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दलित विमर्श :-‘तलाश’ में अभिव्यक्त दलित समाज/ओमप्रकाश मीना

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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दलित विमर्श :-‘तलाश’ में अभिव्यक्त दलित समाज/ओमप्रकाश मीना

चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
दलित समाज सदियों से वर्णव्यवस्था के शोषण का शिकार रहा है। इस व्यवस्था के तहत उसे मानवीय जीवन जीने से वंचित रखा गया। हिन्दू समाज में धर्म एवं शास्त्रों की आड़ में दलित समाज पर जुल्म और अत्याचार किये जाते रहे और उनकी आवाज को खामोश कर दिया गया। उन्हें विद्या अर्जित करने के अधिकार से वंचित रखा गया क्योंकि उन्हें भय था कि विद्या अर्जित करने से उनकी शोषणकारी नीति का भेद न खुल जाए। अविद्या एवं अज्ञानता के चलते दलितों का शोषण होता रहा है। इस संदर्भ में ‘गुलामगिरी’ में महात्मा ज्योतिबा फुले लिखते हैं-

                            “विद्या बिन मति गई  
                           मति बिन नीति गई
                           नीति बिन गति गई
                           गति बिन धन गया
                          धन बिन शूद्र पतित हुए,
                          इतना घोर अनर्थ मात्र अविद्या
                            के कारण हुआ।”1 

अविद्या एवं अज्ञानता के कारण शोषणकारी व्यवस्था के तंत्र को दलित समझ नहीं पाये। जिन धर्मशास्त्रों की आड़ में शोषण को जायज ठहराया गया, उन धर्मशास्त्रों की असलियत से अविद्या एवं अज्ञानता के चलते अनभिज्ञ रहें। हालांकि संत साहित्य में निर्गुण संतों ने इस वर्णव्यवस्था पर प्रहार किया और निर्गुण संतों की यह परम्परा आगे तक जारी रही। वर्ण-जाति व्यवस्था के विरोध की एक लम्बी सशक्त परम्परा रही। आधुनिक काल में भेदभाव आधारित जाति-वर्ण व्यवस्था से मुक्त, शोषण से मुक्त समानता आधारित आदर्श समाज की नींव रखने में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का अहम् योगदान रहा है। डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने उच्च शिक्षा प्राप्त करके दलित समाज के उत्थान एवं विकास के लिए संघर्ष किया और उनके अधिकारों के लिए संवैधानिक लड़ाई लड़ी। उन्होंने दलित समाज को शिक्षित, संगठित होकर, संघर्ष के लिए प्रेरित किया। साथ ही उन्होंने हिन्दू धर्मशास्त्रों के शोषण का भंडाफोड़ करके दलित समाज में संघर्ष एवं चेतना के बीज बोये। आजादी के बाद संविधान में दलित,स्त्री एवं अल्पसंख्यक समुदाय को संवैधानिक अधिकार दिलवाए। दलित साहित्य बाबा साहेब के संघर्ष और विचारों से वैचारिक ऊर्जा ग्रहण करता है। दलित साहित्य अम्बेडकरवादी दृष्टीकोण के तहत समाज को नयी दिशा प्रदान कर रहा है।

दलित साहित्य एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में उभरकर सामने आया। हिन्दी क्षेत्र में दलित साहित्य ने नब्बे के दशक के बाद विभिन्न साहित्यिक विधाओं के माध्यम से दलित आंदोलन की मुहिम को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।दलित साहित्य ने वर्णव्यवस्था के खिलाफ़ दलित समाज के आक्रोश एवं प्रतिरोध के स्वर को मुखर किया।दलित साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम के ‘तलाश’ कहानी संग्रह की कहानियों में अभिव्यक्त दलित समाज का मूल्यांकन अपेक्षित है।उनका पहला कहानी संग्रह ‘तलाश’ है। इस कहानी संग्रह में कुल बारह कहानियां हैं-‘तलाश’, ‘सांग’,‘नो बार’, ‘मोहरे’, ‘बिट्टन मर गई’, ‘मूवमेंट’, ‘लाठी’, ‘जरुरत’, ‘लहर’, ‘कामरेड का घर’, ‘गंवार’, ‘शीतलहर’। इस कहानी संग्रह की कहानियां दलित जीवन की व्यथा, घनीभूत पीड़ा, छटपटाहट, संघर्ष, आक्रोश एवं प्रतिकार के स्वर को अभिव्यंजित करती हैं। 

इक्कीसवीं सदी के दौर में भी सवर्ण समाज में दलितों के प्रति घृणा एवं भेदभाव की दुर्गंध भरी हुई है। इस संदर्भ में जयप्रकाश कर्दम की ‘तलाश’ कहानी मि.गुप्ता के माध्यम से सवर्ण समाज में व्याप्त दलित समाज के प्रति घृणा एवं जातिगत भेदभाव को अभिव्यक्त करती है। कहानी में दलित पात्र रामवीर सिंह मि.गुप्ता के मकान में किरायेदार है। रामवीर सिंह एक दलित स्त्री रामबती को अपने यहाँ खाना बनवाने के लिए काम पर रखता है, पर मिसेज गुप्ता एवं मि.गुप्ता एतराज करते हैं। मि.गुप्ता रामवीर से कहता है-“इंसान तो सब हैं साहब! पर इंसान-इंसान में भेद होता है। सब इंसान बराबर नहीं होते। हजारों साल से समाज में यह भेद बना हुआ है। समाज के बीच समाज के अनुसार चलना पड़ता है साहब! समाज जिन बातों को मानता है हमको भी वे बाते माननी पड़ती है। यदि मोहल्ले में यह बात पता चल गई कि हमारे घर के अन्दर चुहड़ी खाना बनाती है तो मुसीबत हो जाएगी साहब!”2 कहानी आधुनिक भारत में दलितों के प्रति मनुवादी मानसिकता को दर्शाती है। इससे पता चलता है कि जाति की जड़ें समाज में कितनी गहरी है कि पुरातनवादी सवर्ण समाज अपनी सोच बदलने को तैयार ही नहीं है। आज दलितों को संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, बावजूद दलितों के प्रति सवर्ण समाज की मानसिक सोच बदली नहीं है। संविधान में दलितों को बराबरी का दर्ज़ा मिला हुआ है, लेकिन अभी भी सामाजिक रूप से बराबरी का दर्ज़ा नहीं मिला है।

इसी क्रम में ‘जरुरत’ कहानी इक्कीसवीं सदी में शिक्षित सवर्ण छात्रा संगीता की दलितों के प्रति अस्पृश्यता एवं जातिगत भेदभाव की मानसिकता को उजागर करती है। कहानी में दलित पात्र जिसे फिलोसफ़र साहब कहकर बुलाते हैं, जो संगीता की संकीर्ण मानसिकता पर सवाल खड़ा करता है- “मेरे लिए यह बड़े विस्मय की घटना थी। मेरा विस्मय स्वाभाविक था। क्योंकि विज्ञान छात्रा होने तथा यूनिवर्सिटी के खुले वातावरण में जीने के बावजूद अन्य लोगों की तरह संगीता का दिमाग भी न केवल जातिवाद के जहर से मुक्त नहीं था बल्कि काफी हद तक वह ऊँच-नीच और छुआछूत को मानती थी। रोज सुबह को वह मंदिर जाती थी। इस समय और किसी के भी सामने पड़ जाने पर उसे कोई अंतर नहीं पड़ता था किन्तु यदि कभी मैं सामने पड़ जाता तो जैसे अशुभ हो जाता। उसके माथे पर कई बल पड़ जाते और उपेक्षा से अजीब-सा मुंह बनाती हुई वह इस तरह बचकर निकलती कि मेरी छाया भी उस पर न पड़ जाये। ...एक दिन उसने पानी से भरी बाल्टी केवल इसलिए नाली में बिखर दी थी कि उसमें मेरे हाथ से पानी की एक छींट पड़ गयी थी।”3 कहानी इक्कीसवीं सदी में शिक्षित सवर्ण वर्ग की संकीर्ण मानसिकता को उजागर करती है। इक्कीसवीं सदी में आधुनिक एवं प्रगतिशील समझने वाले शिक्षित सवर्ण समाज की सोच अभी तक जातिगत मानसिकता से ग्रसित है। जाति का प्रभाव इतना गहरा है कि व्यक्ति की पहचान उसकी योग्यता व गुण-कर्म से न होकर जाति से होती है। कहानी सवर्ण समाज की प्रगतिशीलता एवं आधुनिकता पर सवाल खड़ा करती है। उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत सवर्ण छात्रों में जातिगत मानसिकता इस कदर व्याप्त है कि वे इस जाति-वर्ण की संकीर्ण सोच से मुक्त नहीं हो पाते हैं। यदि ऐसे मनुवादी लोगों को प्रशासनिक व्यवस्था सँभालने को मिल जाये तो क्या दलित समाज इससे न्याय की उम्मीद कर सकता है? आज भी दलितों के साथ जुल्म और अत्याचार बढ़ रहे हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर से दलितों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाये जा रहे हैं। बाबा साहेब ने हिन्दू समाज से बदलाव की कोई उम्मीद नरखते हुए दलितों से संगठित होकर संघर्ष के लिए आह्वान किया था। यह संगठन की भावना शिक्षा से संभव है।

