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समीक्षा: रामोदय : मुक्तकामी चेतना का संवाहक / डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ला

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, दिसंबर 15, 2013 | रविवार, दिसंबर 15, 2013

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 दिसंबर-2013 

चित्रकार:अमित कल्ला,जयपुर 
(डॉ. सुधाकर मिश्रा का लिखा रामोदय (खण्ड काव्य,मूल्य-151 रुपए,पृष्ठ-164 ) 1990 में नारायण प्रकाशन ,वाराणसी आया था। रामोदय खण्ड काव्य पर हिन्दी विभाग ,मुम्बई विश्व विद्यालय में एम्.फिल. हो चुका है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में बनते-बिगड़ते रिश्ते, टूटते मानव मूल्यों के बीच गुम होती मानवता, अंधकार की घोर कारा, जीवन की भयावहता से मुक्ति का मार्ग अगर कही है तो वह राम और रामकाव्य में है। रामोदय  रामकाव्य परम्परा की आधुनिक कड़ी के रूप में हमें एक ओर तृतीय विश्व युद्ध की भयावहता ,विनाश लीला का दर्शन करवाता है तो दूसरी ओर राम के आदर्शों के आईने में मानवता के मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।मिथक और मिथकीय चेतना की धार से कवि रामत्व की स्थापना में ही युग और युग की मुक्ति की संभावना व्यक्त करता है। राम व्यक्ति नहीं सम्पूर्ण भारतीयता के आदर्श है। जिनकी स्थापना में युगों- युगों तक युद्ध की भयावहता से मुक्ति का महामार्ग प्रशस्त हो सकता है।

रामोदय की स्थापना में कवि दृष्टि आधुनिक युग सत्य का साक्षात्कार कराती है। वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा सामरिक अस्थिरता के दौर में रामोदय मुक्तकामी चेतना का संवाहक बनकर उभरता है। आधुनिक काव्य दृष्टि,लोक की समझ ,मानवता के संरक्षण चिंता, भारतीय आदर्श, आधुनिक विश्व व्यवस्था के बीच भारत ,रचना तथा रचनाकार के सरोकार है।)

 रामोदय : मुक्तकामी चेतना का संवाहक

वौqश्वक पटल पर बनते बिगड़ते शक्ति संतुलन, वर्तमान आर्थिक औपनिवेशिक सत्ता के विस्तार तथा बदलते मानवीय संबंधों को लेकर गहन अंधकार की कारा में घिरी मानवता के सम्मुख ‘रामोदय’ एक ऐसा दस्तावेज है जिसमेंरामकाव्य परम्परा के साथ-साथ भारतीय परम्परा, भारतीय सामासिक संस्कृति की जीवनदृष्टि, जीवनदर्शन एवं मूल्य-बोध की सार्थक अभिव्यक्ति हुई है। इसमें कवि के अनुसार भारतीयता एवं भारतीय गौरव के आधार हैं राम। लोक-मंगल, पुण्य एवं मानवीयता के प्रतीक हैं राम —

लोकमंगल चाहिए हमको, नहीं कुछ और
पाप को इस भूमि पर संभव न कोई ठौर ।
अब न पशुता का गमन हो आदमी के बीच
द्वेष का संगीत गाये बस वही जो नीच !।

इसी रामत्व के उदय में ही कवि को त्राण दिखाई पड़ रहा है। युगीन समस्यायें बढ़ती जा रही हैं। काल की गति तीव्रहो गई है। सदी के आqन्तम दशक में सात्विक शक्तियों के पराभव के साथ-साथ दु:ख की चरमावस्था में धरती तो क्या आकाशकी आँखों में भी आंसू हैं। वैश्वीकरण की नीतियों के फलस्वरूप सारा का सारा वातावरण आसुरी सत्ता, सुरा-सुन्दरी मेंमदमस्त है।

लगता है आघात नहीं वह
भला कौन सा दिन है?
कौन निशा जिसमें नारी ने
नहीं अश्रु-रस भोगा?
बस इतना ही सोच देवियाँ
आयु यहाँ जी लेतीं —
होना था सो हुआ,
नहीं जो होना है, वह होगा ।।

ऐसे समय में, कवि जानकी के चरित्र के माध्यम से नारी शक्ति को हमारे सामने प्रस्तुत करता है। अशोक वाटिकाके काममय वातावरण में पुष्ट हिमालय की छवि, साक्षात नारी आदर्श, सीता का नायक राम से महामिलन करवाता है।अंतरात्मा परितुष्ट हो रही है और सीता के मुख से दिव्य ज्योति विश्वास बन छीटक रही है। ऐसी अवस्था में योगिनी मेंवङ्काशक्ति भर जाती है। दूसरी ओर विश्व की एकध्रुवीय सत्ता का नायक क्रोधदग्ध हो उठता है क्योंकि वह अपने को नारीशक्तिके सम्मुख असहाय-असमर्थ पाता है। नीति विशारद की बुद्धि मारी जाती है, वह कह उठता है —

