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नटवर त्रिपाठी का फीचर:शिगमोत्सव: गोवा में रंगो का मेल

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 31, 2013 | रविवार, मार्च 31, 2013

अप्रैल 2013 अंक
शिगमोत्सव: गोवा में रंगो का मेल

समूचे भारतीय अंचल में होली का त्योहार हर गांव, कस्बे और शहर में अपनी-अपनी अनूठी आंचलिक मान्यताओं की खुशबू लिए उल्लास और मौज-मस्ती के चरम पर होता है। होली  का मूल नाम होलिका है। इस त्योहार की प्राचीनता इससे जान पड़ती है कि होलिका का उल्लेख नारद पुराण, भविष्य पुराण, प्राचीन जैमिनी मीमांसा-सूत्र आदि अनेक प्राचीन ग्रन्थों सहित ऐतिहासिक शिलाखण्डों, शैलचित्रों, मूराल व चित्र शैलियों में देखने को मिलता है। मुस्लिम इतिहासवेता अल बुरानी ने भी होलिकोत्सव का वर्णन किया है और उसकी मान्यता है कि यह त्योहार हिन्दू ही नहीं मुस्लिम समुदाय भी मनाता है। 


बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के दहन और उसके पुत्र प्रहलाद के जीवित बचे रहने की दैविक अद्भुतता के आख्यान, कामदेव के शिव को शाप वाले प्रसंग तथा राधा-कृष्ण के अप्रतिम प्रेम जैसे ऐसे अनेक संदर्भों यह रंगो का फाल्गुनी त्योहार है। होली का समय खेतों में धान पकने का होता है, अच्छी फसल की कामना में किसानों की होली उमंगी उभर क रनज़र आती है। कुलु में बर्फ में गुलाल को मिला कर होली के रस्मो-रिवाज, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल शांतिनिकेतन में वसन्तोत्सव, डोलपूर्णिमा व चैतन्य महाप्रभु के जन्म दिवस के रूप में भी यह त्योहार मनाया जाता है, हरियाणा में धुलण्डी के रूप में देवर-भाभी के कुतुहल, गुजरात में ‘गोविन्दा आला रे जरा मटकी संभाल’ बोलों के साथ सामूहिक दधी-माखन की मटका फोड़ होली, महाराष्ट्र में रंगपंचमी और शिमगो के रूप में होली पर्व पर अनेक आयोजन होते हैं। 

बिहार में फगुआ, तमिलनाडू तथा दक्षिण में कामनाहाबा, उत्तरप्रदेश में बरसाने की लट्ठमार होली, पंजाब में होली-मोहल्ला, आन्ध्रप्रदेश की बंजारा होली, राजस्थान व मध्यप्रदेश नीमार और झाबुआ के आदिवासियों का नदियों और तालाबों के किनारे एकत्रित हो होली दहन और घरों से आई रोटी और अन्य वस्तुओं को मिला कर बांट कर खाने तथा भगोरिया, विवाह योग्य युवक-युवतियों का भाग कर विवाह करना, गुजरात के राठवा आदिवासियों की रंग होली के नाम से होली महोत्सव होता है। यूं भारत के बाहर बांगलादेश, पाकिस्तान, इंगलैण्ड, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम, त्रिनीडाड, मोरिशयस आदि देश जहां भारतीय लोग रचे बसे हैं, बड़े उल्लास के साथ होली मनाते हैं। 
  
परन्तु समूचे गोवा में होली उत्सव शेष भारत के होली उत्सव से भिन्न तरीके बड़े उल्लासपूर्ण तरीके से मनाया जाता है। किन्तु होली दहन के पीछे जो भाव और मूल तत्व सर्वत्र दिखलाई पड़ता है और संस्कृति को समूचे देश को जोड़ता है वह तत्व सर्वत्र एक समान है। गोवा में चाहे अलग तरह से होली मनाई जाती है परन्तु वहां भी वही सांस्कृतिक तत्व मौजूद है। गोवा में शिगमो उत्सव होली का पर्याय है। हम यहां गोवा-गोमान्तक होली की चर्चा करते हैं:

