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राजनीति से संवाद:शिक्षक समाज का ड्राइविंग फोर्स(संवाहक बल)होते हैं–डॉ.अरूण कुमार

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on बुधवार, नवंबर 16, 2016 | बुधवार, नवंबर 16, 2016

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-23,नवम्बर,2016
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राजनीति से संवाद:शिक्षक समाज का ड्राइविंग फोर्स(संवाहक बल)होते हैं–डॉ.अरूण कुमार
(सांसद डॉ.अरूण कुमार से जितेन्द्र यादव और सौरभ कुमार की बातचीत)

(डॉ.अरूण कुमार, वर्तमान में बिहार के जहानाबाद संसदीय क्षेत्र के सांसद और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा-अरूण गुट) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। लगभग तीन दशकों से डॉ. अरूण कुमार, जहानाबाद समेत पूरे बिहार की जनता का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं तथा उन्होंने जनता के प्रति प्रतिबद्ध और लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करने वाले नेता के रूप में भारतीय राजनीतिक क्षितिज पर अपनी खास पहचान अर्जित की है। प्रस्तुत है डॉ. अरूण कुमार से जितेन्द्र यादव और सौरभ कुमार की बातचीत)

अपनी माटी - आपकी शिक्षा-दीक्षा किस-किस जगह से और कहाँ तक हुई ?

डॉ. अरूण कुमार – प्रारंभिक शिक्षा गाँव के सरकारी विद्यालयों में हुई। क्लास – 6 तक अपने गाँव के विद्यालय में ही पढ़ें। क्लास - 6 के बाद गया जिला स्कूल में पढ़ाई की। आमनौर हाई स्कूल में भी पढ़ाई हुई। स्कूल के लिस्ट में, थोड़ा नटखट थे। हमारे पिता जी शिक्षक थे, और नेता जी थे, जिसकी वजह से शिक्षकों का सान्निध्य मिलता रहा। कई जगह घूम-घूम कर पढ़ें। फाइनली चाकन्द उच्च विद्यालय से मैट्रीक किया। सेकन्डरी एज्युकेशन में भी एक से अधिक विद्यालयों में पढ़ें। ज्ञान भारती उच्च विद्यालय जगलाल नजरडिहया फिर आमनौर हाई स्कूल में थे, जसवंत विधालय, खिजरसरैय में थे। जहाँ कहीं भी नेतागिरी या कुछ ज्यादा आगे बढ़ जाते थे, वहाँ से हटा दिया जाता था। स्नातक से लेकर के स्नात्तकोत्तर तक पटना विश्वविद्यालय में थे। पीएच.डी मगध विश्वविद्यालय से किया।

अपनी माटी – सर, पीएच.डी किस विषय पर है?
डॉ. अरूण कुमार – ब्रिटिश साम्राज्य का कृषक आंदोलन पर क्या प्रभाव पड़ा? स्वामी सहजानन्द की उसमें भूमिका कैसी रही ?

अपनी माटी - आपका राजनीतिक सफर किस रूप में और कहाँ से शुरू हुआ था, कृपया विस्तार से बताएँ ?
डॉ. अरूण कुमार – जब चाकन्द हाई स्कूल में थे, उसी समय 74का आन्दोलन शुरू हो गया था। 75में पटना विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। 74 में ही जे.पी के विचारों से प्रभावित होकर स्कूली जीवन से ही आन्दोलनरत था, उस पर अभियान चला रहा था। चाकन्द स्टेशन को उड़ाने की साजिश में मुझे गिरफ्तार किया गया। लेकिन चाकन्द स्टेशन उड़ाया नहीं गया था, ऐसी साजिश की जा रही है, इसके लिए मुझे गिरफ्तार किया गया था। धरना-प्रदर्शन चल रहा था। हम सिद्धरालय झंडा को ले गये थे, चाकन्द। छात्र आन्दोलन में थे। गया में, उस समय कर्फ्यू लगा हुआ था। उसी समय गिरफ्तारी हुई, पर छोटा समझ के छोड़ दिया गया। डॉ. विलियन उस समय जेपी मूवमेंट में उस इलाके में सक्रिय थे। और एक कोई कौल थे, मेडिकल के स्टूडेंट थे, सकारात्मक सोच के व्यक्ति थे। इन लोगों की ताकत थी, मेरे पास। डॉ. विलियन बाद में सी.पी.आई.एम.एल से जुड़ गये। हमलोग यूनिवर्सिटी में आये, तो हम भी सी.पी.आई.एम.एल के छात्र विंग वी एस एफ से जुड़ गये। लंबे दिनों तक उसके साथ काम किया। उनके साथ रहते हुए भी, जॉर्ज फर्नांडीज से जुड़ाव बना रहा। जॉर्ज फर्नांडीज जब जेल में थे तो बौरादा डायनामाइट कार्य इतिहासपूर्ण समझ के जॉर्ज हमारे आदर्श बन गये। हमलोग पटना विश्वविद्यालय के छात्र मुजफ्फरपुर में उनके चुनाव में भाग लिये। उनसे जुड़ाव बना रहा, लेकिन मौलिक रूप से लंबे दिनों तक सी.पी.आई.एम.एल के छात्र विंग से जुड़ाव बना रहा। उस समय 74 आंदोलन के बाद 77 में चुनाव हुआ था। उस समय जनता पार्टी के साथ था, लेकिन उसके साथ-साथ जॉर्ज का प्रभाव रहा। जन मोर्चा, जनता दल में भी रहे इनमें रहते हुए भी जॉर्ज से जुड़ा रहा। इसके बाद मुख्य रूप से जॉर्ज के राजनीतिक अभियान में समता पार्टी से जुड़े, तब तक निर्दलीय से मैं एमएलसी के लिए चुना गया था। उस समय शरद यादव जी हमारे नेता थे, लालू यादव से कोई रिश्ता नहीं रहा। 90 में टिकट नहीं मिला। शरद जी चाहते थे। 93में मैं गया संसदीय क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव जीता। 94 में समता पार्टी बना। समता पार्टी से जुड़े। फिर शरद जी वगैरह सब एक साथ आ गये। सरकार बनने तक मैं रहा। 13 वीं लोकसभा में भी समता पार्टी से सांसद हुआ। बीच में नीतीश कुमार से विवाद हुआ, फिर अलग होकर हमलोगों ने राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) बनाया। उसके बाद अब तक सब आपके सामने है। मामला इलेक्शन कमीशन में है कि पार्टी का असली उत्तराधिकारी कौन है?