बहुसंख्यक मात्रा में होने के बावजूद भी दलित सवर्णों के जुल्म और अत्याचार का शिकार हो रहे हैं, इसका सबसे बड़ा कारण है-दलितों में संगठित चेतना का अभाव। ‘सांग’, ‘जहर’ एवं ‘लाठी’ कहानी में दलितों में संगठित चेतना के अभाव के चलते हो रहे शोषण एवं अत्याचारों को दर्शाया गया है। ‘सांग’ कहानी में मुखिया दलित भुल्लन एवं उसकी पत्नी चम्पा को बेरहमी से मारता है, लेकिन भीड़ से कोई भी बचाने को आगे नहीं आता है। इसी तरह ‘लाठी’ कहानी में संगठित चेतना की कमी की वजह से दलित बहुसंख्यक मात्रा में होने के बावजूद भी मुठ्ठी भर सवर्णों के जुल्म और अत्याचार को सहन करते हैं। कहानी में बदनी जाट दलित हरिसिंह की कमर पर लाठी से प्रहार करने से फग्गन के अंदर बदनी के खिलाफ प्रतिशोध की भावना जाग उठती है। सम्मन उसे समझाता है कि हम अकेले गाँव जाटों का मुकाबला नहीं कर पायेंगे। फग्गन प्रतिवाद करता है कि गाँव में जाटों की संख्या पचास है और हमारे यहाँ पांच सौ लोग है। लेकिन फग्गन भूल जाता है कि संगठित चेतना के अभाव में दलित की पांच सौ लाठी एक साथ नहीं उठ सकती। कहानी में दलितों में संगठित एकता की कमी का अहसास सम्मन फग्गन को करवाता है- “हाँ, पांच सौ लाठी हैं, पर कभी पाँच सौ लाठी निकली है किसी बाहर के खिलाफ़। आपस में एक-दूसरे का सिर फोड़ने के लिए ही हैं यह लाठी। बाहरवालों के सामने पांच लाठी नहीं मिलेगी उठती हुई।”4 सम्मन के इस कथन से स्पष्ट होता है कि दलितों में संगठित संघर्ष की चेतना की कमी का फायदा सवर्ण लोग उठाते हैं। इस तरह जुल्म सहते रहने से जुल्म को बढ़ावा मिल रहा है। इसी संदर्भ में ‘जहर’ कहानी में विशम्बर के तांगे में पंडित के अलावा दो चमार, एक कुम्हार, एक मुसलमान और दो अहीर भी थे। लेकिन विशम्बर के अलावा कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता है। किसी के द्वारा कुछ भी प्रतिक्रिया व्यक्त न होने से पंडित को शह मिलती है, जिससे उसका जातीय अहं और ज्यादा बढ़ जाता है और दलितों के खिलाफ जहर उगलना जारी रखता है। यहाँ तक वह दलितों को पाँव की जूती समझकर पाँव में ही रखने की चेतावनी देता है, बावजूद तांगे में बैठे दो दलित व्यक्ति चुपचाप सहन कर जाते हैं। इस तरह सहने से जुल्म एवं अत्याचार बढ़ेगे ही, न कि कम होंगे। दलित समाज में हीनताबोध टूटेगा, तभी उसमें आत्मसम्मान और स्वाभिमान की भावना जाग्रत होगी और तब वह जुल्म और अत्याचार के खिलाफ उठ खड़ा होयेगा। अम्बेडकरवादी चेतना के फलस्वरूप ही दलितों का हीनताबोध टूटेगा।

सवर्णों ने दलितों को कभी एकजुट होने नहीं दिया। उन्हें उपजातियों में बांटकर आपस में लड़ाते रहें और उनकी मेहनत पर ऐशो-आराम करते रहे। दलितों में ही उपजातिगत भेदभाव व्याप्त हो गये हैं, जिसके चलते उनमें सामूहिकता एवं आत्मीयता की भावना पैदा नहीं हो पायी। सवर्णों की इस साजिश से दलित समाज अनभिज्ञ रहा है। डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने दलित समाज को शोषण एवं भेदभाव के खिलाफ संगठित होकर संघर्ष करने का आह्वान किया। उनका ‘महाड़ तालाब आंदोलन’ तथा ‘कालाराम मंदिर प्रवेश’ जैसी सीधी कार्यवाही दलितों को संगठित संघर्ष के लिए प्रेरित करती हैं। आपस में लड़ने के बजाय शोषण के खिलाफ़ संगठित लड़ाई लड़नी होगी। यदि दलित समाज संगठित होकर शोषण एवं भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़े, तो क्या मजाल है कि मुठ्ठी भर ब्राह्मणवादी सवर्ण उन पर आँख उठाकर देखे ले।

हालांकि दलितों में शोषण एवं भेदभाव के खिलाफ आक्रोश एवं प्रतिरोध की भावना प्रस्फुटित हो रही है। जयप्रकाश कर्दम दलितों में जाग्रत आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान की भावना को कहानियों में अभिव्यक्त करते हैं। ‘लाठी’ कहानी बदनी जाट के जुल्म के खिलाफ फग्गन और उसके परिवार में आक्रोश एवं विद्रोह की भावनाको दर्शाती है। इस संदर्भ में कहानीकार लिखते हैं- “सब अपनी-अपनी चारपाइयों पर बेचैनी से करवट बदल रहे थे। हरिसिंह की कमर पर लगी लाठी के दर्द को हर कोई अपने अन्दर महसूस कर रहा था। फग्गन सबसे ज्यादा बेचैन था। ...बदनी, मैं देखूँगा तुझै। वह आक्रोश से बुदबुदाया। आक्रोश के कारण उसका चेहरा खिंच रहा था, मुठ्ठियाँ कस रही थी और उसकी आँखे सामने दीवार के साथ खड़ी लाठी पर अटकी थी।”5 कहानी में हिंसा के खिलाफ आक्रोश एवं प्रतिरोध के स्वर को अभिव्यक्त किया गया है। इसी तरह ‘जहर’ कहानी शाब्दिक हिंसा का प्रतिकार करती है। कहानी में दलित पात्र विशम्बर दलितों के खिलाफ जहर उगल रहे पंडित को बीच रास्ते में उतारकर आक्रोश व्यक्त करता है- “दो रूपये का नुकसान मुझै होयेगा ना? मैं सौ रुपये का नुकसान भी बर्दाश्त भी कर लूँगा, पर तेरे जैसी अपमानजनक बातें मैं बर्दाश्त नहीं करूँगा। चल उतर जल्दी से। बातों में लगाकर टैम ख़राब मत कर मेरा। नहीं तै यू संटर देख रा है मेरे हाथ में, इससै सूड दूंगा तुझै।”6 कहानी में विशम्बर दलित समाज का प्रतिनिधित्व करता है। वह दलितों में सोये हुए स्वाभिमान एवं आत्मसम्मान की भावना को जाग्रत करता है। ‘लाठी’ एवं ‘जहर’ कहानी में क्रमशः फग्गन एवं विशम्बर दलित समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो अब जाग्रत हो रहे हैं और किसी भी प्रकार की शारीरिक एवं शाब्दिक हिंसा को बर्दाश्त नहीं करेंगे। ये कहानियां जुल्म और अत्याचार के खिलाफ आक्रोश एवं प्रतिरोध की भावना पैदा करती है। जुल्म को सहने से सवर्णों को शह मिलती है, इसलिए जुल्म का प्रतिकार करना ही होगा।

दलित समाज अम्बेडकरवादी विचारों से प्रेरणा लेकर जाग्रत हो रहा है, जुल्म और अत्याचार का प्रतिकार भी कर रहा है लेकिन कभी–कभार दलितों में घृणा और हिंसा के खिलाफ प्रतिशोध की भावना आ जाती है। जब अस्तित्त्व और अस्मिता खतरे में हो, तो अपने अस्तित्त्व और अस्मिता की रक्षा के लिए हथियार उठाना पड़ सकता है। जैसा कि ‘सांग’ कहानी में दलित स्त्री चम्पा अपनी जान की रक्षा के लिए मुखिया पर गंडासा से प्रहार करती है क्योंकि इससे पहले प्रतिकार न करने की वजह से ही उसके पति भुल्लन को मुखिया ने पीट-पीट कर मार दिया था। कहानी में चम्पा के मन में जुल्म के प्रति प्रतिकार की भावना थी, न कि प्रतिशोध की भावना। अगर चम्पा के मन में प्रतिशोध की भावना होती तो वह मुखिया को मारने का अवसर ढूंढ़ती, लेकिन उसने ऐसा करना उचित नहीं समझा। जबकि ‘लाठी’ कहानी में बदनी जाट के प्रति फग्गन के मन में प्रतिशोध की भावना पैदा हो जाती है। वह बदनी जाट से बदला लेने का निर्णय लेता है, तो सम्मन उसे ऐसा करने से रोकता है- “मैं मानता हूँ तेरे नियाँ हरिसिंह अपने बेटे से भी बढ़कै है,अर उसकी चोट का तुझकू बहोत दुःख हो रा है। पर गुस्से या जल्दबाजी मैं उठाया गया कदम अच्छा नतीजा नहीं देवैगा। अपने गुस्से कू संभाल कै ठण्डे दिमाग सै काम लै। हमै कोई दूसरा उपाय सोचना पडैगा।”7 कहानी में सम्मन का कथन बुद्ध के दर्शन एवं अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण को प्रतिष्ठापित करता है, जो हिंसा और घृणा के स्थान पर अहिंसा, करुणा और प्रेम पर आधारित है। डॉ.अम्बेडकर ने दलित समाज को अहिंसा, करुणा एवं समता का मार्ग बताया। उन्होंने शोषण एवं भेदभाव के खिलाफ़ किये गये आंदोलनों में किसी भी प्रकार की हिंसा का मार्ग नहीं अपनाया। उनकी लड़ाई हिंसा और घृणा के खिलाफ थी। यदि शोषण के खिलाफ़ हिंसा के मार्ग को अपना लिया जाये,तो फिर दलित आंदोलन अपने मूल लक्ष्य से भटक जाएगा। डॉ.अम्बेडकर शोषणकारी व्यवस्था को ख़त्म करने की बात करते हैं,न कि शोषक को ख़त्म करने की।

शिक्षा से दलित समाज में आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान की भावना जाग्रत हुई है, साथ ही वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुए हैं। अधिकांशत:आर्थिक संसधानों पर सवर्ण वर्ग का ही कब्ज़ा रहा है, जिसके चलते दलित समाज की इन पर आर्थिक निर्भरता बनी हुई थी। डॉ.अम्बेडकर एवं फुले ने दलितों में शिक्षा की अलख जगाई। डॉ.अम्बेडकर ने संविधान में दलितों को अधिकार दिलवाए तथा सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण का प्रावधान किया। फलस्वरूप शिक्षित दलित समाज का सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्त्व बढ़ा। शिक्षा से दलित समाज के चहुमुंखी विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके साथ ही सवर्णों पर आर्थिक निर्भरता भी ख़त्म हुई और सवर्ण वर्ग के वर्चस्व एवं श्रेष्ठता को चुनौती मिलने लगी। डॉ.अम्बेडकर ने शिक्षा को शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ़ लड़ाई लड़ने का मारक एवं शक्तिशाली शस्त्र माना है। उनका मानना था कि ‘शिक्षा ही दलित समाज के उत्थान और विकास का आधार है’, इसलिए उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षित किये जाने पर जोर दिया। 

