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बातचीत:भाषा जो समाचारपत्रों की पहचान होती है:ओम थानवी

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on बुधवार, नवंबर 16, 2016 | बुधवार, नवंबर 16, 2016

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-23,नवम्बर,2016
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बातचीत:भाषा जो समाचारपत्रों की पहचान होती है:ओम थानवी
(जानेमाने रचनाकार और सम्पादक ओम थानवी जी से रजनीश मिश्र की बातचीत)

(हिंदी अख़बारों ने बदलाव के कई दौर देखें हैं जिससे वे प्रभावित भी हुए, वर्तमान ‘सूचना-समाज’ एवं प्रौद्योगिकी के युग में इन अख़बारों को एक नई किस्म की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, वह चुनौतियां किस प्रकार की हैं और उसका क्या असर हिंदी के अख़बारों में हैं, इन सब विषयों पर जनसत्ता से सेवानिवृत्त हुए संपादक ओम थानवी का रजनीश मिश्रा द्वारा लिए गए साक्षात्कार के प्रमुख अंश)

प्रश्न:1  ओम थानवी जी आप पच्चीस वर्षों तक जनसत्ता से जुड़े रहे पहले चंडीगढ़ फिर काफी समय तक दिल्ली में, आप हिंदी पत्रकारिता में आये परिवर्तन के गवाह भी हैं, इन परिवर्तनों के बीच आप जनसत्ता को अन्य हिंदी दैनिक समाचार पत्रों की पंक्ति में किस प्रकार देखते हैं ?

उत्तर : जनसत्ता शुरू से ही एक अलग किस्म का अख़बार था इसके संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी ने इसे एक ऐसा अख़बार बनाने की शुरुआत की जिसमें खबरों के साथ – साथ विचारों का चयन भी बड़ी गंभीरता से किया जाता था, जब मैं चंडीगढ़ में था तब वहां से प्रकाशित संस्करण की स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी वह कोलकाता और लखनऊ संस्करण की तरह ही निकलता था लेकिन दिल्ली संस्करण अपनी निष्पक्ष विचारों एवं अपनी संतुलित पृष्ठ सज्जा के साथ अपनी अलग पहचान बना चूका था, और कई तरह के व्यवधानों का सामना करते हुए आज भी हिंदी अख़बारों में जनसत्ता अपनी विशेष पहचान बनाए हुए है, इसके संपादकीय एवं वैचारिक पृष्ठ आज भी विचारशील लोगों के बीच गंभीरता से पढ़े जाते हैं ।

प्रश्न:हिंदी समाचारपत्रों के इतिहास में संपादकों और संपादकीय नीतियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा, आप हिंदी समाचारपत्रों में वैचारिक पृष्ठ के महत्व को किस रूप में देखते हैं विशेषकर वर्चुअल संचार माध्यमों की बढ़ती लोकप्रियता के बीच?


उत्तर : वर्चुअल माध्यम में विचारों की गहराई नहीं होती वे त्वरित होते हैं, अधिकतर भावावेश में लिखे गए होते हैं इसलिए कम समय में मिट जाते हैं, लेकिन वैचारिक पृष्ठों एवं पत्रिकाओं  आदि के लेखों में गहराई होती है, जहाँ तक संपादकीय पृष्ठों की बात है वे हमेशा से समाचारपत्रों की जान रहें हैं इसमें संपादक अपने विवेक के अनुसार, सामग्री एवं विषयों का चुनाव करते हैं। हमारे यहाँ पहले संपादकीय पृष्ठों में तीन संपादकीय लिखे जाते थे जिसमें एक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर, एक में राज्य एवं वहाँ होने वाली घटनाओं से संबंधित विचार तथा  तीसरे में कम गंभीर विषय पर विचार होते थे, इन संपादकीयों के अलावा इस पृष्ठ पर अग्रलेखों के द्वारा भी कई विषयों पर विचार प्रस्तुत किए जाते थे । वर्तमान समाज में जहाँ लोग अपनी भागमभाग वाले जीवन में व्यस्त हैं और सोचने से बचना चाहते हैं ऐसे में संपादकीय पृष्ठों का महत्व बढ़ जाता है। 


प्रश्न: 3  हिंदी समाचारपत्रों के पृष्ठों में इंपोर्ट एक्सपोर्ट के दौर में विचारों का भी इंपोर्ट एक्सपोर्ट होने लगा है कई आलेख अनुदित होकर (इसमें केवल अंग्रेजी से हिंदी ही है न कि कोई अन्य भारतीय भाषा) छपने लगे हैं इसे क्या हिंदी में विशेषज्ञ लेखन की शून्यता माना जाए?