अपनी माटी – सर, इसी से जुड़ता हुआ एक सवाल, कि जब आप छात्र आंदोलन में सक्रिय थे, उसी समय भारतीय राजनीति में आपातकाल की एक घटना हुई। जॉर्ज फर्नांडीज उसके विरोध में थे। उसमें छात्रों की बड़ी भूमिका रही। आपातकाल को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
डॉ. अरूण कुमार – देखिए, आपातकाल का तात्कालिक रिएक्शन था। सरकार गिरी और सरकार बनी भी, लेकिन यह अनगाइडेड मिसाइल की तरह प्रतिरूप हुआ और जिस उद्देश्य से इतना बड़ा जन-आन्दोलन हुआ था। उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं हुई। कांग्रेस के भ्रष्टाचार, वंशवाद के खिलाफ आन्दोलन था। फ्रीडम ऑफ प्रेस के लिए आन्दोलन था। साथ ही वैचारिक धरातल पर मूल रूप से यह आन्दोलन मिश्रितवाद (मिश्रित विचारों का वाद), जो बना, वह कोई अच्छा रिजल्ट नहीं दे पाया। मैं मानता हूँ कि विकास एक क्रमिक प्रक्रिया है, लेकिन समाज का जो वाहक फोर्स था, कल तक वो विचार था। 74 आन्दोलन के बाद धीरे-धीरे विचार वाहक फोर्स नहीं रहा। पहले कांग्रेस में भी विचारक और विचारवान लोग थे, जिनके चिन्तन में देश था और इसके कारण देश उस मोड़ पर खड़ा नहीं था, जहाँ पर आज खड़ा है। उत्तरोत्तर रूप में अच्छे विचार में जाना चाहिए था, मेरी सोच से, वो नहीं गया। 74 का आन्दोलन एक बड़ा आन्दोलन था। कोई भी जनआन्दोलन होता है, तो उससे वैचारिक कार्यकर्ता निकलते हैं। 74 का आन्दोलन विचारों का एक बड़ा पुंज था, लेकिन उसे समेटना संभव नहीं हो सका। तात्कालिक नेतृत्व का अभाव हुआ और यह आंदोलन पराभव का शिकार हुआ, दुर्घटना का शिकार हुआ। और जिन उद्देश्यों के लिए यह आन्दोलन हुआ था, तो वह आज उस चश्मे से यदि देखें, तो सबकुछ बिखरा हुआ नजर आता है।

अपनी माटी – सर, उस आन्दोलन में छात्रों की बड़ी भूमिका रही और छात्र आन्दोलन चरम पर था, न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे भारत में। सर, अभी जो छात्र राजनीति है, अभी के समय में वह कुछ विश्वविद्यालयीय कैंपस में दिखती है, परन्तु अधिकांश युवा राजनीति से तटस्थ नजर आते हैं...
डॉ. अरूण कुमार – देखिए, छात्र को राजनीति में रूचि लेनी चाहिए। हमलोग जब छात्र थे, उससे पहले जो छात्र थे, वो इसलिए राजनीति में हिस्सा नहीं लेते थे कि उन्हें MLA और MP बनना था। इस देश में असम गण परिषद सीधे छात्र आन्दोलन से सत्ता में आया। वीरू कुमार, सुखण राम वगैरह इससे सत्ता में आए। असम में हम छात्र आन्दोलन के लोग गये थे, वो भी हमारे यहाँ आयें, लेकिन वहाँ भी परिणाम सही नहीं निकला। इसलिए कि मैं जो महसूस करता हूँ कि विचार अध्ययन से होगा, अध्ययन के बिना नहीं होगा। छात्र आन्दोलन अराजकता का शिकार हुआ। लेफ्ट हो, राइट हो, मध्यमार्गी हो, हमलोग के कालखण्ड में वही छात्र आन्दोलन करते थे, नेतृत्व करते थे, जो वैचारिक स्तर पर मजबूत होते थे। आज जातीय इनपुट ज्यादा है, सेकुलिरिज्म का लबादा है। रियल सेकुलर तत्व नहीं है। यानी वाद अपने फायदे और सुविधा के लिए है। जिस तरीके से राजनीतिक नेतृत्व वाद को अपने हिसाब से प्रयोग करता है। वैसे ही छात्र आन्दोलन से जुड़े, छात्र राजनीति से जुड़े लोग भी उस वाद का उसी तरीके से प्रयोग करते हैं। इसलिए मैं कहूँगा कि विश्वविद्यालय अराजकता का शिकार है।  
सर,

