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सिने-दुनिया:भारतीय सिनेमा में बदलते नारी चरित्र – एकता हेला

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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सिने-दुनिया:भारतीय सिनेमा में बदलते नारी चरित्र – एकता हेला

चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
आधुनिक युग में अगर सबसे अधिक किसी माध्यम ने प्रभावित किया है तो वो है ‘सिनेमा’। इससे पहले दृश्य-श्रव्य माध्यम के रूप में मंच पर मंचित नाटकों को ही देखा गया था। सिनेमा के प्रादुर्भाव ने समय के साथ समाज में क्रांति का रूप ग्रहण कर लिया है। मंच पर मंचित नाटकों का दर्शक वर्ग काफी सीमित होता था उसकी अपनी सीमायें होती थीं लेकिन इस वैज्ञानिक माध्यम की कोई सीमा नहीं है। लंदन  में 1895 में लुमिएर (Lumière) चल-चित्र की स्क्रीनिंग के बाद सिनेमा यूरोप भर में एक सनसनी बन गई और जुलाई 1896 तक इन फिल्मों को बंबई  में भी प्रदर्शित किया गया था। अगले एक साल में प्रोफेसर स्टीवेंसन्द्वारा एक फिल्म प्रस्तुति कलकत्ता स्टार थियेटर में एक स्टेज शो में की गयी । स्टीवेंसन के प्रोत्साहन और कैमरामैन हीरालाल सेन ने  उस स्टेज शो के दृश्यों से 'द फ्लॉवर ऑफ़ पर्शिया' (1898) में  (फारस के फूल) नामक फिल्म बनाई। एच एस भटवडेकर की  ‘द रेसलर्स’ (1899) जो मुंबई के हैंगिंग गार्डन में एक कुश्ती मैच को दिखाती  है, किसी भारतीय द्वारा शूट की हुई पहली फिल्म थी। यह पहली भारतीय  वृत्तचित्र फिल्म भी थी। अपने शुरुआती दौर में सिनेमा घटित घटनाओं की छाया मात्र के रूप में नजर आती है लेकिन आगे आने वाले समय में सिनेमा ने कला के रूप में नए आयाम स्थापित किये।

भारत की पहली पूरी अवधि की फीचर फिल्म का निर्माण दादा साहेब फाल्के  द्वारा किया गया था। दादासाहब भारतीय सिनेमा के अगुआ थे और भारतीय संस्कृति के विद्वान भी। दादासाहब ने   संस्कृत महाकाव्यों के तत्वों को आधार बना कर राजा हरिश्चंद्र  (1913), मराठी  भाषा की मूक फिल्म का निर्माण किया। इस फिल्म में पुरुषों ने ही महिलाओं का किरदार निभाया।१ यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म  का  सिर्फ एक ही प्रिंट बनाया गया था और इसे 'कोरोनेशन सिनेमेटोग्राफ' में 3 मई 1913 को प्रदर्शित किया गया। फिल्म को व्यावसायिक सफलता मिली और इसने  अन्य फिल्मों के निर्माण के लिए अवसर प्रदान किया।  इसके बाद “तमिल  भाषा की पहली मूक फिल्म ‘कीचका वधं’  का निर्माण रंगास्वामी नटराज  ने 1916  में किया।”२ वर्तमान समय में तमिल, तेलुगु, हिंदी, मलयालम, कन्नड़, भोजपुरी, मराठी, बंगला, गुजरती, पंजाबी, उड़िया, छत्तीसगढ़ी, असमिया, अंग्रेजी, राजस्थानी, हरियाणवी, ब्रज, कोंकणी, तुलु आदि भाषाओँ में सिनेमा का निर्माण हो रहा है। भारतीय सिनेमा अपने प्रारंभिक दौर से लेकर आज तक कई ढर्रों पर चलता दिखाई देता है। 

