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समीक्षा:मुंशी प्रेमचन्द की कहानियाँ:जीवन यथार्थ/डॉ.हुसैनी बोहरा

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, जनवरी 11, 2016 | सोमवार, जनवरी 11, 2016

चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
अपनी माटी
वर्ष-2, अंक-21 (जनवरी, 2016)
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मुंशी प्रेमचन्द की कहानियाँ: जीवन यथार्थ/डॉ.हुसैनी बोहरा

 चित्रांकन-सुप्रिय शर्मा
प्रारम्भ में हितोपदेश, पंचतंत्र, अलादीन आदि की कथाओं में मनोरंजन होने के साथ-साथ जीवन की कई व्यावहारिक बातों का दिग्दर्शन भी होता रहा है। लेकिन समय की परिवर्तनशीलता से कहानी के स्वरूप में निरन्तर बदलाव आया है एवं वह अपने परिष्कृत रूप को प्राप्त करने लगी है। इसमें कोई संदेह नहीं। कहानी के कई नाम प्रचलित हैं- किस्से ,गल्प आदि। प्रायः मानव चरित्र  के किसी एक पहलू पर प्रकाश डालने के लिए, किसी घटना या वातावरण की सृष्टि के लिए कहानी लिखी जाती है। कहानी कला पाश्चात्य जगत् की देन है उपन्यास की तरह। आधुनिक कहानी ही वस्तुतः कहानी कला के तत्त्वों पर खरी उतरती है। प्रेमचन्द ने स्वयं कहा है- कहानी में बहुत विस्तृत विश्लेषण की गुंजाइश नहीं होती वरन् कहानीकार का उद्देश्य मनुष्य चरित्र के अंग को दिखाना है।“1 अतः इस आधार पर उपन्यास और गल्प भिन्न कला है। गल्प जीवन की केवल झांकी मात्र होती है, उपन्यास में सम्पूर्ण जीवन दृष्टिगत होता है।

कहानी की उत्तमता अथवा अनुत्तमता के संबंध में मानसरोवरके प्राक्कथन में प्रेमचन्द ने लिखा है-सबसे उत्तम कहानी वह होती है जिसका आधार किसी मनोवैज्ञानिक सत्य पर हो।“2 वर्तमान कहानी के संबंध में उनका निर्णय है-वर्तमान आख्यायिका का मुख्य उद्देश्य साहित्यिक रसास्वादन कराना है और जो कहानी इस उद्देश्य से जितनी दूर जा गिरती है, उतनी ही दूषित समझी जाती है।सत्य है इसमें कोई संदेह नहीं। इसके लिए अनिवार्य शर्त रचनाकार के द्वारा स्वयं उसे भोगा गया हो। तब कोई कहानी जीवन्त कहानी का रूप ले लेती है। पाठक स्वयं  उस कहानी में गतिशील होता हुआ अनुभव करता है।

                                जब-जब कहानी की बात उठती है तो प्रेमचन्द का नाम निश्चय ही आदर के साथ लिया जाता है। प्रेमचन्द ने जो भोगा है, जो देखा है उसे निष्कपटता के साथ शब्दों में साकार कर दिया है। प्रेमचन्द ने जीवन के अनुभवों से शिक्षा प्राप्त की और सच्चे अर्थोें में यही वास्तविक शिक्षा होती है जो व्यक्ति को परिपक्व बनाती है। उनका सम्पूर्ण साहित्य उनके जीवनगत  अनुभवों का निचोड़ ही है।

                जीवन में जनवादी साहित्य में यथार्थवादी प्रेमचन्द ने वैसा ही लिखा है, जैसा उन्होंने देखा है। उन्होंने रोमांस और अध्यात्म को अपनी कहानी में हावी नहीं होने दिया, सत्य चित्रण के कारण ही उनका चित्रण प्रभावशाली बन पड़ा है। अस्तु, उपन्यास से साहित्य सेवा प्रारम्भ करने वाले प्रेमचन्द ने 1907 से कहानी लेखन आरम्भ किया। उनकी शुरू की कहानियां जमानामें छपी थीं।अनमोल रत्नउर्दू में लिख उनक पहली  कहानी थी। प्रेमचन्द का पहला कहानी संग्रह सोजे वतननाम से प्रकाशित हुआ था। जिसे अंग्रेज सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया था।

