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शोध:स्वातंत्र्योत्तर भारत के प्रमुख जनान्दोलनों का स्वरूप एवं प्रकृति/ सुमीत द्विवेदी

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अप्रैल 15, 2014 | मंगलवार, अप्रैल 15, 2014

           साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            
'अपनी माटी' 
(ISSN 2322-0724 Apni Maati
इस अप्रैल-2014 अंक से दूसरे वर्ष में प्रवेश
शोध:स्वातंत्र्योत्तर भारत के प्रमुख जनान्दोलनों का स्वरूप एवं प्रकृति/ सुमीत द्विवेदी

चित्रांकन:रोहित रूसिया,छिन्दवाड़ा
भारत में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध एवं बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में होने वाले पुर्नजागरण या समाज सुधार आन्दोलनों ने भावी जनान्दोलनों के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि का निर्माण किया। यह दौर देश में सामाजिक-सांस्कृतिक उथल-पुथल तथा परम्परा के आधुनिकता में रूपान्तरण की शुरूआत का दौर था। दूसरे शब्दों में यह भारतीयों में अनुभव एवं युक्तिपरक सोच के विकास, गौरवशाली अतीत के प्रति स्वाभिमान के जागरण तथा राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय भावना के उद्भव का दौर था। जिससे आगे चलकर राष्ट्रीय आन्दोलन का मार्ग प्रशस्त हुआ। आधुनिक भारत के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक लक्ष्यों के निर्धारण, उनका जन आकांक्षाओं के माध्यम से संघर्ष इस दौर की प्रमुख विशेषताएं थीं। 

उन्नीसवीं सदी के मध्य से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति और कमोवेश उसके बाद के ढाई दशकों, खासतौर पर विनोवा भावे के भूदान और जयप्रकाश की सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन तक के करीब सवा सौ वर्षों के दौर को यदि भारत में जनान्दोलन का दौर निरूपित किया जाए, तो कदाचित गलत नहीं होगा। आजादी के बाद सामाजिक- सांस्कृतिक आन्दोलन यद्यपि बहुत कमजोर पड़ गए, तथापि समय-समय पर ये आर्थिक आन्दोलन के रूप में सक्रिय अवश्य रहे। इस पूरे दौर के आन्दोलनों पर जब हम गौर करते हैं, तो हमें मुख्य रूप से तीन बातें देखने को मिलती हैं। एक तो यह है कि इन आन्दोलनों की जड़ें समाज में निहित थीं, क्योंकि ये आन्दोलन या तो समाज व्यवस्था में सुधार लाने के प्रति लोगों को जागरूक एवं प्रेरित करते थे या समाज के ढांचे में मौलिक बदलाव लाने हेतु संघर्ष करने के लिए उन्हें संगठित रूप से गतिमान करते थे। भले ही इनमें से कोई या कुछ आन्दोलन जाहिर तौर पर किसी वर्ग के लोगों के अधिकारों की अभिस्वीकृति या हितों के संवर्धन से ही संबंधित रहे हों, तो भी उनका मूल लक्ष्य समाज व्यवस्था में मौलिक बदलाव लाना ही था, क्योंकि ऐसा किये बिना उनके घोषित वर्गीय लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं हो सकती थी।(मीडिया विमर्श, अप्रैल-जून 2012, पेज 45)

दूसरे इन आन्दोलनों ने लोगों को आन्दोलन के लक्ष्यों के प्रति जागरूक तथा उनकी प्राप्ति हेतु संघर्ष के लिए संगठित व गतिमान करने के प्रभावकारी माध्यम के रूप में वैयक्तिक संचार पद्धिति को प्रमुखता दी और विद्यमान जनसंचार माध्यमों पर पूर्णतया निर्भर करने की जगह या तो स्वयं के माध्यमों के विकास को आन्दोलन का एक अंग बनाया या आन्दोलन की मानसिकता से जुड़े लोगों ने अपने प्रयासों से समाचार पत्रों, पम्प्लेटों एवं पत्रिकाओं के प्रकाशन के माध्यम से आन्दोलन में सहयोग किया। तात्पर्य यह है कि तत्कालीन जनान्दोलनों के दौरान आन्दोलनों की भांति संचार माध्यमों की जड़ें भी समाज के अन्दर से निकलती थीं। तीसरी बात यह है कि इन आन्दोलनों में जनप़क्ष प्रमुख एवं ताकतवर था, जबकि संचार (अथवा मीडिया) अनुपूरक एवं अनुगामी था। आजादी के बाद से जनान्दोलन एवं मीडिया विशेष रूप से पत्रकारिता का सामाजिक पक्ष यद्यपि कमजोर पड़ने लगा, तथापि देश में जनान्दोलनों का अस्तित्व कमोबेश बना रहा था।
स्वातन्न्न्योत्त्र भारत के प्रमुख जनान्दोलन-
आजादी के बाद समाजवादी नेता डॉ0 लोहिया ने समाजवादी आन्दोलन को फैलाया। यद्यपि 50 के दशक के आरम्भ में समाजवादी पार्टी ताकत व फैलाव की दृष्टि से कांग्रेस के बाद दूसरी बड़ी पार्टी थी तथा जिसकी जन-स्वीकृति भी बढ़ रही थी, परन्तु समाजवादी विचारधारा ने राष्ट्रीय जनान्दोलन का रूप नहीं लिया था। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के गठन के बाद यह डॉ0 राम मनोहर लोहिया का ही प्रयास था कि समाजवादी आन्दोलन के समता के कार्यक्रम आम आदमी की आकांक्षा बनने लगे थे। लोहिया के आन्दोलन ने विशेषतः उत्तर भारत के जनमन को ज्यादा हिलाया। 

