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आलेखमाला:मुक्तिबोध का वैचारिक संघर्ष – सुरेश कुमार ‘निराला’

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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आलेखमाला:मुक्तिबोध का वैचारिक संघर्ष – सुरेश कुमार ‘निराला’                             

     
चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
देखा जाय तो किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण और सृजनशीलता, उन व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, भौगोलिक, जीवनासंघर्ष और उनके अध्ययन की गहराई पर निर्भर करता है। इसी कड़ी में अगर हम मुक्तिबोध के ‘सृजन और वैचारिकी का आत्मसंघर्ष’ पर बात करें तो इसका प्रमाण उनकी कविताओं में अधिक देखने को मिलता है। मुक्तिबोध की तमाम रचनाओं में वैचारिकी और आत्मसंघर्ष साफ-साफ झलकता है साथ ही इनकी रचनाओं में आत्मसंघर्ष मुख्य रूप से द्वंद के रूप में संघर्ष करता है और वे द्वंद कई परतों के बाद निर्णायक रूप में प्रगट होता है। जैसे- ‘मुझे कदम-कदम पर/ चौराहे मिलते हैं / बाँहें फैलाए !!/ एक पैर रखता हूँ/ कि सौ राहें फूट्तीं,/ व मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ ;../ अजीब- सी अकुलाहट दिल में उभरती है, / मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ ,/  जाने क्या मिल जाए !! / मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में / चमकता हीरा है ;/ हर- एक छाती में आत्मा अधीरा है,/ प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है, / मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में / महाकाव्य-पीड़ा है,./’ मुक्तिबोध अपनी कविताओं में वैचारिक शब्द का प्रयोग भी वैचारिक ढ़ंग से करते हैं। वैश्विक दौर में ओद्योगिक कारखाने, मिसाइल्स आदि के प्रयोग और परिणाम के संदर्भ में वे लिखते हैं- मनुष्य मृत्यु का दानव नहीं /औद्योगिक सभ्यता के भावों के साचों में /वैचारिक मशीनों ने ढाँचों ने /कल्पना के रौकेट मिसाइल्स के पार्श्वो ने/ अनुभूति उड़न्त अश्वों ने /प्राकृतिक प्राणों को अप्रात किया है!/ हृदय की चिड़िया को मारकर / उसमें एक छेद कर / उसमें एक बत्ती डाल /सुलगा दिया है./..’ .एक तरफ मुक्तिबोध के वैचारिक आत्मसंघर्ष दूसरे को उनकी अनुभूति कराता है तो वहीं दूसरी तरफ उनका आत्मसंघर्ष लोगो को प्रेरित करता है । वे कहते हैं कि – ‘अब न करो देर, ढ़ाई अक्षर उस पर लिखकर, नव किसलय उपजाओं। मन तुम हरित भूमि बन जाओं..।’ मुक्तिबोध की विशेषता इन बातों में है जो कि वे छोटे-से-छोटे कार्यों को महत्वपूर्ण मानने में विश्वास रखते हैं। जैसे कि छोटे-से-छोटे कहे जानेवाले लोग महत्वपूर्ण है- ‘उतने ही जितना सूरज का उगना’ आगे वे अंतरराष्ट्रीय चक्र का चलने जैसा खुद को ढ़ालने से लेकर उसपर निरंतर चलते रहने का आवाहन करते हैं, ये प्रयास जहां उनके आत्मसंघर्ष को दिखाता है वहीं पर सृजन क्षमता को मजबूत बनाता है। उनका मत हैं कि- ‘काव्य रागात्मक संदर्भों की भावात्मक अभिव्यक्ति है’ दूसरी तरफ वे कहते हैं कि- ‘काव्य, संस्कारित मन की बृहत्तर अभिव्यक्ति है। संस्कार आद्यंत चरित्र का भी होता है तथा क्षण विशेष का भी हो सकता है। ये संस्कार व्यक्ति, देश, जाति, धर्म, सभी के हुआ करते हैं। सामाजिक संस्कारों से संस्कृति बनती है और व्यक्ति-संस्कारों से कला।’ इस तरह से मुक्तिबोध न केवल समाज को महत्व देते हैं बल्कि उसमें व्यक्ति को समान रूप से शामिल करते हैं। आशावान होना एक बात है लेकिन आशा पर ही निर्भर होना दूसरी बात है और इससे भी आगे बढ़ें तो आशाओं को साकार करने में खुद को खपा देना बड़ी बात है। यही है मुक्तिबोध का वैचारिक संघर्ष। वे कहते हैं- ‘करते हैं इंतजार /जब हिमालय का शिखर मजदूर के / डाकिये के/ किसान के / बेटों के/ चर्णों को चूमेगा./.जब मेहतर का पुत्र भी/ आधुनिक वेदों को पढ़ेगा..। इस तरह से मुक्तिबोध का संघर्ष समान अधिकार, समान सुविधा, समान प्रतिष्ठा और बंधुत्व की ओर अधिक है। यही संघर्ष उनकी काविताओं में अधिक प्रबल रूप में सामने आया है। 