          आज की हिंदी सिनेमा ने तमाम तरह की पुरानी रूढ़ियों को तोड़ा है। अपने समय की नब्ज को पहचानते हुए उसे प्रोत्साहित किया है और अपने लिए दर्शक तैयार किये हैं। विषय, भाषा, चरित्र, प्रस्तुति आदि सभी स्तरों पर भारतीय सिनेमा अपनी पुरानी छवि को छोड़ नयी जमीन तैयार कर रहा है। इन सब के बीच जो सबसे उल्लेखनीय बात ये हुई है कि सिनेमा में जो परम्परा से नारी का चरित्र गढ़ा जाता रहा है उसने उस ढाँचे को तोड़ा है। एक ममतामयी माँ, बहन, आदर्श पत्नी आदि की छवि से बाहर निकलकर आज की नारी पात्र अपने ढंग के चरित्र को निभा रही हैं। वो सिर्फ घर में चौका-बर्तन करने वाली या घरवालों के तानों को सुनकर भी चुपचाप सबका भला चाहने वाली ही नहीं बल्कि घर से बाहर निकलकर अपने महत्वकांक्षाओं को पूरा करने वाली सबला है। जिस औरत को सिनेमा ने अपने शुरुआती दौर में अबला के रूप में प्रस्तुत किया था आज वही अबला मुख्य भूमिका में आ गयी है।
‘हंसी तो फंसी’, ‘क्वीन’ और ‘हाईवे’ जैसी फिल्में बदले हुए ज़माने की बदली हुई सोच को दर्शाती हैं। “हाईवे की वीरा एक उच्चवर्गीय और रसूखदार परिवार की लड़की है। बचपन से ही वह अपने पिता के बड़े भाई से शारीरिक शोषण का शिकार होती आई है। जब वह इसके बारे में अपनी माँ को बताती है, तो उसकी माँ उसे चुप रहने और इस बाबत किसी से न कहने की सलाह देती है। यही वह तथाकथित सभ्य वर्ग है, जहाँ बात-बात पर लड़कियों को तहजीब और सलीके की दुहाई दी जाती और दीवारों के पीछे स्त्री को सजी संवरी वस्तु की तरह इस्तेमाल किया जाता है। वीरा की माँ का उसे चुप रहने की सलाह देना सिर्फ वीरा को नहीं, पुरे स्त्री समूह को दोषी बनाती है।” ३ इस तरह के वाकया समाज में आये दिन सुनने को मिलते हैं। सिनेमा की भूमि समाज में घटने वाली घटनाओं से सिंचित होती है। “आजादी के ६५ सालों बाद भी हम पाते हैं कि एक समतामूलक समाज बनाने में भारत की प्रगति धीमी और निराशाजनक है। महिलाओं के प्रति भेद-भाव फूल रहा है और धर्म, जाति, अमीर, गरीब, शहरी-ग्रामीण विभाजकों में समान रूप से मौजूद है।”४ भारतीय समाज में आज भी नारी को लेकर असमंजस की स्थिति है। कुछ एक मौकों पर यह आधुनिकता की ओर बढ़ता हुआ नजर आता है तो कुछ ऐसी भी घटनाएँ हुयी हैं जिससे इसके संकीर्ण सोच का पता चलता है। ये स्थिति भारतीय सिनेमा में भी नजर आती है।