                                मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों की संख्या तीन सौ के लगभग हैं। इसके अतिरिक्त उनकी उर्दू कहानियों की संख्या भी सौ के ऊपर है। भाव एवं शिल्प की दृष्टि से अन्तर पूर्व और बाद की कहानियों में स्पष्ट दिखाई देता है। प्रेमचन्द को लिखने की प्रेरणा समाज से प्राप्त हुई। विशेषकर ग्रामीण समाज से। इस संबंध में प्रेमचन्द की तुलना चार्ल्स डिकेन्स से कर सकते हैं। डिकेन्स और प्रेमचन्द दोनों ही जनता के आदमी थे।पुष्पपाल सिंह प्रेमचन्द के संबंध में लिखते हैं-प्रेमचन्द ने कहानी को यथार्थ की प्रस्तुति का नया धरातल प्रदान किया था। उन्होंने मनुष्य ,समाजव्यक्ति और उसके जीवन परिंवेश को कथा के केन्द्र में ला खड़ा किया था। सामान्य व्यक्ति उनकी कहानियों का नायक बना था।“3

भाव के क्षेत्र में प्रेमचन्द की आरंभिक कहानियाँ भावना प्रधान और आदर्शवादी हैं। वे प्रत्येक स्थिति में किसी ऊँचे आदर्श पर जाकर समाप्त होती है, उनका प्रभाव भावुकतापूर्ण और उपदेशात्मक सा प्रतीत होता है। जिन कहानियों में प्रेमचन्द जी ने किसी आदर्श का चित्रण नहीं किया है, उदाहरण के लिए कफन‘,‘पूस की रात‘, ‘नशाआदि उन कहानियों में भी मुख्य प्रभाव परिस्थिति के विरुद्ध विद्रोह  करने का ही रहा है। प्रेमचन्द की कहानी की सफलता उनका निराशामूलक न होना है।


युगान्तकारी दृष्टिकोण ही उन्हें आधुनिक विचारक की संज्ञा प्रदान करता है। प्रत्येक आधुनिक समसामयिक को, सत्यता को स्वीकार करने की क्षमता रखता है। प्रेमचन्द सनातनता को अस्वीकार करते हैं। उनके अनुसार दृश्य जगत् में कुछ भी सनातन नहीं है। इसी से यथार्थ भी गतिशील है। परिवर्तनशील है। यह दृष्टिकोण उनके साहित्य को, उनकी कहानियों को विशिष्टता प्रदान करता है। प्रेमचन्द पाखण्ड के घोर विरोधी थे, क्योंकि पाखण्ड का सच्चाई और मनुष्यता से कोई मेल नहीं है। यह उनका मुख्य चिन्तन रहा है, जिसके केन्द्र में मनुष्यता है, जिसका आधार मनुष्य जीवन का यथार्थ है। जीवन गतिशील है और यथार्थ में गतिशीलता है एवं यह गति पैदा होती है द्वन्द्व से, अन्तर्विरोध से। प्रेमचन्द ने इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जीवन और उसके यथार्थ को पहचानने का प्रयास किया है।

यथार्थ का आग्रह जड़ता और यथास्थिति में बदलाव के पक्ष में होता है, जिसे प्रेमचन्द ने समझा है, कहानियों में उतारा भी है। यह सत्य है कि गतिशील यथार्थ की सही समझ जब हो जाती है तो वह यथार्थ की अगली अवस्था की कल्पना भी कर सकता है, यह कल्पना यथार्थ का अंग बन जाती है। प्रेमचन्द ने इसे पहचाना है, स्वीकारा है। इसलिए उनकी कहानियों में भारत के ग्राम ,यहां के कृषक वर्ग, आम और करौंदे के पेड़ ,पशु-पक्षी आदि मिल जाते हैं। प्रेमचन्द ने अपने यथार्थ चित्रण के बल से मनुष्यों की व्यक्तिगत रुचि ,आदर्श, भावना तथा उनके स्वभाव की विशेष प्रवृत्तियों के, उनके बातचीत, रहन-सहन, रंग-ढंग, चाल-चलन और उनके विशेष लक्षणों के चित्रण द्वारा उनका सच्चा चित्र पाठकों के समक्ष उपस्थित कर दिया है। पाठक इन सभी बातों को अपने आसपास घटित होता हुआ अनुभव करने लगता है।

मनोविज्ञान पर आश्रित होने के कारण ही प्रेमचन्द की कहानियों में यथार्थवाद को विशेष स्थान मिला है। उनका दृष्टिकोण और जीवन के संबंध में विचार भले ही आदर्शवादी हो। प्रेमचन्द अपने चरित्र चित्रण  और कथावस्तु में यथार्थवादी हैं, परन्त दृष्टिकोण में आदर्शवादी।