और इसमें यह बात पूरी तब होगी, जब हम कहेंगे कि वर्तमान में शिक्षक का सम्मान घटा है। शिक्षक समाज का ड्राइविंग फोर्स होते हैं। ड्राइविंग फोर्स तब कहते हैं, जब चीजें क्रमिक रूप से आगे बढ़ती हैं। हमारे यहाँ हजारों वर्ष पहले और बाद के इतिहास में जब झाँकते हैं, तब देखते हैं कि और देश औधोगिक क्रांति से आगे गया है, और चीजों से आगे गया है, अर्थ उसका आधार रहा है। परन्तु जब भारत के इतिहास को झाँकते हैं, तो देखते हैं कि यहाँ मानवीय तत्व ज्यादा रहा है और वह शिक्षक की वजह से रहा है। शिक्षक ड्राइविंग फोर्स रहा है। आजादी के शुरू के बीस-पच्चीस वर्षों को छोड़ दीजिए तो स्पष्ट होता है कि बाद का काल उत्तरोत्तर रूप से कमजोर होता गया। शिक्षक का समाज पर प्रभाव कम हुआ यानी शिक्षक का सम्मान घटा। जब तक शिक्षक समाज का संवाहक बल था, तब तक समाज व्यक्ति पर प्रभावी रहा। जब शिक्षक का सम्मान घटा तब समाज कमजोर हुआ। समाज कमजोर हुआ तो व्यक्तिवादी समाज का निर्माण होने लगा यानी व्यक्ति डोमिनेंट हो गया। नतीजा क्या हुआ, जब व्यक्ति डोमिनेंट हो जाएगा तो इसका असर राजनीतिक पार्टियों पर भी पड़ा। पार्टियों में भी पार्टी डोमिनेंट नहीं रहा, पार्टी का व्यक्ति डोमिनेंट हो गया। जब ऐसी स्थिति बनी, तो समाज में, घर में, परिवार में, देश में अराजकता की स्थिति बनी। “Individual is always a thread for the Nation, society, Mankind” शिक्षा को ही मैं आधार मानता हूँ। रिस्टोर करता है, तो शिक्षक। पुलिस से नहीं होगा, गर्वनेंस से नहीं होगा। शिक्षक से होगा। शिक्षक ही चरित्र निर्माण करता है। व्यक्ति का निर्माण करता है। इस संदर्भ में मुझे अपने विश्वविद्यालयीय जीवन की एक घटना बार-बार याद आती है। जिसका असर मेरे जीवन पर गहरा पड़ा। जब मैं स्नातक के दृतीय वर्ष का छात्र था, एक बार पटना विश्वविद्यालय के एक हॉस्टल में, जो पटना विश्वविद्यालय का पाइनियर हॉस्टल माना जाता था, जहाँ पढ़ाई करने वाले लड़के रहते थे, मैं सुबह-सुबह गया, वहाँ के लड़के ने कहा – नेता जी, देखिए कई दिनों से कुत्ता मरा हुआ है, बदबू दे रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन क्या कर रहा है? मैंने कहा, चलो वी.सी. के पास। उस समय पटना विश्वविद्यालय के वी.सी. देवेन्द्रनाथ शर्मा थे। सुबह-सुबह वी.सी. अकेले टहल रहे थे। आज के वी.सी की तरह नहीं, कि फोर्स और गार्ड के साथ घूमते हैं। उनसे हमने कहा कि हॉस्टल के सामने कई दिनों से कुत्ता मरा हुआ है। बदबू दे रहा है। उन्होंने कहा, कहाँ मरा हुआ है, चलो। वो आये, हमलोग के देखते ही, वे कई दिनों से मरे हुए कुत्ते को अपने दोनों हाथों से उठाने लगे। यह देखते ही हमलोग का दिमाग खुला, कि इसके लिए वी.सी. को बुलाने की क्या आवश्यकता थी? उसके बाद हमलोग विद्यार्थी में से कोई कुते का पूँछ पकड़ रहा है, कोई पैर पकड़ रहा है। देवेन्द्रनाथ शर्मा कहने लगे – अरे, आपलोग देश के भविष्य हैं, आपका काम मरे हुए कुते उठाना नहीं है, ये काम तो वी.सी. का है, चपरासी का है। यह घटना मैं इसलिए सुना रहा हूँ कि शिक्षक की यह भूमिका है, जो सहजता और सरलता से युवाओं में अच्छी चीजें डालता है। इसलिए शिक्षक और उसकी संस्था को अनिवार्य रूप से मजबूत करना होगा। एक लाइन और जोड़िये, यही मूल होगा हमारे साक्षात्कार का, कि सरकारी प्राथमिक विद्यालय से लेकर के विश्वविद्यालयों तक शिक्षा का स्तर गिरा है और निजी विद्यालय-विश्वविद्यालयों की शक्ति बढ़ी है, जिससे आमजन शिक्षा से वंचित होता जा रहा है। जो लोग सामाजिक न्याय का ढ़ींढ़ोरा पीट रहे हैं, वहीं सामाजिक अन्याय का प्रणेता बने हैं। क्योंकि सरकारी विद्यालय-विश्वविद्यालयों को सुसंगठित किए बिना और मुफ्त शिक्षा दिये बिना आमजन के लिए शिक्षा दुरूह विषय होता जा रहा है। आपकी कलम चल रही है, उसी वजह से चल रही है। नहीं तो, इस वर्ग के लोग धीरे-धीरे समाप्त हो जाएँगें। मीडिल क्लास, लोअर मीडिल क्लास, सर्वहारा वर्ग शिक्षा से मरहूम हो जाएगा। सांसद, विधायक, व्यूरोक्रेटस का बेटा-बेटी पढ़ेगा, बाकी सब साक्षर होंगे। सरकार किसी की हो चिन्तन के केन्द्र में इतर विषय नहीं है सब के चिन्तन के केन्द्र में विषय आम जन के लिए दुरूह शिक्षा है।

