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आलेख:इतिहास के पृष्ठों पर अनलिखी आदिवासी आग्नेय गाथा: मगरी मानगढ़/डॉ. नवीन नन्दवाना

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, सितंबर 08, 2015 | मंगलवार, सितंबर 08, 2015

अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-2, अंक-19,दलित-आदिवासी विशेषांक (सित.-नव. 2015)
इतिहास के पृष्ठों पर अनलिखी आदिवासी आग्नेय गाथा: मगरी मानगढ़
डॉ. नवीन नन्दवाना

चित्रांकन-मुकेश बिजोले(मो-09826635625)
   साहित्य और समाज का गहरा नाता होता है। साहित्यकार समाज की विविध गतिविधियों को साहित्य के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाता है। अतः जीवन की सौंधी महक साहित्य में मिलती है। किंतु ऐसा नहीं होता कि साहित्यकार केवल उस सौंधी महक को ही अपनी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करता हो, वह तो समाज की पीड़ा और तकलीफों को भी व्यक्त करने के साथ-साथ वहाँ की दुर्गंध को भी वाणी प्रदान करता है और साथ ही इस बात की भी आशा करता है कि उसके प्रयास से समाज का प्रत्येक जन अपनी पीड़ा को समझ कर उनके निवारण का प्रयास कर सकेगा और वह दुर्गंध धीरे-धीरे सुगंध में तब्दील हो सकेगी। मुंशी प्रेमचन्द का मत है कि -’’साहित्य जीवन की आलोचना है। चाहे वह निबंध के रूप में हो चाहे कहानियों के या काव्य के, उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या करनी चाहिए।‘‘1 और हमारा साहित्य अनादि काल से ही अपने इस दायित्व का निर्वहन करता चला आ रहा है। 

समय के बदलाव के साथ-साथ साहित्य के मान, मूल्य और विषय भी बदलते रहते हैं। रचनाकार अपने समय का साक्षी होता है और वह अपने आस-पास घट रही घटनाओं को सूक्ष्म रूप से अवलोकित करता है। आज का साहित्य जीवन के यथार्थ का साहित्य है। समय के बदलाव को समझते हुए आज से कुछ वर्षों पूर्व कलमकार ने नारी जीवन के यथार्थ को परखने का प्रयास किया और परिणामस्वरूप स्त्री विमर्श नामक एक बड़ी संकल्पना का जन्म हुआ। कई-कई रचनाकारों ने इस विषय पर कलम चलाकर इस विमर्श को प्रचारित, प्रसारित एवं स्थापित किया। इसके बाद साहित्य जगत में एक नई संकल्पना का जन्म हुआ और वह थी दलित विमर्श। जिसके माध्यम से दलित जीवन के यथार्थ और उनकी समस्याओं को वाणी प्रदान की गई। आज ऐसी ही एक नई संकल्पना को लेकर साहित्य जगत में चर्चा जोरों पर है और वह संकल्पना है, आदिवासी विमर्श। 

’’मनुष्य की प्रतिभा और सामर्थ्य की अनन्त संभावनाओं का द्वार अपने अनुभव के लिए खुला रखकर सप्रयत्न उसके वर्तमान को बदलने में जो संलग्न होता है, वही समकालीनता का धर्म निर्वाह करता है।‘‘2 और आज का रचनाकार अपने जीवन के समकालीन मुद्दों पर कलम चलाकर समकालीनता के दायित्व का निर्वहन कर रहा है। आज समकालीन हिन्दी कविता और उपन्यास लेखन के माध्यम से आदिवासी जीवन के दुःख-दर्द को मुखरित करने का व्यापक प्रयास किया जा रहा है। आज हिंदी जगत में ऐसे कई उपन्यास रचे जा चुके हैं जो आदिवासी जीवन पर केंद्रित हैं। इस प्रकार का लेखन आज से नहीं वर्षों पहले से चल रहा है। हाँ, आज इसकी संख्या में वृद्धि हुई है। आदिवासी जीवन पर केंद्रित हिन्दी के चर्चित उपन्यासों की बात की जाए तो रांगेय राघव का कब तक पुकारूं, राजेंद्र अवस्थी का सूरज किरण की छांव, मैत्रेयी पुष्पा का अल्मा कबूतरी, वीरेंद्र जैन का डूब, पार, भगवानदास मोरवाल का रेत, काला पहाड़, संजीव का धार, जंगल जहाँ शुरु होता है, सावधान नीचे आग है, रणेंद्र का ग्लोबल गाँव के देवता, हिमांशु जोशी का महासागर, महुआ माजी का मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ आदि के नाम मस्तिष्क पटल पर उभरते हैं।

