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प्रवासी दुनिया:प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियम्वदा के उपन्यासों में नारी अंतर्द्वंद – डॉ. मधुमती नामदेव

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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प्रवासी दुनिया:प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियम्वदा के उपन्यासों में नारी अंतर्द्वंद – डॉ. मधुमती नामदेव


              
चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
उषा प्रियम्वदा प्रवासी साहित्यकारों के सशक्त हस्ताक्षरों में से एक हैं, जिनके बिना प्रवासी साहित्यकारों का इतिहास पूरा नहीं हो सकता है, इनकी रचनाओं में अमेरिकी जीवन की झलक, उसके रहन-सहन के साथ-साथ भारतीय जीवन सांस्कृतिक मूल्यों की प्रतिस्थापना इनके प्रसंगों लेखन में स्पष्ट दिखाई देती है। वे आज की सशक्त कहानी लेखिका हैं। उसके संस्कारों का अभूतपूर्ण वर्णन दिखाई देता है।

उषा प्रियम्वदा आज हिन्दी उपन्यासों के प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक हैं। परिवार और समाज की विसंगतियों, विडम्बनाओं इन्होंने जिन्होंने जितनी सूक्ष्मता से चित्रित किया है उतनी ही व्यापकता से व्यक्ति के बाह्य और आंतरिक संसार के बीच संबंध को भी उकेरा है। उषा प्रियम्वदा ने अपने उपन्यास शेष यात्रा, रुकोगी नहीं राधिका, पचपन खम्भे लाल दीवारें, अन्तर्वशी और नया उपन्यास नदी में आधुनिक जीवन की ऊब, छटपटाहट, संत्रास और अकेलेपन की स्थिति को पहचाना और व्यक्त किया है इसके अंकन में अद्भुत गहरे यथार्थबोध का परिचय दिया है। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में एक ओर आधुनिकता का प्रबल स्वर मिलता है, तो दूसरी ओर उसमें विचित्र तथा संवेदनाओं के साथ हर वर्ग का पाठक तादात्म्य का अनुभव करता है। उनके कथा साहित्य में छठे और सातवें दशक के शहरी परिवारों का संवेदनापूर्ण चित्रण मिलता है।

अमेरिका में रहने वाली भारतीय महिलाओं की मनःस्थिति का अत्यंत सजीव चित्रण करती हैं इनके उपन्यास शेष यात्रा जिसकी नायिका ‘अनु’ नारी-मन की समस्त कोमलताओं के बावजूद उसके जीते जागते स्वाभिमान और कठोर जीवन-संघर्ष का प्रतीक है, उच्च मध्यमवर्गीय प्रवासी भारतीय समाज अपने तमाम अर्न्तविरोधों, व्यामोहों और कुंठाओं के साथ मौजूद है। अनु, प्रणव, दिव्या और दीपांकर जैसे पात्रों का लेखिका ने जिस गहन अंतरंगता से चित्रण किया है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। 

डॉ. प्रणव कुमार की परिणीता बनकर अमेरिका में जा बसी अनु स्वयं को डॉ. प्रणव कुमार के घर-परिवार, रहन-सहन के अनुसार ढाल लेती है, लेकिन शीघ्र ही उसे लगने लगा कि वह वहाँ अकेली है, डॉ. प्रणव कुमार एक महात्वाकांक्षी और अस्थिर पुरुष है। टूट बिखरकर भी वह जोड़ने की कोशिश करती है, आत्महत्या नहीं करती है, यथार्थ है उसकी अभिमान, निजता और स्वावलम्बन जिसे वह कहानी के अंत तक बनाये रखती है जब डॉ. प्रणव कुमार मरीज बनकर उसी अस्पताल में भर्ती होता है, जहाँ अनु सर्विस करके अपना स्वाभिमान पूर्वक जीवन जीती है।

डॉ. इन्द्रनाथ मदान के शब्दों में - ”उषा प्रियम्वदा की कहानी कला से रूढ़ियों, मृत परम्पराओं, जड़ मान्यताओं पर मीठी-मीठी चाटों की ध्वनि निकलती है, घिरे हुये जीवन की उबासी एवं उदासी उभरती है, आत्मीयता और करुणा के स्वर फूटते हैं। सूक्ष्म व्यंग्य कहानीकार के बौद्धिक विकास और कलात्मक संयम का परिचय देता है, जो तटस्थ दृष्टि और गहन चिन्तन का परिणाम है।“ 

