Latest Article :
Home » , , , » कविता: संजीव बख्‍शी

कविता: संजीव बख्‍शी

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 31, 2013 | रविवार, मार्च 31, 2013

अप्रैल 2013 अंक (यह रचना पहली बार 'अपनी माटी' पर ही प्रकाशित हो रही है।)                           


(हिंदी के कवि 
संजीव बख्‍शी 
अपने कविता संग्रहों- 
तार को आ गई हल्‍की हँसी, 
भित्‍ति पर बैठे लोग
जो तितलियों के पास है
सफेद से कुछ ही दूरी पर पीला रहता था 
व 
के लिए जाने जाते हैं। 
हाल ही आदिवासियों के मिजाज 
पर आया उनका उपन्‍यास 
'भूलनकांदा' 
खासा चर्चित रहा है। 
छत्‍तीसगढ़ शासन के 

संयुक्‍त सचिव पद से हाल ही में 

सेवानिवृत्‍त बख्‍शी ने 

एफ 23 ,न्‍यू पंचशील नगर 
रायपुर 
छत्‍तीसगढ़ 
492001 
(1)नहीं जाना छोड कर यह ठौर

न जाने क्‍या है यहां 
क्‍यों यहां रहना ऐसा लगता है कि 
यही है 
जिसे रहना कहते हैं 
दिन भर की व्‍यस्‍तता अपने आप  
जीवन राग अपने आप 
एक संगीत 
जो लगातार बजता रहता है
किसी ने आकर फूंक दी है बांसुरी 
इसे छोड् कहीं और रहने की बात 
कैसे हो सकता है
यहां सुबह सुबह सात बजे पीछे दूर एक मंदिर में बजती है घंटी 
बाल्‍टी हंडों के टकराने की आवाज नियमित 
पीछे  मोहल्‍ले में पानी भरने को लेकर घमासान 
तब तक एक स्‍कूल की बस आ जाती हैं पीछे 
नाश्‍ते के पहले पहले  एक आवाज आती है कहीं दूर से 
एक रेल गाडी निकलती है 
उसकी लंबी सीटी 
कुकर की सीटी और इस सीटी में जैसे कोई मुकाबला 
कभी रेल पहले कभी कुकर 
सामने मैदान पर आ गए हैं हल्‍ला मचाते बच्‍चे पीछे की झुग्‍गी में रहने वाले 
बकरियां उनके बच्‍चों के साथ 
लोहे के फाटक खोल रहे हैं बार बार बच्‍चे कि बाल आ गया है भीतर 
बकरियां खोल रही है फाटक कि भीतर है हरियाली 
दोनों की सोच में शायद हो 
यह फाटक बंद करने की परम्‍परा ही गलत 
हरियाली है तो यह सबके लिए 
और बच्‍चे यदि भगवान है तो यह फाटक क्‍यों 
दुपहरी का यह काम 
कोई कहे गैरजरूरी पर ऐसा नहीं 
यही नहीं नए शहर के नए मकान में 
या उसके आसपास 
न सामने मैंदान न पीछे कोई सड्क 
न मंदिर की घंटी सात बजे 
न उतनी दूरी पर रेल लाइन 
यह सब मिल कर लगता है कोई एक राग बन गया है 
जीवन जीने का राग 
एक कठिन शास्‍त्रीय संगीत सा  
इसी कठिन शास्‍त्रीय संगीत में काम वाली बाई की मां बीमार रहती है 
इलाज के लिए महिना के बीच मे पगार मांगती है बाई 
सब्‍जी वाली आती है और जानती है कि घर में
कौन कौन सी सब्‍जी खाई जाती है 
भिंडी एक किलो कहने से पूछती है मेहमान हैं 
तय है इस घर के काम काज 
तय है बाई के आने का समय 
सब्‍जी वाले का ,अखबार वाले का समय 
आम के मौसम में साल के साल एक कोयल बिना नागा आती है 
कू कू करती 
यहां सुबह उठते ही पता है सूरज  पेड् के उस पार से उगता है 
चौथ की रात चांद ढूढने पूरा आसमान झांकने की जरूरत नहीं 
बेटा कहता है अकेले यहां कहां रहोगी 
अकेले कहां 
यहां सब कुछ है जो और कहीं नहीं ।