ऐतिहासिक महत्त्व की दृष्टि से पंचपरमेश्वरवह कहानी है जिसे लेकर वह पहले पहल हिन्दी मंच पर आए। कहानी का आरम्भ जुम्मन शेख और अलगू चौधरी की गाढ़ी मित्रता के साथ होता है,उनमें न खान-पान का व्यवहार था न धर्म का नाता -केवल विचार ही मिलते थे।यही काफी था, क्योंकि यही मित्रता का मूल मंत्र है। इसी पृष्ठभूमि में कथा का विकास होता है और यथार्थ का आरम्भ होता है-जुम्मन की बूढ़ी खाला अपनी सारी मलकियत जुम्मन के नाम कर दी ताकि उसे दो जून रोटी क आसरा मिल सके, पर परिणाम कुछ और ही होता है-बुढ़िया न जाने कब तक जिएगी। दो-तीन बीघे ऊसर क्या दे दिया मानो मोल ले लिया----जितना रुपया इसके पेट में झोंक चुके , उतने से तो सारा गांव मोल ले लेते। यह जीवन का यथार्थ है और जैसा कि प्रेमचन्द अपने आरम्भिक समय में आदर्श के पक्षधर भी रहे थे अतःवे साथ ही साथ पंचायत द्वारा निष्पक्ष न्याय करवाकर पंचायत के आदर्श को स्थापित करते हैं, अलगू प्रसंग के माध्यम से यह सिद्ध कर देते हैं कि न्याय निष्पक्ष होता है, वह धर्म, मित्रता आदि से प्रभावित नहीं होता।

प्रेमचन्द यथार्थ का आदर्शीकरण नहीं करते और न आदर्श को यथार्थ के रूप में चित्रित करते हैं। उनके अनुसार दोनों ही मनुष्य के शोषण के खतरनाक हथियार  रहे हैं। वे यथार्थ के भीतर विद्यमान आदर्श की-मानवीयता की झलक अवश्य दिखाते हैं। आदर्श की यह झांकी अदृश्य देवत्व की जाग्रत करने या उद्घाटित करने के रूप में। आदर्श का अभाव एक भयानक त्रासदी के रूप में यथार्थ के विद्रूप को प्रस्तुत करने लगता है, जैसा कफनमें। कफनमें दो तथ्य महत्त्वपूर्ण हैं-एक ग्रामीण परिवेश का जीवन्त और घटनापूर्ण चित्र तथा दूसरा है आर्थिक शोषण की पृष्ठभूमि। पहला कथा के आरम्भ में ही स्पष्ट है-झोंपड़े के द्वार पर बाप बेटे दोनों एक बूझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना से पछाड़ खा रही ह“4---वस्तुतः प्रेमचन्द ने सामाजिक वास्तविकता को घीसू के इस कथन के माध्यम से फलीभूत कर दिया है--कफन लगाने से क्या मिलता है? आखिर जल ही तो जाता है। कुछ बहू के साथ तो न जाता----और दोनों बाप -बेटे कफन बेचकर दारू पी रहे हैं और आलू खा रहे हैं।“5 यह हमारी उस शोषण व्यवस्था को प्रतिबिम्बित करता है जो अपने चरम रूप में पहुँच गई है कि इतना शोषण हो चुका है निम्नवर्ग का,इतना क्षुधातुर है कि वह कुछ भी करने को तैयार है, संवेदना मर चुकी है।

जीवन की इस विरूपता को सामने रखकर वस्तुतः लेखक सामंजस्य को पाने की चेष्टा करता है,जो हमारे युग की अनिर्वायता है। आज जो अमानवीयता व्याप्त है उसका प्रतिकार होना चाहिए, घीसू माधव की तरह वर्तमान में जीना कोई निदान नहीं है। बुधिया की त्रासदी वस्तुतः इसी तथ्य को उजागर करती है।