मेरी जन्म एवं कर्म भूमि राजस्थान रही है और राजस्थान का भी ऐसा संभाग उदयपुर जो कि आदिवासी बहुल क्षेत्र है। हमारे विभाग में अध्ययनरत लगभग 80 प्रतिशत विद्यार्थी वर्ग इस वर्ग से हैं। उदयपुर के नजदीक दो जिले डूंगरपुर और बाँसवाड़ा पूरी तरह आदिवासी बहुल हैं। यह क्षेत्र वागड़ क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। भील, मीणा, गरासिया तथा सहरिया यहाँ की प्रमुख आदिवासी जातियाँ है। यहाँ का सामाजिक जीवन भी विविधतापूर्ण है। यहाँ के आदिवासियों का जीवन विविध लोकसांस्कृतिक परम्पराओं से समृद्ध है। लोक संस्कृति का यह प्रवाह गंगा की भाँति अविरल एवं अखण्ड रूप से सदियों से प्रवाहमान है तथा सहजता एवं अकृत्रिमता उसकी अपनी विशेषता है। राजस्थान की आदिवासी जातियों खास तौर पर भील और मीणा आदि के जीवन को आधार बनाकर यहाँ के लेखकों ने भी अपनी कलम चलाई है। राजस्थान में निवासरत आदिवासीजन के जीवन पर डॉ. राजेंद्रमोहन भटनागर ने मगरी मानगढ़, डॉ हरिराम मीणा ने धूणी तपे तीर और सोहन लाल शर्मा का मीणा घाटी आदि प्रमुख औपन्यासिक रचनाएं है। 

राजस्थान के बाँसवाड़ा के नजदीक स्थित मानगढ़ की पहाड़ी अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती है किंतु दुर्भाग्य है कि भारतीय इतिहासकारों की दृष्टि उसकी महत्ता तक समय रहते नहीं पहुँची। इस धरा पर आदिवासी जनता के साथ भीषण अमानुषिक अत्याचार हुए किंतु उनके त्याग और बलिदान का अंकन कर, भारतीय इतिहास में उनके लिए एक पृष्ठ भी नहीं लिखा गया। यहाँ घटित हुआ हत्याकांड जलियांवाला बाग हत्याकांड से कई गुना बड़ा था किंतु इतिहास के पृष्ठों पर यह आग्नेय गाथा अंकित नहीं हो सकी। यहाँ इतने बड़े घटनाक्रम के बावजूद आदिवासियों का बलिदान इतिहास में अंकित नहीं हो सका। यहाँ भी उनके साथ छलावा ही हुआ। वह ठगा सा रह गया। राजस्थान के साहित्यकारों की दृष्टि इस घटना पर पड़ी और इन्होंने इतिहास के पन्नों से गुमनाम रही इस घटना को उपन्यास एवं नाटकों आदि के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान की। राजेंद्रमोहन भटनागर ने 07 दिसम्बर, 1908 की इसी हैरतअंगेज घटना को आधार बनाकर मगरी मानगढ़ नामक उपन्यास की रचना की। उन्होंने बता दिया कि यह घटनाक्रम जलियांवाला बाग घटनाक्रम से कई गुना भीषण और दर्दनाक था। जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल, 1919) में तो सिर्फ 379 शांतिप्रिय लोग मारे गए जबकि मानगढ़ पहाड़ी पर मरने वालों की संख्या 1500 के लगभग थी। इतनी बड़ी संख्या में नरसंहार हुआ किंतु वह इतिहास के पन्नों में गुमनाम ही रहा। जीवन की बुनियादी समस्याओं से झूझ रहा आदिवासी जन इतिहास में अंकित होने से भी वंचित ही रहा। ऐसे समय में याद आती है राजस्थान के प्रसिद्ध गीतकार की ये पंक्तियाँ -

’’सत्ता के गलियारे कोई/
अपनेपन की बात चलाए/ ऐसा लगता है बांबी में/ 
अमृत की आवाज लगाए/ पग को धूल, शूल आँखों को/
सपनों को जहरीला दंशन ऐसे में सौगंध उठाएँ-परिवर्तन, केवल परिवर्तन।‘‘3

जी, परिवर्तन की कामना इस वागड़ अंचल के आदिवासियों में जगाई थी- श्री गोविंद गुरु ने और उनकी यह अलख केवल राजस्थान के इस इलाके तक ही सीमित नहीं रही। वह मध्यप्रदेश और गुजरात तक में भी फैल गई। हाँ, यहाँ यह बात ध्यान रखना जरूरी है कि गोविंद गुरु ने जो परिवर्तन की अलख जगाई थी वह किसी सत्ता को परिवर्तित करने के लिए नहीं थी। वह तो इस इलाके में रहने वाले आदिवासी जन की जीवन स्थितियों में परिवर्तन लाने की अलख थी। गोविंद गिरी उन आदिवासियों के लिए मसीहा बनकर उभरे थे। उन्होंने ही उन लोगों को बताया था कि जीवन क्या होता है और उसे कैसे जीना चाहिए। उनका ध्यान आदिवासी समाज की बदहाल स्थितियों की ओर गया और इस बदहाल जीवन को देख वे बेचैन हो उठे। वे कहते हैं कि- ‘‘मेरा समाज, मेरे लोग... सबके सब शोषण की चक्की में पिस रहे हैं। आज से नहीं सदियों से। वे भूल गए हैं कि वे भी दूसरे मनुष्यों की तरह सम्मान से जीने का हक़ रखते हैं। मनुष्य होने की यही पहचान है।....वे कीड़े-मकोड़े नहीं हैं। उनके उत्थान के लिए मैं बेचैन हूँ।’’4 आदिवासी जन को मनुष्य होने की यही पहचान दिलाने का कार्य वागड़ अंचल में श्री गोविंद गुरु ने किया। प्रस्तुत उपन्यास मगरी मानगढ़ इसी आदिवासी जन के त्रासदपूर्ण जीवन और गोविंद गुरु के योगदान का स्मरण कराता है।

