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आलेखमाला:भारतीय पुनर्जागरण और राजनीति –तानाबाई पाटिल

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on बुधवार, नवंबर 16, 2016 | बुधवार, नवंबर 16, 2016

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-23,नवम्बर,2016
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आलेखमाला:भारतीय पुनर्जागरण और राजनीति –तानाबाई पाटिल


भूमिका

               ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत की आर्थिक व्यवस्था के मुख्य आधार गाँव थे।१ प्राय: भारत गाँवों में निवास करता था। व्यक्ति की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति वहीं होती थी। ग्रामवासियों का संबंध बाह्य जगत् से नहीं के बराबर था। गाँव में जो कुछ भी उत्पादन होता था उसकी सारी खपत वहीं हो जाती थी।२ आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों क्षेत्रों में यही व्यवस्था थी। राजनीतिक चेतना का अभाव था। व्यक्ति का जीवन आदर्शवादी और धार्मिक विचारों का केंद्र था। राजनीतिक भाव प्राय: अभाव हो गया था, जिससे आगे चलकर ब्रिटिश शासन स्थापित करने में अंग्रेजों को कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई। अंग्रेज पूंतिपतियों का मूल उद्धेश्य व्यापार करना तथा उससे लाभ कमाना था। ब्रिटिश शासन के साथ कुछ नये आर्थिक परिवर्तन दृष्टीगोचर होते हैं, जिनका प्रभाव आगे आनेवाले राजनीति पर पड़ा। ब्रिटिश शासन में लार्ड कार्नवालिस ने राजस्व की नयी व्यवस्था प्रारंभ की। परिणामस्वरूप भूमि का मालिक किसान हुआ, बदले में कुछ पैसा सरकार को लगान के रूप में देना पड़ता था।३ धीरे-धीरे खेती का स्वरूप व्यापारिक होता गया और व्यक्ति अधिक अन्न पैदा कर अधिक पैसा कमा सकता था।
उन्नीसवीं शताब्दी के राजनीतिक सुधार संबंधी क्रिया-कलापों के परिणामस्वरूप पैदा हुआ मान लेना भी अनुचित होगा। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जिस राजनीतिक स्वरूप का दर्शन होता है उससे ज्ञान होता है कि प्रारंभ के राजनीतिक क्रिया-कलाप वास्तव में अपने स्थानीय और प्रांतीय प्रश्नों पर ही थे। वे उन थोड़े से लोगों का प्रतिनिधित्व करते थे, जो सारे देश के बारे में केवल थोड़ी-सी जानकारी रखते थे। वास्तव में अखिल भारतीय स्तर पर हम कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक समूह देखते हैं, जो कुछ निश्चित हितों पर विचार करते थे। हिंदू धर्म ने लोगों में एकता का भाव पैदा किया, जिनकी कोई सामान्य भाषा न थी, जो सामाजिक और राजनीतिक रूप से निखरे हुए पृथक-पृथक थे। परंतु उन सभी का एक ही धार्मिक आधार था, जिसने उनको एक सूत्र में बांध रखा था। कॉग्रेस ही एक ऐसी संस्था रही, जिसका जन्म तो स्थानीय रूप में राजनीतिक क्रिया-कलापों से हुआ, लेकिन आगे चलकर यही राष्ट्र राजनीति के प्रकार का एक प्रमुख साधन बनी।

पुनर्जागरण तथा सुधारवाद :
                भारत की बौद्धिक पुनर्जागरण आधुनिक भारतीय राजनीति के उदय का महत्वपूर्ण कारण था। जिस प्रकार इटली के पुनर्जागरण तथा जर्मनी के धर्मसुधार आंदोलन के युरोपीय राजनीति के उदय के लिए बौद्धिक आधार का काम किया था, उसी प्रकार भारत के सुधारकों तथा धार्मिक नेताओं के उपदेशों ने देशवासियों में स्वायत्त तथा आत्मनिर्णय पर आधारित राजनीतिक जीवन का निर्माण करने की इच्छा उत्पन्न की। भारतीय आत्मा के जागरण की सर्वप्रथम सर्जनात्मक अभिव्यक्ति दर्शन, धर्म तथा संस्कृति के क्षेत्र में हुई और राजनीतिक आत्मचेतना का उदय उसके अपरिहार्थ परिणाम के रूप में और मोटेन की रचनाओं में मिलता है। मुख्यत: बौद्धिक और सौंदर्यात्मक था किंतु भारतीय पुनर्जागरण के मूल में तत्वत: नैतिक और आध्यात्मिक आकांक्षाओं का प्राधान्य था। भारतीय पुनर्जागरण में अतीत को पुनर्रजीवित करने की प्रवृत्ति अधिक बलवती थी।