     अपनी माटी - आपके अनुसार राजनीति में आदर्शवाद का पालन कितना प्रतिशत तक किया जा सकता है?
डॉ. अरूण कुमार – देखिए, कोई वाद का मूल व्यक्ति है और व्यक्ति का निर्माण जितना संस्कारित होगा, उतना ही वह वाद जिन्दा रहेगा। वाद का मूल व्यक्ति है, कोई मशीन नहीं है और व्यक्ति का निर्माण हमारे के यहाँ बंद हुआ है, तो आदर्शवाद कहाँ से रहेगा? हम कहते हैं कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए हम कानून बनाएँ और भ्रष्टाचार होता क्यों हैं? हमारा बेटा बीमार हो जाये, हम साधारण आदमी हैं तो मैं कोई अपराध करूँगा, तो न इलाज करवाऊँगा। बुनियादी आवश्यकता है शिक्षा और स्वास्थ्य, हर व्यक्ति के लिए जरूरी है। पाँच-पाँच दिन भूखा रहकर, पेट काट कर भी कोई गरीब से गरीब व्यक्ति चाहता है कि अपने बच्चे, माँ-बाप का इलाज करा दें। इस देश में शिक्षा और स्वास्थ्य बुनियादी आवश्यकता है, जो कि आम लोगों से दूर होता जा रहा है। कल और आज में फर्क आया है। पहले सरकारी विद्यालयों में ऐसी व्यवस्था थी कि गरीब से गरीब आदमी पढ़ जायेगा, और एक से एक लोग इन विद्यालयों से पैदा हुए। सरकारी अस्पताल में ऐसी व्यवस्था थी कि मरीज पहुँच जायेगा, तो मरेगा नहीं। आज इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। मरीज के अभिभावक को दवा, सूई, कॉटन आदि सभी लाना पड़ता है। केजरीवाल कितना बके या केन्द्र सरकार कितना कहे। कल जो एम्स था, आज दिल्ली एम्स नहीं है। गिरावट आयी है। इसका कारण क्या है, इसका कारण यह है कि हम डॉक्टर पैदा नहीं कर रहे हैं। उसमें मानवीय तत्व में कमी आयी है। उसको इज्जत उस रूप में नहीं मिल रही है। नेता उस रूप में नहीं मिल रहा है। डॉक्टर, इंजीनियर देख रहा है, कि नेता पैसा कमा रहा है। हम क्यों रूके भाई। पहले भी Corruption था। परन्तु पहले “Corruption was a block. Now corruption is tactics. It is a strategy, it is a trick, it is a skill”. मेरा लबोलुबाब यही है कि बुनियादी आवश्यकता के अभाव में व्यक्ति वादों का लबादा ओढ़े रहता है। वाद के करीब नहीं पहुँच पाता है। उसकी रक्षा नहीं कर पाता है। इसलिए व्यक्ति का निर्माण और व्यक्ति के निर्माण के सा।थ-साथ बुनियादी आवश्यकताओं की माँग की पूर्ति आवश्यक है। आदर्शवाद जो है, पहले हमारे गाँव में ऐसे आदर्शवादी व्यक्ति थे, जिनके पास कुछ नहीं रहने पर भी उनको इज्जत दी जाती थी। आज ऐसे व्यक्ति को कहा जाता है कि बेकार आदमी है।

अपनी माटी - लोगों की धारणा है कि पहले से अब राजनीति में अपराधीकरण बढ़ा है, इस पर आपका क्या मानना है?

डॉ. अरूण कुमार – मैंने शुरू में ही कहा कि जब समाज का ड्राइविंग फोर्स विचार नहीं बनेगा, तो उसकी जगह कोई और लेगा। चाहे वह मनी ले या मसल-पावर ले। हमारे यहाँ बौद्धीक लोग दूर से देखते हैं कि राजनीति गंदा है। प्रायः वे राजनीति से किनारा करते हैं। इससे जो गैप हुआ है, उस गैप को दूसरे लोगों ने भरा। आप आजादी के बाद के कालखंड को देखिए कि उस समय इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर वकील सभी राजनीति में सक्रिय थे। धीरे-धीरे ये वर्ग राजनीति से कटने लगे। आप सिर्फ आदर्श की बात करेंगे, उससे जुस्तजू नहीं करेंगे। संघर्ष नहीं करेंगे। रोकेंगे नहीं उसको। तो कोई जगह ले लेगा। जगह लिया। वही आदर्श बन गया। वही ड्राइविंग फोर्स बन गया। बीस गो मर्डर करने वाला आदमी’, गाँधी टोपी पहन लेता है। गमछा पहन लेता है। सब को पैर छुए चलता है। भईया, चचा! समाज कहता है कि झुठे हमलोग माने हलइया की अपराधी है। ई तो नेताउन सबसे बढ़िया है। देवता है।

