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शोध:शिवानी के कथा साहित्य में सामाजिक चेतना / डॉ. पंकज कुमार खटीक

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, दिसंबर 15, 2013 | रविवार, दिसंबर 15, 2013

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 दिसंबर-2013 


चित्रकार:अमित कल्ला,जयपुर 
समाज और साहित्य का परस्पर घनिष्ठ संबंध है। जो कुछ समाज में घटित होता है, उसका प्रभाव साहित्य पर अवश्य पड़ता है। अतः ‘साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है’ और उक्त कथन लगभग रूढ़-सा हो गया है। स्वयं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ग्रन्थ ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में साहित्य को जनता की चित्तवृत्ति का प्रतिबिम्ब मानते हुए कहा है- “जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है तब निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है।”1

प्रसिद्ध विद्वान मैकाइव्हर तथा पेज ने कहा है, “समाज कार्य प्रणालियों और चलनों की अधिकार सत्ता और पारस्परिक सहायता की, अनेक समूह व श्रेणियों की तथा मानव व्यवहार के नियंत्रणों तथा स्वतंत्रताओं की एक व्यवस्था है। इस निरन्तर परिवर्तनशील व जटिल व्यवस्था को हम ‘समाज’ कहते हैं।”2इस प्रकार समाज और साहित्य की परस्पर सम्बद्धता स्पष्ट है और उक्त संबंध प्रत्येक लेखक के साहित्य में किसी न किसी रूप में अवश्य वर्णित हुआ है।

समकालीन कथा साहित्य के दौर में विशेषकर पाँचवें-छठे दशक के लेखक-लेखिकाओं में गौरा पंत ‘शिवानी’ का नाम अपनी बहुज्ञता, बहुश्रुतता आदि विशेषताओं के साथ तीव्रता से उभरा है। 17 अक्टूबर 1923 ई. को राजकोट (गुजरात) में अश्विनी कुमार पाण्डे के यहाँ जन्मी शिवानी का संबंध बाल्यकाल से ही साहित्यिक वातावरण से रहा है। अपनी आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर एवं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के सान्निध्य में पूर्ण करने के पश्चात् शिवानी अपने पति श्री शुक्रदेव पंत के सहयोग से आजीवन लेखन में प्रवृत्त रही। मुख्य रूप से नारी जीवन को विविधरूपा संवेदना के साथ प्रस्तुत करने वाली शिवानी ने कुमाऊँ के सामाजिक जीवन को भी प्रमुखता प्रदान की है। साथ ही शहरी परिवेश का चित्रण भी शिवानी ने तत्कालीन सामाजिक एवं पारिवारिक विषमताओं के साथ अपनी कथाओं के माध्यम से मुखरित किया है।

कूर्मांचल क्षेत्र के ग्रामीण जन-जीवन में सरलता-सहजता व सादगी का वातावरण रहने के बावजूद समाज में कुछ कुरीतियाँ एवं मान्यताएँ ऐसी थीं, जिसके कारण वहाँ के जीवन में सामाजिक असंतोष व्याप्त था। जैसे बाल विवाह, दहेज-प्रथा, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, अन्धविश्वास, भय आदि। शिवानी ने वहाँ के सामाजिक जीवन को बड़ी कुशलता से अपने साहित्य में रूपायित किया है। शिवानी के ‘कालिन्दी’ उपन्यास में अन्नपूर्णा के बाल विवाह का जिक्र है तथा बाल्यावस्था में विवाह होने के पश्चात् उस पर दहेज के लिए मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना का मार्मिक चित्रण है। कच्ची वयस में अन्नपूर्णा जब मातृत्व भार सम्भावना से दबी घर लौटती है तो उसके पिताजी उसे पुनः ससुराल नहीं भेजते, वह अपनी पुत्री के साथ आजीवन पतिविहीन जीवन भोगती है। दहेज के कारण कालिंदी का विवाह भी होते-होते रूक जाता है।

साहित्यकार
गौरा पंत ‘शिवानी’
‘रतिविलाप’ लघु उपन्यास में हीरावती का विवाह बचपन में ही किसी अधेड़ के साथ करा दिया जाता है, परेशान होकर हीरावती उसकी हत्या कर भाग जाती है। इस प्रकार ‘पाथेय’, ‘पुष्पहार’, ‘पिटी हुई गोट’ आदि कहानियों में भी कम आयु में विवाह कराये जाने के उदाहरण हैं। दहेज समस्या को समाज से हटाने के लिए शिवानी अपनी रचनाओं के माध्यम से युवा शक्ति का आह्वान करते हुए कृत संकल्प दिखाई देती है। ‘चाँचरी’ कहानी में श्रीनाथ अपने माता-पिता की मर्ज़ी के खिलाफ बूढ़े दरिद्र ब्राह्मण की बेटी ब्याह लाता है, वह भी बिना दहेज के, चाँचरी का पिता कहता है, “तुम निश्चय ही देवता हो बेटा, नहीं तो क्या इस दरिद्र ब्राह्मण को ऐसे उबार लेते? कहाँ राजा भोज तुम और कहाँ मैं गंगू तेली! सिवाय कुश कन्या के मेरे पास है ही क्या?”3

