुत प्रभाव डाला और एक दूसरे की मान्यताओं को अपने में शामिल किया[viii] बोन विश्वासों के इतिहास को तीन चरणों में समझा जा सकता है। पहला चरण तिब्बत में बौद्ध धर्म के विकास से पहले का है। इस चरण में बोन विश्वासों का मुख्य हिस्सा बुरी आत्माओं को भगाने और अच्छी आत्माओं की आराधना करने का था। दूसरे चरण में बोन विश्वासों का मुख्य हिस्सा मृत्यु से संबन्धित कर्मकांड करने तक ही सीमित रह गया था। यह समय आठवीं सदी के पूर्वार्द्ध का था। इसी समय में तिब्बत में बौद्ध धर्म का विकास शुरू हो गया था। इसके बावजूद बोन विश्वासों पर बौद्ध धर्म का प्रभाव बहुत ज्यादा नहीं था। बोन विश्वासों का तीसरा चरण आठवीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुआ जो अब तक जारी है। इस चरण में बोन विश्वासों का एक स्तर पर कायांतरण हुआ। इन विश्वासों में बौद्ध धर्म की कई बातें शामिल हो गईं[ix]

मेम्बा बौद्ध हैं। तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रसार की थोड़ी चर्चा कर लेना भी यहाँ प्रासंगिक होगा। तिब्बत में बौद्ध धर्म उस समय पहुंचा जब उसके जन्मस्थान गंगा के मैदान में उस पर (यानि उसकी दार्शनिक परंपरा और अनुयायियों पर) हमले हो रहे थे। तिब्बत के राजा स्त्रोङ्ग बचन के समय से तिब्बत में बौद्ध धर्म के विस्तार की शुरुआत हुई। मध्य तिब्बत में पैदा हुए इस राजा ने तिब्बत के बड़े हिस्से पर अपना राज्य कायम किया। यह संभवतः भोट क्षेत्र के पहले विस्तृत एकीकरण की कोशिश थी। उसने नेपाल और चीन की राजकुमारियों से शादियाँ की जिनकी मार्फत बौद्ध धर्म भोट क्षेत्र में पहुंचा। राजा ने इसके प्रचार-प्रसार की बहुत कोशिशें की[x] हालांकि यह सब बहुत सहजता से नहीं हो गया क्योंकि पूरे भोट क्षेत्र के निवासी पहले से ही अपने स्थानीय जनजातीय विश्वासों को मानते थे। पुराने विश्वासों के मानने वाले शक्ति के राजनीतिक-आर्थिक केन्द्रों ने बौद्ध धर्म का कड़ा विरोध भी किया। बौद्ध धर्म को मिले राजकीय संरक्षण के कारण उनका विरोध बहुत सफल नहीं हुआ लेकिन उनका प्रतिवाद और साजिशें लंबे समय तक चलती रही। इसी दौर में भारत से तमाम बौद्ध भिक्षु हिमालय के अंदरूनी हिस्सों में गए। शांतरक्षित जैसे महान ज्ञानी भिक्षु भी दो बार तिब्बत गए। पहली बार जब वे गए तो मङ्ग-युल के इलाके से लौट आए लेकिन दूसरी बार वे 75 वर्ष की उम्र में तिब्बत गए और फिर आजीवन वहीं धर्म प्रचार और दार्शनिक तथा धार्मिक ग्रन्थों का अनुवाद किया। वे महान भोट राजा ख्रि-स्त्रोङ्ग लदे बचन के बुलाने पर तिब्बत गए थे। इस शासक के समय (802-845 ईस्वी) तिब्बत या यूं कहे कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में बौद्ध धर्म का बहुत विस्तार हुआ तथा महान ग्रन्थों का लो-- (दुभाषिया) के माध्यम से भोटी भाषा में अनुवाद हुआ। इन्हीं गुरु शांतरक्षित के शिष्यों में से एक थे- पद्मसम्भव ये वही पद्म संभव हैं जिन्हें समूचे हिमालय के बौद्धों में बहुत सम्मान और श्रद्धा के साथ याद किया जाता है एवं उनकी पूजा की जाती है[xi] हिमालय के क्षेत्र में बौद्ध धर्म को प्रचारित करने में सबसे ज्यादा योगदान गुरु पद्मसंभव का ही है। उन्हे पूरे हिमालयी इलाके में विभिन्न नामों से पुकारा जाता हैं। उनके ज्ञान, बुरी शक्तियों को पराजित करने की शक्ति और क्रोध का बखान हर जगह है। मेचुका के गोनपा में भी उनकी ही मूर्ति केंद्र में है। गुरु पद्मसंभव को लेकर पूरे हिमालय में हजारों कहानियाँ हैं। कहा जाता है कि वे अपने ध्यान के लिए हमेशा सबसे खूबसूरत जगहें चुनते थे। अब खूबसूरती के साथ दुश्वारी तो लगी ही रही है सो समूचे हिमालय में जहां-जहां उन्होंने तपस्या की वे सारी जगहें बेहद सुंदर हैं लेकिन साथ ही उन तक पहुँचना बहुत मुश्किल है। ऐसी जगहों पर बाद में जो गोनपा बने उन्हें ताक-साङ्ग गोनपा कहा गया जिसका मतलब है शेर/बाघ की माँद। दोनों ही बातें हैं। एक तो वह महान गुरु एक ताकतवर शेर की तरह रहता था जिसको अपनी ताकत और कर्मों पर पूरा विश्वास था। दूसरा कि, ऐसा माना जाता है कि हिमालय के इलाके में कई बुरे देवता थे जिन्हें गुरु पेमासंभा (पद्मसंभव) ने पराजित किया था। वे ऐसे दीवाने थे कि लोग आज तक उनके दीवाने हैं।