भारतीय सिनेमा में शुरू से ही दो धाराएँ चलती रही हैं- एक व्यावसायिक सिनेमा की जिसके लिए सबकुछ एक व्यापार है तो वहीँ दूसरी ओर समान्तर सिनेमा की धारा थी जो सामाजिक मुद्दों को सिनेमा के माध्यम से लोगों के सामने ला रही थीं। यह बात मानने में कोई हर्ज नहीं कि भारतीय सिनेमा का परिदृश्य बदला है लेकिन ‘बदलाव एक विरोधाभाषी चीज है इसे एक खास सन्दर्भ में समझना होगा’। ९० के दशक कि एक फिल्म जो दर्शकों को खासी पसंद आई थी ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ और २१वी शादी कि एक फिल्म ‘रब ने बना दी जोड़ी’ को अगर कसौटी पर देखें तो यह बदलाव साफ़ नजर आएगा। पहली फिल्म में लड़की की माँ बेटी के उसके आशिक के साथ भाग जाने के समर्थन में खड़ी है और दुसरे में शादीशुदा लड़की अपने अनचाहे पति से छुटकारा पाने के लिए दूसरे के साथ भाग जाना चाहती है। दोनों ही स्थिति में लड़की का भाग जाना समाज में स्वीकृत हो चुका है लेकिन दोनों की स्थितियों में बदलाव है। जो चीज समान है वो है लड़की का ‘स्व’। यह पारंपरिक अवधारणा के विपरीत है लेकिन फिर भी स्वीकार्य है और यही बदलाव है। हाल की कुछ फिल्मों पर नजर डालें तो ‘कॉकटेल’, ‘निःशब्द’ और ‘जब तक है जान’ जैसी फिल्मों जिनमे लिव इन रिलेशन, उम्र की सीमा को नकारता प्रेम सम्बन्ध और शादी से पहले सेक्स आदि बदलावों को दर्शाते हैं। उम्र की सीमा को न मानने वाली प्रेम कहानी जो एक दशक पहले निकली थी ‘लम्हें’ को उस समय दर्शकों ने नकार दिया था लेकिन आज स्वीकार्य है। पटकथाओं में आ रहे बदलाव को सामाजिक बदलाव के रूप में भी देखा जा सकता है और इन बदलावों की रौशनी में स्त्री चरित्रों के बदलाव को भी।  
भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर से ही भारतीय समाज में व्याप्त नारी जीवन की समस्याओं और विडम्बनाओं को लेकर फिल्में बनार्इ गर्इ, जिनमें ‘दुनिया ना मानें’ (1937), ‘अछूत कन्या’ (1936) ‘आदमी’-(1939), ‘देवदास’-(1935), ‘इंदिरा एम।ए।’ (1934) बाल योगिनी’ (1936) प्रमुख रूप से सम्मिलित है। इस तरह की फिल्मों में नारी जीवन से संबंधित जिन समस्याओं को उजागर किया गया उनमें ‘बाल विवाह’, ‘अनमेल विवाह’, ‘पर्दा प्रथा’, ‘अशिक्षा’ आदि थे। हिंदी सिनेमा में स्वतंत्रता प्राप्ति यानी सन्1947 के बाद  परिवर्तन आया।  फिल्मों में व्यावसायिकता बढ़ी और जो विषय सामाजिक होने चाहिए वह गौण हो गए और इससे जुड़े लोगों का ध्येय सिर्फ मुनाफा रह गया। “ऐसे लोगों नें नारी जीवन के हर पक्ष का शोषण  किया , उसे ऐसी वस्तु में बदल दिया जिसकी विशेषताओं और कमजोरियों दोनों का व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा सके। अगर कभी नारी जीवन की समस्याओं को फिल्मों का विषय बनाया भी गया, तो उसे ऐसे कृत्रिम रूप में प्रस्तुत किया गया कि उससे नारी जीवन की थोड़ी सी जटिलता का भी एहसास नहीं होता था, बल्कि इसके विपरीत सारी समस्या ऐसे समाधान के साथ समाप्त होती थी जिसका न तो तर्क से कोर्इ संबंध होता था, न वास्तविकता से।”