महिला जीवन की अनेक विडंबनाओं, आशाओं, निराशाओं, विषमताओं और कटुता का सूक्ष्म अंकन हुआ है। बदलते समाज में संबंधों में आयी हर छोटी से छोटी बात पर उषा जी ने पैनी दृष्टि रखी। अपने समय के प्रवासी स्त्री समस्याओं की जिस ईमानदारी से इन्होंने अपने उपन्यासों में उबारा है, वैसा अत्यंत दुर्लभ है। नारी मन के भाव-चित्रों, अनुभूतियों और कल्पनाओं एवं यथार्थ का जो वर्ण मानवीय संबंधी के माध्यम से व्यक्त किया है अच्छा दुर्लभ है। मानवीय संबंधों में व्याप्त तमाम, विघटन और जटिलता का यथार्थ चित्रण है। 

शेष यात्रा उपन्यास का प्रारंभ ही नारी के कष्ट, अकेलेपन और निःसहाय अवस्था के यथार्थ से होता है। नायिका अनु का स्वगत कथन कि- ”यही यथार्थ है, यथार्थ प्रणय मुझे छोड़कर चला गया है। अब प्रणय के बिना सारी जिंदगी काटनी होगी, सारी जिंदगी।“   नायिका अनु का पति प्रणय के छोड़कर चले जाने पर वह अकेले ही जीवन व्यतीत करने के लिए विवश है उसी विवशता पर रात के अंधेरे पर अकेले घर पर रहने से उसके मन में जो अंतर्द्वन्द चल रहा है उसे लेखिका ने यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है ”वह उस लम्बे चौड़े पलंग पर अपनी जगह पर सिमटी सिकुड़ी पड़ी रहती है। दोनों हाथों से चहरे को ढँके हुये, घुटनों को समेटकर, पेट से चिपकाये हुये एक आतंकित गठरी जैसी-- रात का हर पल शरीर से रिसते हुए एक एक कतरा खून की तरह लगता है। सांसारिक जीवन यातनाओं से परिपूर्ण है कष्टप्रद है तभी तो वह मन ही मन विचार करती है कि ”अगर वह दर्पण न होकर एक रहस्यमय दरवाजा होता जिसमें बैठकर वह एकदम दुनिया से ओझल हो जाती तो कैसा अच्छा होता, उसके पीछे एक सुखद नींद वाला अंधेरा होता जिसमें वह आकंठ डूब जाती और इन सब यातनाओं का अंत हो जाता।“  

रुकोगी नहीं राधिका उपन्यास भारतीयों की मानसिकता में गहरे उभरकर बड़ी संवेदनशीलता से परत दर परत उनके असमंजस की पकड़ने का सार्थक प्रयास है ऐसे लोग जो जानते हैं, कि कुछ साल विदेश में रहने पर भारत में लौटना संभव नहीं होगा पर यह भी जानते हैं, कि सुख न वहाँ था और न यहाँ है। स्वेद में अनिश्चितता और सारहीनता का एक साख वापसी पर परिवार के बीच होने पर अनुभव जैसे मुहँ में कड़वा सा स्वाद छोड़ देते है विदेश में रहते हुये भारतीय संस्कार को याद करते हुये जीवन व्यतीत करना और देश में आकर उन्हीं संस्कारों से गुजरते हुये ‘‘देश परिवार, मेरा परिवार, मेरे जीवन की अर्थहीनता और मैं स्वयं जो होती जा रही हूँ, एक भावनाहीन पुतली सी।’’ यह सिर्फ अकेली स्त्री के अनुभवों की नहीं आधुनिक समाज में बदलते रिश्तों के मध्य तालमेल न बैठा पाने वाले अनेक व्यक्तियों और संबंधों की बारीकी से पड़ताल करना है एक असामान्य पिता की सामान्य संतानों के साथ असहज  संबंधों की कथा है। ऐसे लोग जिनके पारिवारिक सीमांतों पर बाहरी पात्रों की सहज दस्तक इन रिश्तों को ऐसे आयाम देती है, जो ठेठ आधुनिक समाज की देन है। नायिका राधिका द्वारा अपने साथी मनीष से यह संवाद नारी अन्तर्द्वन्द्व और संत्रास, पीड़ा का उत्कृष्ट नमूना है- मनीष का कथन- क्यों राधिका, बनाया नहीं, तुम्हें क्या परेशान किया करता है?’’   