यह आदिवासी समाज जो मुख्यतः दक्षिण राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात के भागों में बसा था, साधारणतः निरक्षर था, हिंसा की भावनाएं उनमें भरी थी। यह समाज शहरी चकाचौंध से दूर अपनी लोक संस्कृति को जीवंत बनाए था। अभावों में बदहाल जीवन जीता यह समाज किसी से कोई शिकायत करे बिना अभावों को ही अपनी नियति मान जी रहा था। उपन्यासकार डॉ. राजेंद्रमोहन भटनागर ने मगरी मानगढ़ उपन्यास के प्रारंभ में ही इनकी बदहाली को इस प्रकार वर्णित किया है- ‘‘घर में था क्या, दो जून की रोटी और हरी या लाल मिर्च की चटनी या कांदा (प्याज) फोड़कर खाने के भी लाले थे। बीच-बीच में सूखे या अति वृष्टि से वागड़ प्रांत उजड़ जाता था।.......पाँव में पनही नहीं, देह पर चिथड़े लपेटे, पीठ से लगे पेट को संभालते........पर ‘डिबुआ (पैसा) नहीं पास, मेला लगे उदास‘ वाली कहावत को वे अपने में जीते थे।’’5 ऐसी दयनीय दशा में जीते वागड़ के आदिवासियों को तारने के लिए मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन, 20 दिसम्बर, 1858 को गणेश्या और सावंती नामक बनजारा दंपति के यहाँ एक मसीहा का जन्म हुआ जिसका नाम था गोविंद गिरी। गोविंद बचपन से ही होनहार था। उसने गाँव में ही कुछ शिक्षा भी प्राप्त की थी। 

गोविंद गिरी को कुछ-कुछ समझ आने पर ही वह पीड़ित मानवता के कल्याण की कामना मन में संजोने लगा। वह गाँव-गाँव घूमकर यह देखना चाहता था कि क्या सभी जगह आदिवासियों का जीवन इसी प्रकार बदहाल है या कुछ भिन्नता लिए है। उसने इसके लिए भजनों का भी सहारा लिया और गाँव वालों का विश्वास अर्जित करने का प्रयास किया। घूमते-घूमते वह बेएड़ा गाँव पहुंचा जहाँ उसे कई भील लोग एक साथ मिले। गोविंद ने उनको ज्ञान की बातें बताई। किसी एक भील ने जब उसकी जाति के बारे में पूछा तो गोविंद ने बड़ी समझदारी से इस प्रकार जवाब दिया- ‘‘मेरी जाति-धर्म इनसानियत है मेरे भाई।....जाति धर्म में क्या रखा है। हम सब वनवासी हैं, आदिवासी हैं, भील भाई हैं। गरीबी हमारा धर्म है और अन्याय, अत्याचार को सहना हमारी जाति।’’6 इस प्रकार गोविंद ने लोगों को जाति, धर्म से परे मानव धर्म अपनाने की सीख देना प्रारंभ किया। गरीब भील जब अपनी दुदर्शा गोविंद को बताते हुए कहता है कि हम सूखे के मारे हैं, दो वक्त का भोजन हमें नसीब तक नहीं होता, ऊपर से रजवाड़े हमसे बेगार लेते हैं। इस प्रकार हमारा जीवन पशुवत है। तो इस पर गोविंद गिरी बताते हैं कि यह हालत केवल तुम्हारी नहीं सभी आदिवासी भाइयों की है। गोविंद ने बताया कि-‘‘भाइयों यह प्रश्न टेढ़ा है। जितना सहज समझ रहें हैं, उतना नहीं हैं।...दरअसल शोषण से मुक्त होने का एक मात्र रास्ता है विद्या।... विवेक की जिससे अंधेरा हटता है। अंधेरा हटेगा तो प्रकाश आएगा। प्रकाश आएगा तो रास्ता सूझेगा। वह रास्ता जिससे शोषण का चक्रव्यूह तोड़ा जा सकेगा।’’7 इस प्रकार गोविंद गिरी ने आदिवासी समाज को शिक्षा की महत्ता दर्शायी और जीवन जीने के मायने सिखाए।

गोविंद गिरी ने आदिवासी जीवन की समस्याओं को समझा और उन समस्याआंे को मूक होकर सह  रहे आदिवासी समाज को बताया। धर्म परिवर्तन, सांप्रदायिकता, शोषण, बेगार, अशिक्षा, जल, पलायन, अंधविश्वास समस्याओं के साथ झूझ रहे और मद्यपान, हिंसा, माँसाहार आदि का व्यवहार कर रहे समाज को गोविंद गिरी ने समता, समरसता और सौहार्द का पाठ पढ़ाया। 