इस प्रकार शिवानी ने ‘श्राप’, ‘पूतोंवाली’, ‘रथ्या’ आदि कथाओं में भी दहेज समस्या का चित्रण करते उसे हुए समाज के लिए घातक बताया है। महत्त्वपूर्ण सामाजिक बन्धन दाम्पत्य जीवन को लेकर भी शिवानी ने अपनी लेखनी चलाई है। स्त्री-पुरूष के परस्पर संबंध, टूटन, घुटन, बिखराव एवं तलाक आदि का वर्णन शिवानी ने अपनी कथाओं में किया है। ‘चाँचरी’ कहानी में श्रीनाथ के परिवार वाले जानबूझकर दोनों के बीच दरार डाल देते हैं। परिणामस्वरूप शादी-शुदा होते हुए भी दोनों को अलग रहना पड़ता है। ‘बदला’ कहानी में रत्ना और ब्रजकुमार का जबर्दस्ती विवाह करा दिया जाता है। क्योंकि रत्ना के पिता नहीं चाहते थे कि उसकी बेटी किसी से प्रेम-विवाह करे। दोनों का दाम्पत्य जीवन नहीं चल पाता। रत्ना ब्रजकुमार की हत्या कर देती है। ‘गैंडा’ लघु उपन्यास में राज अपने पति के बदसूरत होने से कुण्ठित जीवन जी रही है। अतः वह अपनी सहेली सुपर्णा के पति को रूप जाल में फँसा अपना और उसका दोनों का दाम्पत्य जीवन बर्बाद कर देती है। इसी तरह कई घटनाओं एवं ‘विवर्त्त’, ‘कैंजा’ आदि कथाओं के माध्यम से शिवानी ने तत्कालीन सामाजिक विषमताओं में टूटते व बिखरते दाम्पत्य जीवन को चित्रित किया है।

अवैध मातृत्व की समस्या भी तत्कालीन सामाजिक परिवेश की एक प्रमुख समस्या है। विभिन्न कारणों से कुंवारेपन में माँ बन जाना उक्त समस्या के अन्तर्गत आता है। ‘किशनुली का ढाँट’ लघु उपन्यास में शास्त्री जी अर्द्धविक्षिप्त किशनुली को अपनी वासना का शिकार बना भाग जाते हैं, परन्तु अंत में पश्चाताप करते हुए पत्र लिखते हैं - “उसके पैरों पर सिर रखकर स्वयं कहना चाहता था, पर गर्ग गोत्री इस नीच ब्राह्मण का ब्रह्मतेज बहुत पहले ही चुक गया है। कैसे कहूँ? न जाने कितनी बार स्टेशन तक जा-जाकर लौट आया हूँ, उससे कह देना किशनी का ढाँट, ढाँट नहीं है, तेरी काखी का यह अधम पति ही उसका जनक हैं।”4

‘करिए छिमा’ लघु उपन्यास में हीरावती और श्रीधर से अवैध संतान पैदा होती है, जिसे श्रीधर की इज्जत की खातिर हीरावती उसे पानी में डुबोकर मार देती है। ‘कैंजा’ लघु उपन्यास में सुरेश भट्ट एक पगली लड़की बसन्ती से यौन संबंध स्थापित कर रोहित को जन्म देता है, जिसे नन्दी पाल-पोस कर बड़ा करती है और अपने प्रेम का फर्ज़ अदा करती है। इस प्रकार ‘तीसरा बेटा’, ‘भूमि-सुता’ आदि रचनाओं में भी शिवानी ने अवैध-मातृत्व का चित्रण किया है। साथ ही उस अवैध संतान को मातृत्व एवं वैधता प्रदान कर समाज में मानवीय गुणों की प्रतिष्ठा भी की है।