शिक्षित दलित वर्ग को प्रतिबद्ध होना होगा कि वह दलित समाज को शिक्षित करें और उनमें चेतना एवं संघर्ष की भावना पैदा करें। इस संदर्भ में डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने शिक्षित युवाओं को आह्वान किया हैं-“दलित युवाओं को मेरा यह पैगाम है कि एक तो वे शिक्षा और बुद्धि में किसी से कम न रहें, दूसरे ऐशो-आराम में न पड़कर समाज का नेतृत्व करें। तीसरे, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी संभाले तथा समाज को जाग्रत और संगठित कर उसकी सच्ची सेवा करें।”8 बाबा साहब ने शिक्षित युवा वर्ग को सामाजिक प्रतिबद्धता के प्रति आह्वान किया। ‘तलाश’ कहानी संग्रह की कहानियां शिक्षित दलित वर्ग को दलित समाज के उत्थान एवं विकास की जिम्मेदारी से अवगत कराती है। इस संदर्भ में ‘मोहरे’ कहानी शिक्षित दलित समुदाय को दलित समाज की उन्नति एवं विकास के लिए दलित समाज के बच्चों को शिक्षित करने के कर्तव्यबोध से अवगत कराती है। कहानी में दलित कार्यकर्ता ब्रह्मसिंह दलित अध्यापकों से कहता है- “आप लोग इन बच्चों को पढ़ाकर केवल अपनी नौकरी पूरी नहीं करते बल्कि आप समाज के लिए भी काम करते हैं। इसलिए आप लोगों को चाहिए कि आप लोग पूरी ईमानदारी और मेहनत से पढ़ायें ताकि समाज को शिक्षित करने में योगदान दे सकें। ...बाबा साहब अम्बेडकर के लम्बे संघर्ष और त्याग का फल है कि आप लोग पढ़-लिखकर सरकारी नौकरी में है। यदि आप लोग चाहते हैं कि हमारा समाज तरक्की करें, हमारे समाज के बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़े तो आप लोगों को नौकरी की भावना से ऊपर उठकर इन बच्चों को पढ़ाने के लिए अतिरिक्त दायित्व अपने ऊपर लेना होगा।”9 कहानी दलित समाज की उन्नति एवं विकास के लिए शिक्षित दलित वर्ग को प्रतिबद्ध करती है। नौकरीपेशा दलित समुदाय को अपने समाज को शिक्षित करने का अतिरिक्त दायित्व उठाना होगा। उनकी शिक्षा की सार्थकता इसी में है कि वे अपने परिवार के साथ–साथ अपने समाज के उत्थान और विकास की ओर भी प्रयासरत हो।

दलित समाज के उज्जवल भविष्य के लिए शिक्षित दलित समुदाय को दलित बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाना होगा,विशेषकर सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों के प्रति, क्योंकि सरकारी विद्यालयों में अधिकांशत: दलित एवं पिछड़े वर्ग के बच्चे ही पढ़ने आते हैं। सरकारी विद्यालय के प्रति नौकरीपेशा दलित समुदाय को इसलिए ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है कि यहाँ पर दलित समुदाय के बच्चे जातिगत भेदभाव के शिकार हो रहे हैं। सवर्ण अध्यापक जातिगत भेदभाव के चलते बच्चों को ठीक से पढ़ाते नहीं है और उनको मानसिक-शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि दलित बच्चे पढ़-लिखकर उन्नति करें। यदि कोई शिक्षक ईमानदारी एवं कर्तव्यनिष्ठा से पढ़ाना चाहता है,तो उन्हें ये हतोत्साहित करते हैं या फिर उसके खिलाफ़ कोई साजिश रचते हैं। कुछ दलित शिक्षक भी ऐशो-आराम के चलते अपनी जिम्मेदारी को भूल जाते हैं। इन वजहों से सरकारी विद्यालयों का शैक्षिक स्तर गिरता जा रहा है, जिसका नुकसान दलित छात्रों को उठाना पड़ रहा है। इस संदर्भ में ‘मोहरे’ कहानी सरकारी विद्यालयों में गिरते शैक्षिक स्तर और सवर्ण अध्यापकों की दलित छात्रों के प्रति संकीर्ण मानसिकता का पर्दाफाश करती है। कहानी में दलित कार्यकर्ता ब्रह्मसिंह सवर्ण अध्यापकों की मानसिकता को उजागर करता है- “गैर-दलित अध्यापक दलित बच्चों को पढ़ाने के प्रति गंभीर नहीं है। वे नहीं चाहते कि दलित बच्चे पढ़-लिखकर कामयाब हो। इसलिए वे हमारे बच्चों को पढ़ाने में रूचि नहीं लेते हैं। हमारा शिक्षित होना उसके लिए चुनौती बन सकता है,वे इस बात को अच्छी तरह समझ सकते हैं। इसलिए पढ़ाने की बजाय वे उल्टे उन्हें हतोत्साहित करते है।”10 ब्रह्मसिंह के इस कथन के माध्यम से कहानी सरकारी विद्यालयों में हो रहे भेदभाव का पर्दाफाश करती है। 

सवर्ण अध्यापक दलित छात्रों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करतेहैं।प्रायोगिक परीक्षा में कम अंक देकर दलित छात्रों को हतोत्साहित करने का प्रयास करते है,ताकि उनका पढाई के प्रति रुझान खत्म हो जाये। इस तरह सरकारी विद्यालयों में दलित छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होता है। शिक्षा विभाग से उन पर कोई आंच नहीं आए इसलिए ये बच्चों को महत्वपूर्ण प्रश्न बता देते हैं, जिनसे छात्र केवल उत्तीर्ण होने लायक अंक प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन इसके चलते छात्रों की योग्यता एवं क्षमता का विकास नहीं हो पाता है। ‘मोहरे’ कहानी में सरकारी अध्यापक इसी रवैये को अपनाते है। कहानी में दलित अध्यापक सत्यप्रकाश छात्रों को महत्वपूर्ण प्रश्न न बताकर ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा के साथ पढ़ाता है, ताकि बच्चों की योग्यता एवं क्षमता का विकास हो। जबकि सवर्ण अध्यापक इसके विपरीत थे। इसलिए सवर्ण अध्यापक सत्यप्रकाश को अपने अनुरूप ढा़लने का प्रयास करते हैं, लेकिन दलित कार्यकर्त्ता ब्रह्मसिंह के विचारों से प्रेरित होकर वह और भी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी से पढ़ाता है। सत्यप्रकाश के खिलाफ सवर्ण अध्यापक दलित छात्र मनोज को मोहरा बनाकर साजिश रचते हैं। वे दलित छात्र मनोज के पिता के माध्यम से झूठी शिकायत डिप्टी डायरेक्टर के पास पहुंचाते हैं और सत्यप्रकाश का तबादला करवा देते हैं। कहानी सवर्ण वर्ग की संकुचित मानसिकता का पर्दाफाश करती है। अफ़सोस की बात है कि दलित छात्र मनोज के पिता ने सत्यप्रकाश से पूछना मुनासिब नहीं समझा और सवर्ण अध्यापक रामदेव त्रिपाठी के बहकावे में आ जाता है। कहानी में दलित कार्यकर्ता ब्रह्मसिंह एवं सत्यप्रकाश जैसे लोग अपने समाज को शिक्षित करने के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं। हालांकि सवर्णों की जातिगत मानसिकता के चलते उन्हें काफी दिक्कतें उठानी पड़ती है। इस तरह कहानी ब्रह्मसिंह एवं सत्यप्रकाश के माध्यम से नौकरीपेशा दलित समुदाय को कर्तव्यबोध के प्रति जाग्रत करती है साथ ही सवर्णों की साजिशों के प्रति सचेत करती है। 

सरकारी विद्यालयों में शैक्षिक गुणवत्ता सुधारने के लिए प्रशासनिक स्तर पर ठोस कार्यवाही की आवश्यकता है। अफ़सोस की बात है कि प्रशासनिक पदों पर भी भ्रष्ट अफसर बैठे हैं। इनसे सुधार की उम्मीद भी करना बेमानी ही होगी। आज दलित समुदाय के कुछ-एक लोग ऊँचे सरकारी पदों पर विराजमान हैं, जरुरी नहीं है कि वे शिक्षा विभाग में ही हो। लेकिन उनका दायित्व बनता है कि वे सरकारी विद्यालय की शैक्षिक गुणवत्ता सुधारने एवं जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए अतिरिक्त जिम्मेदारी उठाये। ‘मोहरे’ कहानी सरकारी विद्यालयों के अध्यापकों द्वारा कर्त्तव्यबोध की अवहेलना को दर्शाती है। इस संदर्भ में कहानी में सत्यप्रकाश से साथी अध्यापक कहते हैं- “कितनी भी मेहनत कर लो, वेतन उतना ही मिलेगा। ...स्कूल में आकर छ: घंटे पूरे करो और महीने के आखिर में वेतन पा लो। सरकारी नौकरी का यही तरीका है।”11 कहानी सरकारी विद्यालयों के यथार्थ का पर्दाफ़ाश करती है, जहाँ अध्यापक महज़ औपचारिकता पूरी करने आते हैं। इनकी इस सोच को बदलने की जरुरत है। शिक्षित दलित समुदाय का दायित्व है कि वह इसके खिलाफ़ प्रशासनिक स्तर पर ठोस कार्यवाही के लिए प्रयास करें, ताकि आने वाली पीढ़ी का भविष्य बर्बाद ना हो। शिक्षित समुदाय संगठित होकर सरकारी विद्यालयों के शैक्षिक गुणवत्ता को सुधारने का बीड़ा उठाये तो बदलाव लाया जा सकता है। ग्रामीण एवं अनपढ़ दलित समुदाय व्यवस्था से अनभिज्ञ रहता है। ऐसे में सरकारी विद्यालय में सुधार कैसे संभव हो पायेगा? इसलिए डॉ.अम्बेडकर ने शिक्षित युवा दलितों को ऐशो-आराम की जिन्दगी से ऊपर उठकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी से अवगत कराया और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी को निभाने के लिए प्रेरित किया। 