पश्चिमी घाट के सैयाद्री पहाड़ों और अरबसागर के मध्य गोवाचंल, नारियल की बन्दनवारों, सदा नीरा सरिताओं, नीली झीलों के मध्य नाना वनस्पतियों से अटापटा गोवा प्रदेश है। यहां चप्पे-चप्पे पर बिछी हरितिमा की मोटी चादर, मनमोहक समुद्री किनारे, वृक्षों से आच्छादित पर्वत श्रेणियां, सुपारी, काजू-कटहल, नारियल तथा बोगनवेलिया की रंगबिरंगी बेशुमार वृक्षावली, चावल के हरेभरे खेत, समुद्र में जाल फैलाते और मछलियां पकड़ते मछुआरे, अरब सागर की गोद में अवस्थित गोवा का नैसर्गिक सौन्दर्य देश को अनुपम उपहार है।  प्रकृति के इस अनुपम अवदान में सदियों प्राचीन मन्दिर, लोकोत्सव, नृत्य-संगीत, लोकशिल्प और संस्कृतिक मेलझोल गोवा की होली के पर्याय शिगमो उत्सव में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता और एक भिन्न प्रकार के महोत्सव की पहचान कराता है।  


गोवा की कोकणी भाषा में शिगमो प्राकृत शब्द सुगीमाहो तथा संस्कृत के सुगरिशमका शब्द से आया है।  जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि शिगमो उत्सव गोवा में होली की पहचान है। साल के अन्तिम मास के पूर्ण चन्द्र याने पूर्णिमा से यह उत्सव दो सप्ताह तक और कहीं-कहीं और आगे तक चलता है। रबी की फसल पक जाने और सारे खेतों में सुनहरी व हरी चादर बिछी दिखलाई पड़ने तथा दशहरी आमों पर फैली आम्रपाली तथा काजू की जटाजूट वृक्षावली से उल्लासित सम्पूर्ण गोवा के स्त्री-पुरूष तथा बाल-आबल इस त्योहार में गीत-भजनों की स्वरलहरियां, नृत्यों की धूम और आध्यात्मिक जात्राओं के साथ आम लोग प्रेम, आनन्द तथा उल्लास से सराबोर दिखलाई पड़ते हैं। 

प्रेम, श्रृंगार, आनन्द, प्रफुललता, और मौजमस्ती वाला यह उत्सव उन महान योद्धाओं की याद में मनाया जाता है जो आक्रामकों को खदेड़ देने के लिए घरों से चले जाते हैं और उन्हें पराजीत कर घर लौटते हैं। इस अवसर पर घोड़ेमोडनी नृत्य जो शौर्य नृत्य है, इसी आशय से किया जाता है, जिसमें योद्धा मारठी पोषाकों की सजधज कर अपने हाथ में खड्ग लिए राजस्थान के कच्छी घोड़ी की तरह घोड़ों पर सवार ढोल, ताशा और तूताड़ी वाद्य के साथ नृत्यरत्त होड्डर-होड्डर की किलकारियां करते दिखलाई गांवों और कस्बों में होली स्थलों के आसपास दिखलाई पड़ते हैं।  गोवा में शिगमो उत्सव दो प्रकार के होते हैं। पहला धाकवो-छोटा शिगमो और दूसरा वडलो शिगमो। धाकवो शिगमो किसानांे, ग्रामीणों, मजदूरों का नृत्य और गीतों का प्रतीक है तो वडलो कस्बाई और शहरी लोगों द्वारा मनाया जाता है। वसन्त ऋतु के आगमन से गोमान्तकवासी होली को वसन्तोत्सव के रूप में देखते व मनाते हैं।

फाल्गुनी पूर्णमासी के शाम को ताड़ अथवा अन्य किसी भी वृक्ष से बनाई गई होली के ईर्द-गिर्द लकड़ियां और झाड़-झंखाड़ लगा दिए जाते हैं। होली के नीचे दो-तीन पत्थर रखे जाते हैं। गांव के स्त्री-पुरूष होली के ईर्द-गिर्द नये-नये परिधान में होली दहन समारोह में एकत्रित हो जाते हैं और गांव का मुख्य पुजारी पहले होली की पूजा करता है और फिर अग्नि प्रज्जवलित करने से पहले होली के यहां रखे पत्थरों पर नारियल फोड़ा जाता है तथा बिखरी हुई चटकें लेने का अधिकार अधिकृत व्यक्ति या महार को ही होता है। इसके साथ ही हाथ से एक नारियल फोड़ने की प्रतियोगिता होती है। जो व्यक्ति अपने हाथ से पहला नारियल फोड़ता है उसे एक नारियल गांव की ओर से उपहार में दिया जाता है। लोग दो दलों में बंट जाते है और हाथ से नारियल फोड़ने की प्रतियोगिता आगे बढ़ती है। जब तक एक दल दूसरे दल से नारियल हाथ से फोड़ने में सफलता हासिल नहीं कर लेता प्रतियोगिता चलती रहती है।