५ अगर  नारी समस्या उभर के भी आती है तो उसमें दाम्पत्य जीवन में देह सुचिता, पतिव्रता नारी, आदर्ष नारी के गुण अधिक दिखार्इ देते हैं। जहा वह अपने ससुराल वालों के अत्याचार को पूरे धैर्य के साथ सहती है और अपने पति को परमेश्वर समझ पूजा करती है। इस समय में फिल्मों में पति-पत्नी के संबंधों को दर्शाया गया जिसमें शक की वजह से दोनों में दरारें पैदा हो जाती है और घर तोड़ने का ठिकरा उस पर मढ़ दिया जाता है परन्तु किसी स्थिति का निर्माण कर स्त्रियों को गलत ठहरा, उससें माफी मंगवा , संबंधों को एक कर दिया जाता है। इसके विपरीत ‘अनुभव’, ‘गृह क्लेश’, ‘दूरिया’, ‘ये कैसा इन्साफ’, ‘श्री मान-श्रीमति’ जैसे फिल्मों में नारी का नौकरी करना , उसका विदेशी संस्कृति को अपनाना आदि रवैयें को भी दिखाया गया है। 
 “हिंदी के व्यवसायिक सिनेमा नें अब तक नारी की जो तस्वीर पेश की है , वह वही है जिसके आदर्श धार्मिक पुस्तकों में मिलते है और जो प्रायः पूजीवादी समाज में नारी की वास्तविक स्थिति का प्रतिबिंब है। इसके अनुसार नारी जीवन की इसके अलावा और सार्थकता नहीं है कि वह अपने पति और बच्चों के लिए जिये, अपनी दैहिक पवित्रता की रक्षा करे और हर तरह से अपने पति के प्रति एकनिष्ठ रहे। कोर्इ ऐसा कदम न उठाए जिससे कि घर की इज्जत पर आंच आए। जो नारी इन जीवन मूल्यों को स्वीकार नहीं करती उन्हें हिंदी फिल्मों में ‘खलनायिका’ बनाकर पेश किया जाता है। नारी के यही दो रूप  हिंदी सिनेमा को स्वीकार्य रहें है और इसका समसामयिक नारी यथार्थ सें कोर्इ संबंध नहीं है।”६  भारतीय सिनेमा में एक दौर ऐसा भी आया जब प्रवीण बॉबी, जीनत अमान, हेलन, डिम्पल कम्पाडिया आदि अदाकाराओं ने अपनी फिल्मों में नारी की एक और ही छवि प्रस्तुत की। इससे पहले नारी को ‘देवी’ के रूप में प्रतिष्ठित किया गया था और उसके बाद क्लब जाने वाली, सिगरेट पीनेवाली आधुनिक नारी के रूप में लेकिन यहाँ भी नारी की मूल समस्याओं का अभाव ही रहा। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि इस दौरान नारियों ने समाज के हर क्षेत्र में अपनी भूमिका दर्ज करायी है। फिर चाहे वो नौकरी पेशा हो, व्यवसाय हो, जनांदोलन हो। हिंदी सिनेमा में नारी तीसरे दशक के बाद से ही निर्देशन, संगीत, लेखन आदि के क्षेत्र में दिखाई देने लगती हैं। ५० और ६० के दशक में विमल राय, गुरुदत्त, महबूब खां, राजकपूर आदि जैसी हस्तियों ने नारी के विभिन्न स्वरूपों को बखूबी चित्रित किया है। इनका मूल विषय नारी के आतंरिक भाव को चित्रित करना था। ‘मदर इंडिया’, ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’ और ‘मधुमती’ जैसी फिल्मों ने यह शाबित किया कि किस तरह स्त्री अपने स्व को जीती है? किस तरह वह खुश रहती है? उसका ह्रदय क्या कहता है? और किस तरह वह परिवार को देखते हुए कहाँ पहुंचना और रहना चाहती है।?