निशाचरों, लो बाँध इसे
हो शान्त पिपासा मन की

दुर्जेय शक्ति के सम्मुख नारी को खड़ा कर कवि ने विशेष दृष्टि का परिचय दिया है। यदि नारी में विश्वास हो, पति के प्रति अटूट निष्ठा हो, तो वह किसी भी हमले का सामना कर सकती है। रामोदय की पृष्ठभूमि बनने लगती है। कहाँ नारी,कहाँ विश्वपटल पर एकक्षत्र राज्य करने वाला रावण। परंतु जब भक्ति स्वयं, सत्य, शील एवं सौन्दर्य से तदाकार हो जातीहै, तब रावण एक ध्रुवीय सत्ता का शिवरपुरुष उसे तुच्छ तथा कमजोर दिखायी पड़ने लगता है —

रावण! तुमने अभी
राम की शक्ति नहीं देखी है
आज हमारे द्वन्द्व युद्ध का
सुखद पर्व है आया।

यह विश्वपटल पर विकासशील भारत के उदयकाल की सूचना है। सोवियत संघ के पतन के साथ आर्थिक
उदारीकरण के स्याह चेहरे को चुनौती देती जानकी पूरी की पूरी संस्कृति को चुनौती दे बैठती हैं। व्यंग्य करती हैं। रावण मैंवह जानकी नहीं हूँ जिसका अपहरण तुमने वन से किया था। न कुबेरसुता हूँ। नहीं विभीषण हूँ जिसके सीने पर लात मारदेगा। रावण मैं विश्वप्रलय का कारण हूँ। नारी विरोध के इस सशक्त स्वर से रावण के अन्तर्मन में भय का संचार होता है–

किन्तु आज-सा प्रबल रूप
था उसने कभी न देखा
शंका विह्वल दशा हुई थी
कभी न ऐसी मनकी ।।

यहाँ वर्तमान नारी विमर्श के प्रश्न को खड़ा किया गया है। देवियों का विरोध में खड़ा होना नारी जागरण का शंखनादहै। नारी मुक्ति के शाश्वत प्रश्न को सीता के माध्यम से उठाने में कवि समर्थ पुरोधा का काम करता है। यही नहीं वह प्रश्नकरता है कि धर्म की आड़ में कब तक दमन, शोषण, अत्याचार होता रहेगा। कब तक चलेगा रावण जैसों का राज। प्रजाराजा के कर्मों को कब तक भोगती रहेगी –

कब तक भोगे प्रजा पाप-फल
भला किसी राजा का

प्रजामुक्ति वर्तमान की सबसे बड़ी समस्या है। चतुर्दिव्â प्रतिक्रिया स्वरूप प्रजाजन में तिरस्कार, धिक्कार का भाव है।इन्द्राणी की आँखों में क्रोध की ज्वाला है। रमा विष्णु के चक्र की ओर आशाभरी नजरों से देखती हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव केध्यान टूटने का इन्तजार करते हैं। देवताओं के अर्थात् क्षेत्रीय क्षत्रयों की दृष्टि महादेव की तरफ है —

अति हो गयी दशानन के
दुष्कर्मों की अब तो है
और तात हम अब भी
आशीर्वादों में ही पूâले ।।

दशानन जैसों को अस्त्र-शस्त्र का आशीर्वाद देकर हम आत्मगौरव में हैं जबकि हमारे आशीर्वादों (दिव्यास्त्रों) का दुरूपयोग किया जा रहा है। समस्यायें अनंत हैं, अबला की मुक्ति सम्भव नहीं। शासन व्यवस्था ध्वस्त है। सज्जन पीड़ित हैं।पापी फल पूâल रहे हैं। बच्चे अनाथ हैं। सम्पूर्ण विश्व पर आतंक की काली छाया मंडरा रही है। चारों ओर मनुज और मानवताको उत्पीड़ित किया जा रहा है। घृणा द्वेष की काली घटा घिरी है। पाप का समुद्र लहरा रहा है। पापियों का राज्य है। कब तक यह अवस्था रहेगी? असुर-मानवता का संघर्ष कब तक चलता रहेगा। पतन का चरम है। देव संस्कृति खतरे में हैं —

