नवोदित स्वर:दीप्ती शर्मा - अपनी माटी

साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण / UGC CARE Listed / PEER REVIEWED / REFEREED JOURNAL ( ISSN 2322-0724 Apni Maati ) apnimaati.com@gmail.com

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गुरुवार, जनवरी 16, 2014

नवोदित स्वर:दीप्ती शर्मा

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 जनवरी-2014 
कुबड़ी आधुनिकता
मेरा शहर खाँस रहा है
सुगबुगाता हुआ काँप रहा है
सड़ांध मारती नालियाँ
चिमनियों से उड़ता धुआँ
और झुकी हुयी पेड़ों की टहनियाँ
सलामी दे रहीं हैं

शहर के कूबड़ पर सरकती गाड़ियों को,
और वहीं इमारत की ऊपरी मंजिल से
काँच की खिड़की से झाँकती एक लड़की
किताबों में छपी बैलगाड़ियाँ देख रही है
जो शहर के कूबड़ पर रेंगती थीं
किनारे खड़े बरगद के पेड़
बहुत से भाले लिये
सलामी दे रहे होते थे।

कुछ नहीं बदला आज तक
ना सड़क के कूबड़ जैसे हालात
ना उस पर दौड़ती/रैंगती गाड़ियाँ
आज भी सब वैसा ही है
बस आज वक़्त ने
आधुनिकता की चादर ओढ़ ली है।
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दमित इच्छा
इंद्रियों का फैलता जाल
भीतर तक चीरता
माँस के लटके चिथड़े
चोटिल हूँ बताता है

मटर की फली की भाँति
कोई बात कैद है
उस छिलके में
जिसे खोल दूँ तो
ये इंद्रियाँ घेर लेंगी
और भेदती रहेंगी उसे
परत दर परत
लहुलुहाल होने तक

बिसरे खून की छाप के साथ
क्या मोक्ष पा जायेगी
या परत दर परत उतारेगी
अपना वजूद/अस्तित्व
या जल जायेगी
चूल्हें की राख की तरह
वो एक बात

जो अब सुलगने लगी है।
दीप्ति शर्मा
इंजीनियरिंग की छात्रा है,
शिक्षा पिथौरागढ़,भीमताल और आगरा में
हुयी,साधारण परिवार में जन्म।
लिखती-पढ़ती हैं.
संपर्क: 72,अदन बाग़ विस्तार,
दयाल बाग़,आगरा-282005
(उत्तर प्रदेश)
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