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'' ‘दलित उत्थान’ की विवेचना अधिकांश आलोचकों ने बहुत ही सीमित दृष्टि से की है''-डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, नवंबर 06, 2012 | मंगलवार, नवंबर 06, 2012


  • पुस्तक  समीक्षा “ डॉ. भीमराव अम्बेडकर की नारी-चेतना विषयक दृष्टि ”
  • डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

डॉ. अम्बेडकर ‘दलित उत्थान’ की दृष्टि से स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात् सर्वाधिक प्रभावशाली विचारक रहे हैं, परन्तु ‘दलित उत्थान’ की विवेचना अधिकांश आलोचकों ने बहुत ही सीमित दृष्टि से की है और उसमें भी मात्र ‘वर्णव्यवस्था’ पर ही ध्यान दिया है । वस्तुतः ‘दलित’ शब्द का तात्पर्य समाज के उस वर्ग से है, जिसकी सदियों से उपेक्षा की गई है तथा जिसकी इच्छा शक्ति को पनपने न देकर बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया । डॉ. अम्बेडकर के विचारों में ‘दलित’ शब्द भी अति व्यापकता के साथ आया है, जिसमें स्त्रियों सहित प्रत्येक वह व्यक्ति जो समाज के तथाकथित ठेकेदारों द्वारा उसके बुनियादी अधिकारों से भी वंचित रखा गया । ‘भारतीय नारी’ के बारे में भी बाबा साहब का चिन्तन प्रगतिशील रहा । इस दृष्टि से डॉ. (सुश्री) शरद सिंह तथा गुलाबचंद के संयुक्त लेखन में प्रकाशित पुस्तक ‘डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श’ नई चेतना को जाग्रत करने वाली प्रतीत होती है । 

इस पुस्तक में सात अध्याय हैं, जिसमें क्रमशः बाबा साहब का जीवन परिचय, उनके जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियाँ, जाति प्रथा और असमानता के बीज, स्वतंत्रता पूर्व भारत में स्त्रियों की दशा, स्वतंत्रतापूर्व स्त्री उद्धार के प्रयास, डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श तथा स्त्री उद्धार हेतु हिन्दू कोड बिल आदि का पर्याप्त विवेचन के साथ बाबा साहब के संपूर्ण व्यक्तित्व को उजागर किया गया है । डॉ. भीमराव अम्बेडकर के स्त्री-विमर्श को व्यापक अर्थ में तार्किक ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास लेखकद्वय ने किया है ।

‘नारी विमर्श’ शब्द हिन्दी कथा साहित्य के केन्द्र में पर्याप्त रूप से चर्चित रहा है, इसकी अभिव्यक्ति का मूल स्वर नारियों की आत्मनिर्भरता एवं नारी-पुरूष की समानता के आस-पास घूमता हुआ दिखाई देता है । आर्थिक स्वावलम्बन के अभाव में नारी अपने ही परिवार में शोषित होती रहती है और अपने बुनियादि अधिकारों से वंचित भी रहती है । स्त्री को आर्थिक अधिकार, पुरूषों के बराबर न होने के कारण विवाहिताएँ अपने पति द्वारा छोड़ दिए जाने के भय से ग्रसित रहती हैं । वे जानती हैं कि परित्यक्ता स्त्री को समाज सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता है । 

प्रस्तुत पुस्तक में यह रेखांकित किया गया है कि स्वतंत्र भारत के कानून मंत्री के रूप में डॉ. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में एक महत्त्वपूर्ण विधेयक तैयार किया गया था, जिसके द्वारा विवाह की आयु-सीमा बढ़ाना, स्त्रियों को विवाह-विच्छेद का अधिकार देने, विरासत का अधिकार देने, भरण-पोषण के लिए धन देने तथा दहेज को स्त्री-धन माने जाने का प्रस्ताव दिया गया था । यद्यपि यह विधेयक ज्यों का त्यों पारित नहीं हो सका, तथापि चार पृथक् कानूनों के रूप में आज काफी सीमा तक स्त्रियों को आर्थिक व सामाजिक स्वतंत्रता दिलाने में मददगार रहा है ।(पृ.80)

भारतीय समाज में नारी और पुरूष के लिए अलग-अलग प्रतिमान देखे जा सकते हैं । स्त्रियों की शिक्षा भी इस दोहरे मापदण्ड का शिकार है । डॉ. अम्बेडकर जानते थे कि जब तक स्त्रियों का ध्यान शिक्षा की ओर नहीं जाएगा, तब तक स्त्रियों का उद्धार संभव नहीं है । ‘महाड़’ में चर्मकार समुदाय की स्त्रियों को सम्बोधित करते हुए उनहोंने कहा था- “तुम्हारे पति और पुत्र शराब पीते हैं तो उन्हें खाना मत दो । अपने बच्चों को स्कूल भेजो ।”(पृ.81)