जिसे देखिए वही
देव-संस्कृति का शत्रु बना है।

साधन के अभाव में मानवता का संघर्ष हमारे सम्मुख प्रश्न चिन्ह बनकर खड़ा है। युग का न्याय यही है कि अन्यायके खिला़फ खुल कर चुनौती दो, लंका नगरी अपने किया का फल भुगते। देवों की सभा जी-७ के राष्ट्रों द्वारा पहली बारअन्याय के खिला़फ शिव के सम्मुख खुलकर विमर्श करती है। शिव की आँखों में युद्ध की भयावहता है तथा रावण के स्नेहके बंधन का टूटना उन्हें हिलाकर रख देता है। सत्य पराजित नहीं होता, धर्म अन्तत: विजयी होता है। जगत कल्याण के लिएमनचाहा निर्णय लेने की सहमती एकध्रुवीय सत्ता के समक्ष चुनौती का घोष है। कब तक रावण अपने सामथ्र्य के बल परआस्था राम तथा विश्वास सीता के बीच —

इधर राम थे, उधर जानकी
आदर्शों की शोभा
और मध्य में रावण
गिरि-सा अपराजेय खड़ा था ।

दीवार बनकर खड़ा रहेगा। यहाँ नारी समस्या को केन्द्र में रखकर सांस्कृतिक समाधान की पहल है। भारतीय नारी साक्षात् आस्था की प्रतिमूर्ति, विश्वास की शाqक्त है - शाqक्त स्वरूपा है।

‘रामोदय’ महादेवी के नारी दर्शन, नारी ही नारी की सबसे बड़ी दुश्मन है को नकार देता है। इसमें एक नई कल्पनाहै रावण की मृत्यु के पश्चात् मंदोदरी का अशोक वाटिका में सीता के पास जाकर उनके दु:ख-सुख की भागीदार बनना।मंदोदरी सीता का मिलन, मंदोदरी द्वारा सीता का श्रृंगार समस्त नारी जगत का सम्मान है। विधवा मंदोदरी सधवा सीता काश्रृंगार करती है —

हो जनकनाqन्दनी पंथ तुम्हारा मंगलमय
अहिवात अचल, निर्मल विचार, उर जीव दया ।
रोयी थी करके विदा सुनयना कभी तुम्हें
विह्वल सुख-दु:ख से आज बिदाकर मयतनया ।।

परिवर्तन की बयार है। स्वयं के दु:ख को भुलाकर सीता के प्रति साहनुभूति नारी शाqक्त की धार है। नारी सशाqक्तकरण कीओर उठा मील का पत्थर है जो नारी जाति तथा २१वीं सदी के भारत की आवाज है। सीता तुम भाग्य से नहीं छली गयींबाqल्क भाग्य तुम्हारे कर्मों से पराजित हुआ है। इस संसार में ऐसा कौन है, जो सती धर्म से खेलकर विजयी हुआ हो –

तुम साक्षात् प्रतिमूर्ति सफलता की ललाम ।
ललनाओं की आदर्श, परातप की शोभा
तुम साक्षात प्रतिमूर्ति, सफलता की ललाम ।
ले नाम तुम्हारा युगों-युगों इस धरती पर
बालायें होगी तप:पूत, परिपूर्ण काम ।।

मंदोदरी की सीता विषयक दृष्टि नारी आदर्श का प्रतिमान है, चुनौती है। मंदोदरी विजित लंका की पटरानी है। सीता के श्रृंगार को अपना सौभाग्य समझती है —

सौभाग्य, सजाकर तुम्हें उऋण हो जाउँ मैं ।
पापों के प्रक्षालन का सुख थोड़ा जी लूँ।
जानकी ! विजित लंकापति की पटरानी हूँ
पी चुकी बहुत मैं अश्रु, स्नेह-रस कुछ पी लूँ ।।८४।।

नारी मर्यादा, नारी सम्मान की रक्षा संस्कृति की रक्षा है। मंदोदरी का उच्च चरित्र नारी जाति का गौरव है। सीता पवित्र है, राम अपनी थाती सहज स्वीकार करें। अब राम की छाया में अबला, अबला नहीं रहेगी। उसका जीवन अब तक जैसा भी था अब तो उसे उचित सम्मान, स्थान मिलें। यहाँ नारीमुक्ति के प्रश्न को खड़ा किया गया है। स्त्री अपमान, शोषण, विनाश का कारण बनती हैं। संस्कृतियाँ नष्ट हो जाती है। मानवता के सामने प्रश्न चिन्ह लग जाता है कि पति रावण की मृत्यु, पुत्र मेघनाद, वुंâभकर्ण आदि के मृत्यु-दु:ख का लेशमात्र प्रभाव मंदोदरी पर दिखाई नहीं पड़ रहा है। अन्तर्मन से दु:खी विधवा मंदोदरी सीता को अचल सौभाग्य, निर्मल विचार तथा जीवों के प्रति स्नेह भाव का आशीर्वाद देती है। ग़जब का आत्मविश्वास, आत्मशाqक्त है। नारीमुक्ति के शाश्वत प्रश्न पर खड़े सवाल द्वारा मंदोदरी द्वारा सीता को रथ की ओर लेकर चलना अचूक उत्तर है। यह सीता के माध्यम से इक्कीसवीं सदी की नारी को गति सम्मान देता है —