वेश्या समस्या समाज में एक कलंक की तरह है, परन्तु शिवानी का यह मानना है कि वेश्याएँ जन्मजात नहीं होती, परिस्थितियाँ उसे बनाती है। अपवाद स्वरूप जिसने जिस्म फरोशी को पारम्परिक रूप से आजीविका का साधन बना रखा हो तो बात अलग है। इस बारे में प्रेमचन्द्र कहते हैं - “वेश्या संबंध यौन संबंध का ही एक दूसरा रूप है। पुरूष इस उद्देश्य से वेश्या के पास पहुँचता है कि उसकी यौन संबंधी शारीरिक आवश्यकताएँ तुष्ट हो जाए। स्त्री इसलिए वेश्यावृत्ति धारण करती है कि उसका अपने जीवन में कभी भूल से या मनुष्य के बल प्रयोग से सामाजिक बन्धनों, धर्म और संस्कृति की दृष्टि से शील भ्रष्ट होना पड़ता है। अतः उसे जीवन यापन के लिए वेश्या जीवन के बिना दूसरा पर्याय नहीं होता।”5

‘कृष्णकली’ उपन्यास में कली का पालन पोषण पन्ना वेश्या द्वारा किया जाता है। पन्ना उसे अपनी तरह वेश्या नहीं बनाना चाहती। अतः पढ़ने के लिए दूर बोर्डिंग में डाल देती है। यहाँ शिवानी जगह-जगह वेश्या जीवन से बचने-बचाने के संकेत देती हैं। ‘रथ्या’ लघु उपन्यास में सर्कस के मैनेजर द्वारा बसन्ती का बलात्कार किया जाता है, मजबूरन बसन्ती को वेश्या बनकर जीवन यापन करना पड़ता है। ‘करिए छिमा’ की हीरावती भी वेश्या है, परन्तु श्रीधर के प्रति उसका प्रेम निश्छल है। असमय पति की मृत्यु उसे वेश्या जीवन की ओर धकेलती है। इस तरह शिवानी ने समाज में स्थित वेश्या जीवन को उकेरते हुए यह कहना चाहा है कि वेश्या बनने से पहले वह भी एक सामान्य स्त्री है, यदि पुरूष समाज जबरन उसे वेश्या बनाता है तो गुनाहगार को दण्डित किया जाना चाहिए।

शिवानी ने कूर्मांचल संस्कृति में व्याप्त तंत्र, मंत्र, टोने, टोटके एवं अन्धविश्वास आदि को भी एक सामाजिक समस्या के रूप में चित्रित किया है। ग्रामीण समाज के लोग किसी प्रकार की गम्भीर व्याधि को भी ईश्वरीय प्रकोप या किसी के द्वारा किया गया जादू टोना मानते हैं और अस्पताल में ईलाज के बजाय तंत्र-मंत्र एवं टोने टोटकों में विश्वास करते हैं। ‘पाथेय’ कहानी में फेफड़ों के संक्रमण से प्रतुल की मृत्यु हो जाने पर, “धीरे-धीरे चार दिन बीत गए - सहसा चौथे दिन, सोना मासी देहरी पर आकर खड़ी हो गई - “ऐ छूँडी, तेरे ससुर ने कहा है, हम कल गया जाएँगे - अशान्त आत्मा गई है उसकी, वहीं की प्रेतशिला में पिण्ड देना होगा, तब ही उसे मुक्ति मिलेगी - अपना सामान रख लेना कल सुबह ही बस चल देगी।”6

‘कालिंदी’ उपन्यास में अन्नपूर्णा उल्लू का बोलना अशुभ मानती है, यथा “आधी रात बीत चुकी थी, सहसा उसकी खिड़की से सटे नीम के पेड़ पर उल्लू बोला। इस मनहूस आवाज को पहचानने में वह कभी भूल नहीं कर सकती थी। ऐसे ही तो उसके विवाह के एक दिन पहले भी उल्लू बोला था।”7 पहाड़ी टोटकों में नवजात शिशु के होठों पर उसी की कटी नाल का रक्त लगाना, नाल कचहरी में या चूल्हे के नीचे गाड़ना जैसे कई उदाहरण भरे पड़े हैं।

समाज में स्थित धार्मिक कर्मकाण्डों के भी कई उदाहरण शिवानी ने प्रस्तुत किए हैं। जैसे ‘तीसरा बेटा’ लघु उपन्यास में सावित्री तीर्थयात्रा के पश्चात् नित्य की भांति गंगा स्नान को जाती है और घण्टों पूजा-पाठ में मग्न रहती है। हिन्दू धर्म में काशी को पवित्र तीर्थ स्थान माना गया है। गंगा का पवित्र स्नान और काशी में मृत्यु पाना प्रत्येक धर्मावलम्बी की कल्पना है। ‘किशनुली’ लघु उपन्यास के कक्का भी काशी में मरने की अन्तिम इच्छा रखते हैं। ‘बदला’ कहानी में ब्रजकुमार की मृत्यु के बाद रत्ना के माता-पिता मानसिक शान्ति हेतु बदरी-केदार की तीर्थ यात्रा पर जाने का प्रस्ताव रखते हैं।समाज में लोक-परलोक का भय व कल्पना पूर्णतया व्याप्त है। ‘किशनुली’ लघु उपन्यास में काखी मृत किशना के कान में राम-राम फूँककर कहती है, “जा किशनी जा, इस संसार में तो तुझे पति सुख नहीं मिला, परलोक में जी भरकर सुख भोगना किशना।”8