मुक्तिबोध के अंदर अनन्त आत्मविश्वास का प्रवाह था, वही उनके सृजन में प्रवाहित हुआ है। इसी प्रवाह का प्रतिफलन है कि मुक्तिबोध एक तरफ दुनिया भर के दु:ख दर्द को सहन करते हुए कहते हैं कि ‘आँसुओं आँखों में, लौट जाओ/ मैं तुम्हें देता हूँ आज्ञा कि गिरों मत / अटको न कंठ में / मुझे अभी देखना है दृश्य यह / मुझे अभी करना है बातचीत / लौट जाओं हिये में / फँस जाओ अन्दर की चट्टानों के तले में / रुको न आँखों में, अटको न गले में..’  तो वहीं पर मुक्तिबोध की संवेदना अनन्त उच्चाइयों को छूती है- ‘अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे/ उठाने ही होंगे । /तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब । / पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार / तब कहीं देखने मिलेंगी हमको / नीली झील की लहरीली थाहें।’, जहां एक तरफ आसुओं को आज्ञा देना कि ‘गिरो मत’ वहीं पर ‘पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार।’,  मुक्तिबोध के वैचारिक संघर्ष को दर्शाता है। किसी भी रचना या रचनाकार में कोई भी विशेष गुण का पाया जाना पाठकों या आलोचकों की देन नहीं है बल्कि वे गुण पहले रचनाकार फिर उनके द्वरा लिखित रचनाओं में हीं निहित होता है। यही कारण है कि मुक्तिबोध का वैचारिक संघर्ष उनकी रचनाओं में झलकता है जो पाठकों के जीवन संघर्ष को और अधिक सबल बनाता है। वे कहते हैं कि ‘कविता में कहने की आदत नहीं पर कह दूँ’ और यही कहने की प्रक्रिया इतना सहज, सरल और बिम्बपरक है कि अधिकतर और महत्वपूर्ण बातें वे कविता में ही कह गये हैं। उदाहरण स्वरूप हम उनकी प्रसिद्ध कविता “अंधेरे में” को देख सकते हैं और इन्हीं छोटी-छोटी कही जाने वाली बातों में मुक्तिबोध का वैचारिक संघर्ष निहित है- 

अब तक क्या किया, 
जीवन क्या जिया, 
ज्यादा लिया, और दिया बहुत-बहुत कम 
मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम !!

मेरा सिर गरम है, 
इसीलिए भरम है।
सपनों में चलता है आलोचन, 
विचारों के चित्रों की अवलि में चिंतन।
निजत्व-भाफ है बैचैन,
क्या करू, किससे कहूँ,
कहाँ जाऊँ, दिल्ली या उज्जैन?  