गरीबी और भुखमरी से दुखी आदिवासी जन को अंग्रेज झूठे सुख-स्वप्न दिखाकर धर्म परिवर्तन करवा रहे थे। गोविंद गिरी ने इस धर्म परिवर्तन के मूल मंतव्य को समझा और आदिवासियों को इसके यथार्थ से परिचित कराया। कई आदिवासी इस्लाम को स्वीकार रहे थे तो कई ईसाई धर्म को। उपन्यास के पात्र रघुवीर को लगता है कि भूख से मरने की अपेक्षा अपना धर्म परिवर्तित करने का विकल्प बेहतर है। किंतु ये सुख स्वप्न ‘चार दिन की चाँदनी, फिर अंधेरी रात‘ ही सिद्ध हुए। ‘‘कल्लू ने मजहब बदला। भूख जरूर मिटी, पर कितने दिन के लिए। गरीबी वहाँ भी थी और बदहाली भी। इसके साथ वह हर एक निगाह में भी गिरता चला गया। उसने वहाँ अपमान, उपेक्षा और ओछापन पाया। ताने पाए। वह घबरा उठा और बिना किसी को बतलाए अपने गाँव लौट आया फिर से बेगम को औरत बनाकर।’’8 वह अपने गाँव तो लौट आया था किंतु वह अब खुलकर जीने की स्थिति में नहीं रहा। वह अपनों के बीच आने के बाद भी डरा सहमा ही जी रहा था। तलवार के बल पर मुसलमान बनाना और मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने के घटनाक्रम भी वह भूूला नहीं था। गोविंद गिरी ऐसे लोगों में स्वाभिमान जागृत करते हैं और उनको अपने धर्म की महत्ता बताते हैं। उनकी द्वारा जगाई गई इसी चेतना के कारण कई आदिवासी पुनः हिंदू धर्म में लौट आते हैं और आगे धर्मानतरण की प्रक्रिया पर विराम लगता है।

मिस्टर ऑलिव जब धर्म परिवर्तन के लिए लिए आदिवासियों को भ्रमित कर रहे होते हैं तब वहाँ पहुँचकर गोविंद गिरी बड़े ही व्यंग्यपूर्ण तरीके से कहते हैं कि- ‘‘जे कित्ता आसान है कि इधर धरम बदलो, उधर नरक से सीधे स्वर्ग में-एकदम चमाचम। ठाठबाट। सब कुछ टनाटन। फिर काहे ठाढ़ेश्वरी की गैल पकड़ें।...कौन पगला बने, खाक छाने। काम वो जा में टका मिले, शान बढ़े, राजकाज में पहुँच सधे। ........ मिस्टर ऑलिव, आप ही फैसला करो कि वह दृश्य शानदार होगा या यह! तब हम होंगे और हमारे हजारों भगत भाई। किसन से किसना बन रहे होंगे या जय-किशन से जैक्शन।’’9 इस प्रकार गोविंद गिरी धर्म परिवर्तन की परिपाटी का मखौल उड़ाते हैं। वे धर्म परिवर्तन की अंधी दौड़ के माध्यम से अपने कल्याण के स्वप्न देख रहे आदिवासी भाइयों को बताना चाहते हैं कि येे महज धोखा है और आदिवासी भाइयों को इस भुलावे में नहीं पड़ना चाहिए। इस प्रकार वे धर्म परिवर्तन की दौड़ पर नियंत्रण पाने में काफी हद तक सफलता अर्जित कर लेते हैं।

मानवीय गौरव की प्रतिष्ठा एक व्यापक सामाजिक तत्त्व है और इसकी स्थापना तभी हो सकती है जब -’’समाज के छोटे से छोटे व्यक्ति के गौरव को वही महत्त्व दिया जाए, जो बड़े से बड़े व्यक्ति को मिलता है। जब महामानव और लघुमानव का भेद कर एक के गौरव का बलिदान कर दूसरे के गौरव की वृद्धि न की जाय।..........उसकी स्थापना तभी हो सकती है जब हम सामाजिक समानता के सिद्धान्त को समान मानें, महाजन के समक्ष लघुजन को रखें, दोनों के लिए समान नैतिक मूल्य और समान अधिकार तथा समान गौरव की घोषणा करें।‘‘10 गोविंद गिरी ने आजीवन इसी लघु मानव आदिवासी को उसका हक दिलाने का व्यापक प्रयास किया।

गुलामी के उस दौर में आदिवासी जनता का हर तरफ से शोषण हो रहा था। एक ओर हमारे राजे-महाराजे शोषण कर रहे थे तो दूसरी ओर अंग्रेज। इस प्रकार वह आदिवासी जन शोषण की चक्की में पिस रहा था। गोविंद गुरु ने जनता को जीवन के मायने समझााए। उनको शिक्षित करने का व्यापक प्रयास किया। इस प्रकार उनमें बेगारी के खिलाफ चेतना जगी। उपन्यास का पात्र दीत्या अब बेगारी नहीं करना चाहता है।अब वह पुरजोर शब्दों में उसका विरोध करता है। वह सरकारी कारिंदे से स्पष्ट कह देता है कि- ‘‘बेगारी तो......। हमारा अपमान है। शोषण है। अन्याय है। अत्याचार है। जब हमारा राजा ही अपनी प्रजा का शोषण करेगा तब वह काहे का राजा, काहे का रक्षक...काहे का प्रजापालक।.........जो अपनी झूठी मान-सम्मान और शान-शौकत के लिए भूरिया की जी-हजूरी में खड़ा रहता है, वह अपनी प्रजा के मान-सम्मान की क्या रक्षा करेगा! उसने तो पहले ही हमें इतना कमजोर कर दिया है कि हम बिना रीढ़ की हड्डी के होकर रह गए।’’11 इस प्रकार गोविंद के प्रयास रंग लाने लगे थे।