अपनी माटी - जनता की कई तरह की परेशानियाँ होती हैं, कई बार आपको उलझन में भी डाल देती होंगी। इसमें सबसे बड़ी चुनौती आपके लिए क्या है?
डॉ. अरूण कुमार – सबसे बड़ी चुनौती अभी हमारे सामने स्वास्थ्य का है, जब मैं लोगों को मरते देखता हूँ, और कुछ कर नहीं पाता हूँ। मैं अपना सबसे अधिक समय स्वास्थ्य पर देता हूँ। रोगियों पर देता हूँ, क्योंकि हमारे क्षेत्र में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था कोलेप्स है। जो आमजन गरीब हैं, दलित हैं, शोषित हैं, पीड़ित हैं उनमें किसी को यदि कैंसर, लीवर की बीमारी हो जाती है, तो उनके लिए उसका इलाज संभव नहीं हो पाता है। हमलोग हर संभव कोशिश करके अल्टीमेट व्यवस्था करते हैं कि बीमार व्यक्ति मौत से बचे। चूँकि यहाँ जो व्यवस्था है, उसमें गरीब आदमी का इलाज संभव नहीं है। हमारे लिए यह बड़ी चुनौती है। आज छठ का दिन है। बिहार की जनता और हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण दिन है। सब लोग इधर-उधर गये हुए हैं। तब भी मेरे डेरे में 10 मरीज हैं। इनकी सेवा के अवसर को मैं राजनीति से जोड़ कर नहीं देखता हूँ। मैं छात्र जीवन से यह काम कर रहा हूँ। बीमार व्यक्तियों को दिल्ली ला रहा हूँ। किसी एम.पी. के घर में ठहरता था। बात सुन करके भी ठहरता था। दर्री पर सोता था। इलाज कराके फिर वापस जाता था। एम्स के जितने पुराने डॉक्टर हैं। इनमें से अधिकांश अब हेड हो गये हैं। वे सब हमको अरूण कुमार के रूप में जानते हैं। सांसद के रूप में नहीं जानते हैं। डॉ. वीएस मेहता, डॉ. हेमंत एम्स छोड़कर चले गये। राजनीतिक इंटरफेंयरेंस के चलते एम्स छोड़कर चले गये। ये सब एम्स के पाइनियर लोग थे। जो 30-32 साल सर्विस करके राजनीतिक इंटरफेंयरेंस के चलते एम्स छोड़कर चले गये। जो हमारा स्ट्रक्चर है , वाजिब रूप से फंक्शन नहीं कर रहा है। धीरे – धीरे डिटोरियेट कर रहा है। आबादी बढ़ रही है। गरीबों की संख्या बढ़ रही है साथ ही उनकी समस्या भी कई गुना बढ़ रही है। रोग का रूप बढ़ रहा है। एल्टिमेटली जो हम समझते हैं, जिससे हम व्यथित रहते हैं। जो हमारे लिए सबसे पीड़ादायक होता है, जब हम गरीब को मरते देखते हैं। हम लाचार हो जाते हैं। यह बड़ी चुनौती है। शिक्षा का अभाव बाद में पीड़ा पहुँचाता है, लेकिन स्वास्थ्य का अभाव हर क्षण पीड़ा पहुँचाता है। मैं समझता हूँ कि हर संवेदनशील सरकार की यह प्रथम दायित्व है कि अपने नागरिकों को मुकम्मल स्वास्थ्य की सुविधा मुहैया कराये।


अपनी माटी - लोग अक्सर कहते हैं कि ईमानदार छबि का प्रतिनिधि पैसा और बाहुबल के आगे टिक नहीं पाता है, इस पर आपका क्या विचार है?
डॉ. अरूण कुमार – मैं ऐसा नहीं मानता हूँ। मेरे खिलाफ बराबर भारी धन लगाया जाता है। जातिय तिकड़म के सामने भले मैं टूट जाता हूँ। पैसा और बाहुबल हमारे सामने नहीं टिकता है और कोई भी व्यक्ति अथवा जनप्रतिनिधि इसका सामना कर सकता है। चूँकि देखिए यदि कंडिडेट के मन में बराबर जीत की ख्वाहिश बनी रहे तब वह पीड़ादायक होती है। आप राजनीति करते हैं, लोगों का नेतृत्व करते हैं, तो विचारों के साथ कीजिए, चरित्रबल के साथ कीजिए। हार में भी आपको कोई तकलीफ नहीं होगी और पीड़ा नहीं देगा। इन स्थितियों में हम हार के भी जीते हुए से भारी होते हैं इसलिए कि हम जन के लिए काम करते रहते हैं। जातिय तिकड़म और राजनीतिक पार्टियों  के शिकार होकर के भले मैं व्यथित होता हूँ। परंतु धन-बाहुबली के सामने मैं व्यक्तिगत रूप से कभी हार स्वीकार नहीं करता हूँ। चारित्र्यबल के सामने कोई धन-बाहुबली जीतता रहे। आम जनता में इसका भाव नहीं। आम जनता कार्यों की समीक्षा करती है। जनता वोट भले ही न दे। वे कहते हैं कि मैं इस कारण नहीं दिया, लेकिन आदमी अच्छा है। हमारे यहाँ तो इतना धन लगाया जाता है कि क्या कहें!!! इस बार तो आम्रपाली के चेयरमैन लड़ रहे थे। सुनने में आया 40 करोड़ रूपये खर्च किया। हमने तो करोड़ भी नहीं देखा। जनता चुन कर भेजती है। हाँ, राजनीतिक पार्टियों से इतर होकर लड़ेंगे। तो व्यवस्था ऐसी है कि उसमें आप हार सकते हैं, पर हारने से कमजोर नहीं हो सकते। आप काम कर सकते हैं। हमने काम किया है। हमारे यहाँ हारे हुए में, जीते हुए से भी ज्यादा भीड़ होती थी। एक काम जो मेरे लिए चुनौती है - स्वास्थ्य का, जिसे मैं ईमानदारी से करता हूँ। और हो सकता है कि लंबे दिनों से करने के कारण दिल्ली में 200 डॉक्टर व्यक्तिगत रूप से मुझे जानते हैं और वो जानते हैं कि यह व्यक्ति गरीबों की मदद करता है। इसलिए हमें प्राइरिरिटी देते हैं। जहाँ आप अपने को इन्व्लाव कीजियेगा, वहाँ रिजल्ट निकलेगा। धन-बाहुबली का फ्लोवर है, लेकिन संख्या में कम है।

अपनी माटी – मतलब आप अभी भी स्वीकार करते हैं कि ईमानदार.....
डॉ. अरूण कुमार – आम जन में आपके कार्यों की समीक्षा होती है। आम जन में आपकी पहचान आपके रूप में है, आपने क्या किया ? इस रूप में है।

अपनी माटी - भारतीय राजनीति में धर्म और जाति की भूमिका को आप किस रूप में देखते हैं?
डॉ. अरूण कुमार – देखिए, यह देश बहुत बार ऊँचाई को प्राप्त किया है। कई बार नीचे भी आया है, तो कई तरह के भटकाव से गुजरता रहा है, लेकिन मानवीय तत्व इसके मूल में है। दुनिया की ऐसी कोई सभ्यता नहीं है, जो इतना झंझावात झेली है, फिर भी इसकी मौलिकता बनी हुई है। आज भी दुनिया के लोग चाहे जितने समृद्ध हो जायें बराबर भारत की ओर उनकी दृष्टि रहती है। नकारात्मक रूप में भी, सकारात्मक रूप में भी। जिस भी धर्म के लोग हों, हम कहें तो, साक्षात् संत परंपरा को हम स्वीकार करते हैं और कोई न कोई ऐसी चेतन शक्ति है...