काम-देश में राम मुग्ध-मन
रही जानकी ऐसे –
श्रद्धा-पुष्ट हिमालय-छवि
जैसे उनचास पवन में ।।

जामवंत की चिंता के माध्यम से रामोदय में युद्ध मनोविज्ञान को रेखांकित किया गया है। युद्ध का परिणाम अंतत:भयानक ही होता है। क्योंकि युद्ध का महाविनाश जब-जब आता है, अपने साथ बहुत सी समस्याएँ लेकर आता है। यहाँ वर्तमान वौqश्वक युद्ध की भयावहता, परिणाम, आतंकवाद की समस्या को उठाकर कवि का जीवनदर्शन सुख से जीने का सूत्र अर्पित है। रावण का पराभव, कुल-गोत्र-परिवार के साथ पुलस्त्य वंश का विनाश, स्वर्णपुरी लंका का जलाया जाना, राक्षस संस्कृति का नष्ट होना, त्रिकालदर्शी रावण की मृत्यु आतंक एवं आतंक का पोषण करने वाले देशों को स्वयं के मंथन के लिए कवि रावण के माध्यम से समाधान देता है कि रावण आतंक के दानव को पहचान लेता —

काश, दशानन
आतंकों से दूर रह गया होता ।।

युद्ध के संदर्भ में राम का चिंतन अपार जन-धन की हानि तथा सृजनशाqक्त संहार को उन्मषित है। युद्ध अटल हो गया है। युद्ध अब युद्ध के लिए नहीं बाqल्क धर्म की स्थापना के लिए लड़ा जायेगा। अधर्म-धर्मका युद्ध वीभत्स युद्ध असत्य की समााqप्त तथा युग सत्य से साक्षात्कार करवाता है।धराशायी रावण मृत्यु के पूर्व क्रम से जीवन के एक एक घटनाक्रम पर विचार कर रहा है। युद्ध ने कितने युद्ध लोभी वीरों — मेघनाद, वुंâभकर्ण, अक्षयकुमार, सुभट, अकम्पन, अकाय तथा के साथ समस्त पुलस्त्य परिवार समाप्त कर दिया —

छला गया मृत्यु से हर प्राणी ।

महाबली रावण ज्ञानी, ध्यानी, नीतिज्ञ, धर्मशास्त्र का ज्ञाता तथा शिव का परम भक्त था। अद्भुत सामंजस्य था उसके व्याqक्तत्व में। अहं का भयंकर विष उसके विनाश का कारण बना। रावण अपने अधर्म प्रेम तथा अहंकार को सुखद नहीं मानता —

लड़ते हैं दो, पर जीतता एक ही पक्ष
विजय उसकी, धर्म की, सत्य की, न्याय की वीर ।
हार अधर्म की, असत्य अन्याय की, कहेंगे लोग यही ।

आसुरी शाqक्त, सत्ता में ग़जब की चरित्र शाqक्त है। रावण सीता का हरण तो करता है किन्तु सतीत्व को छूता तक नहीं, इसके साक्षी पवन, धरती, आकाश, जल, पावक, तृण, तरू तथा अशोक हैं —

रावणत्व का भी मूल्य है अपना ।।

युद्ध की विभीषिका के परिणाम स्वरूप युद्धकाल में सब कुछ नीति-अनीति, धर्म-अधर्म, रिश्ते-नाते जलकर स्वाहा हो जाते हैं। जीवित रहती है मात्र विजय की अभिलाषा। अन्य सब कुछ गौण हो जाते हैं। महाकाल की भूख का जाल पैâलनेलगता है —

युद्ध चाहे धर्म हो या अधर्म
लेकिन है विनाश की पृष्ठभूमि सशक्त, सौमित्र,
बचता नहीं कुछ भी शेष ... ।।५३।।