‘‘सब कुछ’’ राधिका कहकर चुप रही, इस डर से कि भावावेग में वह रो न पड़े। ‘‘सब कुछ’’ उसने अपने को संभव किया फिर कहा- ”मेरा परिवार, मेरा परिवेश, मेरे जीवन की अर्थहीनता और मैं स्वयं जो होती जा रही हूँ, एक भावनाहीन पुतली सी...।“  

पचपन खम्भे और लाल दीवारें उपन्यास का संबंध यथार्थ जीवन से है, यथार्थ अपने निमित्त स्वरों व वहाँ के साथ उपन्यास में व्यक्त है। उपन्यास के मूल में छोटी सी कहानी है, तथापि इसमें एक गहन अनुभूति पीड़ा व संवेदना निहित है उपन्यास की नायिका सुषमा पढ़ी लिखी युवा स्त्री है, जो नौकरी कर रही है, उसकी परिवारिक विसंगतियों और मजबूरियों में उसके निजी जीवन की आहुति होती है। इसमें नारी आंतरिक संत्रास अन्तर्द्वन्द्व और घुटन की अभिव्यक्ति हैं इस उपन्यास में नारी की टूटन और बिखराव का चित्रठा है, जो बदलते परिवेश में नए बन रहे संबंधों का परिणाम है। उषा ने विविध भावों को मार्मिकता और सहजता के साथ प्रस्तुत किया है कही भी कृत्रिमता का आभास नहीं है नायिका सुषमा के माध्यम से एक ऐसे कुंठित मन को चित्रित किया है, जो जीवन के इस कटु यथार्थ को जीने के लिये अभिशप्त है हमारे समाज में लड़की का पढ़ लिखकर नौकरी पेशा होने का अर्थ है मात्र वह धनोपार्जन का साधन रह जाती है परिवार की सम्पूर्ण जिम्मेदारी उस पर डालकर माता पिता निश्चिन्त हो जाते है यहाँ तक कि उस बेटी की समय पर शादी करना है इसे भी विस्मृत कर दिया जाता है नायिका सुषमा की माता का यह कथन देखिये - ‘‘सुषमा की शादी तो अब हमारे बस की बात नहीं रही। इतना पढ़ लिख गई है, अच्छी नौकरी है और अब तो क्या कहती है, भी बनने वाली है काला और चपरासी अलग से मिलेगा, बताओं, इसके जोड़ का लड़का मिलना तो मुश्किल ही है। लड़की समाजी है, जिससे मन मिले उसी से कर ले हम खुशी खुशी शादी कर देंगे।’’   