                “भारतीय पुनर्जागरण आंदोलन के कुछ नेताओं ने खुले रूप से इस बात का समर्थन किया कि हमें वेदों, उपनिषदों, गीता, पुराणों एवं प्राचीन धर्मशात्रों के आधार पर अपना वर्तमान जीवन ढालना चाहिए।५ उन्होंने उन भारतियों की निंदा की जो कल्सले, डार्विन, मिल और स्पेन्सर के विचारों से प्रभावित थे तथा जिनका जीवन दर्शन आध्यात्मिक तथा राष्ट्रप्रेम से पूर्णत: शून्य हो गया था। अतीत को पुनर्जीवित करने की यह भावना आक्रामक तथा अहंकारपूर्ण विदेशी सभ्यता की महान् चुनौती के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न हुई थी।६ चूंकि यह सभ्यता राजनीतिक दृष्टि से अत्यधिक प्रभावी और आर्थिक दृष्टि से बलशाली थी। इसलिए उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया का होना और भी स्वाभाविक था। परिचय की इस यांत्रिक सभ्यता तथा भारत की धार्मिक तथा पुण्योन्मुखी संस्कृतियों के बीच इस संघर्ष से नये भारत का उदय हुआ।

                “विदेशी राजनीतिक शक्ति के आघात के विरुद्ध बचाव की व्यवस्था के रूप से देश की प्राचीन संस्कृतियाँ पुन: सचेतन तथा तक्षा सचेष्टा हो उठी। वे अपना अस्तित्व पुन: आग्रहपूर्वक बताने लगी।७ प्राचीन ग्रंथों का नये मानववादी तथा राजनीति दृष्टिकोण से विवेचन किया जाने लगा। प्राय: प्राचीन धर्मग्रंथों में आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांतों का बीज खोज निकालने का भी प्रयत्न किया गया। चूँकि विदेशी साम्राज्यवाद ने अत्यंत क्रूर और विनाशकारी तरीकों से काम किया था और भारत की मैसूर, मराठा, सिख आदि बड़ी-बड़ी शक्तियाँ धीरे-धीरे भूमिसात् हो गयी थी। अत: देश भयंकर विषमावस्था में फँस गया था। ऐसी दशा में देशवासियों के सामने धार्मिक तथा आध्यात्मिक सांत्वना को छोड़कर और कोई चारा नहीं रह गया था। परिणाम यह हुआ कि जिस प्रकार मध्ययुग में इस्लाम तथा हिंदू धर्म की प्रक्रिया ने भक्तिमार्ग में नानक,. कबीर, सूर, तुलसी आदि को जन्म दिया, उसी प्रकार ब्रिटेन की प्रचंड राजनीतिक शक्ति तथा सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण आंदोलन आदि का उदय हुआ। पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार ने एक ऐसा नया बुद्धिनीवि वर्ग पैदा कर दिया था, जिसकी देश की सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन में कहीं कोई जड़ नहीं थी। उसमें से कुछ ने या तो ईसरियत अंगीकार कर संतोष किया या बुद्धिवाद या प्राकृतिक धर्म के सामान्य जीवन दर्शन के अनुयायी बन गये। किंतु इस बुद्धिजीवी वर्ग के कुछ लोगों ने प्राचीन धर्म ग्रंथों की शरण ली और उत्साह के आवेश में आकर अतिरंजित ढ़ंग से उनका गुणगान किया।

                इस नवीन भारत के निर्माण में जिन महान् शक्तियों ने योगदान दिया उनमें ब्रह्म समाज (स्थापना-२३ जनवरी १८३०) का स्थान अग्रगण्य है। इस संस्था ने बंगाल में महत्वपूर्ण सांस्कृतिक तथा सामाजिक कार्य किये। राजा राममोहन राय (१७७२-१८३३), देवेंद्रनाथ ठाकुर (१८१७-१९०५) तथा केशवचंद्र सेन (१८३८-१८८४) ब्रह्म समाज के मुख्य नेता थे। यह आंदोलन बौद्धिक हेतुवाद तथा ईसाई भक्तिवाद का समन्वय था। राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण तथा सुधारवाद का पिता भी कहा जाता है।८ राजा राममोहन राय और उनके साथियों का वह पहला समूह था, “जिसमें विदेशी संस्कृति का अध्ययना किया तथा उनके विवेकवादी और माननवादी विचारों और भावनाओं को ग्रहण किया।९ राजा राममोहन राय १८२० के बाद के युरोपीय राष्ट्रीय आंदोलन से परिचित थे और उन्हें उनकी राजनीतिक मुक्ति की आकांक्षाओं से हार्दिक सहानुभूति थी। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता मनुष्य का अमूल्य धन है। स्वतंत्रता राष्ट्र के लिए भी अवश्य होती है। उन्होंने यह विश्वास किया कि अंततोगत्वा यूरोपीय राष्ट्र तथा एशियायी उपनिवेश निश्चिय ही अपनी स्वाधीनता प्राप्त कर लेंगे।१०