जयप्रकाश कर्दम की कहानी दलित समुदाय को शोषण एवं भेदभाव के प्रतिकार के लिए प्रतिबद्ध करती है। ‘तलाश’ कहानी में मि.गुप्ता जातिगत भेदभाव के चलते रामवीर सिंह से दलित स्त्री रामबती से खाना बनवाने के लिए मना करता है, लेकिन रामवीर सिंह व्यवस्था के साथ समझौता नहीं करता है। वह प्रतिकार करता है- “इसलिए केवल इस आधार पर उससे खाना नहीं बनवाने का कोई औचित्य नहीं है कि वह जाति से चुहडी है। ऐसा करना तो जातिवाद को बढ़ावा देना है। गुप्ता की बात मानकर रामबती से खाना बनवाना बंद कर देना तो छुआछूत और जातिवाद के सामने हथियार डाल देना होगा जो समाज का सबसे बड़ा दुश्मन है और जिसका विरोध मैं आज तक करता हूँ।”12 इस तरह रामवीर सिंह मि.गुप्ता की जातिवादी मानसिकता का प्रतिकार करता है और मकान खाली कर देता है। रामवीर सिंह को यह मकान मुश्किल से मिला था, वह चाहता तो रामबती की जगह किसी अन्य को खाना बनवाने के लिए रख सकता था, लेकिन ऐसा करना उसने मुनासिब नहीं समझा। वह जातिगत भेदभाव एवं शोषण के खिलाफ प्रतिबद्ध है, इसलिए दलितों के प्रति शोषण एवं अन्याय का प्रतिकार करता है। इसी तरह ‘शीतलहर’ कहानी चन्दप्रकाश के माध्यम से समाज के प्रति कर्तव्यबोध को जाग्रत करती है। कहानी में चन्दप्रकाश सरकारी अधिकारी है, वह स्वयं सरकारी फ्लैट में रहता है और उसका अपना निजी फ्लैट खाली रहता है। जिसमें वह शीतलहर से पीड़ित भिखारियों को रखने का निर्णय लेता है। उसकी सोच एवं निर्णय सामाजिक प्रतिबद्धता को स्पष्ट करती है।

चिन्ता का विषय यह है कि शादी या नौकरी लग जाने के बाद शिक्षित दलित समुदाय समाज के प्रति अपने कर्तव्यबोध को भूल जाता है। वे भूल जाते हैं कि उसकी उन्नति के पीछे दलित समाज का योगदान रहा है। ‘गंवार’ कहानी दलित समाज के प्रति उदासीन नौकरीपेशा दलित वर्ग को कठगरे में खड़ा करती है। कहानी में प्रभात नौकरी लगने के बाद भी दलित आंदोलनों, कार्यक्रमों एवं साहित्य में सक्रिय भूमिका निभाता है, जबकि बाकी साथी अपनी जिम्मेदारी को भूल जाते हैं। इस संदर्भ में रचना प्रभात से कहती है-“अच्छा है तुम कहीं न कहीं सक्रिय तो हो। ...तुम्हारी सक्रियता देखकर अच्छा लगता है। पुराने साथियों में से एक तुम ही दिखाई देते हो जो आंदोलनों से जुड़े हो। बाकी के लोग तो ...कोई शादी करके बीबी के पल्लू से चिपकर रह गया, कोई पैसा कमाने और जमीन-जायदाद इकठ्ठी करने में लग गया, किसी को दारु ने बेकार कर दिया है।”13 कहानी दलित समाज के प्रति अपने दायित्व से परे नौकरीपेशा दलित वर्ग को सामाजिक जिम्मेदारी से अवगत कराती है। 

विडंबना की बात तो यह है कि कुछ दलित जाति छिपाने के लिए अपना सरनेम बदल लेते हैं। वे सरनेम का टाइटल ऐसा रखते है, जो ऊँची जाति होने का बोध कराता हो। ‘बिट्टन मर गई’ व ‘जरुरत’ कहानी शिक्षित दलित वर्ग की जाति के प्रति हीनताबोध को दर्शाती है। ‘बिट्टन मर गई’ कहानी में बिट्टन की शादी ऐसे व्यक्ति से होती है, जो जाति से दलित है, लेकिन नाम के आगे ‘निगम’ टाइटल कायस्थ होने का बोध कराता है। इस संदर्भ में कहानीकार कहानी में लिखते हैं-“बहुत सारे दलित लोग सिंह, वर्मा, चौहान, कश्यप, भार्गव आदि टाइटल लगाते हैं। विशेष रूप से स्वाधीनता के बाद देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के बाद जब से जाति-पांति का विरोध समाज के एक वर्ग द्वारा शुरू हुआ तब से दलितों ने अपनी जातीय हीनता के बोध से मुक्त होने के लिए ऐसे टाइटल अपने नाम के साथ लगाने शुरू कर दिए जो दलित जाति का बोध कराने की बजाय उच्च जातीय होने का बोध कराते है।”14 कहानी पढ़े-लिखे एवं नौकरीपेशा दलित वर्ग की अपनी जाति के प्रति हीन भावना को दर्शाती है, जो अपनी जाति छिपाने के लिए नाम के आगे टाइटल बदलकर रखते है और साथ ही किसी सवर्ण लड़की से शादी करने में अपना स्टेटस समझते हैं। कहानी ऐसे लोगों को आत्मबोध के लिए विवश करती है कि ऐसा करने से जाति बदलने वाली नहीं है और दूसरी बात जिस सामाजिक हैसियत को पाने के लिए वे अपनी जाति छिपाते हैं, वह भेदभाव पर आधारित है। कहानी में बिट्टन का पति उसे उसके मनुवादी माता-पिता से मुक्त कराने के लिए उनके खिलाफ़ कोई कार्यवाही भी नहीं करता, क्योंकि उसमें जाति का भेद खुलने का डर बना हुआ है। कुछ हद तक बिट्टन की मौत का जिम्मेदार उसका पति भी है, जो शिक्षित होने के बावजूद भी जाति हीनताबोध से ग्रसित है। अच्छा होता यदि वह जातिगत भेदभाव के खिलाफ़ प्रतिक्रिया व्यक्त करता। 
इसी क्रममें ‘जरुरत’ कहानी शिक्षित दलित पात्र रामरतन की जातीय हीनताबोध को दर्शाती है- “उसके अन्दर अपने जाति को लेकर एक कांप्लेक्स था, जिसके चलते वह अपनी जाति छिपाता था और अपने नाम के साथ भी दलित समाज में प्रचलित या प्रतीकात्मक सरनेम न लगाकर सवर्ण होने का आभास देने वाला सरनेम ‘चंदेल’ लगाता था। एक तो सवर्ण होने का आभास देने वाला सरनेम,दूसरे राकेश के साथ आर.एस.एस. की शाखा में भी वह जाता था। इस कारण से भी लोग उसको सवर्ण समझते थे और उसी के अनुरूप उसके साथ व्यवहार भी करते थे।”15 कहानी शिक्षित दलित वर्ग को आत्मविश्लेषण के लिए विवश करती है। जातिगत भेदभाव के भय से कुछ शिक्षित दलित अपनी जाति को छिपाने के लिए बाध्य होते हैं। वे दलित विरोधी बातों के खिलाफ़ कोई प्रतिक्रिया भी व्यक्त नहीं करते हैं, क्योंकि जाति-भेद खुलने की आशंका उनके मन में बनी हुई है। इसलिए ‘जरुरत’ कहानी में रामरतन आरक्षण, जातिवाद और धर्म संबंधी बहसों में चुप रहता है। यानी जाति के प्रति हीनताबोध उनके स्वाभिमान और आत्मसम्मान को दबाये हुए हैं। कहानी में नायक ऐसे लोगों को आत्मविश्लेषण के लिए विवश करता है। रामरतन के विपरीत कहानी का नायक स्वाभिमानी व्यक्ति है, जिसको अपनी जाति को लेकर कोई हीनताबोध नहीं है साथ ही वह दलित समाज द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाता है।

जयप्रकाश कर्दम की ‘गंवार’ कहानी सुविधाभोगी, धनलोलुप एवं विलासी शिक्षित दलित वर्ग की मानसिकता सवाल खड़ा करती है। कहानी में प्रभात आभा की धनलोलुप और सुविधाभोगी मानसिकता पर सवाल खड़ा करता है। आभा प्रभात के शादी के प्रस्ताव को ठुकराकर ऐसे आदमी से शादी करना चाहती है, जो धनवान हो। यानी उसके लिए ऐशो-आराम एवं धन-सम्पति ज्यादा मायने रखती है, जो कि अम्बेडकरवादी आंदोलन के दृष्टिकोण में उचित नहीं है। बाबा साहब शिक्षित दलित समुदाय को ऐशो-आराम की जिन्दगी छोड़कर समाज की सच्ची सेवा करने के लिए प्रेरित करते हैं। कहानी इसी दृष्टिकोण के तहत सुविधाभोगी शिक्षित दलित समुदाय को आत्मशोध के लिए विवश करती है। इस तरह ‘तलाश’ कहानी संग्रह की कहानियां दलित समाज की विसंगतियों का पर्दाफाश करती हुई, उन्हें आत्मशोध एवं आत्मबोध के लिए विवश करती हैं। साथ ही जाति हीनताबोध से ऊपर उठकर स्वाभिमान की जिन्दगी जीने के लिए प्रेरित करती हैं। शिक्षित दलित समुदाय को सामाजिक प्रतिबद्धता के प्रति आह्वान करती हैं।