            मुक्तिबोध एक ऐसे साहित्यकार के रूप में सामने आते हैं जिनकी हर रचना के  ‘शीर्षक’ को पढ़ते ही सृजनात्मक और आलोचनात्मक दोनों होने का आभास होता है। मन में एक नयापन आ जाता है कि ये तो बिल्कुल नया है। एक तरफ वे परम्परा को महत्वपूर्ण मानते हैं।   वहीं पर उन परम्पराओं में छिपे खामियों को सामने लाते हैं। यही प्रतिबद्धता उनका संघर्ष है। उदाहरण के लिए उनकी रचनाओं का शीर्षक- ‘चाँद का मुह टेढ़ा है’, ‘भूरी-भूरी खाक धूल’, (कविता-संग्रह), आगे देखिये ‘काठ का सपना’, ‘सतह से उठता आदमी’ (कहानी संग्रह), ‘कामायनी: एक पुनर्विचार’, नई कविता का आत्मसंघर्ष, ‘नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’, ‘एक साहित्यिक की डायरी’ (सहित्यालोचना) ‘विपात्र’ (उपन्यास), तथा ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’। जिस प्रकार से ‘विषय का चुनाव भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिचायक होता है ठीक उसी तरह से मुक्तिबोध की रचनाओं का शीर्षक उनके व्यक्तित्व का परिचायक है। जब हम उनकी रचानाओं के अन्दर प्रवेश करते हैं और आगे बढ़ते हैं और जितने हीं अन्दर प्रवेश करते हैं उतने ही उनकी वैचारिक छवि हमारे सामने उभर कर आती है। अशोक वाजपेयी लिखते हैं कि ‘मुक्तिबोध एक कठिन समय के कठिन कवि हैं। उन्होंने अपने सच को कठिन वैचारिक और भावात्मक संघर्ष से पाया और कविता में चरितार्थ किया..प्रय: लंबी कविताएँ लिखने का जोखिम उठाया।..मुक्तिबोध की कविता में दृढ़ व्यक्तित्व है, पर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझने, दूसरों से खुल कर मिलने और उनके साथ मिलकर संघर्ष करनेवाला व्यक्तित्व..वह अपनी जिम्मेदारी और शिरकत को बेझिझक स्वीकार करता है, दूसरों पर दोषारोपण करना उसका स्वभाव नहीं है। इसीलिए मुक्तिबोध की कविता गहरे नैतिक बोध से अनुप्राणित है।’, जहां अशोक वाजपेयी जोखिम उठाने वाले कवि मानते हैं वहीं पर नैतिक बोध से अनुप्राणित कहते हैं और ये दोनो चीजें मात्र उन्हीं कवियों में पाया जा सकता है जिसने जीवन संघर्ष में बहुत गहराई तक गोता लगाया हो। मुक्तिबोध एक तरफ अपना वैचारिक संघर्ष जारी रखते हैं तो दूसरी तरफ अपने समय के सहपाठियों, लेखकों और कवियों को चेताते भी हैं। वे ‘काव्य की रचना- प्रक्रिया’ आलेख में लिखते हैं कि- ‘काव्य की आस्था यथार्थोन्मुखी न होकर आदर्शोन्मुखी होती है। युग का आदर्श राजनीति अर्थों में भले ही हो किंतु मानवीय अर्थों में आज कोई युग-आदर्श नहीं इसलिए कवि पर दायित्व पिछले सभी युगों से ज्यादा है, कारण कि श्रेष्ठ काव्य के लिए श्रेष्ठ व्यक्तित्व का होना निश्चित शर्त है।’ मुक्तिबोध की पंक्ति- ‘श्रेष्ठ काव्य के लिए श्रेष्ठ व्यक्तित्व का होना निश्चित शर्त है।’ को इस आलेख के आरम्भ में ही समझने का प्रयास किया गया है। मुक्तिबोध जब व्यक्ति या व्यक्तित्व का जिक्र करते हैं तो इसका बहुत बड़ा अर्थ है। उसमें भी कहते हैं कि ‘श्रेष्ठ काव्य के लिए श्रेष्ठ व्यक्तित्व’, इस व्यक्तित्व का अर्थ सिर्फ और सिर्फ ‘केन्द्र’ हो सकता है। जहां से प्रत्येक का संचालन हो, आरंम्भ हो, विस्तार मिले और संतुलित रहे।

मुक्तिबोध ने न केवल परम्परागत खामियों को सामने लाया बल्कि उन्होंने वर्तमान व्यवस्था और वर्तमान में चल रहे अंध-संस्कारों की ओर भी ध्यान दिलाया है । वे कहते हैं कि- ‘अभी विज्ञान आदर्श नहीं बन सका है लेकिन उसने प्राचीन आस्था, मूल्य, संस्कार सबको ध्वस्त कर पूरी मानवीय चेतना को अविश्वास और संशय से भर दिया है। यह दुरभिसंधि सबसे अधिक पश्चिमी देशों में है, क्योंकि यूरोप की आस्थाएँ, संस्कार गत डेढ़ हजार वर्ष में एक इसाई आस्था उत्पन्न कर सके थे जिसे विज्ञान ने सौ वर्षों में ध्वस्त कर दिया। ‘वेस्टलैंड’ इसी खंडित स्थिति का काव्य है।’ वहीं पर पशिमी देशों के छाया को भारतीय परिवेश में हिंदी साहित्य के भक्तिकाल और और आधुनिककाल में दिखाते हुए लिखते हैं- ‘हमने अपनी आस्था का परित्याग इसी प्रकार कर दिया है जिस प्रकार धोबी महोदय के कहने से युगपुरुष राम ने सीता का परित्याग कर दिया था। हमारी आस्था का भी वही हो रहा है जो कि राम की सीता का हुआ था। इस स्थिति पर पहुच कर गत वर्षों में हमने ‘खंडित’ व्यक्तित्व की भावना का प्रचार शुरू किया। भक्तिकाल के प्रभु, नई कविता के प्रभुओं से सर्वथा भिन्न हैं। इन वर्तमान प्रभु भक्त महोदयों का स्थिति खंडित का है अथवा आस्था या संस्कार का? यह प्रभु भक्त दोनों ही रूप में खंडित हैं।,’ मुक्तिबोध बहुत ही गहरे बोध के कवि हैं इसलिए वे अपने समसामयिक राजनीतिक बोध को परखते हुए लिखते हैं कि- ‘राजनीति लोकशासन का दावा कर सकती है किन्तु लोकमंगल का दावा उसका मात्र प्रचार है, प्रपंच है’, मुक्तिबोध की कविताएँ जितनी बहुआयामी है उतनी ही बहुआयामी उनकी विचारधारा भी है। यही कारण है कि ‘अंधेरे में’ कविता के जुलूस में मंत्री, उद्योगपति, सेना, पुलिस, अध्यापक, आलोचक, कवि-गण और शहर का कुख्यात गुंडा, डोमाजी उस्ताद सब शामिल हैं। आप इस पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि यह राजनीति के अपराधीकरण के यथार्थ रूप है। मुक्तिबोध अपनी सतत रचनाशीलता के बावजूद वे लगभग अपने समय में उपेक्षित ही रहे और इसका प्रभाव भी उनकी कविताओं में दिखाई देती है- 