रावण, विभिषण को फटकारता है। मैंने जो कुछ पाया था वैâलाश पति को अपना सिर चढ़ाकर उसे तुमने एक तपस्वी की शरण में जाकर पा लिया। उसे धिक्कारता है। मृत्युमुखी रावण के सामने रक्ष संस्कृति तथा राष्ट्र आज भी क्षणीय है। राजनीति के सूत्र विभिषण को वह बताता है कि सर्वश्रेष्ठ धर्म राष्ट्र धर्म है, यही रावण का एकमात्र धर्म रहा है। वर्तमान राजनीतिक स्वार्थ के प्रति वह उन्हें सावधान करता है कि कभी भी स्वार्थ के बस में होकर राष्ट्र से समझौता मत करना। वर्तमान राजनैतिक उथल-पुथल के दौर में रावण के मुख से स्वातंत्र्य की रक्षा की बात कहलवाकर कवि अवसरवादिता, राजनैतिक स्वार्थ, जैसे कृत्यों पर चोट करता है —

मत करना स्वप्न में भी अपने इस देश से विश्वासघात
यह भूमि, मातृभूमि है तुम्हारी, प्राण-पूज्य
छीन-छीनकर संसार का वैभव, जीवन से खेल
बनाया है इसको मैंने आर्थिक महाशाqक्त
कुछ भी नहीं है बढ़कर, जननी-जन्मभूमि से जगत में ।।
रखना स्वतंत्र, खेलना मत हाथों में स्वार्थ के ।।५६।।

नीति विशारद, ज्ञानी, वीर, शाqक्तशाली, शिव का परमभक्त, राष्ट्रप्रेमी, रावण की मृत्यु पर देवताओं के साथ-साथ सारा विश्व हिल उठा। यह रावणत्व, पांडित्य एवं वीरता की मृत्यु थी, एक झटके में परिवर्तन। वैâसे अपने समय की एकमात्र महाशाqक्त रावण के सम्मुख सभी देव, नर, गंधर्व, पांqक्तबद्ध खड़े हो गये हैं। विभीषण के अन्तर्मन में उथलपुथल है। मैंने खुद ही अपना घर उजाड़ दिया वह लंका के पतन का स्वयं अपने को कारण मानते हैं। अपने मन के अंतर्द्वंद्व को राम से छीपाने का प्रयास कर रहे हैं, राम समझ जाते हैं। विभीषण को समझाते हैं जो घटित हुआ वह इतिहास हो चुका है, अब समस्याओं से ग्रस्त राष्ट्र को समस्याओं से मुक्त करने का समय है। युद्ध के बाद इतिहास पर विचार करने का समय नहीं है। चुनौती तो अब शुरू हो रही है। राष्ट्र के सम्मुख अनंत समस्याएँ खड़ी हैं। प्रजापालन ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। धैर्य के साथ अपने धर्म का निर्वाह करो। समय के साथ राष्ट्र के विकास को नवगति दो। शासन सत्ता के लिए नीति निर्धारण का समय है। विचार का समय नहीं है। दायित्व का निर्वाह करो —

      व्यर्थ है रोना-धोना उस पर जो हो गया घटित, इतिहास
      हो गया, चाहे जैसे भी, स्वेच्छया-परेच्छया
    बोझ संताप का, आसान नहीं उतारना जिसे
    रहेगा सिर पर, माँगता धैर्य अपराजेय
    सुलझानी होंगी समस्याओं की उलझीं लटें ।।५९।।

सम्पूर्ण विश्व एकध्रुवीय सत्ता से ऊब चुका था, उसका विरोध बढ़ रहा था। अविकसित, अर्धविकसित एवं
विकासशील देश अपनी आqस्मता बचाए रखने के लिए बेचैन थे, जबकि रावण की सत्ता आधिपत्य चाहती थी। रावण की मृत्यु ने सबकी राह आसान कर दी किन्तु किसी व्यवस्था के ढ़ह जाने पर उसके पीछे सक्रिय सिद्धांत न तो झूठे पड़ते हैं न वे अप्रासंगिक हो जाते हैं। सवालों के घेरे में पूँजीवाद, आखिर पूँजीवाद का विकल्प क्या हो ? हो भी या न हो। अब हम क्या करें ! समाजवाद ? इतिहास अपनी गतिशीलता में ही जीवित है। विचारधारा का अंत वैâसा ? रक्ष संस्कृति, लंका, राम एवं रावण व्याqक्त नहीं संस्कार-संस्कृति बन गये हैं। आज भी यह संघर्ष अनवरत जारी है। शरीर एवं संस्थान बदलते जा रहे हैं। धर्म हत्या नहीं सिखाता, व्याqक्त जन्म से छोटा या बड़ा पैदा नहीं होता। दूसरों को सुखी करना सर्वोत्तम कर्म है। क्या युद्ध की दाह शांत हो जायेगी। विश्व पर इसी तरह युद्ध थोपा जाता रहेगा। आत्मीयजनों की लाशें क्या नये युद्ध को आमंत्रित कर रहीं हैं ? अव्यवस्था, कुपोषण, असमानता, साधनों की कमी, विधवा एवं बच्चों की संख्या में वृद्धि, आर्थिक विपन्नता किसी भी राष्ट्र के पतन के सभी कारण युद्ध के पश्चात् एक साथ जुट जाते हैं। देश कई दशक पीछे चला जाता है। राजा के कर्मों का फल अन्तत: प्रजा को भुगतना पड़ता है —