दलित समाज में महिलाएं दोहरे शोषण का शिकार हो रही है- एक पितृसत्ता और दूसरी वर्णव्यवस्था से। आजादी के बाद भी भारत में महिलाएं, विशेषकर दलित महिलाएं पितृसत्ता एवं वर्णव्यवस्था के शोषण का शिकार हो रही है। जयप्रकाश कर्दम के ‘तलाश’ कहानी संग्रह की कहानियाँ स्त्री की वेदना एवं व्यथा को बयां करती हुई स्त्री चेतना एवं प्रतिरोध के स्वर को अभिव्यक्त करती हैं। उनकी ‘सांग’, ‘बिट्टन मर गई’, ‘गंवार’ कहानी पितृसत्ता एवं वर्णव्यवस्था की शिकार स्त्री जीवन की वेदना को बयां करती है। ‘सांग’ कहानी स्त्री जीवन की घनीभूत पीड़ा को चम्पा के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। कहानी में शीला चम्पा को सांग देखने के लिए अनुरोध करती है, तो चम्पा पुरुषप्रधान समाज में स्त्री की वेदना को बयां करती है- “जबकि हम यह जानते हैं कि पूरी जिन्दगी वही पीड़ा, वही दर्द, दुःख, अभाव और रोना-झींकना है, यही हमारे जीवन का सच है। फिर इस क्षणिक सुख के लिए इतना पागलपन क्यों? क्या क्षण-भर का सुख भुलावा नहीं है? फिर हम अपने आपको भ्रम और धोखे में क्यों रखें, क्यों न सच को ही स्वीकार करें हम।”16 इस तरह कहानी चम्पा के माध्यम से स्त्री जीवन की व्यथा एवं पीड़ा को बयां करती है। पुरुषप्रधान समाज में स्त्री का जीवन घर की चारदीवारी में सिमट कर रह गया है। विशेषकर ग्रामीण दलित स्त्री का जीवन तो पितृसत्ता एवं वर्णव्यवस्था ने दयनीय बना दिया है। मनुवादी सवर्ण समाज दलित स्त्री को इंसान की श्रेणी में समझता ही नहीं है। विडम्बना की बात है कि एक तरफ़ भारतीय समाज में बहु-बेटी की इज्जत जान से भी बढ़कर होती है, दूसरी तरफ़ हिन्दू समाज में दलित स्त्री की इज्जत को तार-तार किया जाता रहा है। ‘सांग’ कहानी में मुखिया दलित स्त्री चम्पा के साथ निंदनीय बर्ताव करता है। चम्पा को ‘चुड़ैल’, ‘हरामजादी’, ‘कुतिया’ जैसे शब्दों से जलील करता है। मनुवादी हिन्दू समाज द्वारा दलितों को उनकी बहन-बेटी के साथ लैंगिक संबंध जोड़कर गाली-गलौज किया जाता है। यानी इनकी नज़र में दलित स्त्री भोग्य की वस्तु मात्र बनकर रह गयी है। ‘बिट्टन मर गई’ कहानी शोषण और अन्याय की शिकार दु:खी, लाचार स्त्री की व्यथा को बयां करती है। कहानी में एक सवर्ण लड़की बिट्टन का विवाह दलित लड़के से हो जाता है, लड़के की जाति का पता चलने पर लड़की के माता-पिता उसे पति के घर नहीं भेजते हैं। बिट्टन और उसके पति के मिलन में जाति की दीवार बीच में आ जाती है। उसके भीतरी दर्द का अंदाजा उसके इस कथन से लगाया जा सकता है- “वहाँ भेजो या कहीं भी, पर मैं यहाँ नहीं रहना चाहती।”17 आगे वह अपने माता-पिता से सवाल करती है कि– “गलती उनकी है या आप लोगों की पर सजा तो मुझे मिल रही है न? मेरी गलती क्या है।”18 लेकिन बिट्टन जाति और पितृसत्ता के बीच घुन की तरह पिसती रहती है। उसके माता-पिता के जातीय वर्चस्व के अहं के चलते बिट्टन की जिन्दगी बर्बाद हो जाती है। आखिर में वह एक नशेडी और आवारा मुन्ना के जाल में फंस कर मौत का शिकार बन जाती है। 

इसी क्रम में ‘गंवार’ कहानी पुरुष पात्र रमेश की स्त्री के प्रति भोग्यवादी मानसिकता को दर्शाती है। कहानी में रमेश एक शादीशुदा पुरुष है, लेकिन वह आभा को वासना की दृष्टि से देखता है। दोस्ती का नाटक करके वह आभा के साथ यौन-संबंध बनाना चाहता है। आभा की आर्थिक स्थिति कमजोर है, उसका दोस्त रमेश सहारा देने के नाम पर आभा का शोषण करता है। आभा का पति एक्सीडेंट में मारा जाता है और ससुराल वालों से उसे कोई सहारा नहीं मिल पाता है। यहाँ तक की बच्चों की जिम्मेदारी भी आभा के ऊपर आ जाती है। कहीं से कोई सहारा न मिलने से आभा एक दु:खी एवं अभावग्रस्त जिन्दगी जीती है और जो थोडा बहुत सहारा देता है, वह आभा से शारीरिक सुख चाहता है। कहानी शिक्षित स्त्री की व्यथा को उजागर करती है। लेकिन सवाल यह उठता है कि आभा शिक्षित और अम्बेडकरवादी विचारों से परिचित होने के बाबजूद भी अपने पति की संपति पर अपना अधिकार क्यों नहीं मांगती है? क्यों वह अभावग्रस्त जिन्दगी जीने को विवश है? कहानीकार के पास इस सवाल का जवाब नहीं मिलता है। कहानी में आभा विवाह से पहले विद्यार्थी जीवन में अम्बेडकरवादी आंदोलन में सक्रिय कार्यकर्ता के तौर पर भाग लेती है। वह अपने साथी प्रभात को गंवार बताकर उसके विवाह के प्रस्ताव को ठुकरा देती है, क्योंकि आभा किसी धनवान लड़के से शादी करना चाहती हैं। तो सवाल यह उठता है कि क्या कहानीकार आभा को पश्चाताप एवं ग्लानि का अनुभव कराने के लिए उसे असहाय एवं बेबस स्त्री के रूप में दिखाना चाहते हैं? जबकि आभा शिक्षित है और स्त्री के अधिकारों से अनभिज्ञ भी नहीं है, बावजूद ग्लानि एवं पश्चाताप का बोध कराने के लिए आभा की चेतना एवं प्रतिरोध की भावना को दबा देना कहाँ तक उचित ठहरता है? इसी तरह कहानीकार ‘बिट्टन मर गई’ कहानी में बिट्टन को जाति एवं पुरुषसत्ता के खिलाफ आक्रोश एवं प्रतिरोध करती हुई स्त्री के रूप में चित्रित क्यों नहीं करते हैं? जब कहानी में बिट्टन एक आवारा एवं नशेडी युवक मुन्ना के साथ भागने का निर्णय लेती है, तो क्यों न बिट्टन अपने पति के यहाँ चली जाती? जबकि उसका पति उसे पाने के लिए बैचेन है। यानी ‘गंवार’ और बिट्टन मर गयी’ कहानी में अंत तक आते-आते स्त्री चरित्र असहाय एवं कमजोर बन गया है| 

‘जरुरत’ कहानी में एक सवर्ण स्त्री संगीता की जातिवादी मानसिकता को दर्शाया गया है। वह काफी हद तक ऊँच-नीच छुआछूत को मानती है, लेकिन अपनी शारीरिक इच्छा की पूर्ति के लिए दलित पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाती है। जयप्रकाश कर्दम कहानी में दर्शाते हैं कि सवर्ण स्त्री भी ऊँच-नीच एवं छुआछूत को मानती है, लेकिन शारीरिक जरुरत के लिए एक दलित के साथ सैक्स करती है। यानी जिस प्रकार एक सवर्ण पुरुष जातिगत भेदभाव के चलते दलित के साथ छुआछूत का भेदभाव करता है, लेकिन यौन-सुख के लिए दलित स्त्री को वासना का शिकार बनाता है। तब उसकी जातीय पवित्रता कहाँ चली जाती है? कहानीकार सवर्ण स्त्री की इसी मानसिकता को उजागर करते हुए सवाल खड़ा करते हैं कि दलितों के साथ अस्पृश्यता का व्यवहार करने वाली संगीता सैक्स की जरुरत पूरी करते समय उसकी अस्पृश्यता की भावना कहाँ चली जाती है? कहानी में संगीता कहती है- “प्यार-व्यार के कारण मैं नहीं आई हूँ। जरुरत खींचकर लायी है मुझे यहाँ।”19 इस संदर्भ में पुस्तक की भूमिका में कथाकार कमलेश्वर लिखते हैं- “जरुरत जैसी कहानी यह सिद्ध करती है कि मनुष्य एक है और उसकी जरूरतें भी एक होती हैं, चाहे वह किसी भी जाति और वर्ग का क्यों न हो। जैसा कि हम अपनी एक पुरानी कहावत में पाते है- भूख न जाने जात-कुजात, नींद न जाने टूटी खाट। ‘सैक्स’ भी जाति और धर्म जैसी बात को मानने से इंकार कर देता है।”20 कहानी स्त्री की यौन-स्वछन्दता की ओर संकेत करती है। संगीता यौन शुचिता की अवधारणा को तोड़ती हुई पुरुषप्रधान समाज के आदर्शों एवं नैतिक मूल्यों को नकारती है। 