उत्तर : हिंदी के अखबारों में जो एक और चीज देखने को मिली है वह है कि इसमें हिंदी के लोगों से ज्यादा अंग्रेजी के लोग छपते हैं, जैसे हिंदी में लेखकों बुद्धिजीवी का अभाव हो।  खुशवन्त सिंह, कुलदीप नैयर छपते हैं क्योंकि ये लोग अंग्रेजी में ब्रांड बन चुके हैं। ये अख़बार उन्हें छापते हैं और कहते हैं कि हमारा अख़बार बड़ा अखबार है क्योंकि हम लोग अंग्रेजी के लेखकों को छापते हैं । हिंदी के कृष्ण कुमार जैसे लेखकों को जहाँ अंग्रेजी के समाचार पत्र छापते हैं वहीं हिंदी के समाचार पत्रों के पास उनके लिए जगह कम है। चेतन भगत जैसे लेखकों को छापना उनके ब्रांड का फायदा उठाने के अलावा कुछ नहीं है। हाँ एक दूसरा कारण संसाधनों की कमी भी है हिंदी के कई समाचार पत्रों के पास संसाधनों की कमी है, प्रबंधन के द्वारा पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराये जाते और कम खर्च पर काम चालने को कहा जाता है, मान लीजिए एक लेख के लिए अगर एक हज़ार रुपए देने पड़ते हो तो महीने के तीस हज़ार हुए और जब कम कीमत पर अनुदित लेख उपलब्ध हो तो प्रबंधन उसी से काम चलाना चाहता है ।  


प्रश्न: 4  वर्ष 1990 के आस पास जनसत्ता के संपादकीय पृष्ठों में तीन संपादकीय (विषयों) के
अलावा, शिकायतें, आलेख एवं किसी राज्य में हो रही परिघटना से संबंधित विचार एवं पाठकों के पत्र (चौपाल) होते थे वही वर्तमान में उनकी जगह कुछ जगह ‘दुनिया मेरे आगे’ और ‘समांतर’ जैसे कॉलम ने ली है इसके बारे में कुछ बताएं?

उत्तर :  तीन संपादकीय छपने ही चाहिए लेकिन प्रबंधन के दबाव में उसे केवल दो तक ही सीमित कर दिया जाता है। शिकायतें चूँकि विचारों से संबंधित नहीं होती थी इसलिए उसे अन्य पृष्ठ में भेज दिया गया। ‘दुनिया मेरे आगे’ स्तम्भ अच्युतानंद मिश्र ने शुरू किया था जिसमें लोगों के जीवन में घटनेवाली आम घटना के लेखन को भी स्थान मिल सके ‘दुनिया मेरे आगे’ और ‘समांतर’ के लिए पैसा नहीं देना पड़ता था यह कई बार साभार प्रकाशित होती थी। ‘समांतर’ और ‘दुनिया मेरे आगे’ ने दूसरे अग्रलेख की जगह ले ली क्योंकि प्रबंधन ने हमारे संसाधन छोटे कर दिए थे। संसाधन छोटे थे लेकिन उन्होंने हमारी स्वतंत्रता में कभी भी दखल नहीं डाला।


प्रश्न:5  आप के संपादन काल में जनसत्ता के वैचारिक पृष्ठों पर हाशिए के चिंतन को प्रमुखता से स्थान मिला जो कि अन्य हिंदी समाचारपत्रों में न के बराबर है इसके पीछे का विचार क्या है?
  
उत्तर : अख़बारों और मीडिया में शुरुआत से ही सवर्णों का अधिकार था, जनसत्ता में भी प्रभाष जोशी, अच्युतानंद मिश्र, राहुल देव और मैं खुद ब्राह्मण वर्ग से आते हैं, और भी अन्य कारणों से दलितों, आदिवासियों और वंचितों को वह स्थान नहीं मिला, जो अब उन्हें मिलाना चाहिए उनसे जुड़े विभिन्न मुद्दों पर हो विमर्शों को भी अखबारों में स्थान दिया जाना चाहिए। 

प्रश्न : 6  क्या भूमंडलीकरण ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समाचारपत्रों के वैचारिक पृष्ठों की अंतर्वस्तु को प्रभावित किया है? 