आदिवासी समाज अंधविश्वास के जाल में फंसा था। गोविंद गुरु ने इस बात को महसूस किया कि जब तक आदिवासी जन इस जाल से मुक्त नहीं होंगे तब तक वे प्रगति के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकते। जब तक ये लोग टोने-टोटकों से मुक्त नहीं हो जाते तब तक ये ठगे जाते रहेंगे। स्वामी दयानंद सरस्वती से साक्षात्कार करते हुए गोविंद इस बात में भी आस्था दर्शा देते हैं कि बाह्याडंबरों के सहारे ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं हैं। जब स्वामी जी गोविंद को परखने के लिए पूछते हैं तो गोविंद उन्हें इस प्रकार स्पष्ट कर देते हैं- ‘‘हुआ तो बहुत कुछ, ऋषि प्रवर, यदि भाल पर तिलक लगाने वालों को स्वर्ग मिल जाए तो फिर पुण्य-पाप पर कौन विचार करेगा। सभी तिलक लगाकर बैकुंठ पहुँच जाएंगे। फिर आपके कर्म वाले सिद्धांत का क्या होगा।’’12 स्वामी दयानंद भी इस पर अपने विचार इस प्रकार व्यक्त करते हैं-‘‘अंधविश्वास के पीछे असत्य की काल्पनिक शक्ति है।...असत्य छिपाने के लिए ढोंग के प्रति रुझान बनता है। दिखावे का आचरण जन-जन को गलत रास्ते की ओर मोड़ता है। जन में उदासीनता बढ़ती है और जन आलसी होने लगता है। बुराई को अपनाने में उसे दिक्कत नहीं होती।’’13 स्वामी जी के विचारों से गोविंद बहुत लाभान्वित होता है। आदिवासियों की तंत्र-मंत्र, झाड़-फंूंक में बहुत आसक्ति होती है। वे सर्पदंश का इलाज भी इन्हीं में ढंूढते हैं। स्वामी गोविंद गुरु उन्हें इन सब अंधविश्वासों से बाहर करने की चेतना जागृत करते हैं। तंत्र-मंत्र के विश्वासी आदिवासियों में शगुन-अपशगुन के विचार भी ठूंस-ठंूस कर भरे होते हैं। राम के वनवास घटनाक्रम के माध्यम से गोविंद उन्हें इस प्रकार के विचारों से मुक्त रहने का संदेश देते हैं।

स्वामी गोविंद गुरु आदिवासियों के जीवन में परिवर्तन लाने के आकांक्षी थे। उनके प्रयत्नों से ही इस वर्ग में शारीरिक स्वच्छता, ईश्वर आराधना, मद्यपान निषेध जैसे परिवर्तन दिखाई पड़ने लगे थे। स्वामी गोविंद गिरी आदिवासी भील समाज को उसके यथार्थ से परिचित कराते हुए कहते हैं कि- ‘‘भाइयों, यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि भील-आदिवासी समाज की हालत हर दृष्टि से दयनीय है। वह समाज वन्य जीवन जी रहा है। अपने समाज में विसंगतियाँ ही विसंगतियाँ हैं। विषमता का विष अलग फैला हुआ है। वह समाज शोषण की चक्की मंे पिस रहा है। भोले भंडारी महादेव का भगत बनता है तो उनकी तरह से विष पीने से तो रहा बल्कि वह मदिरा पीने की लत का शिकार हो चुका है। चोरी करने से नहीं घबराता। लूटमार करना उसके बाएं हाथ का खेल है। डकैती के क्षेत्र में भी उसका दबदबा है। जरा-जरा सी बात पर वह मार-पीट पर उतारू हो जाता है। अपराध करने में वह सबसे आगे है।..........फिर कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे हमारा समाज ऊपर उठ सके, हमारी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो सके। हमारी भी सभ्य और ऊँचे समाजों में गिनती होने लगे।’’14 गोविंद गिरी की ये बातें सभी को ठीक लगती है। गलत आदतें और परंपराएं त्यागने हेतु एक सभा के गठन का विचार आता है और इसी की परिणति ‘सम्य सभा‘ के गठन के रूप में हुई। गोविंद गिरी ने इसका क्षेत्र भी केवल भीलों तक न रखकर वागड़, मध्यप्रदेश और गुजरात प्रांत में बसने वाले मीणा, गरासिया और बनजारा जाति के साथ-साथ अन्य जातियों तक फैला दिया। आदिवासी समाज को सुदृढ़ स्वरूप प्रदान करने के लिए गोविंद गुरु चाहते हैं कि-‘‘यदि आदिवासी समाज नशा-पत्ता, माँस-मदिरा, चोरी-डकैती, परस्त्री संपर्क, बहुपत्नी प्रथा आदि को छोड़ देगा तो एक बड़ा काम होगा- नैतिक और सामाजिक दृष्टि से। एक ईश्वर को मानेगा तो एकसूत्र में बंध जाएगा। प्रतिदिन नहाना। बिना नहाये भोजन न करना। इस तरह के आचरण वालों की संख्या बढ़ती जाएगी तो नैतिक तथा सामाजिक दृष्टि से अपना समाज सृदृढ़ होगा।’’15 इस प्रकार के गोविंद गिरी के प्रयत्न रंग लाते हैं। और सैंकडों-हजारों की संख्या में आदिवासियों की जीवन शैली में बदलाव प्रारंभ हो जाते हैं। 