तिब्बत में मिले राजकीय संरक्षण के कारण हिमालय के वृहद विस्तार में बौद्ध धर्म विकसित होने लगा। इस क्रम में कई अनोखी और रुचिकर सामाजिक अंतःक्रियाएँ और परिवर्तन हुए। बौद्ध धर्म ने हिमालयी क्षेत्र की जनजातियों के पारंपरिक विश्वासों का बहुत बार खंडन किया लेकिन बहुत बार ऐसा भी हुआ कि इन जनजातियों के पारंपरिक विश्वासों में बौद्ध धर्म मिलजुल गया। यह क्रम चलता ही रहा। बाद में तिब्बत के धार्मिक नेता के तौर पर चोङ्ग-- का उदय हुआ। वे मूलतः एक दार्शनिक और शिक्षक थे जिन्हें उनके मंगोल शिष्यों ने यह पूरा भोट इलाका अर्पित किया था जिसके बाद वे धार्मिक नेता के साथ ही सत्ता और राजकाज के केंद्र में गए। उनके शिष्य ड्गे-दुन-ग्रुब ही पहले दलाई लामा हुये जिनकी परंपरा आज तक कायम है[xii]

मेम्बा जनजाति का क्षेत्र भी तिब्बत के प्रशासनिक तंत्र के ही अंतर्गत रहा था। सारे धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक-व्यापारिक सम्बन्धों का संचालन तिब्बत के धार्मिक-प्रशासनिक तंत्र के प्रतिनिधि ही करते थे। ल्हासा की धार्मिक ताकत से ही उसकी प्रशासनिक और आर्थिक-व्यापारिक ताकत भी पैदा होती थी इसीलिए मेम्बा जनजाति की सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं में भी धर्म की बहुत मजबूत पकड़ है। मेचुका घाटी में मेम्बा जनजाति के विभिन्न गोत्रों के पहुँचने के बारे में एक मान्यता यह है कि तिब्बत के लामा छीजे लिङ्ग्बो (Lama Cheeje Lingbo), गुरु पेमा का एक छुपा हुआ खज़ाना (निश्चित तौर पर ज्ञान और बौद्ध-धर्म का) ढूंढते हुए यारगप छू के किनारे-किनारे यहाँ तक पहुंचे थे। यहीं उन्हें एक झरना मिला जिसके पत्थरों पर गिरने से माने पेमे हम की आवाज निकल रही थी। लामा ने अलग-अलग जगहों का नाम उनकी विशेषता के आधार पर रखा। मे/मेन का अर्थ दवा, छु का अर्थ पानी और खा का अर्थ बर्फ। मतलब औषधि युक्त बर्फ़ीला पानी। तो इस तरह इस क्षेत्र का नाम हुआ मेचुका[xiii] हालांकि यारगप छू की इस घाटी के लिए एक अलग नाम का प्रचलन भी रहा है। नेह-नाङ्ग नेह का मतलब है तीर्थ। नाङ्ग का अर्थ भीतर रहने वाले लोग। मतलब उन लोगों की जगह जो तीर्थों के भीतर रहते हैं। मेचुका घाटी के चारों तरफ कुल छह तीर्थ हैं जो किसी किसी रूप में बौद्ध धर्म या महान भिक्षु गुरु पद्मसंभव से जुड़े हुये हैं। मेम्बा इन तीर्थों की यात्रा करते रहते हैं। इस लिहाज से देखें तो नेह-नाङ्ग नाम भी ठीक जान पड़ता है। मेचुका में रहने वाले मेम्बा तिब्बत से आए जबकि टूटिंग में रहने वाले मेम्बा पूर्वी भूटान (तावांग के नजदीक से) से आए।