जयप्रकाश कर्दम ‘तलाश’ कहानी संग्रह में स्त्री व्यथा एवं वेदना को अभिव्यक्त करते हैं, जो मानवीय संवेदना को झकझोरती है।उनकी कहानियों में एक तरफ स्त्री वर्णव्यवस्था और पुरुषसत्ता द्वारा शोषित है, वही दूसरी तरफ आक्रोश,संघर्ष एवं प्रतिरोध के रूप में चित्रित हुई है। उनकी ‘सांग’, ‘मूवमेंट,’ ‘लाठी,’ ‘गंवार’ कहानी शोषण एवं भेदभाव के प्रति दलित स्त्री केआक्रोश, प्रतिरोध एवं संघर्ष के स्वर को अभिव्यंजित करती है। ‘सांग’ कहानी में दलित स्त्री चम्पा अपने अस्तित्व एवं अस्मिता की रक्षा के लिए जुल्म का प्रतिकार करती है। वह दो रूपये देकर अपने नाम की छाप लगवाकर सांग देखती है। जब उसके सांग देखने से क्रोधित होकर मुखिया चम्पा पर हाथ उठाता है, तो वह उसका प्रतिकार करती है। इस संदर्भ में कहानीकार लिखते हैं- “लेकिन इससे पहले कि मुखिया का हाथ चम्पा तक पहुँचता, ओढ़ने में से गंडासा पकड़े चंपा के हाथ बाहर निकले और अगले ही क्षण मुखिया का सिर दो फांक हो गया।”21 इस तरह चम्पा पुरुषसत्ता एवं वर्णव्यवस्था दोनों का विरोध करती हुई अपने अस्तित्व एवं अस्मिता की रक्षा करती है। इस संदर्भ में कथाकार कमलेश्वर लिखते हैं- “कहानी की केन्द्रीय पात्र चम्पा के लिए ‘सांग’ एक अनुभव है। पति के मौत का त्रासद अनुभव। गरीब, बेबस मजदूर स्त्री के साथ ‘सांग’ की पुनरावृति न हो, चम्पा इस समाज को एक सबक देती है। स्त्री की दमित चेतना की यह अवस्था है।”22 इसी तरह ‘लाठी’ कहानी जुल्म एवं अत्याचार के प्रति दलित स्त्री के आक्रोश को अभिव्यक्त करती है। कहानी में बदनी जाट हरिसिंह की पीठ पर लाठी से प्रहार करता है, तो हरिसिंह की पत्नी अतरो का बदनी जाट के प्रति आक्रोश का भाव उभरता है- “बदनी, तेरा सत्यनाश होएगा। तुझपै ऐसी हाय पड़ैगी कै कोई दीया जलाने वाला भी नई बचैगा। जैसा तैनेजुल्म करा है सत्यानाशी, तुझकू इसकी सजा जरुर मिलैगी।”23कहानी में वर्णव्यवस्था एवं पुरुषसत्ता के शोषण के खिलाफ दलित स्त्री अतरो में आक्रोश एवं प्रतिरोध की भावना पैदा होती है। सदियों से दलितों के साथ जुल्म और अत्याचार होते आ रहे हैं, लेकिन अब इसके खिलाफ़ दलित स्त्री के अन्दर आक्रोश की ज्वाला उभरकर बाहर आने लगी है। यानी अब वे शोषणकारी पुरुषसत्ता एवं वर्णव्यवस्था के खिलाफ़ खामोश बैठने वाली नहीं है बल्कि प्रतिकार एवं संघर्ष के लिए तत्पर है।
‘तलाश’ कहानी संग्रह की ‘मूवमेंट’ कहानी स्त्री चेतना एवं सहभागिता की भावना को दर्शाती है, साथ ही दलित आंदोलनों के स्त्री के प्रति दृष्टिकोण पर सवाल खड़ा करती है। कहानी में दलित स्त्री सुनीता का पति सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय कार्यकर्ता है, जिसके चलते वह अपने परिवार को समय नहीं दे पाता है। परिवार की जिम्मेदारी का सारा बोझ सुनीता पर होता है और इस जिम्मेदारी को निभाते हुए वह घर की चारदीवारी तक ही सिमट कर रह जाती है। लेकिन अब उसकी इच्छा-आकांक्षाएं जाग्रत हो गयी है। वह घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर समाज के लिए काम करना चाहती है। वह दलित आंदोलनों के सिद्धांत एवं व्यवहार पर सवाल खड़ा करती हुई दलित कार्यकर्त्ता को आत्मशोध के लिए विवश करती है। वह अपने पति से कहती है- “तुम बराबरी की बात करते हो न, बराबरी का मतलब है हर क्षेत्र में हर स्तर पर बराबरी। हर किसी को अवसर की स्वतंत्रता और समानता। मेरी सारी जिन्दगी तो परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए घर की चारदीवारी की भेंट चढ़ रही है। मेरे लिए कौनसा अवसर है इस पर नहीं सोचोगे तुम कभी। यही तो सबसे बड़ी दिक्कत है। मैं पूछती हूँ क्या यही प्रगतिशीलता है तुम्हारी कि बाहर जाकर अन्याय और असमानता के खिलाफ भाषण झाड़ो और खुद घर में असमानता का व्यवहार करो? यही मूवमेंट है तुम्हारा?”24 कहानी दलित कार्यकर्ताओं को अपना मूल्यांकन करने के लिए मजबूर करती है। उनका ‘मूवमेंट’ तभी पूरा होगा जब स्त्री की भागीदारी बढ़ेगी। बाबा साहब समाज की उन्नति के लिए नर-नारी की समान सहभागिता को अनिवार्य मानते हैं। उनका मानना था कि ‘नारी की उन्नति के बिना समाज एवं राष्ट्र की उन्नति असंभव है।’ वे दलित समाज की प्रगति का पैमाना महिलाओं की प्रगति से मानते थे। उनके सामाजिक आंदोलनों में स्त्री की सहभागिता देखी जा सकती है। महाड़ में चावदार के सार्वजनिक तालाब से अछूतों को पानी का अधिकार हासिल करने के लिए चलाये गये ‘महाड़ सत्याग्रह’ के ऐतिहासिक मार्च में पांच सौ से ज्यादा महिलाएं शामिल थीं। 1942 में नागपुर में महिलाओं के सम्मलेन को डॉ.अम्बेडकर ने संबोधित किया, जिसमें तीन हज़ार से ज्यादा महिलाओं ने भाग लिया था। इस संदर्भ में ‘गंवार’ कहानी दलित स्त्री रचना के माध्यम से सामाजिक कार्यक्रमों में स्त्री की सक्रिय भागीदारी को दर्शाती है। ‘सांग’ कहानी की ये पंक्तियाँ स्त्री-पुरुष के सहयोग की भावना को दर्शाती है-

“हो गया गात सूख कै माड़ा
पिया दे दै मनै कुल्हाड़ा
ओए, मैं भी चलूँगी तेरे साथ में।”25

सम्पूर्ण राजनीतिक तंत्र ब्राह्मणवादी विचारधारा की गिरफ्त में रहा है। ऐसे में दलित समाज अपने अधिकारों एवं न्याय के लिए कैसे उम्मीद कर सकता है? इसलिए डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने 1930 में दलितों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग की और दलित समुदाय को पृथक राजनीतिक अस्मिता प्रदान की। उन्होंने 1937 में ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ तथा 1942 में ‘शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन’ की स्थापना की। दलितों के लिए स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता के विषय में प्रथम गोलमेज सम्मेलन में डॉ.अम्बेडकर ने कहा था– “हम यह महसूस करते हैं कि जब तक दलित वर्गों के हाथों में राजनीतिक सत्ता नहीं आती, उनकी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।”26 उन्होंने दलित समाज के अधिकारों की प्राप्ति के लिए राजनीतिक सत्ता की आवश्यकता को महसूस किया और साथ ही लोकतांत्रिक शासन पर जोर दिया। इस संदर्भ में ‘तलाश’ कहानी संग्रह की ‘नो बार’ कहानी दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी एवं लोकतांत्रिक सरकार की आवश्यकता पर जोर देती है। कहानी में राजेश लड़की के पिता से प्रतिवाद करता है- “बी.जे.पी.के बारें में यह धारणा है कि उसकी सोच साम्प्रदायिक और विघटनकारी है। मुस्लिम और दलित बी.जे.पी. को लेकर सशंकित है। उनको लगता है कि बी.जे.पी. सरकार का रुख उनके प्रति सकारात्मक नहीं रहेगा। मुस्लिम तो खैर बी.जे.पी. को वोट देगे ही नहीं। जहाँ तक दलितों का सवाल है वे स्वयं पिछड़ो के साथ मिलकर सत्ता में आने के लिए जोड़-तोड़ कर रहे हैं।”27 कहानी राजनीतिक दलों में व्याप्त साम्प्रदायिक एवं विघटनकारी मानसिकता को अभिव्यक्त करती है, जिनसे दलितों एवं मुस्लिमों के हितों की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। दलित समाज इन जातिवादी एवं साम्प्रदायिक दलों की असलियत को समझ चुका है, इसलिए अपने हितों एवं अधिकारों के लिए अपनी राजनीतिक सत्ता की आवश्यकता को महसूस कर रहा है। वे अपने सामाजिक-आर्थिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए राजनीतिक सत्ता में आने की कोशिश कर रहे हैं। आज भारतीय राजनीति में ‘बहुजन समाज पार्टी’ दलितों के हितों का प्रतिनिधित्व कर रही है। वोट बैंक के चलते कांग्रेस, भाजपा या अन्य समाजवादी एवं मार्क्सवादी पार्टियाँ जाति की राजनीति कर रही हैं। हर चुनाव में उम्मीदवारों के चयन में जाति का फैक्टर काम कर रहा है। राजनीतिक सत्ता में आने के लिए ये पार्टियाँ अपने आपको दलितों के हितैषी के रूप में पेश कर रही हैं। इसके लिए चुनाव टिकट से लेकर मंत्रिमंडल के गठन तक दलित प्रतिनिधि का चुनाव करते रहे हैं। लेकिन इन पार्टियों में दलित प्रतिनिधि या नेता का अपना कोई वजूद नहीं रहता है, क्योंकि वह पार्टी के सिद्धांतों के अनुरूप ही कार्य करता है। ऐसे में इन पार्टियों के दलित नेताओं से भी दलितों के हितों की सुरक्षा की अपेक्षा करना बेमानी होगी।

दलितों को स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी के जरिये राजनीतिक सत्ता में आना होगा। लेकिन साथ ही यह भी जरुरी है कि सरकार स्थायी ही नहीं लोकतांत्रिक भी हो। सरकार के लोकतांत्रिक मूल्यों पर जोर देते हुए ‘नो बार’ कहानी में दलित पात्र राजेश कहता है- “लेकिन सरकार का स्थायी होना ही जरुरी नहीं है। समाज और राष्ट्र के प्रति उसका दृष्टिकोण भी स्वस्थ सकारात्मक और प्रगतिशील होना चाहिए।”28 इस संदर्भ में डॉ.अम्बेडकर लिखते हैं-“यह भाईचारा ही है जो लोकतंत्र का एकमात्र दूसरा नाम हो सकता है। लोकतंत्र केवल सरकार का एक रूप भर नहीं है। यह बुनियादी रूप से संगठित रूप में रहने तथा संयुक्त रूप में बातचीत के अनुभव का एक तरीका भी है। निश्चित रूप से यह अपने साथ के लोगों के प्रति सम्मान तथा प्रतिष्ठा का रवैया है।”29 स्पष्ट है कि सरकार के स्थायीकरण के साथ-साथ सरकार का लोकतांत्रिक भी होना जरुरी है। जाति एवं साम्प्रदायिक भावनाओं से ऊपर उठकर सरकार का समाज और राष्ट्र के प्रति सकारात्मक एवं प्रगतिशील दृष्टिकोण होना चाहिए। साथ ही योजनाओं को सही ढंग से क्रियान्वयन करवाने के लिए भ्रष्ट प्रशासन पर अंकुश लगाना बहुत जरुरी है। 