होली दहन के समय अजब-गजब आवाजें और फूहड़ शब्दोच्चारण कहीं-कहीं अपवाद स्वरूप देखने को मिलते हैं, अन्यथा सारे गोवा में शिष्टता के साथ होली मनाई जाती है। कुछ जगह ताड़ वृक्ष के सूखे रस्सा-कस्सी की तरह खींचते हैं और टग-आफ-वार का दृश्य उपस्थित करते हैं। ग्रामीणांचल में कब्बडी और खो-खो प्रतियोगिताएं प्रचलित थी अब कहीं-कहीं देखने को मिलती है। लोग ‘धूलवाड़’ याने परस्पर चेहरे और सिर पर गुलाल और नील का बहुतायत से प्रयोग करते हैं। धूलवाड़ में युवतियां को दूर रखा जाता है। किन्तु कस्बों में यह परंपरा टूट रही है। परस्पर दुराव, टकराव और मतभेद को मिटाने वाले इस शिशिरोत्सव में घरों में मनपसन्द मिठाईयां बनाई जाती और परोसी जाती है। मीडिया और फिल्मों के प्रभाव से अब गांवों और कस्बों में पानी रंग का प्रयोग  होने लगा है। 

होली उत्सव के दौरान लोग इकट्ठा होकर समवेत स्वर में वृन्दगान गान करते है।   ढ़ोल, ताशा और घुमट बजाते हुए वे मस्ती में नाचते गाते हैं। पणजी और अनेक कस्बों की सड़कों और गलियों में यह परिदृश्य हर किसी को देखने को मिलता है। गायकों की थाली में लोग भेंट देते हैं और अच्छी भेट देने वाले लोगों के मंगल की कामना ऊंचे स्वर में जो गीत गाया जाता है उसे ताली कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि समारोह के अन्तिम दिन नृत्यकारों के पदचापांे दैविक शक्ति का सूत्रपात होता है और भक्ति संगीत की स्वरलहरियां नेपथ्य में बिखर जाती है। इस तरह के समारोह के बाद समूची नृत्य मण्डली सामूहिक स्नान करती है।  होली के अवसर पर शिगमो उत्सव में तालगड़ी, हानपेट, लैंप डांस औेर गोफ के आयोजन बहुतायत से होते जिसमें लोगों की बड़ी संख्या में भागीदारी होती है। कृष्ण भक्ति पर आधारित तालगड़ी नृत्य होली से पांच दिन तक चलने वाला नृत्य है जिसमें लकड़ी के डण्डे के पर कुण्डा लगा रहता है लेकर पुरूष कलाकार नाचते हैं और थोड़े से अन्तर के साथ डाण्डिया की तरह नृत्य करते हैं। ताशा तथा झांझ की गमक पर समूह के साथ मन्दिरों के आंगन में किया जाता है।