मेम्बा, तिब्बत-बर्मन भाषा परिवार की बोडिक शाखा की मेम्बा भाषा बोलते हैं। हालांकि टूटिंग और मेचुका के मेम्बा लोगों की भाषा में फर्क दिखाई देता है किन्तु यह फर्क स्थान के कारण हुआ है। दोनों की भाषाएँ एक ही भाषा परिवार से संबन्धित हैं। शादियाँ, वंश परंपरा को ध्यान में रखकर की जाती हैं। वंशान्तर[xiv] आवश्यक है और इसका पालन कड़ाई से किया जाता है। आमतौर पर बहुविवाह का चलन नहीं है जैसा कि अरुणाचल प्रदेश की कुछ प्रमुख जनजातियों में सामान्य रूप से देखा जाता है। कहने की जरूरत नहीं है कि समाज की संरचना पितृसत्तात्मक है और पुत्र ही वंश-परंपरा का वाहक माना जाता है। हालांकि यह भी कहने की जरूरत नहीं है कि स्त्रियों की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी है। शायद कठिन जीवन-यापन की परिस्थितियाँ और आध्यात्मिक और भौतिक जीवन में बौद्ध धर्म का मजबूत तंत्र इसका कारण है। मेम्बा समाज में तलाक मान्य है बशर्ते कोई वाजिब कारण हो मसलन साथी द्वारा छल किया जाना। यहाँ तक कि यदि पति बहुत क्रूर है तब भी पत्नी उससे तलाक ले सकती है[xv]

मेम्बा, तिब्बत के साथ भी व्यापारिक रिश्ते में थे और साथ ही अपनी पड़ोसी जनजातियों के साथ भी व्यापार करते थे। यह व्यापार विनिमय प्रणाली के तहत होता था। चूंकि हिमालय के इन दुर्गम इलाकों में सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र ल्हासा था (व्यापारिक ताकत भी) इसीलिए मेम्बा व्यापार करना काफी पहले ही सीख गए। अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों में सबसे तेज व्यापारी वे ही समुदाय माने जाते हैं जिनका एक स्थापित व्यापारिक संबंध ल्हासा के साथ था। इसीलिए मोनपा और मेम्बा दोनों ही व्यापार-कुशल समुदाय हैं। यह ध्यान रखने की बात है कि यह तुलनात्मकता स्थानीयता के संदर्भ में है। जब व्यापार का मतलब सामानों की खरीद-बिक्री हो, तभी यह पैमाना लागू होता है।  

पूरी मेचुका घाटी में मेम्बा लोगों की बस्तियाँ हैं। अभी शहर के इलाके में रामों, तागिन, आदी आदि जनजातियों के लोग भी रहते हैं। कुछ नौकरी के सिलसिले में आए तो कुछ ने स्थायी रहवास बना लिया है। हालांकि मेचुका के मूलनिवासी मेम्बा जनजाति के लोग ही हैं और इसके ऐतिहासिक-धार्मिक-मिथकीय प्रमाण पूरे मेचुका में मिल जाएंगे। नदी, पहाड़, झरनें, हवा, दिशाएँ, घर, गोनपा सब तरफ इसके प्रमाण हैं।