गोविंद गिरी को लगता है कि यहाँ का आदिवासी पशुवत जीवन जी रहा है। वह अपाहिज-सा है और मेंढ़क की भाँति अंधेरे कुए में पड़ा टर्र-टर्रा रहा है और उसकी सुनने वाला कोई भी नहीं है। न राजे-महाराजे और न ही भूरिया अर्थात् अंग्रेज। वह समाज दीन-हीन और दिशाहारा है। उपन्यास के प्रारंभ में ही एक पगला बाबा उस अंग्रेज के इस क्षेत्र में आने और उसके दुष्परिणामों की ओर अपने गीत के माध्यम से संकेत दे देता है। वह कहता है-

‘‘पाड़ावां पाड़ावां भुरियो आवे रे
भूरियो साब दगामाते आवे रे
भूरियो साब मेवाड़ आवी लागो रे
भूरियो साब दरपण देतो आवे रे
मेवाड़ ना राजा धूजवे लागा रे।।’’16 

इस गीत द्वारा वह बाबा यह पूछता है कि वागड़ बलिदान माँग रहा है और यह बलिदान कौन देगा? इस प्रकार यह उपन्यास वागड़ के आदिवासियों के यथार्थ को उद्घाटित करता है। आदिवासियों की दयनीय दशा पर गोविंद गुरु को हैरानी होने लगती है। वे सोचते हैं कि- ‘‘यह कैसी समाज व्यवस्था है- एक तरफ सुभीता भोगी, अधिकार सम्पन्न, धन-धान्य से पूर्ण ठिकानेदार, महारावल, राज-महाराजा आदि हैं और दूसरी ओर दरिद्रनारायण, अधिकारवंचित झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले, दीन-हीन, जंगल में राह खोजते, पीड़ित और शापित हैं। इतना अंतर क्यों? किसने खींची ऐसी रेखा। फिर अच्छा समाज कैसे बने? षड्यंत्र! दुरभिसंधि। धोखा। छल-प्रपंच। पर क्यों? किसलिए? किसने किया?’’17 गोविंद गिरी द्वारा जगाई गई अलख से राजस्थान के वागड़ प्रदेश के साथ-साथ, मध्यप्रदेश और गुजरात के आदिवासियों में चेतना जागृत हो गई। अत्याचार का मुकाबला करने, स्वदेशी अपनाने, शिक्षा, समता, सम्मान, न्याय, शोषण का विरोध आदि प्रारंभ हो गए। अदालतों में मुकदमें आना बंद हो गए, पंचायतें अपने स्तर पर समस्याओं का हल करने लगी। महारावल और ठिकानेदार आदि हिल चुके थे। ये लोग धीरे-धीरे गोविंद गुरु के विरोधी होने लगे थे। कूरिया जब भील राज्य की बात करता है ताक गोविंद उसे बताते हैं कि हमने भगत पंथ चलाया है, कोई आंदोलन नहीं किंतु लोगों ने इसे आंदोलन और राजनीति से जोड़ दिया है। गोविंद का प्रयास था कि सदियों से पीड़ा झेल रहे आदिवासी भील को शोषण की चक्की में पिसने से मुक्ति मिले, उसकी गरीबी और पिछड़ापन दूर हो। ंिकंतु वे यह भी जानते थे कि यह सब कुछ केवल एक व्यक्ति और एक दिन के प्रयासों से संभव नहीं है। गोविंद कुछ आक्रोश में आ कहते हैं कि- ‘‘अंग्रेज रेजिमेंट के हमारे राजा-महाराजा, महारावल-जागीरदार आदि गुलाम हैं। हम गुलामों के गुलाम हैं। वास्तव में हमारे महाराजा अपने को झूठी शान, ऐशो आराम आदि के नाम पर गिरवी रख चुके हैं।...याद रहे शोषण कर्त्ता कायर होता है। कायर कभी राजा नहीं हो सकता।’’18 इन बातों ने कुरिया को यह समझा दिया कि गुरुजी केवल भक्त नहीं असाधारण क्रांतिकारी व्यक्तित्व के धनी हैं। 

