सम्पादन सहयोग
स्तुति राय, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, एस.एस. खन्ना कॉलेज, प्रयागराज
संजय साव, शोधार्थी, हिन्दी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय,दिल्ली
प्रस्तावना
नामवर सिंह ने अपने नाम को सार्थकता प्रदान की- ‘यथानामे तथागुणे’। वे हिन्दी के सबसे चर्चित आलोचकों में से हैं और उतना ही विवादित भी! नामवर सिंह ने हिन्दी आलोचना को जटिलता से न केवल मुक्त कराया बल्कि उसे लोकप्रियता के शिखर पर भी पहुँचाया। उन्होंने हिन्दी आलोचना को नया दृष्टिकोण प्रदान किया। साहित्य एवं कला के सामाजिक महत्त्व पर नए सिरे से विचार किया और उसकी सामाजिक उपादेयता में प्रगतिशील वैचारिकी का अमली जामा पहनाया। नये दौर के साहित्य को वह पारम्परिक दृष्टिकोण से देखने के पक्षपाती नहीं थे। यही कारण है कि रूढ़ पारंपरिक और पुराने पड़ चुके साहित्यिक सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिमानों को उन्होंने बदलने की वकालत की। नये दौर के साहित्य में विचारधारा (वैचारिकी) महत्त्वपूर्ण थी, जिसका मूल्यांकन सामंतयुगीन साहित्य सिद्धान्तों से संभव नहीं था। कविता और आलोचना के क्षेत्र में उन्होंने साहित्य के नये प्रतिमानों को गढ़ा और ‘दूसरी परम्परा की खोज’ का कठिन मार्ग प्रशस्त किया।
नामवर सिंह का आलोचकीय दायरा सिर्फ़ हिन्दी तक सीमित नहीं है। सच्चे अर्थों में
वह भारतीय साहित्य के समीक्षक थे। हिन्दीतर भाषाओँ के अद्यतन साहित्य का विषद
अध्ययन था। यही कारण है कि उनकी ख्याति महज़ हिन्दी तक सीमित नहीं थी। वह हिंदी के
बाहर भी उतने ही समादृत थे। उनकी दृष्टि भारतीय भाषाओँ में लिखे जा रहे साहित्य पर
तो थी ही, साथ ही विश्व साहित्य में आ रहे नवाचारोन्मुखी भी थी।
हिंदी समीक्षा एवं आलोचना को नामवर सिंह ने बहुत कुछ दिया है। हिन्दी आलोचना
को एक नयी धार दी। नामवर सिंह ने हिंदी अकादमिक जगत् का मार्क्सवादी साहित्य चिंतन से ‘व्यापकता और
गहराई’ में परिचय करवाया। छायावाद से रहस्यमयता का आवरण हटाने और उसे ‘राष्ट्रीय
जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति’ के रूप में स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य
किया। आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार ‘अपभ्रंश साहित्य के अध्येता हुए हैं
लेकिन नामवर सिंह उसके आलोचक थे|’ नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि में ‘प्रासंगिकता
का प्रमाद’ नहीं है, बल्कि विचारधारा की गहराई और समाजशास्त्र की व्यापकता है। वे ‘इतिहास
की शव साधना’ के बजाय इतिहास को ऐतिहासिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य
में व्याख्यायित करने के पक्षधर थे। नामवर सिंह सांप्रदायिक उन्माद के दौर में
‘ज़माने से दो-दो हाथ’ करने को भी प्रतिबद्ध हैं। नामवर सिंह को ‘वाद-विवाद और
संवाद’ के लिए भी जाना जाता है।
नामवर सिंह के आलोचना की अपनी विशेषता, सीमायें और कुछ विसंगतियां भी हैं। विशेषकर
अज्ञेय, रामचंद्र शुक्ल और तुलसीदास सम्बंधित उनकी मान्यताओं में बाद
में हुए बदलाव के कारण। हिंदी में साहित्यिक विमर्शों के मद्देनज़र उनकी दृष्टि की
सीमाओं का भी अंदाज़ा लगता है।
नामवर सिंह का जन्मशताब्दी वर्ष शुरू हो चुका है। आज वे हमारे बीच होते तो
ख़ुशी-ख़ुशी जन्मशताब्दी वर्ष में शरीक होते; जैसे उन्होंने अपने षष्टिपूर्ति या
अन्य समय-समय पर मनाये गए जन्मोत्सवों में मुदित-मगन मन से शामिल हुए। उनका
व्यक्तित्त्व और कृतित्त्व बहुत व्यापक है। वे हमारे बीच भौतिक रूप में उपस्थित
नहीं हैं; उनका कृतित्त्व है। हिंदी साहित्य पर उनकी आलोचकीय आभा तरोताज़ा है। इसी
के सहारे उनके किये-अनकिये का मूल्याँकन साहित्यालोचकों को करना है। नामवर सिंह
अपने पीछे विवेक सम्मत साहित्यालोचकों-पाठकों की एक लम्बी कतार भी छोड़ गए हैं। हमारा
प्रयास है कि जन्मशताब्दी वर्ष के बहाने हम अपने शीर्षस्थ आलोचक को याद करें। उनके
कृतित्त्व का मूल्यांकन एवं पुनर्पाठ हो। उनसे प्राप्त साहित्यिक दृष्टि और आलोचकीय
परम्परा का विकास हो। नामवर सिंह पर बहुत शोधकार्य हो चुका है, बहुत सारे विशेषांक पहले
भी आ चुके हैं लेकिन हमारा उद्देश्य है कि नामवर सिंह से उनके अंतिम दिनों में
जुड़े शोधार्थी-विद्यार्थियों का अनुभव भी सामने आये। साहित्य अध्येता की युवा पीढ़ी नामवर
सिंह को कैसे देखती-समझती है! इन्हीं कौतुक के साथ इस विशेषांक की प्रस्तावना बनी
है! आप सभी जुड़ेंगे इस उम्मीद के साथ आप सभी के
शोधपूर्ण आलोचकीय आलेखों का स्वागत है! धन्यवाद।
प्राथमिक स्तर पर चयनित आलेख
(यह सूची अभी अंतिम नहीं है. इसमें जोड़ा और घटाया जा सकता है.)