प्रेमचन्द एक महान् यथार्थवादी लेखक थे। यथार्थ उनके लिए एक अविभाज्य वस्तु भी, जिसमें व्यक्ति और समाज तथा परिवेश और मन का जैसा अलगाव न था जैसा प्रायः मान लिया जाता है पूस की रातमानव यातना की कहानी है, लेखक ने विस्तार से उसमें दिखलाया है कि कड़ाके की ठण्डवाली रात में हल्कू कैसे अपनी इच्छाओं को वश में करके  यातना पाता है और अन्त में जब जानवर सारा खेत चर जाते हैं तब हल्कू प्रसन्न होता है, उसके रात को पहरेदारी नहीं करनी पड़ेगी। इस तरह कहानी एक मनोवैज्ञानिक अनुभव के साथ समाप्त होती है। पाठक यह जानकर अचंभित  सा हो जाता है । लेखक इसकी परवाह नहीं करता है, क्योंकि यह  सत्य हैऔर यही यथार्थ चित्रण की कसौटी भी। यहाँ लुकाच की एक बात महत्त्पूर्ण हो जाती है कि यथार्थ प्रतीति के माध्यम से ही नहीं अभिव्यक्त हो सकता है। इसलिए साहित्य अमूर्त यथार्थ का ही नहीं ,मूर्त घटनाओं  और पात्रों का भी महत्त्व है। इसलिए प्रेमचन्द चरित्र अथवा मनोगति को अधिक महत्त्व देते हैं और इसी से उनकी कहानियों का यथार्थ खण्डित नहीं होता ,अपितु अखण्डित ही रहता है।

प्रेमचन्द का द्वन्द्व जितना वैयक्तिक है उतना सामाजिक भी। बड़े भाई साहब कहानी इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। दो भाइयों की इस कथा में दोनों एक दूसरे से स्वभाव में विपरीत हैं। बड़ा भाई कमजोर होता हुआ भी छोटे भाई पर शासन करने के लिए गंभीरता धारण  करता है। इस प्रकार दोनों के बीच द्वन्द्व चलता रहता है,यह उनका अपना द्वन्द्व होते हुए भी यह व्यापक सामाजिक संदर्भ बन जाता हैै। बड़े भाई जानते हैं के उनका यह बडप्पन अन्यथा स्थान है-गलत जगह पर है फिर भी बड़े भाई की स्वाभाविक गरिमा उनको बाध्य करती हैं इस बड़े भाई की बार बार असफलता और छोटे भाई की सफलता, और इस तरह अपनी सफलता पर बड़े भाई के प्रति किंचित् उपेक्षा भाव का द्वन्द्व। इन सब का वर्णन प्रेमचन्द ने मनोवैज्ञानिक धरातल पर विलक्षण ढंग से किया है।

नशाप्रेमचन्द की ही नहीं, हिन्दी की श्रेष्ठ कहानियों में अन्यतम है। अपनी यथार्थवादी संवेदना के नाते वे परिस्थितियों से संघर्ष करनेवाले चरित्रों को सबसे अधिक सहानुभूति देते थे। नशा के पात्र वीर की विडम्बनापूर्ण स्थिति का चित्रण किया गया है। अपनी स्थिति को भूल वह अपने मित्र ईश्वरी जैसा मान-सम्मान और आदर पाना चाहता है। इसी के चलते वह ईश्वरी के गाँव पहुँकर नौकरांे से उद्दण्डतापूर्ण व्यवहार करता है। दूसरी ओर राष्ट्रवादी जमींदार होने का दंभ भरता है। गाँधीभक्त ठाकुर से डींग हाँकता है-हम लोग तो तैयार बैठे हुए हैं, ज्यों ही स्वराज्य हुआ, अपने सारे इलाके असामियों के नाम हिला कर देंगे।“6 यह कथन उनकी सारी मनो अभिलाषाओं को प्रकट कर देता है। मनोविज्ञान के आधार पर बहुत ही प्रखर सत्य को उद्घाटित किया है प्रेमचन्द ने।