केतन मेहता की फिल्म ‘मिर्च मसाला’ में जहा एक ओर एक नारी समाज की नारियों में जागृति लाने का काम करती है तो वहीं मुजप्फ़र अली के ‘उमराव जा़न’  की भूमिका में रेखा एक कोठेवाली के रूप में नारी संवेदनाओं को उजागर करती है। “लगभग सौ साल के इतिहास में लगातार ऐसी-फिल्में बनती रही है, जिनमें स्त्री जीवन के यथार्थ को कलात्मक उत्कर्षता के साथ प्रस्तुत किया गया है।”७ हिंदी सिनेमा के सातवें, आठवें और नौवें दशक में स्त्री पक्ष को लेकर गजब का बदलाव आया जिसनें रूपहले पर्दे पर ही नहीं बल्कि समाज में पल रहे नारीवादी विचारधारा को भी तोड़ा कि नारी सिर्फ घर की चारदीवारी में रहकर घर का काम-काज और बच्चों को पालनें के लिए नहीं होती है। इस दौरान ‘दो बीघा जमीन’, ‘बूट पालिश’, ‘जागृति’, ‘झनक-झनक पायल बाजें’, ‘सुजाता’, ‘गाइड’, ‘उपकार’, ‘आनंद’ इसके अलावा ऋशिकेश मुखर्जी की ‘अभिमान’ और ‘मिली’ जैसें फिल्मों नें सामाजिक अंतरद्वंद का चित्रण  किया है। उसी फिल्म ने  नर्इ सोच कों उजागर किया जहा स्त्री-चरित्र को अपना  कैरियर भी प्यारा है। 
पिछले एक दशक में भारतीय सिनेमा में नारी को लेकर दृष्टिगत बदलाव आया है। नारी की संवेदनाओं और विडम्बनाओं को केंद्र में रख कर फिल्मे बन रही हैं। ऐसा नहीं है कि इससे पहले इस तरह की फ़िल्में नहीं बनती थीं लेकिन अब की फिल्मों में समस्याओं के साथ-साथ नारी सबलीकरण पर भी जोर दिया जाने लगा है। इन फिल्मों ने नारी जीवन के पारिवारिक और सामाजिक सवालों को ही नहीं उठाया गया है बल्कि राजनीतिक सवालों को भी उठाया गया है। स्त्री जीवन पर केंद्रित –‘सूरज का सातवा घोड़ा’ (1992) , ‘दामिनी’ (1993), ‘बेंडिट क्वीन’ (1994), ‘मम्मो’ (1994), ‘फायर’ (1998), ‘सरदारी बेगम’ (1998), ‘मृत्युदंड’ (1998), ‘गॉड मदर’ (1999), ‘हरी-भरी’ (1999), ‘गजगामिनी’ (1999), ‘अस्तित्व’ (2000), ‘जुबैदा’ (2000), ‘क्या कहना’ (2000), ‘लज्जा’ (2001), ‘चांदनी बार’ (2001),  आदि के नाम लिए जा सकते है।  इनके अलावा ‘नसीम’ (1995), ‘जख्म’ (1999), ‘हमारा दिल आपके पास है’ (2000), ‘फिज़ा’ (2000) आदि में भी स्त्री जीवन को महत्वपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त किया गया है।
सन्1992 में ‘रूदाली’ और ‘रोजा’ जैसी फिल्मों ने समाज में स्त्री के चरित्रों और कमजोरियों को उभारा, दोनों फिल्मों  की स्त्री पात्र लड़ती  है पर समाज और परिस्थितियों के आगें झुक जाती है। सन्1993 में ‘दामिनी’ फिल्म में नारी एक सशक्त चरित्र के रूप में उभर कर आती है जहा वह अपनें पति से अलग रहकर भी अपने सम्मान की लड़ार्इ लड़ती है। समाज में हो रहें अत्याचार के विरूद्ध खड़ी होती है, बेबाक  होकर हाथ में फावड़ा लेकर गुन्डों का सामना करती है। सन्1995 में ‘बाम्बे’ फिल्म में एक मुस्लिम स्त्री का हिंदू लड़के के साथ शादी और उससे उपजी दिक्कतों को दर्शाया गया। सन्1997 में ‘विरासत’ और ‘परदेश’ जैसी फिल्मों में, फिल्म विरासत में गाँव और शहर के मध्य आंतरिक संवेदना का चित्रण किया गया वही परदेश के स्वच्छंद वातावरण में खुद को