‘यहाँ पड़ा हुआ हूँ।
आँखे खुली हुई हैं।
पीटे गए बालक- सा मार खाया चेहरा 
उदास, इकहरा 
स्लेटी-पट्टी पर खीची गई तस्वीर
भूत जैसी आकृति- 
क्या वह मैं हूँ? 
मैं हूँ?

मुक्तिबोध, बिंब-प्रतीक और वातावरण में खुद को भी शामिल करते हैं। ‘मुक्तिबोध रचनावली’ के पाँचवें खंड में मुक्तिबोध का आलोचनात्मक लेखन बहुत हीं गहरी संवेदनशीलता एवं वैचारिकता के साथ लोकतांत्रिक रूप में सहज ढ़ंग से सामने आया है। आज के आलोचकों और पाठकों का मत है कि ‘मुक्तिबोध निराला के बाद हिंदी के सबसे महत्वपूर्ण कवि हैं।’ यद्यपि कवि के रूप में उन्हें स्वीकृति बहुत देर से मिली। काव्य जगत में मुक्तिबोध का प्रवेश ‘तार सप्तक’ के कवि के रूप में होता है और वे अपने सृजनशीलता के बल पर आगे बढ़ते गए। कुल मिलाकर देखा जाय तो मुक्तिबोध की लोकप्रियता हिंदी समाज में लागातार बढ़ी है। हिंदी की वैचारिक दौर में उन पर लिखना आलोचकों के लिए खुद को साबित करने जैसा है। विचार, संवेदना, यथार्थ और अभिव्यक्ति के मेल से बना मुक्तिबोध का काव्य-संसार अधिक प्रासंगिक होते जा रहे हैं और यही उनके वैचारिक संघर्ष को प्रमाणित करता है-      

‘प्रकाशमान लाल रक्त नामहीन। 
कारण की राह पर 
खड़ा एक 
जंगली 
व कँटीला, व्यक्तित्वहीन, 
मीठा बेर- झाड़ हूँ मैं 
पत्थर मार-मारकर मुझे खाया गया है 
मुझे तोड़ा गया है क्रूरता से 
और मेरे बेरों को 
बच्चों ने, राह्गीरों ने, बूढ़ों ने, स्त्रियों ने
बहुत-बहुत पसंद किया!!
और इस तरह मैं उनके खून में बसा हूँ,’ ...।   
  
  
               संदर्भ-
1. ‘आलोचना’, संपादक- अपूर्वानंद, सहस्त्राब्दी अंक- 55. राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। जुलाई-सितम्बर-2015.
2. ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, गजानन माधव मुक्तिबोध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। संस्करण- 1991. 
3. ‘भूरी-भूरी खाक धूल’, गजानन माधव मुक्तिबोध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। संस्करण-1987.
4. ‘सरस्वती, संपादक- शरद सिंह, सामयिक प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली। अक्टूबर- दिसम्बर- 2016.
5. ‘सहित्य-सेतु’, संपादक- डॉ. पी. सत्ति रेड्डी, प्रकाशक- आंन्ध्र प्रदेश हिंदी अकादमी, हैदराबद, जुलाई-सितम्बर-2016.
6. ‘नया ज्ञानोदय’, संपादक- लीलाधर मंडलोई, प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ, लोदी रोड, नई दिल्ली। अंक दिसम्बर-2016. 
7. ‘मुक्तिबोध रचनावली’, संपादक- नेमिचन्द्र जै, राजकमल प्रकाश, नई दिल्ली। प्रथम संस्करण-1980. द्वितीय आवृति- आवृति-2007.

                                                                             

सुरेश कुमार निराला
अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबद- 500007
सम्पर्क 8978238147,niralaeflu@gmail.com
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