सम्पूर्ण उपन्यास में भारतीय और विदेशी परिवेश में टकराहट दिखाई देती है- भारतीय परिवेश को ध्यान में रखते हुये सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठा को ध्यान रखते हुये नायिका सुषमा को वार्डशिप मिलने पर उसके कमरे के बाहर पीतल की तख्ती का लटकना और दूसरों के द्वारा उसका सम्मान करना दिखाई देता है, तो दूसरी ओर उसके अन्तर्द्वन्द्व में भारतीय नारी का संत्रास दिखाई देता है और उसी के विद्रोह में नायक नील के साथ सैर-सपाटे करना, पिक्चर देखना आदि अनेकानेक गतिविधियाँ है, जो नायिका सुषमा को सामाजिक जीवन के प्रति विद्रोह, को स्पष्ट करता है उसमें हमें पढ़ी लिखी नारी की समाज के प्रति आक्रोश विद्रोह, ही नहीं उसकी घुटन और आंतरिक संत्रास भी दिखाई देता है। नील को विदाई देते समय उसका यह कथन कि -‘‘मैं केवल साधन हूँ, मेरी भावना का कोई स्थान नहीं। विवाह करके परिवार का निराधार छोड़ना मेरे लिये संभव नहीं।’’ भारतीय मूल्यों की प्रतिष्ठा का सूचक है। इसमें नौकरी पेशा नारी की समस्याओं, उसके तीव्र भावात्मक संघर्ष, उसके टूटते-जुड़ते व्यक्तित्व आदि का सशक्त चित्रण प्राप्त होता है। परिवार में पूरी तरह समर्पित नायिका सुषमा साधन बनकर माँ बाप और भाई-बहिन की इच्छाओं की पूर्ति में संलग्न है। छात्रावास के पचपन खंभे और लाल दीवारें उन परिस्थितियों का प्रतीक है जिनमें रहकर सुषमा को ऊब तथा घुटन का तीखा अहसास होता है, लेकिन फिर भी यह उससे मुक्त नहीं हो पाती शायद उन परिस्थितियों के बीच में जीना ही उसकी नियति है। उसके हॉस्टल के खम्भे समाज की मर्यादाओं और परिवार के प्रति कर्तव्य के प्रतीक है, जहाँ सुषमा बेजान सी खड़ी है। नील खम्बे गिनना चाहता है, ताकि वह सुषमा को मुक्त कर सके इसमें महानगरीय जीवन की होटल-रेस्तरा, बार, कैफे, क्लब, नाइट क्लब आदि का जीवन भी उभरकर आया है। 

आधुनिक प्रभाव ने मनुष्य के यौन संबंधी दृष्टिकोण में भी व्यापक परिवर्तन ला दिया है। यौन नैतिकता अब सेक्स की स्वाभाविक मांग में परिवर्तित हो गई है, क्योंकि आधुनिक युग की आत्मनिर्भर नारी प्रेम की किसी आदर्श या पवित्रता के बंधन में बंधकर नहीं देखती। उषा प्रियम्वदा के प्रायः सभी उपन्यासों में नगरीय पात्र सामाजिक मर्यादाओं से विद्रोह करते हुये जिन्दगी को अपनी सम्पूर्णता में, स्वच्छ रूप में जीने को लालायित नजर आते हैं। इन्हीं कारणों से दाम्पत्य संबंधों में विच्छेद और मूल्यों का ह्रास हुआ है। 

समाज की खोखली मान्यताओं को बनाये रखने के लिये नैतिकता का आवरण ओढ़कर सुषमा नील को छोड़कर कृत्रिम जीवन जीने को विवश हो जाती है। आधुनिकता से परिपूर्ण इस समाज में आज भी जीवन की इस विवशता की हम यत्र-तत्र देख सकते हैं। पारिवारिक दायित्वों के बोझ उठाते-उठाते तमाम सुख-सुविधाओं के बाबजूद जीवन में एक रिक्तता व खालीपन रहता है और रिक्तता में अपने लिये समय नहीं निकाल पाना अपने स्वयं के जीवन को जीने के लिये प्राप्त प्यार को अपने ही हाथों समाप्त कर नायक नील को विदाई देते समय स्पष्ट कहती है कि ‘‘मैं केवल साधन हूँ, मेरी भावना का कोई स्थान नहीं। विवाह करके परिवार को निराधार छोड़ना मेरे लिये संभव नहीं।अंतर्वशी उपन्यास विदेश में बसे युवकों से मध्यम वर्गीय परिवारों की कन्याओं का विवाह, उनका संघर्ष और मोह भंग का अटूट चित्रण है। इसकी नायिका बनारस की वनश्री या बांसुरी जो अमेरिका पहुँचकर वाना हो जाती है एक ऐसे समाज के बीच जहाँ सभी लोग दूसरों की उपलब्धियों और लाचारियों के बीच किसी तरह अपना पारिवारिक जीवन व्यतीत करते हैं। नारी की विवशता, असहायता और संघर्ष इस पूरी उपन्यास में दिखाई देता है। 