घुटती, महसूस करती एक नायिका का चित्रण किया गया। सन्1998 और सन्1999 के ‘गॉडमदर’ , ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘ताल’, ‘हजार चौरासी की मां’, ‘दिल से’ आदि जैसी फिल्मों ने नारी के अनगिनत चरित्र पेश किए जिन्होंने सामाजिक बधनों को कहीं न कहीं तोड़ा। इसके साथ फिल्मों में उपभोक्तावादी संस्कृति का विकास हुआ जिसका कार्य सिर्फ और सिर्फ मुनाफा था। “सिनेमा का संसार भी पुरूष वर्चस्व वाला संसार है। यह वर्चस्व उनके संख्या बल के कारण नहीं बलिक सिनेमा के संसार में जारी मूल्य व्यवस्था के कारण है।”८ पुरुषवादी सत्ता हर हाल में नारी पर अपना प्रभुत्व चाहती है यही वजह है कि उसे एक कैद से मुक्त कर दुसरे कैद में डाल देना चाहती है। आज जिस तरह से फिल्मों में नारी के अंगों की नुमाइश हो रही है वो उसे एक और कैद में कैद करने की कोशिश है। लेकिन ये मूड सिर्फ व्यावसायिक फिल्मों का है इसके इतर भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी सिनेमा की स्त्रियाँ भी अब वैश्विक परिदृश्य पर नजर आ रहीं है, स्वभावत: उनके चरित्रों में भी परिवर्तन आया है। 21वीं  शताब्दी  के प्रारंभ में ही ‘क्या कहना’, ‘मि। एण्ड मिसेस अय्यर’, ‘मानसून वेडिंग’, ‘लज्जा’, ‘चांदनी बार’ जैसी फिल्मों ने भारतीय समाज की पोल खोल कर रख दी, जिसमें नारी स्वतंत्रता किसी न किसी रूप में बाधित हो रही थी। ‘क्या कहना’ फिल्म में प्रिटी जिंटा (स्त्री पात्र) नायिका एक लड़के से प्रेम करती है। उसकी परिणति गर्भधारण के रूप में होती है नायिका उस लड़के से शादी करना चाहती है पर वह उस गर्भ कों गिराने की सलाह देता है।  परन्तु वह बच्चे को जन्म देने का फैसला करती है। इसी परंपरा की फिल्म ‘पा’ भी सराहनीय है जहा नायिका अकेले बच्चे को जन्म देकर पालती है। एक समय ऐसा था जब नीना गुप्ता ने बिन ब्याही माँ बनने की घोषणा की थी तो काफी शोर हुआ था लेकिन आज जब इस तरह की चीजें फिल्मों के माध्यम से आती हैं तो सामान्य सी लगती है, यहाँ तक कि उस कदम को सही ठहराया जाता है। ये समाज में आये बदलाव को दर्शाता है।
      एक ओर सिनेमा ने जहाँ नारी चरित्रों  को सामाजिक परिवर्तन में नया रूप दिया है, तो वहीँ पर दूसरी ओर औरत को एक उत्पाद के रूप में भी पेश किया है। जहा वह सिर्फ बाज़ार के प्रोमोटर के रूप में मॉडल बन कर रह गर्इ। सिनेमा का प्रभाव अत्यंत व्यापक और अधिक तीव्र होता है जो व्यक्ति के मानसिक स्तर को झकझोरता है। आज बदलते परिप्रेक्ष्य में सिनेमा में स्त्री का चरित्र बदला है। वह एक माडल के रूप में किसी वस्तु या उत्पाद को अधनंगे कपड़ों में पेश करती दिखार्इ देती है। बड़ी-बड़ी लांजरी कम्पनी अपनी लांजरी को फिल्मों के माध्यम से पेश करते है। कम्पनी अपना प्रोडक्ट फिल्म में स्पोन्सर्ड करवाती है, वह भी नारी पात्रों से क्योंकि वह भावनात्मक स्तर पर दूसरी नारी से जुड़ी होती है। इस तरह आज जो समाज में फैशन और कपड़ों के प्रति जो मानसिक बदलाव  (ब्राण्ड वाली) आया है वह कहीं न कहीं सिनेमा से प्रभावित है। जिसने औरतों या स़्त्री को