गरीबों के सवालों को लेकर सरकार ढेर सारी योजनायें बनाती है, लेकिन प्रशासन की अनदेखीके चलते गरीबों की योजनायें अधर में लटकी रह जाती है या भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था की भेंट चढ़ जाती है। इसी संदर्भ में ‘शीतलहर’ कहानी गरीबों के लिए सरकारी व्यवस्थाओं पर सवाल खड़ा करती है। सरकार एवं प्रशासन की अनदेखी के चलते गरीब लोग तेज सर्दी-गर्मी में फुटपाथ पर जीवन गुजारने के लिए मजबूर है। अपना परिवार चलाने के लिए काम न मिलने से बेकारी ने उन्हें भिखारी बना दिया। कहानी में चन्द्रप्रकाश सरकारी व्यवस्थाओं की पोल खोलता है-“सरकारी व्यवस्थाएं कैसी होती है तुम जानती तो हो।...बेरोजगारी सुरसा के मुंह की तरफ बढ़ती जा रही है। यदि कहीं पर काम मिलता भी है तो जान-पहचान से ही। इनको कौन जानता-पहचानता है। ये किसी भी बाज़ार में किसी भी चौराहे पर जाकर खड़े हो जाए, किसी भी फैक्टरी-कारखाने में चले जाये, इन्हें कोई काम नहीं देगा। सब दुत्कार का भगा देगे।...यदि इनको काम मिल जाये तो ये भीख बिलकुल नहीं मांगेगे और तब ये लोग इतनी भयंकर शीतलहर में बिना छत और कपड़ों के इस तरह फुटपाथ पर नहीं पड़े रहेंगे।”30 कहानी बेरोजगारी एवं बेकारी की समस्याओं को उठाती हैं, जिसके चलते लोग गरीबी और भिखारी की जिन्दगी जीने को अभिशप्त है। पेट की भूख ने उन्हें भिखारी बना दिया, जहाँ हर-रोज अपमानित होना पड़ता है। जनता के अरबों-खरबों रुपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते जा रहें हैं। भ्रष्ट राजनेता एवं भ्रष्ट प्रशासक वर्ग अमीर पर अमीर होता जा रहा है, वही दूसरी तरफ़ गरीबों एवं भिखारियों को दो जून की रोटी तक नसीब नहीं हो पा रही हैं। एक तरफ़ लोगों के पास रहने के लिए कई-कई मकान है, जिनमें रहने के लिए उनके पास समय तक नहीं है और सुरक्षाकर्मी उनकी खाली कोठियों की रखवाली करते हैं,दूसरी तरफ़ भिखारियों को रहने के लिए झोपड़ी तक नसीब नहीं हो पाती है। ‘शीतलहर’ कहानी भारत की इस विडम्बना की पोल खोलती है, साथ ही भ्रष्ट सरकारी एवं प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़ा करती है। जरुरी है गरीबों एवं दलितों के अधिकारों के समुचित प्रतिनिधित्व करने की, यह तभी संभव हो पायेगा जब इस वर्ग के लोगों का राजनीतिक एवं प्रशासनिक क्षेत्र में प्रतिनिधित्व बढ़ेगा।

गरीबों एवं दलितों के हितों के लिए इस वर्ग का राजनीति, प्रशासन एवं अन्य सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व बढ़ना जरुरी है। लेकिन ब्राह्मणवादी वर्ग के आधिपत्य के चलते इनको प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। इसलिए बाबा साहब ने दलितों एवं पिछड़े वर्ग के लिए सविंधान में आरक्षण का प्रावधान रखा। आरक्षण के माध्यम से सदियों से हाशिए पर रखे गये समाज को सत्ता एवं संसाधनों में भागीदारी मिली है। आरक्षण से दलितों एवं पिछड़े वर्गों को सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व मिल रहा है,साथ ही सूचना अधिकार ने तो ब्राह्मणवादी शोषण एवं भेदभाव को बेनकाब कर दिया है। इससे ब्राह्मणवादी समाज बौखलाए हुआ है क्योंकि वह अपने वर्चस्व को बनाए रखना चाहता है। इसलिए ब्राह्मणवादी समाज आरक्षण पर आरोप लगाता है कि इससे जातिवाद को बढ़ावा मिल रहा है और इससे समाज में ज्यादती हो रही है। इस संदर्भ में ‘नो बार’ एवं ‘जहर’ कहानी आरक्षण के बारें में सवर्णों की ब्राह्मणवादी संकीर्ण सोच को उजागर करती हैं। ‘नो बार’ कहानी में लड़की का पिता मंडल कमीशन पर आरोप लगाता है कि इसके चलते जातिवाद को बढ़ावा मिला। इस संदर्भ में वह कहता है- “सब कुछ अच्छा खासा चल रहा था। समाज प्रोगेसिव हो रहा था। जातिवाद अपनी मौत मर रहा था। लेकिन वी.पी. सिंह के बच्चे ने मसीहा बनने के चक्कर में मंडल कमीशन लागू कर जातिवाद को फिर से जिन्दा कर दिया। कोई देश की बात नहीं करता, सब अगड़े-पिछड़ों की बात करते हैं।...कांशीराम और मायावती को देखो। ये तो बिना जाति के बात ही नहीं करते। वी.पी. सिंह ने आग लगाई, ये आग में घी डालकर उसे भड़का रहे हैं”31 कहानी ब्राह्मणवादी सोच को उजागर करती है। सवर्ण समाज का मानना है आरक्षण से जातिवाद को बढ़ावा मिला, नहीं तो जातियां कब की खत्म हो गयी होती। लेकिन सवाल यह उठता है कि जाति पहले आई या आरक्षण? इसी संदर्भ में कहानी में राजेश प्रतिक्रिया व्यक्त करता है- “नहीं, ऐसा तो नहीं है कि कांशीराम और मायावती जातिवाद को भड़का रहे हैं। जातिवाद तो समाज में पहले से हो रहा है। हर चुनाव में उम्मीदवारों के चयन से लेकर मंत्रिमंडल के गठन तक सब जगह जातिवाद का फैक्टर काम कर रहा है।”32 राजेश के माध्यम से कहानी स्पष्ट करती है कि आरक्षण से जातिवाद को बढ़ावा नहीं मिल रहा है। आरक्षण का उद्देश्य सदियों से वंचित समाज को अधिकार दिलाना है और व्याप्त भेदभाव को ख़त्म करके समाज में समानता लानी है। 

दरअसल, आरक्षण सदियों से वंचित वर्ग को उनके अधिकार दिलाने एवं समाज में समान स्तर लाने की एक संवैधानिक प्रक्रिया है। यह एक सकारात्मक एवं सृजनात्मक प्रक्रिया है। आरक्षण सवर्णों एवं दलितों के आपसी मेल-मिलाप पर रोक नहीं लगाता और ना ही रोटी-बेटी के संबंध बनाने पर रोक लगाता है। फिर कैसे कहा जा सकता है कि आरक्षण जातिवाद को बढ़ावा दे रहा है? ‘नो बार’ कहानी आरक्षण के संदर्भ में सवर्णों की संकीर्ण मानसिकता पर प्रतिक्रिया व्यक्त करती है। ये लोग नहीं चाहते हैं कि दलित समाज उन्नति करें एवं उसे अपना अधिकार मिले। आरक्षण से दलित एवं पिछड़ा वर्ग ने सरकारी संस्थाओं एवं राजनीति में इनके आधिपत्य को चुनौती दी है, इससे बौखलाए ये आरक्षण के खिलाफ जहर उगल रहे हैं।‘जहर’कहानी में आरक्षण के प्रति ब्राह्मणवादी समाज के अन्दर व्याप्त जहर को दर्शाया है। कहानी में पंडित दलित समाज एवं आरक्षण के खिलाफ अपने अन्दर का जहर उगलता हुआ कहता है-“पर मेरी समझ में एक बात नहीं आती कि चमारों पर ज्यादती कैसी हो रही है। इनकी पढाई मुफ्त और वजीफ़ा ऊपर से। नौकरियों में इनके लिए आरक्षण और नौकरी की तैयारी के लिए मुफ्त ट्रेनिंग सरकार की ओर से दी जा रही है।प्रधान,प्रमुख से लेकर एम.एल.ए.,एम.पी. बनने में इनके लिए आरक्षण। इन्हें तनिक कुछ कह दे तो हरिजन एक्ट। असल बात तो यह है भईया कि इनके कारण सारे समाज पर ज्यादती हो रही है। ...कुछ ना कुछ करना पड़ेगा,नहीं तो बड़ी ज्यादती हो जाएगी यह तो। पाँव की जूती पाँव में ही रहनी चाहिए।”33 कहानी दलित समाज के प्रति ब्राह्मणवादी समाज की संकीर्ण सोच को उजागर करती है। इन्हें यह स्वीकार नहीं है कि दलित समाज को राजनीति एवं सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व मिले,इसलिए यह ब्राह्मणवादी समाज आरक्षण के खिलाफ़ जहर उगल रहा है। उदारीकरण के दौर में सरकार निजीकरण को बढ़ावा दे रही हैं, जहाँ पर दलितों के प्रतिनिधित्व का कोई प्रावधान नहीं है। सरकारी नौकरियों एवं संस्थाओं में दलित समाज को संविधान में आरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते उनको प्रतिनिधित्व मिल रहा है। निजी क्षेत्रों में सवर्णों का आधिपत्य है तथा निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू नहीं है। ब्राह्मणवादी लोग फिर से वैसी ही व्यवस्था चाहते हैं, ताकि उनका समाज में वर्चस्व बना रहे और दलितों का शोषण होता रहें। कहानी में पंडित कहता है कि ‘पाँव की जूती पाँव में ही रहे’। वे दलितों को अपने से नीचे स्तर पर ही रखना चाहते हैं, न कि बराबरी के स्तर पर। ‘जहर’ कहानी इक्कीसवीं सदी में सवर्णों की संकीर्ण सोच को उजागर करती है।