(2)एक गरीब बीमार के लिए जरूरी है एक गरीब चिकित्‍सक 

एक गरीब बीमार के लिए 
जरूरी है एक गरीब चिकित्‍सक 
जो सस्‍ती दवाईयों के नाम जानता है नब्‍ज पर हाथ धर 
जान ले मर्ज पूछे न सुबह क्‍या खाया 
चिकित्‍सक पर तरस खाए 
गरीब बीमार 
कि हम फीस देंगे तब तो उसका चलेगा घर
क्‍या खाएगा 
जो रख दो 
देखता नहीं कितना है 
कि सोच समझ कर देना चाहिए फीस 
मोहल्‍ले भर ने ले ली है एक तरह से जिम्‍मेदारी 
गरीब चिकित्‍सक की 
मोहल्ले की बैठक में 
सौ की तय कर दी है फीस 
और यह भी कि कोई चिकित्‍सक से न कहे 
कि यह तय फीस है कि उनको लगे यह है अपने आप 
गरीब चिकित्‍सक ने देखा 
आखिर में रात को 
तो देखे सौ सौ के नोट 
उसे याद आ गए चेहरे 
उस दिन थे जो बीमार 
याद हो आया कि 
कैसे संभल संभल कर रखते गए थे ये नोट 
कि और दिन की तरह 
किन्‍हीं चेहरों पर मासूमियत कम थी 
वह चेहरों पर मासूमियत चाहता था 
फिर से वही होना चाहता था 
गरीब चिकित्‍सक 
एक गरीब चिकित्‍सक के लिए जरूरी है 
गरीबों के चेहरे पर मासूमियत 
गरीब मोहल्‍ला 
के लिए जरूरी है पास एक गरीब चिकित्‍सक
सच जानें 
इस चिकित्‍सक की समझ से अलग
और इस चेहरे की मासूमियत के बरक्‍स 
कोई अमीर नहीं होना चाहता 
यहां मालकौंस का अलाप चल रहा था 
सब एक साथ गा रहे थे 
एक कवि मुग्‍ध सुन रहा था । 
Share this article :

6 टिप्‍पणियां:

  1. भूलन कांदा उपन्‍यास के बाद कम ही कविता लिख पाया ा यह बिलकुल नई कविता जिसे पूरी ही की कि मानिक भाई से अपनी माटी के प्रवेशांक के बारे में पता चला ा यहां अपनी कविताओं को देख कर प्रसन्‍नता हो रही है । प्रवेशांक के लिए बहुत बहुत बधाई । पूरा अंक सुंदर है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. संजीव जी
    आपने 'अपनी माटी' को मान दिया वरना बड़े लोग अक्सर 'मानदेय' और प्रिंट पत्रिकाओं में उलझे रहते हैं।आपकी पहली कविता बड़ी अच्छी लगी जहां कोई अनावश्यक कलाकारी नहीं ठूँस कर आपने रोज़मर्रा की डायरी को सरल और सहज ढंग से उकेरा है।सीधापन लाने के लिए भी बड़ी मेहनत करनी होती है।हमारे जीवन में बाज़ार के प्रवेश के बाद ख़त्म होती आत्मीयता के बीच आपने काम वाली बाई आदि के उदाहरण देकर हमें फिर से झकझोरा है।इस अंक को अपनी दो ताज़ा कवितायेँ दान देने हेतु शुक्रिया-माणिक

    उत्तर देंहटाएं
  3. भूलन कांदा पढ़ने का बड़ा मन है।हो सका तो हम साथियो के बीच उस पर चर्चा भी रखे।मगर 'हो सका तो' खैर।आपकी दूजी कविता पढ़ते हुए मामला समझने में वक़्त लगा।मगर आखिरकार एक कवि के मन की बात हु-ब -हूँ पाठक समझ जाए ये मसला थोड़ा सा पाठक की मेधा पर भीडिपेंड करता है।मगर जिस भाव को रचने के लिए आपने प्रयास किया वह एक अछूता विषय लगता है।आपकी कविता में बनावटीपन नहीं मिलता ये भी आपका एक बड़ा गुण है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. Apko meri kavitayan Bapu aur Aanchal achi lagi, padhkar mera jivan safal ho gaya,Sanjeev ji. Aap jaise mahan kavi ko meri rachanayan achi lagi yehi meri mandey hai, Sanjeev ji. Dhanyabad Sanjeev ji...............Rajiv Anand

    उत्तर देंहटाएं
  5. मानिक जी दूसरी कविता के अंत में यह जोड् रहा हूं । मैं सोचता हूं इससे कुछ कविता खुल रही है। आपकी बात से मुझे तसल्‍ली हुई कि कविता मैंने सहीं जगह पर डाली धन्‍यवाद

    यहां मालकौंस का अलाप चल रहा था
    सब एक साथ गा रहे थे
    एक कवि मुग्‍ध सुन रहा था ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. राजीव आनंद जी आपकी सभी कविताएं सादगी से लिखी गई कविताएं हैं उनमें से दो जो तुरंत अच्‍छी लगी पर महान कवि कहा जाने से डर लगता है । हम सब एक साथ कविताएं लिख रहे हैं कभी मैंने कोई अच्‍छी लिख ली कभी आपने

    उत्तर देंहटाएं

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template