डॉ. पंकज कुमार खटीक
प्राध्यापक - हिन्दी,
हाड़ारानी राजकीय महाविद्यालय,
सलुम्बर
जिला उदयपुर, राजस्थान-313027
मो- 09530470925

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इस तरह शिवानी ने अपनी कथाओं में ग्रामीण एवं शहरी जीवन में व्याप्त धार्मिक अन्धविश्वासों एवं कर्मकाण्डों का चित्रण कर मानव समुदाय को शैक्षिक जागृति की ओर प्रेरित किया है। शिवानी ने समाज में स्थित निम्न एवं उच्च वर्ग के बीच व्याप्त आर्थिक विषमताओं को उजागर करते हुए वर्ग संघर्ष को भी प्रस्तुत किया है। ‘मायापुरी’ उपन्यास की शोभा गरीबी से परेशान होकर शहर आती है, परन्तु वहाँ भी वह सुख से नहीं रह पाती उल्टे अपना परिवार भी खो देती है। ‘चल खुसरो घर आपने’, ‘गैंडा’, ‘अतिथि’, ‘प्रतीक्षा’, ‘माणिक’ आदि रचनाओं में उक्त प्रकार के निम्न उच्च वर्गों के बीच उत्पन्न मतभेदों का चित्रण है, जिसमें शिवानी ने यह प्रकट करने का प्रयास किया है कि समाज में उक्त आर्थिक विषमताओं को दूर करने के पश्चात् ही समाज को खुशहाल देखा जा सकता है।

शिवानी की कथाओं में वर्णित कूर्मांचल के सामाजिक जीवन में कुण्डली मिलाने की प्रवृत्ति को भी प्रमुखता से देखा जा सकता है। लड़के-लड़की का बिना कुण्डली मिलाए किसी सूरत में विवाह सम्पन्न नहीं होता। ‘कैंजा’ लघु उपन्यास का उदाहरण दृष्टव्य है, “नन्दी के पिता हेमचन्द्र तिवारी नेपाल के राणाओं के राज-ज्योतिषी थे। उनकी विलक्षण गणना प्रदत्त लोकप्रियता ही एक दिन उनकी शत्रु बन गई। राणा परिवार, बिना कुण्डली दिखाए, कण्ठ तले गस्सा भी नहीं उतारता था।”9 इस प्रकार ‘कालिंदी’, ‘ठाकुर का बेटा’, ‘रथ्या’ आदि कई कथाओं में शिवानी ने कुण्डली मिलाने की प्रवृत्ति को प्रमुख सामाजिक क्रियाकलाप के अन्तर्गत स्थान दिया है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि शिवानी ने अपने कथा साहित्य में ग्रामीण एवं शहरी जीवन की सामाजिकता को पूर्ण मार्मिकता, सजीवता एवं यथार्थ के साथ चित्रित कर अपने विस्तृत एवं व्यापक ज्ञान का परिचय दिया है।

संदर्भ ग्रन्थ सूची

1. शुक्ल आचार्य रामचन्द्र; ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’, काशी नागरी प्रचारिणी सभा, तेरहवाँ संस्करण, सं. 2018 वि., पृ. 16 (काल विभाग)।
2. मैकाइव्हर एवं चार्ल्स एच. पेज; ‘समाज’, हिन्दी अनुवाद, जी विश्वेश्वरैया, रतन प्रकाशन मन्दिर, तृतीय संस्करण, 1977 ई., पृ. 5
3. शिवानी, चाँचरी (दो सखियाँ), राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ. 62 
4. शिवानी; किशनुली (रतिविलाप), राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ. 60
5. ए. गवली;, प्रेमचन्द्र के उपन्यासों में चित्रित स्त्री-पुरूष संबंधों का अनुशीलन, अन्नपूर्णा प्रकाशन, 1983, पृ. 69
6. शिवानी; पाथेय (दो सखियाँ), राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ. 99
7. शिवानी; कालिंदी, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006, पृ. 20
8. शिवानी; किशनुली (रतिविलाप), राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006, पृ. 66
9. शिवानी; कैंजा (पूतांवाली), राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ. 48
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