अपनी माटी – ये हम राजनीति में खासकर पूछ रहे हैं...
डॉ. अरूण कुमार – मैं बतला रहा हूँ। एक प्वाइंट बतायेंगे तो मूल प्वाइंट छूट जायेगा। तो मैं कह रहा हूँ कि ये जायेगा नहीं। राजनीति में धर्म का होना, कोई अपच करने वाली वस्तु नहीं है। धर्म आदमी का निर्माण करता है। नकारात्मक धर्म आदमी का नाश करता है। धर्म का मतलब है मानवीय मूल का होना। धर्म का मतलब नाक चापना नहीं है। धर्म का मतलब आँख बंद करके सिर्फ कीर्तन-भजन करना नहीं है। धर्म का मतलब है मानवीय चेतना का होना। मानवीय सद्गुणों का आपमें होना और यह राजनीति में यदि है तो उसकी उत्कृष्टता उतनी ही अधिक होगी। इसलिए चाहे किसी भी धर्म के सही धार्मिक लोग हमें मिलते हैं तो उनकी ऊर्जा, शक्ति हमें प्रभावित करती है। इसलिए लेफ्ट से प्रभावित रहने के बाद भी उन दिनों में भी मैं धर्म को अफीम नहीं माना। यह मेरी अपनी समझ है कि धर्म आदमी को परिष्कृत करने का एक तरीका है। धर्म लोगों में विभाजन करने का हथियार नहीं है। बहुत-से लोग अनाप-शनाप नारा देते रहते हैं। स्वयं में चाहे जितने गंदे हों, अधार्मिक हों, लेकिन धर्म का लबादा ओढ़े रहते हैं। मेरी दृष्टि में धर्म की परिभाषा यह नहीं है। धर्म की परिभाषा है, जो मानव को परिष्कृत करता है। विचार, धारणा, रास्ता, साधना धर्म है और वह राजनीति के लिए पूरक है।

अपनी माटी – और जाति ...सर...
डॉ. अरूण कुमार – जाति का भी। यह विश्वास का विषय है। इस देश में विश्वास का संकट है। छोटे-छोटे कबीले रहे हैं। छोटी-छोटी जातियाँ रही हैं। हजारों तरह की जातियाँ हैं। सब को अपनी जाति का भान है। डॉ. लोहिया ने कहा जाति....

अपनी माटी – जाति तोड़ो आन्दोलन….
डॉ. अरूण कुमार – जाति तोड़ो तब कहा जब जाति संकट बन गया। जात से जमायत का पहला नारा दिया। यानी जहाँ विश्वास हो, उस विश्वास से जोड़ो, उसके अंदर मूल तत्व डालो फिर जमायत तक जाओ और फिर वास्तविक मानवता की परिकल्पना करो। जात यह नहीं कि उस जात को ऐसा खड़ा करो कि वो दूसरे जात का झोपड़ी जला दे, तुम्हारी माल बनाने के लिए। यदि विश्वास है तो उसके अंदर सकारात्मक तत्व डालो ताकि जमायत का निर्माण हो और सभी जातियों का पिरामिड बने। उदाहरण के लिए तिलक ने गणेश पूजा की शुरूआत की तो वे अंधधार्मिक नहीं थे। एक बड़ा भूभाग जहाँ गणेश पूजा होती थी, उन्होंने गणेश चतुर्थी शुरू की और उसे राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ दिया। बहुत लोग ऐसे हुए हैं, जिन्होंने जातिय आधार पर समाज को संगठित करके राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने का कार्य किया है। जैसे स्वामी सहजानन्द सरस्वती भूमिहार जाति से थे, लेकिन उनकी पूरी लड़ाई भूमिहार जमींदारों से थी। मूल रूप से बिहार में जमींदार, भूमिहार थे। उनका पहला टकराव भरतपुर से हुआ, जहाँ मेह में एक किसान को बाँधे हुए था। चंदा लाने गये थे। उन्होंनें कहा कि कौन पागल ने इसे बाँधा। मैनेजर ने कहा सरकार ने बाँधा। तब तक सरकार आ गयी और सरकार ने कहा कि बाँधों, स्वामी को! स्वामीजी ने कहा कि पापी, तुम्हारे पाप के परिमार्जन के लिए, मैं चंदा लेने के लिए आया, कि कुछ सुधार हो। अब आप चिंतन का फर्क देखिए। उन्होंने आगे कहा कि – कल जो होने वाला है उसमें तुम्हारा विनाश होने वाला है। लेकिन जब तुम मुझे ही बाँधने के लिए उतावले हो। तो मैं कहता हूँ कि मैं इसी बिहटा में रहूँगा और तुम्हारी कोठी, जो पाप से बनी है उसका एक-एक ईंट उखाड़ लूँगा। तभी मैं बिहटा छोडूँगा। वही हुआ। भरतपुर का एक-एक ईंट बिक गया।  

