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धरोहर:पत्थरों पर बोलता प्रेम ‘खजुराहो’/डॉ. मधुमती नामदेव

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, अक्तूबर 05, 2014 | रविवार, अक्तूबर 05, 2014

त्रैमासिक ई-पत्रिका 'अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)वर्ष-2, अंक-16, अक्टूबर-दिसंबर, 2014
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छायाकार:ज़ैनुल आबेदीन
खजुराहो भारत के बुंदेलखंडी भाग मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले का छोटा सा कस्बा है खजूर के पेड़ों के विशाल बगीचे थे इससे इसका नाम खजुराहो पड़ा। यह ताजमहल के बाद सबसे ज्यादा देखे और घूमे जाने वाले पर्यटक स्थलों में है। खजुराहों शिल्पकला के प्रसिद्ध मंदिर विश्व की अनमोल धरोहर है इसे यूनेस्को द्वारा सन् 1986 में विश्व विरासत का दर्जा प्राप्त हुआ। यह भारतीय आर्य स्थापत्य कला और वास्तुकला की नायाब मिसाल है। पत्थरों पर तराशी सुंदर कला की नगरी है ‘खजुराहों’। यहाँ के विश्व प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण चंदेल राजाओं ने 950-1050 ईस्वी के मध्य करवाया था। इन मंदिरों की संख्या प्रारंभ में 85 थी अब इनकी संख्या लगभग 22 है। ये मंदिर मध्ययुगीन भारत की शिल्प एवं वास्तुकला के सर्वोकृष्ठ नमूने हैं। पत्थरों पर उकेरे गये जीवन के विभिन्न आयामों का प्रदर्शन करते खजुराहों के गगनचुम्बी देवालय विश्वभर में विख्यात हैं। यहाँ दूर-दूर तक फैले मंदिरों की दीवारों पर देवताओं तथा मानव आकृतियों का अंकन इतना भव्य एवं कलात्मक हुआ है, कि दर्शक देखकर मंत्र मुग्ध हो उठते हैं।

खजुराहों केवल स्थापत्य कला के मंदिर ही नहीं, भारत की सांस्कृतिक धरोहर भी है इसमें नारी की जिन भाव भंगिमाओं को अंकित किया गया है उसके सामने आधुनिक यूरोप व अमेरिका के चित्र भी फीके पड़ गये हैं। मंदिरों के विशाल समूह (पश्चिम समूह) की खोज सन् 1938 में एक ब्रिटिश इंजीनियर कैप्टन टी. बर्ट को अपनी यात्रा में कहारों से मिली जानकारी के आधार पर हुई। मध्ययुगीन सभ्यता के प्रतीक इन मंदिरों की मूर्तियां प्रेम आनंद और उल्लास का प्रतीक हैं। इन मंदिरों को भौगोलिक दृष्टि से तीन भागों में विभाजित किया गया है-
पश्चिमी समूह के मंदिरों में कंदरिया महादेव, चौसठ योगिनी, चित्रगुप्त मंदिर, विश्वनाथ मंदिर, लक्ष्मण मंदिर तथा मातंगेश्वर मंदिर।

पूर्वी समूह के मंदिरों में पार्श्वनाथ मंदिर, घटाई मंदिर, आदिनाथ मंदिर, मंदिरों के इस समूह में ब्रह्मा, वामन आदि हिन्दू देवताओं के मंदिर भी हैं।दक्षिणी समूह के मंदिरों में दूल्हादेव मंदिर तथा चतुर्भुज मंदिर।खजुराहों के मंदिर निर्माण कला के सर्वोच्च और पूर्ण आदर्श है। वास्तुकला की नागर शैली में ये अपना विशेष स्थान रखते हैं। ये मंदिर आधुनिक और पुरातनकाल के बीच एक कड़ी है। हजार वर्षों के प्राकृतिक प्रकोपों के बावजूद ये मंदिर आज भी एक सुंदर मोती की तरह भारत की कंठमाला में चमक रहे हैं। ग्रेनाइट और बलुआ पत्थरों से बने ये मंदिर हजार वर्षों से अपने मटियाले गुलाबी तथा हल्के पीले रंग में उन सभी को मूक आमंत्रण देते हैं जिन्होंने प्रेम किया है और प्रेम की तलाश में भटकते रहे हैं। इन मंदिरों की भव्यता में शांति  एवं संसार में कुछ पा लेने का संतोष झलकता है। 

कला के इस साम्राज्य में मनुष्य के प्रेम को पूर्णता प्राप्त होती है, प्रेम का कोई भी रूप न बचा होगा जो खजुराहों की मूर्तियों में दिखाई न देता हो। मनुष्य के प्रत्येक मूड में उकेरी हुई ये मूर्तियां इतनी सजीव हैं कि ऐसा लगता है अभी ये बोल पड़ेंगी।  खजुराहों में भारतीय संस्कृति के सभी पक्ष एक साथ परिलक्षित होते हैं।धार्मिक प्रभाव से परिपूर्ण सम्प्रदाय विशेष के आराध्यदेव जिसके अंतर्गत केन्द्रीय स्थल के महादेव मंदिर जिसमें तमाम देवी देवताओं की कलात्मक मूर्तियां, चित्रगुप्त मंदिर, आदिनाथ मंदिर और बुद्ध प्रतिमा आदि हैं।धार्मिकता के प्रभाव से रहित पारिवारिक घरेलू दृश्य, नृतक वादक, गुरू-शिष्य की प्रतिमायें।व्याल, शार्दूल तथा पशुओं आदि की मूर्तियां, मल्लयुद्ध, हाथियों का युद्ध, शार्दूल की मूर्तियां पाश्विकता पर आध्यात्मिकता की विजय का प्रतीक है।

