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शनिवार, मार्च 15, 2014

समीक्षा:विकृतियों को तोड़ता है विक्रम का कविता-संग्रह /डॉ. उदयवीर सिंह(दिल्ली)

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 मार्च-2014 

     
चित्रांकन
वरिष्ठ कवि और चित्रकार विजेंद्र जी
 
 स्वराज प्रकाशन से प्रकाशित विक्रम कुमार  के कविता-संग्रह ‘अछूत अछूत अछूत’ में कुल 50 कविताएँ हैं, जिनमें कवि ने समाज में व्याप्त कई समस्याओं को उठाया है। कवि ने दलित विमर्श से प्रभावित होकर ‘अछूत’ शब्द को परिभाषित करने की कोशिश में अब तक के गढ़े हुए परिभाषा पर अपने तर्कों से प्रश्न चिन्ह लगाया है-

‘‘अछूत वो, जिसे छुआ न जाए
फिर सूर्य अछूत/देवता अछूत
क्यों पूजते हो इसे ?’’ 1

         कवि विक्रम कुमार में गैर-दलितों के साथ बराबरी की आकांक्षा प्रबल रूप से परिलक्षित होती है। इनकी कविताओं का अध्ययन करने से विदित होता है कि ये सामाजिक विकृतियों और भेदभाव के स्वयं भी शिकार रहे हैं। यह कविता-संग्रह ‘सर्व धर्म सम भाव’ का प्रबल रूप से अपील करती है और जातिगत संकीर्णताओं की जंजीरों को तोड़कर स्वतंत्र और उन्मुक्त वातावरण में जीने की स्वाभाविकता पैदा करती है। इन्होंने मानव मात्र के लिए मानवता की स्थापना करने की प्रेरणा दी है, जो ‘जाति’ शीर्षक कविता में दिखता है-

‘‘क्या है जाति / जो मानव-मन से
जीवन से जा न सकी/क्या दिया इसने सिवाय
नफ़रत, घृणा और अजनबीपन के
मानव जाति है एक / फिर क्यों बाँट दिया लोगों को
हिन्दू , मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई / ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र में
ऐसा नहीं हो सकता / जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़े
वही हो हमारी जाति/मनुष्य जाति, मानवतावादी जाति।’’2

          यह कविता-संग्रह महिलाओं, शोषितों, दलितों एवं पीड़ितों की आवाज़ को बुलंद करके हाशिए पर पड़े मनुष्य की पीड़ा को दूर करने का साहसपूर्ण और चुनौतीपूर्ण कार्य करता है, जो ‘दमन क्यों’ कविता में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है -

‘‘करके सृष्टि का जन्म / दिया पुरुषों को जन्म
पाकर जीवन पुरुषों ने / किया क्यों नारी दमन !’’ 3

           
अछूत अछूत अछूत
स्वराज प्रकाशन,
अंसारी रोड़, दरियागंज, दिल्ली 2, 
संस्करण 2012, मूल्य-100
संविधान का हवाला देते हुए कवि विक्रम कुमार ने अस्पृश्यता के अंत पर प्रश्न चिन्ह लगाया है तथा समाज की इस दुर्भावना के लिए ख़ास वर्गको जिम्मेदार ठहराया है। इन्होंने अपने काव्य के माध्यम से समाज के शोषक और अत्याचारी वर्ग को फटकार लगाई है और मेहनत कशों को आगे बढ़ने के लिए ललकारा है। लोगों को आगे बढ़कर भारतीय समस्या जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद और वंशवाद को हटाने के लिए गुहार करते हैं। इसीलिए ‘आओ आओ’ कविता में वो लिखते हैं-

‘‘किसी को कुछ यूँ ही नहीं मिलता /होता है छटपटाना
तड़पना, लड़ना, मरना /तब जाकर मिलता है वह
जड़ों को कुरेदो/बुराइयों को निकालो
अपने को तपाओ, बनाओ/ तभी फैला सकोगे प्रकाश
अपने अंदर, अपने आसपास
जाति मिटाओ, धर्म निरपेक्षता अपनाओ
क्षेत्रवाद मिटाओ, वंशवाद हटाओ।’’ 4