स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने वहाँ जनआंदोलन खड़ा कर दिया। उन पर हमला भी हुआ, लेकिन नहीं डिगे। वहाँ के लोगों में इतनी आस्था पैदा कर दी, कि भरतपुर बेच-बेच कर ही खाया और अनाज नहीं हुआ। तो लोग शुरू में जात के भी हिसाब से जुड़ें, लेकिन लोगों ने बाद में महसूस किया कि यह आन्दोलन किस तरह का है। इसमें गरीब-मजदूर सबका हित है, लड़ाई में सब लोग हैं। डॉ. श्री कृष्ण सिंह जैसे लोगों से स्वामीजी ने कहा कि पंडित नेहरू से कहो कि किसान आन्दोलने से ही आजादी की लड़ाई सम्भव होगी। पंडित नेहरू ने नहीं माना, गाँधी ने नहीं माना। लेकिन सुभाष चंद्र बोस ने माना, उन्होंने कहा कि अगर स्वामी सहजानन्द सरस्वती नहीं होते, तो आजादी की लड़ाई खेत-खलिहान में नहीं जाती। स्वामी जी जब भाषण करते थे, तो वे अंग्रेजों के खिलाफ नहीं बोलते थे। वे जमींदारों के खिलाफ बोलते थे। उन्होंने कभी अंग्रेजों के खिलाफ नहीं बोला। वे कहते थे कि यही है जिसके चलते टिका (अंग्रेज) हुआ है। ये (जमींदार) आधार नहीं रहे, तो वह (अंग्रेज) गिर जायेगा। तो, जातिय संगठन से भी चीजों को खड़ा करके लोगों ने बड़ा किया है। पंडित मदन मोहन मालवीय व्यक्ति थे। उनमें शिक्षक का संस्कार था। जगजीवन राम की जूठी थाली, ब्राहम्ण रसोइया ने नहीं उठाया, उन्होंने उठा लिया। पूरे विद्यार्थी को यह समझ में आ गया कि ज्ञान, वाद या विचार क्या है?

अपनी माटी - पुराने नेताओं में आप किस नेता से ज्यादा प्रभावित होते रहे हैं?
डॉ. अरूण कुमार – देखिए, छात्र जीवन से तो मेरे ऊपर सबसे अधिक प्रभाव जॉर्ज फर्नांडीज का है। हमने जॉर्ज फर्नांडीज को नेता माना। आज भी उनको नेता मानता हूँ। छात्र जीवन में स्वामी सहजानन्द सरस्वती को पढ़ा और उनसे प्रभावित रहा। व्यावहारिक जीवन में सबसे ज्यादा प्रभावित जॉर्ज फर्नांडीज से रहा। उन्होंने मेरे लीडरशिप को परिष्कृत किया। जॉर्ज फर्नांडीज के जीवन को मैंने बहुत नजदीक से देखा-झांखा और उनसे प्रभावित रहा। जॉर्ज फर्नांडीज का असर मेरे जीवन पर पूरा-पूरा रहा। मैं नहीं कह सकता कि मैं उनको फॉलो करता हूँ। वही मेरे जीवन में आदर्श के रूप में हैं।

अपनी माटी - वर्तमान भारतीय राजनीति में वह कौन-सा नेता है, जिसे आप अपना आदर्श मानते हैं और उसके जैसा बनने का प्रयास करते हैं?
डॉ. अरूण कुमार – देखिए, वाद के हिसाब से मतभिन्नता के बावजूद मैं नरेंद्र मोदी को आज के कालखंड में अपना आदर्श मानता हूँ। मैं महसूस करता हूँ कि नरेन्द्र मोदी ने एक संकट के काल में जब राष्ट्र दिशाभ्रम, एक कमजोर नेतृत्व का शिकार था उन्होंने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की। हम नहीं कहते कि कोई अलादीन का चिराग है, जो दो साल के अंदर चीजों को समेट दे। लेकिन विश्वास का जो एक संकट था, बड़े हद तक लोगों में पैदा कियो। लोगों को लगा कि चीजें सुलभ हो सकती हैं। अभी हुआ नहीं है, लेकिन हो सकती है। एक कालखंड में, मैं उनके विरोध में भी था, लेकिन दूसरा कालखंड ऐसा है, जो सारी चीजों से ऊपर उठकर वे दुनिया के सामने भारत को मजबूती से रख रहे हैं।

अपनी माटी - वर्तमान राजनीति से आप कितना सन्तुष्ट हैं?
डॉ. अरूण कुमार – देखिए, राजनीति समाज से संचालित है। समाज कमजोर हुआ है। व्यक्तिनिष्ट समाज बना है। जब तक व्यवस्था समाजनिष्ट नहीं बनेगी, तब तक मजबूत राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं होगा। यह व्यक्तिनिष्ट दौर है, न कि समाजनिष्ट। यदि समाजनिष्ट राष्ट्र होगा, तो उसको स्थायित्व मिलेगा। नरेन्द्र मोदी जैसा हजारों-लाखों व्यक्ति चाहिए तभी समाजनिष्ट होगा। कभी-कभी व्यक्ति इतना व्यक्तिवादी हो जाता है कि उससे भी राष्ट्र को खतरा होता है। हमें उन संस्थाओं को जहाँ से व्यक्ति का निर्माण होता है, उसे मजबूत करना होगा। समकालीन परिप्रेक्ष्य में आदमी निकालने वाली जितनी फैक्ट्रियाँ थीं वह कमजोर हुई हैं, जिसके चलते मानव का निर्माण ठहरा है। रूका है। राजनीतिक पार्टियों में भी पहले संगोष्ठियाँ, बहसें हुए करते थे। वहाँ सृजन का पाठ पढ़ाया जाता था। ये सारी चीजें बंद हो गयी हैं। व्यक्तिनिष्ठ पार्टियाँ हो गयी हैं। वह चाहे समाज को जिस दिशा में ले जाये या डुबो दे। चाहे मंझधार में रखे। मैं संतुष्ट तो नहीं हूँ। लेकिन अचानक एक हवा का झोंका चला है। कुछ व्यवस्थित होने का प्रयास हो रहा है।