जब ईसाई सभ्यता देश की पुरानी संस्कृति पर प्रहार कर रही थी तब दयानंद हिंदू पुनर्रुत्थानवाद के आक्रामक समर्थन के रूप में प्रकट हुए। दयानंद को ईसाइयत के प्रसार का भय था, क्योंकि वे समझते थे कि इससे राष्ट्रीय भावना संकट में पड़ जायेगी।११ उन्होंने भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता की नींव तैयार की। आधुनिक हिंदू समाज के संगठन की जो प्रवृत्ति देखने को मिलती है, उसका मुख्य द्येय दयानंद को ही है।१२ उन्नीसवीं शताब्दी में विकसित होनेवाले उदारवादी राष्ट्रवाद (बैथम मिल आदि) के साथ-साथ आदर्शवादी अर्थात् सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (हीगल) का प्रभाव हिंदूस्तान पर पड़ रहा था। पंडित नेहरु ने आर्यसमाज को इस्लाम तथा ईसाइयत के प्रभाव के विरुद्ध प्रतिक्रिया कहा।१३ देश और जाती के संबंध में जो परिभाषा दयानंद ने की उसे ही बीसवीं शताब्दी के हिंदू राष्ट्रवादियों ने स्वीकार किया। हम देखते हैं कि दयानंद का धार्मिक राष्ट्रवाद आगे चलकर सांप्रदायिक राष्ट्रवाद का धारण कर लेता है।

राजनीतिक आंदोलन तथा संस्थाएँ :
                “भारतीय मुसलमानों में पुनर्जागरण की गति हिंदूओं की अपेक्षा धीमी थी।१४ मुसलमानों ने अंग्रेजी की नयी शिक्षा स्वीकार नहीं की। मुसलमानों के मन में सदा यही धारणा थी कि अंग्रेजों ने हमें जीतकर अपनी सत्ता स्थापित की है।१५ मुसलमानों ने प्रथम राष्ट्रीय जागरण का परिचय अलीगढ़ आंदोलन में मिलता है। वैसे १८५७ की क्रांति में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ थे; किंतु आगे की राजनीति में वे बिल्कुल कट जाते हैं। पुन: उनका सांप्रदायिक रूप हमारे सामने आता है, जो सर सैयद अहमद खाँ की देन थी। आगे चलकर उनकी चेतना का विकास सांप्रदायिकता के आधार पर होता है।

                १८७७ में समाचार पत्रों पर नियंत्रण हेतु दमन नीति अपनायी। फलस्वरूप उस वर्ष वर्नाकुलर प्रेस(समाचार संपादन) ऐक्ट बना। साथ ही साथ भारातीय सस्त्र ऐक्ट भी बढ़ाया गया। किंतु इनके परिणाम विपरीत सिद्द्ध हुए और जनता में इनके विपरीत उत्तेजना और बढ़ी। लार्ड रिप्पन के कार्यकाल में इलबर्ट बिल के आगमन ने भारतियों के जागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हरिदास तथा उमा मुखर्जी ने भारतीय राष्ट्रवाद के जन्म का समय बताते हुए कहा है कि यह इलबर्ट बिल १८८३ से पहले का नहीं है। १८७७ के दुभिक्ष के पश्चात्य जनता में असंतोष बढ़ता जा रहा था। इन सभी कारणों से जनता अपने हितों के तृटि और अधिक सचेष्ट होती जा रही थी और उनमें अपने अधिकारों के प्रति जागरुकता बढ़ी।

                १८८५ में भारतीय राजनीतिक कॉग्रेस की स्थापना आधुनिक भारत के राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटना थी। सन् १८८५ में दिसंबर के २८, २९, ३० दिनांक के देश के ७२ प्रमुख  राष्ट्रवादी बंबई में एकत्र हुए। भारतीय इतिहास में इतना महत्वपूर्ण और व्यापक सम्मेलन इससे  पहले कभी नहीं हुआ था।१६ सबसे अधिक प्रभावशाली राष्ट्रवादियों के दल ने जो आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कॉग्रेस का जन्मदाता बना, पश्चिम से सर्वधारण की शिक्षा, आर्थिक विकास, समाज सुधारतथा राजनीतिक आधार पर निर्मित राष्ट्र। कॉग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में ब्रीतीश शासन के प्रति निष्टापूर्ण विरोध की बात उठायी जाती थी। नेताओं के भाषणों से हम उच्च पदों की नौकरियों में भारतियों के लिए अधिक स्थानों की मांग, प्रातिनिधित्व सरकार के प्रति धीमी प्रगति का विरोध, प्रशासनिक तथा सर्वाधिक सुधारों की माँग आदि की आलोचना पाते हैं।