समाज की प्रगति नारी-प्रगति के अभाव में अधूरी है, क्योंकि वह समाज का आधा हिस्सा होती है । 19 जुलाई, 1972 को नागपुर में सम्पन्न “दलित वर्ग परिषद्” की सभा में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का उक्त कथन अवलोकनीय है- “नारी जगत् की प्रगति जिस अनुपात में हुई होगी, उसी मानदण्ड से मैं उस समाज की प्रगति को आँकता हूँ” (पृ.82) उन्होंने गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली स्त्रियों से आग्रह किया था “आप सफाई से रहना सीखो, सभी अनैतिक बुराइयों से बचो, हीन भावना को त्याग दो, शादी-विवाह की जल्दी मत करो और अधिक संताने पैदा मत करो ।”(पृ.82) लेखकद्वय ने उनके विचारों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है ।

नारी-चेतना की दृष्टि से स्त्रियों में आत्मचेतना का विकास आवश्यक है । पुरूष और नारी जीवन-रथ के दो पहिए हैं, दोनों को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए । डॉ. अम्बेडकर का स्पष्ट कथन है- “पत्नी को चाहिए कि वह अपने पति के कार्य में एक मित्र, एक सहयोगी के रूप में दायित्व निभाए । लेकिन यदि पति गुलाम के रूप में बर्ताव करे तो उसका खुल कर विरोध करें । उसकी बुरी आदतों का खुलकर विरोध करना चाहिए और समानता का आग्रह करना चाहिए ।” (पृ.82)

इसी प्रसंग में लेखक द्वय का यह कथन समीचीन है कि स्त्री-पुरूष की जिस समानता की कल्पना डॉ. अम्बेडकर ने की थी, वह बहुसंख्यक परिवारों में आज भी नहीं है । पुरूष घर का मुखिया है, स्त्री को बराबरी का आर्थिक अधिकार भी नहीं है, भले ही वह कमाऊ स्त्री हो ।” (पृ.83) साफगोई के साथ ये विचार भी द्रष्टव्य है- “आज स्त्रियों का बड़ा प्रतिशत साक्षर है, फिर भी अंधविश्वास से पूरी तरह उबर नहीं पाया है । आज भी ग्रामीण अथवा मध्यमवर्गीय शहरी युवती मनचाहे युवक से विवाह नहीं कर पाती है । ....................पुत्र की लालसा में पुत्रियाँ पैदा करते हुए संतानों की संख्या बढ़ाने अन्यथा कन्या भ्रूण को मारने के उदाहरण भी समाज में बहुसंख्यक है । ..........दहेज जैसे प्रकरणों में पढ़े लिखे तथा सवर्ण वर्ग की स्त्रियाँ भी दलितों-सा जीवन जीने को विवश है ।” (पृ.84-85) 

समग्रतः उक्त कृति डॉ. अम्बेडकर के नारी विषयक दृष्टिकोण को पूरी ईमानदारी से उजागर करती है साथ ही डॉ. शरद सिंह तथा गुलाबचन्द के मौलिक विचारों को भी अभिव्यक्ति प्रदान करती है, जिसमें उनका दृष्टिकोण है- “यह ठीक है कि आज गाँव की पंचायतों से लेकर देश के सर्वोच्च पद तक स्त्री मौजूद हैं, लेकिन इसे देश की सभी स्त्रियों की प्रगति मान लेना ठीक उसी प्रकार होगा जैसे किसी प्यूरीफायर के छने पानी को देखकर गंगा नदी के पानी को पूरी तरह स्वच्छ मान लिया जाए ।” (पृ.85) 

पुस्तक पठनीय, संग्रहणीय एवं विवेचनीय है । संदर्भ- ग्रथों के आधार से प्रामाणिकता पर प्रश्नचिहन भी नहीं है । मुद्रण कार्य त्रुटिरहित व कलेवर आकर्षक है ।



डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी
(अकादमिक तौर पर डाईट, चित्तौडगढ़ में वरिष्ठ व्याख्याता हैं,आचार्य तुलसी के कृतित्व और व्यक्तित्व पर ही शोध भी किया है.निम्बाहेडा के छोटे से गाँव बिनोता से निकल कर लगातार नवाचारी वृति के चलते यहाँ तक पहुंचे हैं.शैक्षिक अनुसंधानों में विशेष रूचि रही है. राजस्थान कोलेज शिक्षा में हिन्दी प्राध्यापक पद हेतु चयनित )

ई-मेल:singhvi_1972@rediffmail.com
मो.नं.  9828608270

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1 टिप्पणी:

  1. हार्दिक आभार डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी जी....

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