अपनी माटी - आप राजनीति में किन एजेंडों को प्राथमिकता देते हैं?
डॉ. अरुण कुमार – मैं शिक्षा को ही टोटल ट्रांसफोर्मशेन का इंस्ट्रूमेंट मानता हूँ। संपूर्ण, मुक्त और गुणात्मक परिवर्तन शिक्षा, संस्कार के साथ। यह संपूर्ण बदलाव कर सकता है।

अपनी माटी - आपको राजनीति में क्या चीज सबसे ज्यादा खटकती है या बुरी लगती है?
डॉ. अरूण कुमार – चेहरा?

अपनी माटी – चेहरा नहीं, कुछ भी राजनीति में या इस तरह की राजनीति में या जो कुछ... 
डॉ. अरूण कुमार – देखिए, नकारात्मक मुद्दे को लेकर यदि ब्लॉक स्तर के नेता कुछ करते हैं तब तो इतना नहीं खटकता है, जब राष्ट्रीय नेतृत्व के परिदृश्य के लोग नकारात्मक मुद्दे को लेकर कूदते हैं और इसी को एजेंडा बना लेते हैं, तब लगता है कि राष्ट्र को खतरा है। जैसे सर्जिकल स्ट्राइक हुआ। अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि हमको प्रमाण चाहिए। इतनी बेवकूफी पूर्ण बात कोई राष्ट्रधर्मी नहीं कह सकता। जैसे मनोहर पार्रिकर जैसा आदमी ने कह दिया कि संघ ने ताकत दी, तब हमारी सेना गयी, तो ये पचने योग्य नहीं है। ये बातें जो अभी राष्ट्र के सामने आ रही हैं। जैसे - मैं बहुत कूदता नहीं हूँ। अभी देखिए, एक आदमी ने आत्महत्या कर लिया, और ऐसा आदमी कूद रहा है (राहुल गाँधी), जिसकी पार्टी चालीस वर्षों तक उसकी बात नहीं सुनी। चार हजार उनको पेन्शन मिलता था। इस सरकार ने दो सालों में उनका पेन्शन कर दिया, 23000 रूपये। पाँच हजार का डिफरेन्सेज का पेमेंट नहीं हुआ, इसके लिए इन्सिकेट करके उनकी हत्या करवाया। केजरीवाल ने एक बार किसान की हत्या करवाया। सब उनका पलोटिंग है। इसको भी किसी ने शराब में सल्फास डालकर दिया। हम नहीं जानते हैं, उसकी स्टारी, जाँच होगी, आगे बात सामने आएगी। राहुल गाँधी भी उसमें थे। इस स्तर की राजनीति यदि राष्ट्रीय स्तर पर होगी। इस स्तर के लोग भ्रष्टाचार से लड़ेंगे? मुल्क की राजनीति करेंगे? ये स्थिर दिमाग का आदमी नहीं है। आप एक पोकेटमार को ले आये। जाली डिग्री वाले को कानून मंत्री बनाने लगे हो। सत्ता के लिए इस स्तर की राजनीति होने लगी है। यह चिंता का विषय है। ठीक बात नहीं है।

अपनी माटी - इस समय देश में सबसे बड़ी समस्या क्या है?
डॉ. अरूण कुमार – देश ही नहीं दुनिया के सामने सबसे बड़ी समस्या आतंकवाद है। यह आतंकवाद ऐसा मुद्दा है, जो बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के मुद्दे से दिमाग को मोड़ता है। गरीबी के विरूद्ध लड़ने से दिमाग को मोड़ता है। गरीबों को जिन चीजों के लिए घाव होना चाहिए था, गरीब उसी का शिकार हो रहे हैं। गरीब उसके लिए हथियार उठा रहे हैं।

अपनी माटी - क्या साहित्य से आपका लगाव रहा है, यदि हाँ, तो किस साहित्य और साहित्यकार को पढ़ना पसन्द करते हैं?
डॉ. अरूण कुमार – देखिए, मैं हंस बहुत दिनों से पढ़ता रहा हूँ। प्रेमचंद मुझे बहुत पसंद हैं और रेणु का मैला आँचल जब मैं पहली बार पढ़ा था तो रेणु का फैन हो गया। इस तरीके से मैं कोई जबरदस्त पढ़ाकु नहीं हूँ। लेकिन चूँकि विद्यार्थी जीवन में मुझे लेफ्ट का जो सान्निध्य हुआ, वह पढ़ने के लिए ज्यादा उन्नत किया। जब मैं फर्स्ट इयर में डायलेक्टिकल मैकेनिज्म पढ़ना शुरू किया, तो उस समय पढ़ने का क्रमिक क्रिया बन गयी। तॉल्सतॉय, विनोबा भावे, गाँधी, लोहिया आदि को पढ़ा। इस कालखंड में जिसमें एमएलसी, एमपी बना, इसमें नहीं पढ़ा। चलते-फिरते जो पढ़ लिए, एडिटोरियल पढ़ लिए, विषयवार नहीं पढ़ा, जो अच्छा लगा, वही पढ़ा। जो कहते हैं कि अच्छा बोलता हूँ, वो पहले के पढ़ने की ही ताकत है।  

  • डॉ.अरूण कुमार,सांसद, जहानाबाद,भारत सरकार। राष्ट्रीय अध्यक्ष,राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा-अरूण गुट), संपर्क–9868180699,drarunkumarjahanabad@gmail.com      

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