चन्दोर के गोवावासी हिन्दू संस्कृति की प्रतिष्ठा के लिए चोल साम्राज्य पर विजय की स्मृति में मूसल खेल का आयोजन करते हैं। इस नृत्य में 7-8 फीट के बांस के निचले सिरे पर घुंघरू बंधे होते हैं जिसे हाथ में ले कर और जोले दे दे कर न्ृत्य में ग्रामीण जनजीवन की अभिव्यक्ति करते हैं। गांवड़ा जाति के लोग गले में घूमट और ढ़ोलक लेकर नृत्यों की श्रृंखला बनाते हैं।  इसमें एक स्त्री वहां-वहां झाड़ू लगाती है जहां-जहां मूसल गिरता है। वह पानी डालती है नृत्य में भाग नहीं लेती। घरों में किया जाने वाला यह नृत्य विशेष अर्चना के साथ पूर्ण होता   है। शिगमोत्सव में यू ंतो गोफ नृत्य कई जगह होता है परन्तु कानकोना के गोफ नृत्य की बात ही कुछ ओर है। नृत्य में ऊंचे स्थान पर अनेक रंग-बिरंगी रस्सियां लटकी रहती है। इसमें रस्सी का एक-एक सिरा युवक पकड़ लेता है, तथा रस्सियों के सहारे युवक ऐसे नृत्य करते हैं कि रस्सियां फूलों की बेल की तरह गुथ जाती है। पारंपरिक वाद्य घुमट, झांझ, सेमल व शहनाई की धुन पर रस्सियों के सहारे गुंथते और विपरीत दिशा में नृत्य करते हुए सुलझते नर्तम मनमोहक हैं। कृष्ण भक्ति पर आधारित गोफ नृत्य में नृत्यकार स्वयं कृष्ण सी वेशभूषा में होते हैं। सैलानियों और पर्यटकों के लिए अन्य नृत्यों और गीतों की तरह यह भी अविस्मरणीय अनुभव रहता है। 

इसी तरह शिगमोत्सव में रोमटवादन एक रोमांचित अनुभव है। कोंकणी बन्धु सदरा, धोतर और फेंटा बांधे रोमट बजाते हुए ताशा, ढ़ोल, झांझ और तूतारी वाद्य के साथ गीत-भजन गाते हुए रोमट भगवान के दर्शन करने आते हैं। भक्ति भाव का ग्रामीण किसान और वाद्य वादकों का यह नज़ारा हृदयग्राही होता है। गोवा में जगह-जगह शिगमोत्वस में दीपक नृत्य महिलाओं द्वारा अपने सिर पर दीवड़-दीपक स्टेण्ड को लेकर उसमें दीप जला कर घूमट, समेळ और हारमोनिम वाद्य की धुनों पर महिलाओं द्वारा पीतल के दीपक को सिर पर रख कर संतुलन बनाये हुए नृत्यों के आकार बनाए जाते हैं। इस नृत्य को देखने के लिए सैलानियों का जमावड़ा देखते बनता है। 

मछुहारे, खेतिहर और ग्रामीण लोग रंगपंचमी होली के पांचवे दिन मन्दिरों के चौक और ग्राम के मध्य हाथों में लंबे-लंबे ध्वज-तरंगमेल जिसे दांडी भी कहते हैं लिए ढ़ोल, ताशा, शहनाई और सूर्त वाद्य वादन करते शोभायात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण और अन्य नाचते और गाते हैं। कुछ के सिरों पर फूल-पत्तों और झाड़ के मध्य रखी मूर्ति को अपने सिर पर लेकर शोभा यात्रा के प्रमुख हिस्सा बनते हैं। वाद्ययंत्रों की धुनों पर ग्रामीण तरंगों को सिर पर लेकर आगे-पीछे नृत्य करते हैं तथा पांच-पांच ताल के बाद आओ-आओ शब्दों का उच्चारण करते हैं। इस तरह तरंग मेल किसानों के ध्वजों का मेला है। इन अवसरों पर पर्यटकों की रेलमपल भी रहती है। विदेशी सैलानी भी स्थानीय लोगों के साथ गुलाल और अबीर लगाने में समान रूप से हिस्सा लेते हैं और वहां केमरे की क्लिक-क्लिक की आवजें सुनाई पड़ती रहती है। इस दिन विशेष भोजन बनया जाता है जिसे ‘‘सागोटी’’ कहते हैं जिसमें सामिष भोजन होता है। 