1973 में गुजरात का नौजवानों का आन्दोलन, अल्पकाल में ही पूरे गुजरात में फैल गया। 1974 में गुजरात आन्दोलन को आगे बढ़ाते हुए जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रान्ति के नाम से आन्दोलन बिहार से आरम्भ हुआ और शीघ्र ही यह आन्दोलन राष्ट्रव्यापी हो गया। यद्यपि दक्षिणी राज्यों में केरल को छोड़कर यह कहीं भी जनान्दोलन का रूप नहीं ले सका, परन्तु शेष देश में यह आन्दोलन एक व्यापक आन्दोलन था। यह सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के नारे का आन्दोलन था जिसने समूचे देश में परिवर्तन की इच्छा को जगाया था। इस आन्दोलन को आमतौर पर मीडिया का पूरा समर्थन था तथा चन्द अखबारनवीसों, जो व्यक्तिगत रूप से श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रति प्रतिबद्ध थे या शासन के कृपा पात्र थे, को छोड़कर मीडिया की सहानुभूति आन्दोलन के साथ थी।

राजनीतिक दलों के आन्दोलन संगठित शक्ति के प्रतीक होते हैं। जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन ने राजनीतिक दलों को शरण दी थी। जनता पार्टी की आपसी खींचतान के बीच संजय गांधी के उग्र प्रदर्शनों को आम जनता ने जनान्दोलन माना। निराशा की धूल झाड़कर श्रीमती इंदिरा गांधी ने धुंआधार दौरे किए। राजनीतिक प्रचार में जनता ने आन्दोलन की छवि देखी। राजनीतिक आन्दोलन हमेशा जनान्दोलन नहीं होते। जनान्दोलन का राजनीतिकरण सदा नुकसानदेह साबित हुआ है। 

इन्दिरा गांधी की मृत्यु के पश्चात देश में स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से विदेशी पैसे ने जनान्दोलन को बहुत विपरीत ढंग से प्रभावित किया। देश में बड़े पैमाने पर देशी-विदेशी पैसे से संचालित व निर्भर क्षेत्रीय व स्थानीय आन्दोलन आरम्भ हो गए। इन आन्दोलनों की सरकारों के साथ बेहतर समझ थी। इनके मुद्दे व कार्यक्रम भी आमतौर पर वैश्विक पूंजीवाद के लिए अनुकूल थे। इन एनजीओ आन्दोलनों ने भारतीय जनान्दोलनों की परम्पराओं को बहुत प्रकार से प्रभावित किया। कार्यक्रमों में कुछ नये मुद्दों का प्रवेश तो हुुआ परन्तु इसने जनान्दोलनों की आत्मनिर्भरता या जन निर्भरता लगभग समाप्त करने की चुनौतीपूर्ण प्रतिस्पर्धा पैदा कर दी।

आन्दोलन चाहे वह स्थानीय हो, क्षेत्रीय हो या राष्ट्रीय हो अथवा सामाजिक, आर्थिक या राजनैतिक हो, में सामान्यतया तीन बातें पायी जाती हैं। एक तो यह कि आन्दोलन का कोई लक्ष्य नहीं होता है। दूसरी यह कि उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कोई संगठन होता है और तीसरी यह कि किसी रणनीति के तहत आन्दोलनकारी संगठन उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सामूहिक रूप से प्रयास करता है। किन्तु इन सब में संगठन की केन्द्रीय भूमिका होती है। 

किसी आन्दोलन को जनान्दोलन कहलाने के लिए विशेष रूप से उसके लक्ष्य, आधार, संगठन और लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सामूहिक प्रयत्न का जनव्यापी होना जरूरी है। यदि ऐसा नहीं है, तो उसे समूहगत, संस्थागत, संवर्गीय अथवा स्थानीय आन्दोलन या विरोध प्रदर्शन कहा जा सकता है, किन्तु जनान्दोलन नहीं। आमतौर पर किसी जनान्दोलन का आसन्न लक्ष्य प्रत्यक्ष रूप से किसी तात्कालिक जनव्यापी मुद्दे का निराकरण या किसी विशिष्ट जनव्यापी समस्या का समाधान होता है, किन्तु उसका दूरगामी लक्ष्य सामान्यतया विद्यमान व्यवस्था में मौलिक परिवर्तन लाना ही होता है, ताकि इससे न केवल संघर्षरत पीड़ित पक्ष को न्याय मिले अपितु सभी के लिए हितकारी एक बेहतर व्यवस्था की रचना हो सके।