- महादेवी वर्मा के सन्दर्भ में ‘तृप्ति’ और ‘अतृप्ति’: कमलेश वर्मा
- हिंदी आलोचना, मार्क्सवाद और नामवर सिंह : वैभव सिंह
- नामवर सिंह की स्त्री-दृष्टि : एक आलोचनात्मक पाठ : प्रोमिला
- प्रेमचंद के साहित्य का समाजशास्त्र, जाति का सवाल और नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि : अमिष वर्मा
- अपभ्रंश-हिंदी संबंध, पृथ्वीराज रासो और नामवर सिंह की इतिहास दृष्टि : दलपत राजपुरोहित
- आलोचना के नामवर : आलोचना की भाषा, सृजनात्मकता और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: शशि भूषण मिश्र
- आलोचना में नामवर : सत्याव्यास
- इतिहासबोध और ‘दूसरी परम्परा’ : नामवर सिंह की इतिहासदृष्टि : शुभनीत कौशिक
- भाषा की कसौटी पर ‘नामवरी आलोचना’ : अभय कुमार
- नामवर सिंह की दृष्टि में इतिहास और आलोचना : प्रभाकर सिंह
- बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी: नामवर सिंह, हिन्दी आलोचना और अस्मिता-विमर्श के अंतर्विरोध : प्रियंका सोनकर
- नामवर सिंह की कहानी आलोचना : कहानी की प्रतिष्ठा और इसकी समीक्षा के नये प्रतिमान-निर्माण का सार्थक प्रयास : इन्द्रमणि कुमार
- हिन्दी साहित्य का आदिकाल और नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि : दीपशिखा सिंह
- परंपराओं के ‘देहरी दीपक’ के रूप में भक्ति-काव्य: नामवर सिंह की स्मृति में : संगीता कुमारी
- नामवर सिंह की दृष्टि में अज्ञेय और मुक्तिबोध : एक समीक्षा रजनीश कुमार यादव
- नामवर सिंह की शमशेर सम्बन्धी आलोचना : धीरेन्द्र कुमार
- नामवर सिंह के नागार्जुन : सुमित चौधरी
- नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि और आलोचना पत्रिका : शालिनी
- वाचिक परंपरा के काव्यशास्त्री चिंतक : नामवर सिंह : आकाश शंकर
- नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि और नई कविता का मूल्यांकन : योगेश कुमार और कमलेश कुमारी
- आचार्य नामवर सिंह की आलोचना पद्धति : जितेंद्र कुमार बिश्वाल एवं सिद्धार्थ शंकर राय
- सृजनशील संवादधर्मी आलोचक-प्रो. नामवर सिंह : मार्तण्ड सिंह
- हिंदी आलोचना में डॉ.नामवर सिंह का योगदान : प्रतिमा सिंह
- भारतीय औपन्यासिक परिदृश्य और नामवर सिंह : पवन साव
- नामवर सिंह जीवन के कुछ प्रसंग : महेन्द्रपाल शर्मा
- एहसास-ए-बरतरी से ख़ुदा हो गया हूँ मैं’ दिव्यानंद
- शिव से शिवालिक की यात्रा : छाया चौबे
- साहित्येतिहास के पुनर्लेखन पर नामवर जी के कुछ विचार : स्तुति राय
विशेषांक से जुड़े समस्त संवाद के लिए एकमात्र पता
birjuhindijnu@gmail.com मो. 9968396448, 9811190748
अंक प्रकाशन तिथि 31 मार्च, 2026
(विशेषांक हेतु अब रचनाएं नहीं ले रहे हैं.)