किसके कर्मों का फल मिलता है किसे राम ।।९०।।

युद्ध-पश्चात् मानवता की संरक्षण दृष्टि का अभाव तथा आतंकदर्शन का पोषण होने लगता है। वस्तुओं के मूल्य बढ़ जाते हैं, जातिवादी शाqक्तयाँ सर उठाने लगती हैं, क्षेत्रीय क्षत्रप बढ़ते जाते हैं। अमीर-गरीब का अन्तर बढ़ता है, जलते देश के भविष्य के साथ जीवनमूल्य, देश की व्यवस्था, अनुशासन भस्मीभूत हो जाते हैं, रावण का युद्ध के सम्बन्ध में यह कथन युद्ध की भयावहता का बयान कर जाता है जैसे कवि हमें युद्ध से सजग कर रहा हो। भयानक अस्त्रों की होड़ ने लंका को भस्म कर दिया। अस्त्रों से मानव का कभी कल्याण नहीं हो सकता। विश्व परमाणु निशस्त्रीकरण की ओर कवि की दृष्टि है। रक्षा के लिए एक सीमा तक अस्त्रों का होना तो आवश्यक है किन्तु अस्त्रों की होड़ हमें नये युद्ध की ओर खींचती है। अत: शााqन्त के लिए अस्त्रों का नष्ट करना आवश्यक है। ये आतंक के कारक हैं। विश्व की वर्तमान सबसे बड़ी समस्या है हथियारों की खरोदफरोख्त है। देश के बजट का बड़ा हिस्सा अस्त्रों पर खर्च किया जाता है। इसका प्रयोग उत्पादकता में किया जा सकता

है। हमें शांति चाहिए युद्ध नहीं। मानवता की रक्षा एवं विश्व कल्याण का रास्ता भयानक आग्नेयास्त्रों के नि:शस्त्रीकरण से होकर जाता है। वौqश्वक पटल पर अस्त्रों की खरीद-फरोक्त विश्व संतुलन के नाम पर देशों में गुटबंदी बढ़ाती है। अत: रामोदय में एक झटके से सभी अस्त्रों की होली जलाकर कवि अस्त्रों की भयावहता से मुक्त विश्व की रचना करता है। सांस्कृतिक मिलन को शांति का दूत बनाकर आगत् युद्ध से सावधान करता है।

इस लिए उचित ऐसे अस्त्रों को करें भस्म
चाहिए सभी को शांति भ्रांत संग्राम नहीं ।।१००।।
² ² ²
पलभर में लंकागढ़ के सम्मुख एक शिखर
बन गया अस्त्र-शस्त्रों का भीषण महाकाय
गूँजने लगी कामना शांति की चतुर्दिशा -
सब एक-देव, दानव, किन्नर, मानव निकाय ।।१०१।।

तृतीय विश्वयुद्ध से पूरी मानवता समाप्त हो जायेगी। अस्त्रों की हो़ड ने इतने परमाणु बम एवं अन्य विध्वंसक अस्त्रों का निर्माण कर लिया है कि एक बार ही नहीं बाqल्क कई बार पृथ्वी को समाप्त किया जा सकता है। परमाणु युद्ध के मुख पर बैठे विश्व के सम्मुख शस्त्रों के नि:शस्त्रीकरण की प्रमुख समस्या है। इसका निराकरण ‘रामोदय’-रामत्व के उदय में निहित है। रामत्व – आशा, विश्वास, शांति, शाqक्त, सृजन, सत्य, समता का    भाव, विश्व मंगल, भ्रातृत्व, प्रेम में है –

‘जय जय रामभद्र’ने उधर गगन के छोर हुए।
शस्त्रास्त्रों की ज्वाला का इधर विशाल रूप ।।१०२।।