उत्पाद बना के रख दिया है। ‘फैशन’ और ‘कॉर्पोरेट’ फिल्म इसका अच्छा उदाहरण है जहा अपने मतलब के लिए लड़कियों का प्रयोग किया जाता है। उसे उस उत्पाद का मॉडल बनाया जाता है जिसकी बिक्री करनी होती है। जिसमें न नारी संवेदना है, न पीड़ा है , न ही उसकी सामाजिकता । वहा सिर्फ उत्पाद है और मुनाफ़ा। जहा स्त्री को इस प्रकार प्रयोग के लिए रखा जाता है। हेयर स्टाइल से लेकर मार्डन बनने और नया लुक की होड़ में सिनेमा में जैसे ही स्त्री का नया रूप (प्रोडक्ट) दिखता है। हाथों-हाथ बाहर भी वह चीज़ या प्रोडक्ट बिक्री हो जाती है।
  “पारंपरिक तौर पर एक राष्ट्र के तौर पर हमारा रुख औरत को देवी या पुरुष की संपत्ति के तौर पर देखने का रहा है, न कि उसके बराबर।" ९ भारतीय सिनेमा अपने शुरुआत से लेकर आज तक कई दौर से गुजरी है, कई रूढ़ियों को तोड़ा है और कई  को जन्म दिया है। नारी को ‘देवी’ की पृष्ठभूमि से निकाल कर उसे ‘शो-पीस’ बनाने में सिनेमा की बड़ी भूमिका रही है और इसका सबसे बड़ा कारण है लैंगिक असमानता।  लैंगिक असमानता आज भी किसी न किसी रूप में मौजूद है। “रोजाना ही लैंगिक स्टीरियोटाइप को मजबूत बनाने वाली छवियों की बमबारी हम पर होती रहती है : बैंकों, आईटी, कारों, रफ्तार, बुद्धिमत्ता और ज्ञान संबंधी योग्यताओं से जुड़ी कोई भी बात पुरुषों से जुड़ी होती हैं; जब सौंदर्य, गहनों, घर-परिवार और देखभाल का मामला हो तभी औरतें नजर आती हैं। बीमा कंपनियों के विज्ञापन हमें बार-बार बेटे की पढ़ाई के लिए और बेटी की शादी के लिए पैसा बचाने के लिए कहते हैं।“१० इस तरह के विज्ञापन या फ़िल्में हमें ये याद दिलाती हैं कि हम चाहे जितने भी आधुनिक परिधान पहन लें, भले ही औरतों को घर की चारदीवारी से बाहर लाकर उसे कहीं भी ले जाएँ लेकिन समानता तब तक नहीं आ सकती जब तक हम औरत और मर्द का फर्क नहीं भुला देते। फिर भी पहले की स्थिति से आज की स्थिति भिन्न है जिसका श्रेय कुछ हद तक सिनेमा को दिया जा सकता है। स्त्री को पौराणिक चरित्रों से बाहर निकाल कर उसे नए चरित्र में ढालने का कार्य सिनेमा ने किया है और इस क्षेत्र में और भी काम करने की जरुरत है।

सन्दर्भ: 
१।बुर्रा एंड राव, २५२ 
२। एस। मुथैयाह, अ पायनियर ‘तमिल फिल्म मकर’, द हिन्दू, २१ अप्रैल २०१४।
३। शिप्रा किरण, हिंदी सिनेमा का बदलता मिजाज, जनसत्ता, ३० अगस्त २०१५।
४। शर्मीला टैगोर, सिनेमा की स्त्री और समाज का यथार्थ, समयांतर, जनवरी २०१४।
५।  पारख, जवरीमल्ल, जनसंचार माध्यमों का सामाजिक चरित्र 2006 , अनामिका पब्लिशर्स।2006। पृ। 172।
६।  वही, पृष्ठ-१७१।
७। पारख, जवरीमल्ल, हिन्दी सिनेमा का समाजशास्त्र, ग्रंथ शिल्पी, दिल्ली, पृ।`-173
८। वही,
९। शर्मीला टैगोर, सिनेमा की स्त्री और समाज का यथार्थ, समयांतर, जनवरी २०१४।
१०। शर्मीला टैगोर, सिनेमा की स्त्री और समाज का यथार्थ, समयांतर, जनवरी २०१४।
                                    एकता हेला 
    सहायक प्राध्यापक 
जोगेशचंद्र चौधरी कॉलेज, 
कोलकाता, पश्चिम बंगाल।
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