उषा प्रियम्वदा का नवीन उपन्यास नदी जीवन के दो छोरों को लेकर लिखा गया है सुख और दुख मनुष्य जीवन के दो हिस्से हैं। हमारा यह जीवन नदी के सदृश्य नियमित रूप से चलता रहता है और अनेकानेक उतार-चढ़ाव आते हुए जीवन की परिणति हो जाती है। नियति अबूझ जीवन और प्रारब्ध न जाने क्या क्या नाम देकर हम अपने मनुष्य जीवन को व्यतीत करते हैं। इस उपन्यास की नायिका आकाश गंगा अपने पुत्र की मृत्यु के पश्चात् पति से अलग होकर विछिन्न जीवन जीती है। पति दोनों बेटियों को लेकर भारत आ जाता है। यहीं से आकाश गंगा का संघर्ष प्रारंभ होता है। भारत लौटकर सास-ससुर और बेटियों की आत्मीयता से घिरने लगती है। लेकिन फिर भी जीवन प्रवाह में अनेक कठिनाईयों से गुजरती हुई अपना रास्ता चुन लेती है। और यही स्त्री जीवन के कटु कठोर यथार्थ का चित्रण है। उषा प्रियम्वदा ने अपने उपन्यास साहित्य में नारी संघर्ष उसका अंतर्द्वन्द स्त्री के अधिकारों और उसकी सामाजिक चेतना को बाखूबी उभारने का प्रयत्न किया है। समाज में नये पुराने मूल्यों की टकराहट तथा स्त्री के द्वारा लिये गये निर्णयों से आने वाली जीवन की कटु सच्चाई को भी लेखिका ने बहुत ही सहज ढंग से उभारा है। डॉ. फिरोज जाफर अली ने कहा भी है कि- ”नारी, नारी दृष्टि से ही रचनात्मकता का सृजन करना चाहती है। सृजनात्मकता की रूपरेखा बनाने में वह समाज में निश्चित भागीदारी चाहती है। देह से परे, बुद्धि और मन की निर्भरता से निजता व सम्मान का हक मांगती है स्त्री को शोषण से, दमन से, पुरुषवादी सोच से मुक्ति चाहिये, मुक्ति ऐसी जो गरिमामय उड़ान के लिये नया आकाश प्रदान करे।“

शेषयात्रा उपन्यास की नायिका अनु, रुकोगी नहीं राधिका की नायिका राधिका, पचपन खम्भे लाल दीवारे की नायिका सुषमा, अंतर्वशी की नायिका वाना और नदी की नायिका आकाशगंगा सभी अपने स्व की पहचान बनाये रखने में मानसिक अन्तर्द्वन्द से गुजरती हैं। इन नायिकाओं के जीवन में बढ़ती उदासी, अकेलापन, ऊब आदि का अंकन करके लेखिका ने आधुनिक युग की प्रत्येक नारी के अन्तर्द्वन्द को सामने खड़ा किया है। उन्होंने आज के नारी जीवन की विसंगतियों को सोचा समझा और इन विसंगतियों से उत्पन्न दुष्चिंताओं, शंकाओं आदि का मार्मिक चित्रण किया है जो अन्यत्र दुर्लभ है। 

संदर्भ ग्रंथ सूची –

1   शेषयात्रा, उषा प्रियम्वदा, राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, सन् 1984, पृष्ठ 7।
2  शेषयात्रा, उषा प्रियम्वदा, राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, सन् 1984, पृष्ठ 7। पृष्ठ 7।
3  रुकोगी नहीं राधिका, उषा प्रियम्वदा, राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, सन् 1988, पृष्ठ 85।

4  रुकोगी नहीं राधिका, उषा प्रियम्वदा, राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, सन् 1988, पृष्ठ 85।

5  पचपन खम्भे लाल दीवारे, उषा प्रियम्वदा, राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, सन् 1987, पृष्ठ 9।

6 स्त्री अस्मिता का प्रश्न और चुनौतियाँ, डॉ. फिरोज जाफर अली, सन् 2011।
7 कथा साहित्य, हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, सन् 2014।
8 नेट।

 डॉ. मधुमती नामदेव
(प्राध्यापक) 
संपर्क सूत्र -1156/3, फेस - 1, समीक्षा टाउन
जी.आर.पी. लाईन के सामने, नॉर्थ सिविल लाईन

जबलपुर – 482001,मोबाईल - 9425344945
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