          कवि ने अपनी कविताओं के माध्यम से दलित विमर्श के साथ-साथ दलित चेतना का स्वरूप भी स्पष्ट किया है। इन्होंनेें समाज में मानव-मानव के बीच भेदभाव पैदा करके गंदगी फैलाने वालों पर कटाक्ष करते हुए ऐसे लोगों को अपने बल और बुद्धि का सदुपयोग करने की चेतावनी भी दे डाली है। अन्यथा समाज के दबे-कुचले लोग एक दिन ऐसे कुटिल मानसिकता वाले बुद्धिमान और बलवान की कद्र करना ही छोड़ देंगे। इसी कारण ‘दलित’ नामक कविता में वे लिखते हैं-

‘‘हे बुद्धिमान ! आप सही नीति /नहीं बना पाये
फिर क्यों आपकी बुद्धि का करें मान
हे बलवान ! आपने बल हीनों पर /बल दिखाया
फिर क्यों कहूँ / आपको बलवान ??---
अपने प्रकाश का, श्रेष्ठता का /बुद्धि का, बल का
सही उपयोग करना सीखो
मानव को मानव ही रहने दो
उसे अछूत ना बनाओ !’’5

          इस कविता संग्रह के माध्यम से इन्होंने बाह्य आडम्बरों पर प्रहार करते हुए लोगों को तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी है। गाय को मां से समानता दी जाती है, जिसके कारण स्त्रियों का अपमान होता है। स्त्रियों को गाय के समान दुधारू मानकर उन की समानता पशु से की जाती है। इस तरह की समानता का कवि ने विरोध किया है और मां को मां का दर्जा ही मिले, इसलिए मां की समानता गाय से नहीं करने के तरफ इशारा किया है। इसी कारण गाय को चौपाया कहते हुए स्त्री रूपी मां को विशेष दर्जा दिया है। इसी परिप्रेक्ष्य में ‘माता’ नामक कविता में वे लिखते हैं-

‘‘गाय नहीं है माता
ये है चार पैरों वाली चौपाया
दूध देने की उपयुक्त पात्र 
मात्र दूध देने से माता कैसे होगी
फिर तो बकरी, ऊँटनी भी
हो जाएगी माता और
साँड, बकरा, भैंसा बाप
कैसे कहें साँड, बकरा, भैंसा को बाप
क्यों पूजा करें इनकी माता की तरह
कोई माँ चौपाया नहीं!’’6   63

           
डॉ. उदयवीर सिंह
स्कूली व्याख्याता हैं,
हापुड में शोध परिषद् 
और 
प्रेरणा साहित्य समिति में 
उपाध्यक्ष हैं
संपर्क :ए-12-यूजी-2,
दिलशाद कॉलोनी,
दिल्ली-110095 
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इस कविता-संग्रह में प्रेम-संबंधी कविताएँ भी संग्रहित हैं, परंतु प्रमुख रूप से ज़ुल्म के खिलाफ़ आवाज़ उठाने और जातीय भेदभाव पर कटाक्ष करने में ज्यादा सफल हो पाया है। प्रेम की करूणा और उपेक्षा से उपजे भाव तथा सामाजिक भेदभाव के विद्रोहात्मक स्वर इस कविता संग्रह में महसूस किए जा सकते हैं। प्रेम व्यक्ति को किस कदर असहाय बना सकती है, इसे भी कई कविताओं में देखा जा सकता है। कुल मिलाकर युवा कवि विक्रम ने करूणा और विद्रोह दोनों भाव को एक साथ साधा है। भावों की विभिन्नता इस संग्रह की एक अन्य विशेषता है, जो इस संग्रह को विविध रंगों वाला प्रदर्शित करता है। कलात्मक रूप में इस कविता संग्रह में तुकों की योजना तो नहीं दिखती है, पर भाव और विचार की श्रृंखला सभी कविताओं में दिखती है। बिम्ब और प्रतीक का इस्तेमाल भी कवि ने किया है, जैसे-गिद्ध, गाय आदि। इस तरह कवि अपने विचारों को पाठकों तक पहुंचाने में सफल हुआ है। कुल मिलाकर विविध समस्याओं को उजागर करते हुए इस संग्रह में एक आह और अन्यायी समाज के प्रति प्रश्नाकुलता का भाव प्रकट हुआ है। उम्मीद करता हूँ कि इस कविता-संग्रह में व्यक्त भावों की विचारोत्तेजकता, सरलता और प्रश्नाकुलता पाठक वर्ग को सोचने के लिए बाध्य करते हुए साहित्य-जगत को झकझोरेगी।
          

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