शस्त्रों की समाप्ति अपने साथ विकास के सूर्य को गति देती है। आर्य संस्कृति का उदय, धर्म की स्थापना, सर्व धर्म समभाव (अगर हम इनका प्रयोग करें तो) की आवश्यकता, गहन अन्धकार में प्रथम राqश्म की संभावना, विश्व मंगल कामना, भ्रातृत्व, अहिंसा, करुणा, शांति युग की मांग है। कर्म ही मनुष्य को मनुष्य या देवता बनाते हैं। रामत्व का उदय सदाचार, न्याय, उदारता, दया, मानव, प्रेम, मर्यादा, स्वराष्ट्र प्रेम, आर्य संस्कृति का मूल है। जीवन की प्रगति का मूलमंत्र कर्म है। कवि की कलम से विश्वगुरु भारत की ध्वनि निकल रही है जो एक बार फिर धर्म की स्थापना, मानवता की रक्षा तथा नये विश्व के निर्माण में अपनी सशक्त भूमिका का निर्वाह करेगा। कवि ने विभीषण, राम, शिव, पुलत्स्य आदि को बोलने का अवसर प्रदान किया है। सभी वक्ताओं ने अपने वक्तव्य के माध्यम से युद्ध की पृष्ठभूमि, युद्ध का दुष्परिणाम, युद्ध की भयावहता, आंतक, आंतक के कारण आदि पर अपने अपने मंतव्य को व्यक्त किया है। साथ ही साथ रावण की अच्छाइयाँ एवं बुराइयों को भी वाणी दी है। युद्ध की पृष्ठभूमि, रक्त संबंध का छूटना, युद्ध का आतंक, आतंकवाद की भयावहता, विभीषण को हमेशा सहयोग देने के लिए आश्वस्त करना, विश्वखाद्यान्न की समस्या, शिव द्वारा रावण के गुणों अवगुणों की चर्चा के बाद मंगलकामना देना। राम का पुलस्त्य को समझाना, की युद्ध टालना चाहते थे, किन्तु रावण ने उनकी बात नहीं मानी। लक्ष्मण व सीता के माध्यम से पूरी व्यवस्था के ध्वस्त होने की बात रख देते हैं। पुलस्त्य रावण द्वारा स्वयं को नकारे जाने तथा युद्ध के बाद लंका के भयानक दृश्य का खाका हमारे सामने रखते हैं। यहाँ कवि कहना चाहता है कि यदि युद्ध हुआ तो विश्व का ऐश्वर्य विनष्ट हो जायेगा, भूख की आग बढ़ेगी। अनाथ अबलाओं की संख्या में वृद्धि होगी। अव्यवस्था बढ़ेगी, निराशा, भय, चिंता, जीवनमूल्यों का ध्वंस, महँगाई, अनुशासन का अभाव, स्वच्छन्दता, स्वार्थवृत्ति, संग्रह की प्रवृत्ति, जाति-धर्म-वाद का विकास होगा, स्वहित सर्वोपरि, ऐसा कहलवाकर कवि ने २१वीं सदी की भयावहता की ओर संकेत किया है। यही युगीन समस्याएं युद्ध का कारण बनेगी।


कवि का मानना है कि शासक को दृढ़ संकल्प, शाqक्तशाली तथा कठोर भी होना चाहिए। क्योंकि स्वार्थी एवं विनाशकारी ताकतों का सामना करने के लिए कभी-कभी रावणीय वृत्ति की भी आवश्यकता पड़ती है। कवि की ऩजर आतंक से ग्रस्त भारत पर है। जनता भय, भूख, भ्रष्टाचार, आतंक से मुक्ति चाहती है। शासक इन मुद्दों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। अशांति  तथा साम्प्रदायिक, गैर साम्प्रदायिक तत्त्वों पर लगाम लगाने की आवश्यकता है। साम्राज्यवादी ताकतों ने समय के साथ अपने मुखौटे बदल दिए हैं। काम वही पुराना - देश की आर्थिक व्यवस्था पर कब्जा करना। सत्ता के समान्तर कार्पोरेट घराने सत्ता का संचालन कर रहे हैं। मीडिया, प्रशासन, पुलिसतंत्र तथा संसद इनकी गिरफ्त में हैं। अब ईमानदार, प्रशासक की नहीं बाqल्क  मानदार एवं कठोर निर्णय लेने वाले शासक की आवश्यकता है। प्रजातंत्र मूल्य खोता जा रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का लोकपाल आन्दोलन जनता की स्वच्छ, ईमानदार, अवाम की रक्षा करने वाले शासक की है जो किसी भी सूरत में राष्ट्र या राष्ट्र के सिद्धान्तों से समझौता न करे। उसके न्यादण्ड में रामत्व हो। साथ ही साथ सहयोगी रावणत्व भी समय असमय पहरेदारी करता रहे। मनमोहनी छवि स्वीकार्य नहीं –

विजय होती है सर्वदा धर्म की न्याय की
सत्य है यह उक्ति 
चलाने को राज्य बनना पड़ता है
रावण भी कभी-कभी ।।