                कॉग्रेस के कुछ सदस्यों ने आधुनिक राष्ट्र के निर्माण के लिए सर्वाधिक क्षेत्रों में भी कुछ ठोस कार्य किया। ऐसे कार्य अधिकतर सामाजिक सुधार के माध्यम से राष्ट्रवादियों के प्रयत्न से हुए। कॉग्रेस ने भारतीय राष्ट्रवाद के उस मंच का कार्य किया, जहाँ सारे देश से भिन्न-भिन्न जाति, धर्म तथा नस्ल के लोगों ने आकर अपना-अपना विचार प्रकट किया। एक समाचार पत्र प्रतिनिधी ने कहा- कॉग्रेस की सभाएँ समान्य जनता में एकता को बढ़ानेवाली संधि पत्र हैं।कॉंग्रेस की नींव इतनी मजबूत पड़ी थी कि आगे का भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास प्रमुख रूप से कॉंग्रेस का इतिहास बन गया।

                “भारत के राष्ट्रवादियों में धार्मिक और सामाजिक सुधारक, राजनीतिक आंदोलनकारी कवि, संत तथा प्रशासनिक व्यक्ति थे। वे अंग्रेजों और भारतियों दोनों से सहानुभूति रखते थे।अत: भारतीय राष्ट्रवाद को १९वीं शताब्दी के राजनीतिक सुधार संबंधी क्रिया-कलापों का परिणाम मान लेना अनुचित होगा। १९वीं शताब्दी के उत्तरार्श में जिस राजनीतिक स्वरूप का दर्शन होता है, उससे ज्ञात होता है कि प्रारंभ के राजनीतिक क्रिया-कपाल वास्तव में अपने स्थानीय और प्रांतीय प्रश्नों पर ही थे। वे थोड़े से लोगों का प्रतिनिधित्व करते थे। जो सारे देश के बारे में केवल थोडी-सी जानकारी रखते थे। वास्तव में अखिल भारतीय स्तर पर हम कुछ धार्मिक और साहित्यिक समूह देखते हैं जो कुछ निश्चित हितों पर विचार करते थे। भारतीय राष्ट्रीय कॉग्रेस का जन्म भी स्थानीय रूप में राजनीतिक क्रिया-कलापों से हो चुका था।

निष्कर्ष :
                स्पष्ट है कि आधुनिक भारतीय राजनीतिक का निर्माण पुनर्जागरण द्वारा होता है। विश्व शासन के संपर्क से नयी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक शक्तियों का जन्म होता है। भारातीय समाज की धार्मिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों का प्रयोग के द्वारा समाज के मूलभूत घटक नयी राजनीतिक एवं अधिक विकास में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। इसका परिणाम जीवन के व्यापक परिवेश में होता है। चूँकि पुनर्जागरण एवं राजनीति धाराओं का मूल ब्रिटीश शासन से जुड़ा है। इसलिए ब्रिटीश शासन जहाँ जिस क्रम एवं प्रक्रिया से पहुँचता है, राजनीतिक उसी क्रम से विकसित होता है। फलत: क्षेत्रीय राजनीति की पहचान भी अत्यंत स्पष्ट है, जो अंतत: भारतीय राजनीति का संघात्मक पक्ष प्रस्तुत करता है।

संदर्भ ग्रंथ -
1.            A.R Desai : Social Background of Indian Nationalism – Pg No-7
2.            D.R Gadmil : The Industrial Evolution of India in recent times, 1933 – Pg No-12
3.            A.R Desai : Social Background of Indian Nationalism – Pg No-56-57
4.            F.Max-Muller : Biographical Essays 1884, Pg No-170
5.            Javahar Lal Nehru : The Discovery of India – Pg No-378-379
6.            Mr. Blunt : Census report, 1911, quoted by Lala Lajpat Rai, The Arya Samaj – Pg.No-168
7.            A.R Desai : Social Background of Indian Nationalism – Pg No-287
8.            A.R Desai : Social Background of Indian Nationalism – Pg No-288-289
9.            A Letter from Roy to the Editor of Calicut Journal – Mr.J.S.Bakingham.
10.          B.C Pal : Ram Mohan Roy as Reconstructore of Indian life and society – Pg No-203
11.          उषा प्रियंवदा भारतीय राजनीति पृ सं- 287
12.          Jawar Lal Nehru – Pg No-378
13.          A.R Desai : Social Background of Indian Nationalism – Pg No-299
14.          The Life of Swami Vivekanada – Pg No-698-699

पाटील तानाबाई
पीएच.डी शोध छात्रा,हिंदी विभाग,मंगलूर विश्वविद्यालय
विश्वविद्यालय कॉलेज मंगलूर-५७५००१,जिला-मंगलूर, कर्नाटक
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