भाषा, गांव-शहर, ऊंच-नीच की सीमाओं को तोड़ता और सबको सबमें जोड़ता गुलाल का हरा रंग संतोष सभ्यता का, पीला रंग आशाओं और खुशी का, लाल अग्नि और ऊर्जा का, नीला विश्वास और परस्पर निर्भरता तथा गुलाबी प्रेम और स्वीकार्यता का प्रतीक गुलाल का यह रंगबिरंगी रंग आम लोगों के चेहरे पर गोवा के हर कस्बे फोंडा, वास्को-डि-गामा, वालपोई, डिचोली, मार्गो, केंपे सहित पणजी शहरों में भी देखा जा सकता है। इस अवसर पर पखावज, कासाले और मंजीरों की थाप पर, सिर पर लाल पट्टा बांधे मोरपंख लगाये कलाकार मोरले जो तोणियामेल की तरह का नृत्य होता है, तीव्र ध्वनि में गायन और वादन किया जाता है। कलाकारों के गले और हाथों में पुष्पमालाएं लगी होती है। महिलाओं द्वारा किया जाने वाला फूगडी नृत्य इस त्योहार का बड़ा मनोरंजक नृत्य है जिसे महिलाएं ताली के साथ गोल-गोल घेरे में और अलग-अलग पंक्तियां और चक्र बना कर पौराणिक लोकगीतों के साथ करती हैं। इसी प्रकार शिगमो उत्सव पर कांजा नृत्य किया जाता है। कलाकार मंच पर पंक्ति में प्रवेश करते हैं तथा नृत्य के दौरान अपनी जोड़ी बना कर ढोल और ताशे के साथ गोल-गोल घूमते हुए कई तरह की अभिव्यंजना करते हैं। यह नृत्य प्रायः होली के 9वें दिन मन्दिरों और केन्द्रीय स्थलों पर किया जाता है। 

कोंकणी-गोवा अंचल में इस समय जात्रा कोंकणी का आयोजन बहुत दिलचस्प है। दामोदर और जाम्बोलिम जो मार्गो कस्बे से लगभग 40 किलोमीटर दूर है दैवयात्रा का आयोजन होता है। यहां मन्दिरों और दैविक स्थलों पर धार्मिक आयोजनों को जात्रा नाम से जाना जाता है। तद्नुसार दीवाली से होली पर्यन्त इनका आयोजन होता है। लोग देवी मूर्ति को पालकी या रथ में सजा कर शोभायात्रा निकालते हैं और दैवी आराधना में एक सप्ताह से एक पखवाड़े तक उपवास रखते हैं, पूरी रात्रि जागरण होता है और पूजा-अर्चना तथा कार्यविधि होती है। सबेरे भोर के समय रात्रि में जलाई गई लकड़ियों के ढेर रात भर जल कर जब अंगारे हो जाते हैं तब श्रद्धालु स्त्री-पुरूष जो प्रायः श्वेत धोती व वस्त्रों में होते हैं तो वे  जलते अंगारों पर पैदल चल कर अपनी मनौति मनाते हैं। उस अवसर पर वहां एकत्रित लोगों को देववाणी भी सुनाई जाती है।

गोवा में देशी और विदेशी सैलानियों का हर मौसम मे विशेषकर शिगमोत्व में जमावड़ा रहता है। गोवा के प्रसिद्ध समुद्री तट ‘बीच’ कोलवा, कलंगघूट, बागा, मोरजिम तथा अंजना में सैलानियों पर होली का रंग चढ़ा होता है। वे वहां परस्पर रंगो की होली खेलते हैं और समुद्री तक के आनन्द में खोये रहते हैं। 

नटवर त्रिपाठी

स्वतंत्र पत्रकार एवं 
लोककला और 
शिल्प प्रलेखक
से.नि. डिप्टी डारेक्टर,
सूचना जन सम्पर्क

नटवर त्रिपाठी
(समाज,मीडिया और राष्ट्र के हालातों पर विशिष्ट समझ और राय रखते हैं। मूल रूप से चित्तौड़,राजस्थान के वासी हैं। राजस्थान सरकार में जीवनभर सूचना और जनसंपर्क विभाग में विभिन्न पदों पर सेवा की और आखिर में 1997 में उप-निदेशक पद से सेवानिवृति। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। कुछ सालों से फीचर लेखन में व्यस्त। वेस्ट ज़ोन कल्चरल सेंटर,उदयपुर से 'मोर', 'थेवा कला', 'अग्नि नृत्य' आदि सांस्कृतिक अध्ययनों पर लघु शोधपरक डोक्युमेंटेशन छप चुके हैं।

संपर्क:-
सी-79,प्रताप नगर,
चित्तौड़गढ़ 
म़ो: 09460364940
ई-मेल:-natwar.tripathi@gmail.com

    
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