सुमीत द्विवेदी
शोध छात्र, 
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
नेहरू ग्राम भारती विश्वविद्यालय, 
इलाहाबाद
323/2 अलोपीबाग़, इलाहाबाद , उत्तर प्रदेश -211006

मो--9450121269
ई-मेल:sumeetdwivedi@gmail.com
भारत में समसामयिक आन्दोलनों विशेषकर अन्ना हजारे के जनलोकपाल आन्दोलन पर जब हम गौर करते हैं, तो देखते हैं कि ये आन्दोलन कमोबेश तीन बातों पर केन्द्रित था। पहला- सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार का उन्मूलन, दूसरा- कालेधन पर प्रभावकारी नियंत्रण और तीसरा- विदेशी बैंकों में अवैध रूप से जमा भारतीयों के धन की स्वदेश वापसी एवं उसका अधिग्रहण। यद्यपि ये आन्दोलन बहुत नियोजित एवं संगठित नहीं है और न ही इनके नेतृत्व एवं कार्यकर्ताओं को बड़े पैमाने पर जनसंघर्ष को संचालित करने का पूर्व अनुभव है, तथापि चूंकि लक्ष्य भ्रष्टाचार का निवारण है, जिससे आज देश में कमोवेश सभी त्रस्त हैं, इसलिए इनको व्यापक जन समर्थन मिला, भले ही यह समर्थन सांकेतिक एवं पैसिव अधिक और ऐक्टिव कम रहा है। इसके अलावा आन्दोलनकारियों की साफ सुथरी छवि, सरलता एवं साफगोई, समाजसेवा और त्याग की भावना तथा भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष की प्रतिबद्धता आदि बातें भी आन्दोलन के प्रति लोगों का समर्थन जुटाने में महत्वपूर्ण रही हैं। देश में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के शुरूआती चरण का पहला भाग समाप्त हो गया है। सूचना का अधिकार तथा ‘लोकपाल विधेयक’ जिस भी रूप में है कानून बनकर कार्यपालिका का हिस्सा बन चुका है। लेकिन आन्दोलनकारी इस बात को बखूबी समझते हैं कि किसी भी आन्दोलन को चाहे वह कितना ही नियोजित और मजबूत क्यों न हो मुकाम तक पहुंचने में संघर्ष के कई दौर से गुजरना पड़ता है, जिसमें काफी समय लगता है। अतः अब वे आन्दोलन के दूसरे चरण में हैं। हालांकि आन्दोलन अपने दूसरे चरण में दो भागों में बंटकर अपनी शक्ति का ह्रास कर चुका है, फिर भी बंटे हुए दोनों हिस्से जिनमें से एक आन्दोलन के माध्यम से तो दूसरा राजनीति दल के रूप में तन्त्र में शामिल होकर, विधायिका द्वारा कुशासन, भ्रष्टाचार और अनाचार पर प्रहार कर रहे हैं। इस चरण के क्या परिणाम होंगे यह अभी भविष्य के गर्त में है, फिर भी कहा जा सकता है कि इसने वर्तमान भारत में राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्तर के परिवर्तनों की शुरूआत तो कर ही दी है।

सन्दर्भ -

1 - जयप्रकाश नारायण, लेखक- सुधांशु रंजन, प्रकाशक- नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, दूसरी आवृत्ति, वर्ष 2012
2 - मीडिया विमर्श पत्रिका, जनान्दोलन विशेषांक, वर्ष 6, अंक 23, जून 2012
3 - भारत में लोकतन्त्र, लेखक- चन्द्र प्रकाश भांभरी, प्रकाशक- नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, दूसरी आवृत्ति, वर्ष 2013
4 - भ्रष्टाचार और अन्ना आन्दोलन, लेखक- महाश्वेता देवी तथा अरूण कुमार त्रिपाठी, प्रकाशक- वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, वर्ष 2012
5 - लोकनायक अन्ना हजारे और जनलोकपाल बिल, लेखक- देवप्रकाश चौधरी, प्रकाशक- हिन्द पाकेट बुक्स, नई दिल्ली, वर्ष 2011
6 - भौमर्षि, लेखिका- शुभांगी भडभडे, प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ, वर्ष 2004
7 - सरोकारों के दायरे, लेखक- अच्युतानन्द मिश्र, प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, वर्ष 2010
8 - जब तोप मुकाबिल हो, लेखक- प्रभाष जोशी, प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, वर्ष 2008
9 - आन्दोलन: संभावनाएं एवं सवाल, प्रकाशक- अरूणोदय प्रकाशन, हार्पर हिन्दी, नोएडा, वर्ष 2011
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