प्रेमचन्द का यथार्थवाद, आदर्शवाद से शून्य न था। उन्होंने कहा है- मगर यह समझना भूल होगी कि कहानी जीवन का यथार्थ चित्र है। यथार्थ चित्र माने भावना और आदर्श से शून्य हू-ब-हू अनुकरण। वे आगे कहते हैं- कहानी यथार्थ जैसी होती है यथार्थ नहीं, वह जीवन को पुष्ट करनेवाला, जीवन का भ्रम खड़ा करती है।“7 ईदगाह कहानी में आशा जैसी बड़ी चीज के यथार्थ पर विशेष ध्यान दिया गयाहै। ईदगाहमें बूढ़ी दादी अमीना के प्रति बालक हामिद की अपनी संवेदनशीलता उसकी स्वयं की सहजता द्वारा संयमित है। इसलिए तीन पैसे होने पर भी हामिद अपने भाग्य को नहीं कोसता न साथियों को हीन समझता है। वह केवल इतना कहता है-खिलौनेे मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तरे चकनाचूर हो जाएँ।“8 यह हामिद का अपना आत्मसंघर्ष है। यही कहानी का यथार्थ है। प्रेमचन्द शोषण के भयावह यथार्थ को मुखर करने के लिए बालक मोहसिन के मुँह से कहलवाते हैं- चौधरी साहब के काबू में सौ जिन्नात हैं।“9 यह वाक्य हामिद को यथार्थ से परिचित  करा देता है। अब उसकी समझ में आ गया है कि चौधरी के पास इतना धन क्यों है। ईदगाहका हामिद मानव मुक्ति के संघर्ष में सहायक बनकर उभरता है। इसलिए ईदगाहका हामिद भी कोरा आदर्श नहीं है, यथार्थ है। तावान‘  कहानी का उल्लेख भी मानवीयता की कसौटी पर पाठक की चेतना को झकझोरती है, “छकौड़़ी ने उद्दण्ड  होकर कहा ,‘तो यह कहिए कि आप देश सेवा नहीं कर रहे हैं, गरीबों का खून चूस रहे हैं। पुलिसवाले कानूनी पहलू से लेते हैं, आप गैरकानूनी पहलू से लेते हैं। नतीजा एक है। आप भी अपमान करते हैं, वह भी अपमान करते हैं। मैं कसम खा रहा हूं कि मेरे घर में खाने के लिए दाना नहीं है, मेरी स़्त्री खाट पर पड़ी पड़ी मर रही है। फिर भी आपको विश्वास नहीं आता।“10 प्रस्तुत कहानी में स्वतंत्रतासंग्राम में पिसते आमजन की पीड़ा को प्रदर्शित किया गया  है।

प्रेमचन्द की कहानियों में कथावस्तु की विविधता पर दृष्टिपात करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि प्रेमचन्द उन थोड़े से कलाकारों में हैं जो हिन्दू और मुसलमान दोनों पर समान अधिकार से लिख सकते हैं। यह उनके व्यक्तिव का यथार्थ है। साहित्य उन रचनाओं को कहेंगे जिसमें कोई सच्चाई प्रकट की गई हो। जब उसमें जीवन की सच्चाइयाँ और अनुभूतियाँ व्यक्त की गई हों। डॉ. रामविलास शर्मा ने कहा है-प्रेमचन्द ने कहानियों में जीवन प्रवाह की ही झाँकी दिखाई है। यथार्थवाद सोद्देश्य होना चाहिए और प्रेमचन्द की कहानियाँ इस कसौटी पर खरी उतरती हैं। प्रेमचन्द की कहानियों का कला पक्ष भले ही आलोचकों की दृष्टि में गौण रहा हो, पर प्रेमचन्द का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य जीवन के यथार्थ को कला के आधार पर प्रतिष्ठित करना रहा है,जिसमें  वे पूर्णतः सफल हुए हैं, यही प्रेमचन्द की कहानियों की उपलब्धि अथवा सार्थकता है।
 
सन्दर्भ
1. प्रेमचन्द, मानसरोवर भाग-1, मलिक एण्ड कम्पनी जयपुर, 2011 प्राक्कथन से
2. वही
3. पुष्पपालसिंह, समकालीन कहानी: सोच और समझ, आत्माराम एंड संस, 1986, पृ.19-20
4. प्रेमचन्द, मानसरोवर की कहानियां, धीरज पॉकेट बुंक्स,मेरठ, पृ.50,
5. वही पृ. 54
6. प्रेमचन्द, मानसरोवर भाग-1, मलिक एण्ड कम्पनी जयपुर, 2011, पृ.76
7. प्रेमचन्द, मानसरोवर भाग-1, मलिक एण्ड कम्पनी जयपुर, 2011 प्राक्कथन से
8. प्रेमचन्द, मानसरोवर भाग-1, मलिक एण्ड कम्पनी जयपुर, 2011, पृ. 20
9. वही, पृ.18
10. . प्रेमचन्द, मानसरोवर भाग-1, मलिक एण्ड कम्पनी जयपुर, 2011, पृ.200

डॉ.हुसैनी बोहरा
6,नाईवाड़ा चौक बोहरवाड़ी,उदयपुर ,राजस्थान,3103001
मो-9413771959,ई-मेल:hussaini.bohara@gmail.com


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