विभीषण की सौम्यता न्याय की, धर्म की, सत्य की उक्ति तो बन सकती है किन्तु शासक को वङ्का से कठोर और पूâल से कोमल होना चाहिए। न्याय एवं दण्ड नीति व्यवस्था की शाqक्त होती हैं। यही बात राम ने भी कही है कि न्याय एवं दण्ड नीति राजा की भुजाएँ है। न्याय जहाँ शााqन्त की स्थापना करता है, वहीं दण्ड अपराधी को अपराध करने से रोकता है। प्रजा में विश्वास पैदा करता है। क्लीव, मृदुभाषी, व्यसनग्रस्त, संकल्प-विकल्प में जीने वाला शासक स्वयं तो नष्ट होता ही है साथ ही राष्ट्रीय गौरव एवं सम्मान को भी पद्दलित करता है। कमजोर, लचर शासक जनका के कष्टों को बढ़ाने वाला, राष्ट्र-राज्य की आqस्मता, अखण्डता को नष्ट करने का कारण बनता है–

कमजोर राजा होता है अभिशाप
प्रजा के लिए व्यथाशाqक्त ।।

विज्ञान राष्ट्र की प्रगति की ऊँचाइयाँ तो देता है किन्तु चारित्र का अभाव हो जाता है। संबंधों में रासायनिक गुणसूत्र ढूंढ़े जाने लगते हैं। रावण का नाटकीय प्रवेश नीति वचन चुनौती हमारे बिना प्रकाश की कल्पना नहीं की जा सकती। पाप से पृथ्वी को मुक्त नहीं किया जा सकता, उसी तरह तुम मुझे मिटा नहीं सकते। हमारा अपराजेय शाश्वत युद्ध चलता रहेगा। युद्ध में मेरी विजय हुई है तुम्हारे साथ-साथ मेरा नाम चलता रहेगा अनवरत। राम के हाथ विश्वशांति के लिए जुड़ जाते हैं।

हजार धर्म हों परन्तु धर्म तो है धर्म ही।
है देह में सभी के रक्त-हाड़-मांस-चर्म ही।।
उसी को पूजना हमें जो सर्व को मिला सके।
जो शाqक्त दे अशक्त को, जो सर्व को खिला सके।।

‘रामोदय’ राजनैतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक आqस्थरता के दौर में अखण्ड भारत की संभावनाओं की ओर संकेत करता है। रावण की राष्ट्रनीति एवं रामत्व के गुणों से युक्त शासक की नीति ही प्रजातांत्रिक भारत के राजनीति का सूत्र बनें। कवि की दृष्टि विभाजन की त्रासदी, स्वतंत्र भारत के विकास के लिए ब्लू प्रिंट का अभाव, शासक की दोषपूर्ण नीतियों, धार्मिक उन्माद, आतंकवाद, जैसे विघटनकारी कारणों की ओर है। चिंता स्वाभाविक है। शासक का स्वच्छ, ईमानदार, धर्मनिष्ठ, यम नियमों का पालन करने वाला, सदाचारी, नीति विशेषज्ञ होना ही पर्याप्त नहीं है। अहिंसा परम शाqक्त है। राष्ट्र निर्माण का मूल मंत्र है। विकास का बी़ज है। शांति काल का पोषक है। हमारा सामथ्र्य है किन्तु शासक को आवश्यकता पडने पर राष्ट्र को बचाए, बनाए रखने के लिए शाqक्त का प्रयोग करने में हिचकना नहीं चाहिए। शासक की कमजोरी राष्ट्र की आqस्मता के सम्मुख प्रश्न बनकर उभरती है। जीवनमूल्यों की रक्षा, लोकमंगल, धर्म की स्थापना, प्रजा का पोषण, न्याय, भ्रष्टाचारी के लिए कठोर सजा का प्रावधान, संवैधानिक संरक्षण शासक के कर्तव्य है। रामत्व की आराधना में ही जीवन के सफलता की वुंâजी है। कवि की यही शाqक्त भी है। 

पाठक मित्रो, इस आलेख  का पीडीएफ वर्जन यहाँ अपलोड किया गया है कृपया क्लिक करके पढ़िएगा।-सम्पादक

डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल
"जैनेन्द्र व्यक्तित्व और कृतित्व " पर पी-एच.डी. की उपाधि ।"हिन्दी कथा साहित्य में विमर्श " विषय पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से बृहद शोध परियोजना पर कार्यरत ।पूरा पूरा परिचय यहाँ है 

एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी-विभाग ,
महर्षि दयानंद कॉलेज ,परेल,  मुंबई - 400012 
103 ,ओशियन व्यू ,आर एन .पी .पार्क ,भायंदर (पूर्व )
ठाणे -401105 ,मो .  09324554008 
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