उत्तर : हां, लेकिन जनसत्ता के संपादकीय पृष्ठों पर इसका कोई विशेष प्रभाव पड़ा हो ऐसा नहीं है, हमने समाचार के साथ विचार को लगातार प्रस्तुत किया। लेकिन प्रबंधन के द्वारा हमारे अख़बार को संसाधन बढ़ाने की छूट नहीं मिली, इसलिए हम ज्यादा बदलाव नहीं ला पाए। हमने इसके लिए प्रबंधन से लड़ाई भी लड़ी, वह हमें अनुबंध में काम करना चाहते थे लेकिन हमने पुरानी व्यवस्था ही स्वीकार की जिसका मुझे निजी तौर पर खमियाजा भुगताना पड़ा, मेरा प्रमोशन कई वर्षों तक रोक दिया गया। अंतिम समय तक भले ही मैंने संपादक का पूरा दायित्व निभाया और लोग मुझे संपादक ही समझते रहे लेकिन रिटायर्ड होने तक प्रिंट लाइन में मेरा नाम कार्यकारी संपादक के तौर पर ही अंकित था।
प्रश्न:7  जब वर्तमान में पश्चिमी के कई देशों में समाचारपत्रों की संख्या में कमी आई है, और भारत में इसमें वृद्धि हुई है ऐसे में आप भारत में समाचारपत्रों विशेषकर हिंदी समाचारपत्रों के भविष्य को कैसे देखते हैं ? 

उत्तर : जैसे-जैसे पत्रकारिता में मुनाफे का खेल बढ़ेगा पत्रकारिता कम होती जाएगी, हिंदी अखबारों में जो सबसे बढ़ा नुकसान हुआ है वह है विचारों का लोप, अखबारों में कोई विश्लेषण नहीं होता है और संपादकीय पेज आज के समय प्रबंधन के लिए सबसे अप्रासंगिक चीज हो गई है। एक और बात जो मैं समझता हूँ वह यह है कि अख़बार में संपादक नाम की जो चीज है वो बिल्कुल ख़त्म है, सबसे ज्यादा बिकने वाले जो अख़बार हैं जिनमें आंध्र, केरल, तमिलनाडु, पंजाब, पं बंगाल, मध्य प्रदेश आदि से प्रकाशित क्षेत्रीय अख़बार प्रमुख हैं, इन ज्यादातर अखबारों में मालिक ही संपादक होते हैं और नीतियाँ भी वे ही बनाते हैं, संपादकीय पेज की क्या जगह हो यह तय मालिक ही करता है और मालिक को लगता है कि यह सबसे ख़राब चीज है इसे कोई नहीं पढ़ता या इसे पढ़ने वाले बहुत कम लोग हैं तो वह इसे मनोरंजन की चीज बना देता है। 

प्रश्न:8  वर्तमान समय में हिंदी अखबारों में जिस भाषा का प्रचालन बढ़ा है उसमें अंग्रेजी के शब्दों के प्रयोग के अलावा हिंदी के शब्दों का दुरुपयोग भी है, इस विषय पर आप के क्या विचार हैं ?
  
उत्तर : भाषा अख़बार के लिए सबसे महत्वपूर्ण साधन है जिसका पतन हिंदी समाचार पत्रों में बहुत तेजी से हुआ है अंग्रेजी के बहुत से शब्द हिंदी में आ गए हैं, हिंदी अब बची नहीं है। शब्दों को भी गलत अर्थों में प्रयोग किया जा रहा है जैसे दबंग और बाहुबली, किसी भी हिंदी शब्दकोश में इन दोनों शब्दों के अर्थ नकारात्मक नहीं हैं ये अच्छे शब्द हैं बाहुबली तो एक जैन देवता का नाम है, और दबंग का अर्थ है जो किसी से न दबता हो, जो निडर हो, लेकिन  अब दबंग दबाने वाले को कहते हैं जिसका उपयोग मीडिया के पत्रकार क्षेत्रीय गुंडों के लिए करने लगें हैं।

        मालिक तर्क देता है और सम्पादक को कहता है कि आप ख़राब हिंदी लिखिए क्योंकि लोग एैसी ही हिंदी बोलते हैं, तो मेरा तर्क है कि आप अपने अंग्रेजी अख़बार में वो अंग्रेजी क्यों नहीं लिखते जो हिंदुस्तान का आदमी बोलता है, वहां संपादक को जिम्मेदारी चाहिए लेकिन हिंदी के प्रति उसका वह रवैया नहीं दिखता। भाषा एक तर्क देती है जिससे पता चलता है कि किसके पास कैसी शब्दावली है और इसी से उसके कद का निर्धारण होता है। जैसे कि जब आप शेक्सपियर को पढ़ते हैं तो उतनी देर के लिए आप शेक्सपियर के बराबर हो जाते हैं आपको शेक्सपियर को पढ़ने के लिए अपनी शब्दावली, अपनी मेधा, अपने विवेक, को ऊँचा उठाना पड़ता है। तो आप अगर अच्छी भाषा को लेकर नहीं आते हैं तो आप समाज को देंगे क्या। हमारी पत्रकारिता का हिसाब भी भाषा हैं। 

रजनीशकुमार मिश्रा,
पांडिचेरी केंद्रीय विश्वविद्यालय,संपर्क:7598369536,8015353407,sabkarajnish@gmail.com
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