गोविंद गिरी यह चाहते थे कि एक-दो नहीं, सभी आदिवासी गोविंद गिरी हों और शोषण और अन्याय का विरोध करे। अंग्रेज ऑफिसर कर्नल शटन राजमाता को भड़काने का प्रयत्न करता है। वह उनसे कहता है कि गोविंद गिरी आपके खिलाफ सत्ता संग्रह में लगा है। राजमाता को विश्वास है कि वह मात्र भगत है और सत्ता से उसका कोई लेना-देना नहीं है। इस पर कर्नल शटन राजमाता का विरोध कर उन्हें धमकाने लगता है और पूछता है कि आप उसे गिरफ्तार करेंगी या नहीं? अंग्रजों की धमकियों से विवश होकर गोविंद गिरी को जेल में डाल दिया जाता है। इसी समय यहाँ अकाल का तांडव होता है और कई मनुष्य और पशु काल की भेंट चढ़ जाते हैं। गोविंद गिरी की पत्नी (बदली) और माता-पिता भी इसी अकाल के कारण मृत्यु के शिकार हो जाते हैं। गोविंद को कारावास से मुक्त किया जाता है। यह घटनाक्रम जानकर उसका मन हाहाकार कर उठता है। मेवाड़ की रियासतों को असहाय और लुंजपुंज देखकर गोविंद गिरी को पीड़ा होती है। ऐसे में उन्हें महाराणा प्रताप के त्याग और शौर्य की गाथा याद आती है और वे सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या ये राजे-महाराजे ही राणा के वंशज है? अब गोविंद गुरु को डूंगरपुर छोड़ने को बाध्य कर दिया जाता है। बाँसवाड़ा में प्रवेश पर भी पाबंदी लगा दी जाती है। रजवाड़ों की दशा पर गोविंद गिरी को बड़ी पीड़ा होती है। वे कहते हैं कि- ‘‘राजा-महाराजा-महारावल, ठिकानेदार और जागीरदार अंग्रजों के पिट्ठू होते जा रहे हैं। वे हर कीमत पर अपना राज्य बचाने के लिए अपमानजनक समझौते पर हस्ताक्षर करते जा रहे हैं। इन राज्यों में राणा-महाराणा-महारावल की स्थिति कमजोर बताकर अपना उल्लू सीधा करते जा रहे हैं।’’19 प्रवेश पर पाबंदी लगने के कारण अब गोविंद गिरी यदा-कदा डूंगरपुर-बाँसवाड़ा की सीमा के आस-पास आकर आदिवासियों में अलख जगाने लगे।

भगतों की ओर से मानगढ़ की पहाड़ी पर, जो कि अहमदाबाद से आठ-दस मील की दूरी पर और बाँसवाडा़ के आनंदपुरी नामक स्थान से पंद्रह-बीस मील की दूरी पर स्थित है, वहाँ धूणी की स्थापना, नेजा फहराने और आदिवासियों को सम्मान के साथ मिलकर जीने और अपनी आर्थिक दशा सुधारने का मंत्र देने हेतु आमंत्रण गोविंद गिरी को दिया जाता है। माघ पूर्णिमा के दिन मेला प्रारंभ होता है। सभी आदिवासी वहाँ एकत्र होने लगते हैं। राजाओं को लगता है कि भील लोग उनके खिलाफ वहाँ एकत्र हो रहे हैं और इसी आशंका से वे अंग्रेज रेजीमेंट से सहायता माँगते हैं। वायसराय जनरल पहाड़ी को खाली करवाने की आदेश दे देते हैं। केप्टिन स्टोकले राजपूत तथा जाट रेजीमेंट और मेवाड़ भील कोर तथा खेड़वाड़ा की कंपनियों को लेकर निकल पड़ता है। अंग्रेजी गुप्तचर ऐजेंसी खबर देती है कि आदिवासी धार्मिक कार्य के निमित्त एकत्र हो रहे हैं। किसी राजनीतिक कारण से नहीं फिर भी अंग्रेज अधिकारी उस अवसर का लाभ अपने हितों के लिए उठाना चाहते हैं। वे ऐसी स्थिति निर्मित करना चाहते हैं जिससे कि आदिवासियांे और स्थानीय राजाओं में परस्पर विरोध के भाव पनपे। कर्नल शटन तीन ओर से पहाड़ी को घेर लेते हैं। जब लेफ्टिनेंट डॉइस स्थिति की धार्मिकता को दर्शाते हैं तो कर्नल शटन जो कहता है उससे उनकी वास्तविकता का बोध हो जाता है। वह कहता है कि- ‘‘हाँ, लेफ्टिनेंट डॉइस, हाँ। यही पॉलिटिक्स है। समय पर मत चूको।...खैर तुम्हें यह सब सोचने की जरूरत नहीं है। ऑर्डर इज ऑर्डर।...ली न्यासी (उदारता) की जरूरत नहीं।...... डू युअर जोब अकॉरडिंगलि माई प्लान।.....यह नाजुक वक्त है।...राजनीति में साधन की पवित्रता पर कभी ध्यान नहीं दिया जाता। सारा ध्यान लक्ष्य प्राप्ति पर रहता है।’’20 केप्टिन स्टोकले मेवाड़ भील कोर को अपनी बातों में ऐसा बहकाता है कि भील होते हुए भी वे अंग्रेजों का ही साथ देते हैं।