अप्सराओं एवं नारियों की मूर्तियां का सौन्दर्य चित्रण जो खजुराहों की जान कहा जाता है। मनुष्य जीवन में प्रेम की विभिन्न मुद्राओं को चित्रांकित करती ये इतनी सजीव हैं, कि लगता है, कि ये मूर्तियां अभी प्रेम से परिपूर्ण हो बोल उठेंगी इन मूर्तियों में परिवार, देवी-देवताओं, अप्सरा आदि की प्रतिमायें जिनमें मिथुन (संभोगरत्) प्रतिमायें भी शामिल हैं। मंदिरों में जड़ी मिथुन प्रतिमायें सर्वोत्तम शिल्प की परिचायक हैं। इन मूर्तियों की सबसे बड़ी खासियत यह है, कि ऐसा लगता है शायद में चल रही है, बस हिलते ही वाली है, या फिर लगता है कि अभी बोल पड़ेंगी, कुछ मूर्तियां मुस्कुराती नजर आती हैं, तो शर्माती एवं रूठती। इन्हीं विशेषताओं के कारण ही तो खजुराहों को पत्थरों पर बोलता प्रेम की संज्ञा दी गई है। ये सभी मूर्तियां दर्शकों की भावनाओं को अत्यन्त उद्वेलित और आकर्षित करती हैं। ‘रति’ का शायद ही कोई ऐसा प्रकार होगा जो यहाँ की मूर्तियों में न हो। यहाँ की मूर्तियों ने तो रसिक शिरोमणि वात्स्यायन, जयदेव, और विद्यापति को भी पीछे छोड़ दिया है। हर मंदिर के बहिरंग में अनेक मूर्तियां अनेक भंगिमाओं के साथ है, कहीं बाकी चितवन, तो कहीं तन नयन, तो कहीं चकित नयन, कहीं केश विन्यास करती तो कहीं अंगराग लगाती, कहीं आंखें आंजती, कहीं आभूषण अलंकरण में निमग्न तो कहीं अपने ही रूप में निहारती, रीझती, दर्पण देखती, कहीं द्वार की ओट से झांकती, तो कहीं चौखट से सिर टिकाये द्वार पर खड़ी प्रतीक्षारत्, नायिकायें ही नायिकायें, होठों की मंद स्थिति से लेकर मुख मंडल के भोलेपन तक ऐसा कोई सूक्ष्म भाव नहीं, जो खजुराहों के कला शिल्पियों से छूटा हो, नृत्यंगनाओं और वादकों की मूर्तियां ही नहीं, तमाम मूर्तियों की देहयष्टि मंे ऐसी लयात्मकता है मानो उनमें नृत्य संगीत और सौंदर्य का समागम है। यहाँ के 22 मंदिर और 3 संग्रहालय धार्मिकता और ऐतिहासिकता का संगम है।

डॉ. (श्रीमती) मधुमती नामदेव
प्राध्यापक,
शा.ओ.एफ.के. महाविद्यालय,
जबलपुर (म.प्र.)
1156/3, फेस - 1, समीक्षा टाउन
जी.आर.पी. लाईन के सामने,
नॉर्थ सिविल लाईन
जबलपुर - 482001
मोबाईल - 9425344945      
खजुराहो के मंदिर के पास ही स्टेट म्यूजियम है जिसमें पूरे म.प्र. की ट्राइबल और फोक आर्ट के नमूने रखे हैं। पास ही पुरातत्व संग्रहालय है, जिसमें चंदेलकाल से संबंधित 10-12 वीं सदी की पूर्ण एवं खंडित प्रतिमायें संरक्षित हैं। अगर आप अपनी बुंदेलखंडी ऐतिहासिक और धार्मिक यात्रा में थोड़ा रोमांच चाहते हैं, तो खजुराहों से मात्र 32 कि.मी. दूरी पर स्थित पन्ना नेशनल पार्क की सैर भी कर सकते हैं। केन नदी के किनारे स्थित इस नेशनल पार्क में खजुराहों से सिर्फ आधा घण्टे की यात्रा करके पहुँच सकते हैं। इस पार्क में शेर के अलावा, चीता, भेड़िया और घड़ियाल देख सकते है, जहाँ नील गाय, सांभर और चिंकारा के झुण्ड अक्सर देखे जा सकते हैं। रंगून झील भी देखी जा सकती है।

अगर भारत में कहीं भी मंदिर, स्थापत्य व वास्तुकला का रचनात्मक, अद्वितीय, भव्य, बेजोड़, शानदार शाही सृजन है, तो वह है केवल हमारी माटी बुंदेलखण्ड के खजुराहों में यहाँ की शिल्पकला में धार्मिक छवियों के अलावा परिवार, पार्श्व, देवता, दिक्पाल, अप्सरायें सुर सुंदरियां भी हैं। इनकी वेशभूषा और आभूषण की भव्यता मनमोहक है। यहाँ की श्रृंगारिका मुद्राओं में अंकित मिथुन-मूर्तियों की कला अभूतपूर्व है, कला का जो निरावृत्त सौन्दर्य अंकन इनमें निहित है उसकी उपमा नहीं की जा सकती है।यदि आपको प्रेम और प्रेम के साथ सत्यम्, शिवम्, सुन्दरं के दर्शन करना हो तो आइयेगा अवश्य हमारे जाबालिपुरम् (जबलपुर) से 250 कि.मी. की दूरी पर “पत्थरों पर बोलते प्रेम खजुराहों” में, जो हमारी माटी बुंदेलखण्ड मध्यप्रदेश के छतरपुर में है।               
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