निष्कर्ष : इस लेख में उद्धृत तथ्यों और तर्कों से यह बात स्पष्ट तौर पर पता चलती है कि मेम्बा जनजातीय समुदाय मूल रूप से जनजातीय आदिम लोक-विश्वासों को मानने वाला समुदाय रहा है किन्तु तिब्बत में बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव के कारण इस समाज के लोगों ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। इस स्वीकार ने उन्हें सिर्फ एक स्थापित धर्म दे दिया बल्कि एक लिपि, ज्ञान और दर्शन की परंपरा तथा व्यवस्थित प्रशासनिक-आर्थिक तंत्र दे दिया। इन सबने मिलकर मेम्बा लोगों के जीवन को बाह्य और आंतरिक दोनों रूपों में अनुशासित कर दिया। हालांकि मेम्बा लोगों ने अपने पूर्ववर्ती विश्वासों को पूरी तरह से नहीं छोड़ दिया। जनजातीय समाज के नियमों को एक नए रूप में वे मानते रहे हैं।

संदर्भ :
[i] H. G. Joshi, Arunachal Pradesh: Past and Present, Mittal Publication, New Delhi, 2005, Pg. 15.
[ii] H. G. Joshi, Arunachal Pradesh: Past and Present, Mittal Publication, New Delhi, 2005, Pg. 01.
[iii] https://www.jncpasighat.edu.in/    
[iv] Siddhartha Kumar Lahiri, The Brahmaputra : Geomorphology, Hazards and Natural Resources, CRC Press, Boca Rato, 2023, Pg. 6-7.
[v] विस्मृत यात्री- राहुल सांकृत्यायन, किताब महल, दिल्ली, 2014, पृष्ठ- 09 
[vi] Niranjan Sarkar, Buddhism among Monpas and Sherdukpens, Directorate of Research, Itanagar, Arunachal Pradesh, Reprint, 2006, Page- 12   
[vii] Kazuharu Mizuno & Lobsang Tenpa, Himalayan Nature and Tibetan Buddhist Culture in Arunachal Pradesh, India: A Study of Monpa, Springer Japan, 2015, Pg. 94.  
[viii] Kazuharu Mizuno & Lobsang Tenpa, Himalayan Nature and Tibetan Buddhist Culture in Arunachal Pradesh, India: A Study of Monpa, Springer Japan, 2015, Pg. 95.
[ix] Kazuharu Mizuno & Lobsang Tenpa, Himalayan Nature and Tibetan Buddhist Culture in Arunachal Pradesh, India: A Study of Monpa, Springer Japan, 2015, Pg. 95.
[x] राहुल सांकृत्यायन, तिब्बत में बौद्ध धर्म, किताब महल, दिल्ली, 2014, पृ. 4-5
[xi] राहुल सांकृत्यायन, तिब्बत में बौद्ध धर्म, किताब महल, दिल्ली, 2014, पृ. 9-10
[xii] राहुल सांकृत्यायन, तिब्बत में बौद्ध धर्म, किताब महल, दिल्ली, 2014, पृ. 37
[xiii] D.K. Dutta, The Membas of Mechuka Valley, Directorate of Research, Arunachal Pradesh, Pg. 09-10
[xiv] D.K. Dutta, The Membas of Mechuka Valley, Directorate of Research, Arunachal Pradesh, Pg. 52
[xv] D.K. Dutta, The Membas of Mechuka Valley, Directorate of Research, Arunachal Pradesh, Pg. 53-56

डॉ. अभिषेक कुमार यादव
सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, राजीव गांधी विश्वविद्यालय, रोनो हिल्स, दोईमुख
ykabhishek@gmail.com

  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
अंक-47, अप्रैल-जून 2023 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक व जितेन्द्र यादव चित्रांकन : संजय कुमार मोची (चित्तौड़गढ़)

1 टिप्पणियाँ

  1. तिब्बती संस्कृति और बौद्ध-धर्म का पूर्वोत्तर में समावेशन | आपका आभार |

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