कर्नल शटन स्वामी गोविंद गिरी पर भील राज्य की स्थापना करने की चाह रखने और कानून तोड़ने का आरोप लगाते हुए तुरंत जगह खाली करवाने को कहता है। स्वामी जी कहते हैं कि ये सब धार्मिक कार्य से आए हैं और जल्दी ही बिखर जायेंगे किंतु कर्नल उनकी एक नहीं मानता है और वह कहता है कि- ‘‘सामी टुम भगटों को समझा सको टो ठीक है वरना टुम देख रहा है अपने चारों ओर। उनके पास खिलौने नहीं, राइफलें, मशीनगनें हैं। उनसे फूल नहीं गोलियाँ निकलंेगी। जिसके लगेगी वह वहीं टें हो जाएगा। समझ-सोच ले, सामी।...अब भी वक्ट है।’’21 ऐसा कहकर बिना कोई बात सुने और बिना कोई वक्त दिए वह फायर करने का आदेश दे देता है। आधे घंटे तक भीषण नरसंहार का क्रम जारी रहा जिसमें ‘‘सरकारी गिनती के हिसाब से पंद्रह सौ सत्रह लोग-लुगाई मारे गए। उनमें बच्चों की गिनती नहीं की और न उनकी जो भगदड़ में खैड़ापा की ओर मुड़ गए थे, मौत की घाटी में जाकर।’’22 इस प्रकार इस दुर्दान्त नरसंहार की साक्षी बनी वह मानगढ़ की मगरी और इतना सब होने पर भी मौन धरे बैठे रहे हमारे राजा-महाराजा-महारावल आदि। गोविंद गिरि पर गठारा गाँव के थानेदार युसुफ खाँ की हत्या का आरोप भी लगाया जाता है और मानगढ़ पर मारे गए लोगांे के लिए भी उसे ही जिम्मेदार माना जाता है। उन्हें सजा-ए-मौत सुनाई जाती है। भील आदिवासियों के उद्धारक गोविंद गिरी उनके कल्याण करते-करते अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं। वे जाते-जाते भी अपनी पत्नी गनी से कहते हैं कि- ‘‘हाँ, गनी, हाँ। थारे सँू म्हारी प्रार्थना जे है कि थे मगरी मानगढ़ की धूणी कभी बुझने मत देना। उसे निहत्थे ईश्वर में ध्यान मग्न, आहुति देते भोले-भाले भगतों का समाधि स्थल बनाना। वह आने वाली पीढ़ी को सदा याद दिलाती रहेगी कि वहाँ अहिंसक समाज पर कभी अंधाधुंध गोलियाँ बरसाई गई थीं, जिसमें हजारों, हजार निहत्थे और ईश्वर मग्न आदिवासी मारे गए थे। आने वाले समाज को यह पता बराबर बना रहे कि न्याय सदा अमर होता है, अन्याय मरता है।’’

गोविंद गिरी के बलिदान की साक्षी वह मानगढ़ की मगरी आज भी है। पर खेद है कि इतने बड़े बलिदान एवं आदिवासी भीलों के उद्धारक स्वामी गोविंद गिरी को वर्षों तक इतिहास भी भूला ही रहा। अब कुछ वर्षों से गोविंद गिरी के त्याग और यहाँ के आदिवासियों के बलिदान की गाथाओं का जिक्र होने लगा है। ‘न्याय सदा अमर होता है, अन्याय मरता है।’ में आस्था रखने वाले गोविंद गिरी के त्याग और सैंकड़ों आदिवासियों के बलिदान के लिए ऐसी रचनाओं के माध्यम से अब कुछ-कुछ न्याय होने लगा है।

संदर्भ सूची -
1. सत्यप्रकाश मिश्र, सम्पादक, प्रेमचन्द के श्रेष्ठ निबंध, ज्योति प्रकाशन, इलाहाबाद, 2003, पृष्ठ-87
2. नन्दकिशोर नवल, समकालीन काव्य यात्रा, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2004, पृष्ठ-8
3. डॉ. रणजीत, हिन्दी के प्रगतिशील और समकालीन कवि, साहित्य-रत्नालय, कानपुर, 2001, पृष्ठ-207
4. राजेन्द्र मोहन भटनागर, मगरी मानगढ़: गोविन्द गिरि, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2011, पृष्ठ-82
5. वही, पृष्ठ-11
6. वही, पृष्ठ-29
7. वही, पृष्ठ-31
8. वही, पृष्ठ-32
9. वही, पृष्ठ-141
10. धर्मवीर भारती, मानव मूल्य और साहित्य, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, 1960, पृष्ठ-27
11. राजेन्द्र मोहन भटनागर, मगरी मानगढ़: गोविन्द गिरि, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2011, पृष्ठ-41
12. वही, पृष्ठ-86
13. वही, पृष्ठ-87
14. वही, पृष्ठ-65
15. वही, पृष्ठ-69
16. वही, पृष्ठ-13
17. वही, पृष्ठ-109
18. वही, पृष्ठ-111
19. वही, पृष्ठ-174
20. वही, पृष्ठ-204
21. वही, पृष्ठ-209
22. वही, पृष्ठ-215

डॉ. नवीन नन्दवाना,सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग,मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय,
 उदयपुर (राज.),मोबाइल: 09828351618, 09462751618
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1 टिप्पणी:

  1. बहुत बढ़िया नवीन जी !!!
    दक्षिण राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात के भागों में बसा आदिवासी आज भी पिछड़ेपन का शिकार है। खेत में काम करना और मजदूरी करना यह उसकी नियति बन गया है। यद्यपि सरकारी सहायता बहुत उपलब्ध है, लेकिन एक आंदोलन के तहत उसमे चेतना जागरण की कमी सी महसूस होती है। अब तो आदिवासियों की संस्कृति चटक रही है। दिन पर दिन दरारे गहरी हो रही हैं।

    डॉ. मोहसिन ख़ान

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