अपने आप को प्रगतिशील या मार्क्सवादी समझने वाले लोगों की भी दलितों के प्रति ब्राह्मणवादी मानसिकता है। एक तरफ़ वे सिद्धांतों में जाति को तोड़ने की बात करते हैं, वही दूसरी तरफ़ व्यवहार में जाति को बढ़ावा दे रहे हैं। मार्क्सवाद का चोला पहने ये भारतीय मार्क्सवादी हिंदुत्व के पोषक बने हुए हैं। इसी संदर्भ में ‘कामरेड का घर’ कहानी भारतीय मार्क्सवादियों की असलियत का पर्दाफाश करती है। कहानी में अभय तिवारी मार्क्सवादी है,किन्तु हिन्दुत्ववादी संस्कारों में लिप्त है। वह अपने साथी कॉमरेड असलम के घर मांसाहार करता है, लेकिन अपने घर में असलम को उसका टिफिन भी नहीं खोलने देता है, क्योंकि उसके टिफिन में अंडे की सब्जी होती है। अभय तिवारी के इस दोहरे चरित्र पर कॉमरेड असलम प्रतिक्रिया व्यक्त करता है- “किसलिए रुक जाऊं मैं, क्या हिंदुत्व को पानी देने के लिए? ...मेरे यहाँ रुकने का कोई औचित्य नहीं है। मैं तो यह मानकर चल रहा था कि आप लोग सच में प्रगतिशील हैं और परिवर्तन के अपने संकल्प के प्रति ईमानदार हैं। इसलिए मैं आप लोगों के साथ जुड़ा था। लेकिन आप लोग तो अन्दर से हिन्दू धार्मिकवाद में अन्दर से जकड़े हुए हैं और उसकी रक्षा कर रहे हैं। ऐसे में आपसे कोई उम्मीद करना बेमानी है। आपके सिद्धांत और व्यवहार के दोगलेपन ने मुझे निराश किया है। मैं इस दोगलेपन के साथ खड़ा नहीं रह सकता।”34 कहानी भारतीय मार्क्सवादियों के दोहरे चरित्र की पोल खोलती है, साथ ही उनके इस दोगलेपन का प्रतिकार करती है। मार्क्सवाद का चोला पहने हिन्दुत्ववादी लोगों से जातिवाद एवं साम्प्रदायिकता के खात्मे की उम्मीद करना बेमानी होगा। दरअसल, ये लोग हिंदुत्व के पोषक है, जो समाज में भ्रम पैदा किये हुए हैं। कहानी मार्क्सवादियों को आत्मशोध के लिए विवश करती है कि यदि भारतीय मार्क्सवादी इसी तरह दोगलेपन के साथ जीते रहें तो लोगों का मार्क्सवाद से विश्वास उठ जाएगा। जब तक मार्क्सवादी जातिवाद एवं धार्मिक उन्मांद के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ेगें, तब तक दलित और अल्पसंख्यक समाज इन्हें अपना हितैषी नहीं मान सकता। कहानी से स्पष्ट होता है कि भारतीय मार्क्सवाद पहले हिन्दुत्ववादी है, उसके बाद मार्क्सवादी है। मार्क्सवाद की आड़ में ये दलितों को उलझाए रखना चाहते हैं, ताकि वर्णव्यवस्था और जातिवाद की नींव बनी रहें।

इसी क्रम में ‘नो बार’ कहानी अपने-आप को प्रगतिशील समझने वालों सवर्णों  की असलियत का पर्दाफाश करती है। कहानी में लड़की का पिता अंग्रेजी अखबार में ‘नो बार’ का विज्ञापन छपवाता है। इससे आकर्षित प्रगतिशील विचारों का दलित युवक राजेश मिलने जाता है, जिससे लड़की का पिता अपनी प्रगतिशीलता का परिचय देता हुआ कहता है कि वह जाति-पांति नहीं मानता। लेकिन जब राजनीति पर चर्चा करते समय उसे राजेश के दलित होने का अहसास होता है तो वह अपनी लड़की से उसकी जाति के बारे में पूछता है, तो उसकी लड़की प्रतिक्रिया व्यक्त करती है-“हमारे एड में पहले ही ‘नो बार’ छपा था इसलिए उसकी कास्ट के बारे में जानने की या इस ओर ध्यान देने की कोई तुक ही नहीं थी। ...जब हम जाति-पांति को मानते ही नहीं तो फिर वह किसी भी कास्ट का हो उससे क्या फर्क पड़ता है।”35 कहानी लड़की के इस संवाद के माध्यम से प्रगतिशील समझने वालों की दोगली मानसिकता पर सवाल खड़ा करती है। उनके दोहरे चरित्र का पर्दाफाश करती है कि एक तरफ़ वे सिद्धांतों में जाति-पांति का विरोध करते हुए अंतर्जातीय विवाह कासमर्थन करते हैं, वही दूसरी तरफ़ दलितों के प्रति ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण अपनाते हैं। कहानी लड़की के माध्यम से सवर्ण वर्ग की प्रगतिशील नयी पीढ़ी की जाति के प्रति बदलती सोच को भी दर्शाती है। शिक्षा से सवर्णों की प्रगतिशील नयी पीढ़ी जाति-पांति के बंधन से मुक्त होना चाहती है। लड़की के माध्यम से सवर्ण वर्ग की नयी पीढ़ी की सकारात्मक सोच को दर्शाया गया है।

डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने जातिप्रथा को तोड़ने के लिए अंतर्जातीय विवाह को कारगर उपाय बताया हैं। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा हैं- “जातिप्रथा समाप्त करने के लिए वास्तविक उपचार अंतर्जातीय विवाह है। जातिप्रथा के निर्मूलन के रूप में कोई अन्य व्यवस्था कारगर नहीं हो पायेगी।”36 अर्थात् रोटी-बेटी के संबंध से आपसी भाईचारा बनेगा। इसके चलते जाति की पवित्रता एवं वर्चस्व टूटेगा। अंतर्जातीय विवाह से समाज में भावनात्मक स्तर पर रिश्ते मजबूत होंगे। लेकिन अफ़सोस की बात है कि अंतर्जातीय विवाह को अभी तक सामाजिक रूप से स्वीकृति नहीं मिली है। यदि कहीं अंतर्जातीय विवाह हो भी रहे हैं तो सवर्ण-दलितों के बीच नहीं, बल्कि सवर्णों के बीच ही हो पा रहे हैं। सवर्णों की नज़र में अंतर्जातीय विवाह का मतलब दलितों के साथ वैवाहिक सम्बन्धों से नहीं है। ‘नो बार’ कहानी प्रगतिशील बनने वालों लोगों की अंतर्जातीय विवाह के प्रति संकीर्ण सोच को उजागर करती है। कहानी में लड़की का पिता लड़की से कहता है- “वह सब तो ठीक है हम जाति-पांति को नहीं मानते और हमने मैट्रोमोनियल में ‘नो बार’ छपवाया था। लेकिन, फिर भी कुछ चीजे तो देखनी होती हैं। आखिर ‘नो बार’ का मतलब यह तो नहीं कि किसी चमार-चूहड़े के साथ..।”37 यानी सवर्ण वर्ग के बीच ‘नो बार’ का मतलब ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य वर्ग के बीच अंतर्जातीय विवाह संबंध से है। कहानी में लड़की का पिता अपने प्रगतिशील विचारों का परिचय देता हुआ कहता है कि उसके परिवार में अंतर्जातीय विवाह हुए हैं। वह बताता है कि स्वयं ब्राह्मण है उसकी पत्नी कायस्थ, दामाद अग्रवाल और बहु पंजाबी खत्री परिवार से हैं। यानी उसके परिवार में अंतर्जातीय विवाह दलित परिवार के साथ नहीं हुआ है। वह सिद्धांतों में जाति-पांति एवं धर्म-सम्प्रदाय के बंधन को नकारता है लेकिन व्यवहार में जाति-व्यवस्था का समर्थक है। 

जाने-अनजाने में किसी दलित के साथ अंतर्जातीय विवाह हो जाये, तो सवर्ण समाज उसे स्वीकार नहीं करता और उसका शिकार लड़का-लड़की होते हैं। ‘बिट्टन मर गई’ कहानी में बिट्टन की शादी अनजाने में एक दलित युवक के साथ हो जाती है, जिसका दंश बिट्टन और उसके पति को झेलना पड़ता है। कहानी में बिट्टन तो जाति एवं पितृसत्ता दोनों की शिकार होती है और आखिर में यही उसके मौत की वजह बनती है। कहानी स्पष्ट करती है कि हिन्दू समाज में जाति के बाहर शादी मान्य नहीं है, विशेषकर दलित समाज के साथ। इस तरह ‘नो बार’ और ‘बिट्टन मर गई’ कहानी से जाहिर होता है कि हिन्दू समाज में अंतर्जातीय विवाह के मामले में कोई महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई है। सवर्ण वर्ग और दलितों के बीच अंतर्जातीय विवाह बहुत कम हुए हैं और जो हुए हैं उन्हें सामाजिक रूप से स्वीकृति नहीं मिली है। अगर प्रेम विवाह के चलते दलित और सवर्ण के बीच विवाह हुए हैं, तो उन्हें मार दिया जाता है या उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। हरियाणा में खाप-पंचायतों में इस तरह की ऑनर-किलिंग के मामले सामने आए हैं। इसका खामियाजा अधिकांश दलित युवक एवं उसके परिवार को भुगतना पड़ रहा है। इन परिस्थितियों में अंतर्जातीय विवाह में बड़ी समस्याएँ पैदा हो रही है। अंतर्जातीय विवाह जाति को तोड़ने का कारगर उपाय तो है, लेकिन यह तभी संभव हो पायेगा जब हिन्दू समाज विशेषकर सवर्ण तबका जातीय संकीर्णता से मुक्त हो पायेगा।

दरअसल, अभी तक हिन्दू समाज जातीय संकीर्णता से ऊपर इसलिए नहीं उठ पा रहा है कि वह जाति को धर्म से जोड़कर देखता है। हिन्दू धर्म-शास्त्र वर्णव्यवस्था के पोषक हैं और हिन्दू समाज शास्त्रों को पूजता है। इसके लिए शास्त्रों के वर्चस्व एवं पवित्रता को तोड़ना होगा। हिन्दू समाज को शास्त्रों के चंगुल से मुक्त कराना होगा और शास्त्रों के प्रति उनके भ्रम को तोड़ना होगा, तभी जातिप्रथा को तोड़ने के लिए अंतर्जातीय विवाह कारगर साबित हो पायेगा। बाबा साहेब जाति व्यवस्था का असली शत्रु शास्त्रों को मानते थे। उनका मानना था कि ‘हिन्दू समाज का जब तक शास्त्रों की पवित्रता से भरोसा खत्म नहीं हो जाता, तब तक उनकी जाति के प्रति सोच में बदलाव नहीं आ सकता। उन्होंने तर्क न मानने वाले वेदों व शास्त्रों को बारूद से उड़ा देने को कहा था’। यानी हिन्दू समाज को धर्म एवं शास्त्रों की तर्कसंगत मूल्यांकन की आवश्यकता है। यदि पूर्वाग्रह से मुक्त होकर शास्त्रों का तर्कसंगत विवेचन करेंगें तो पायेंगे कि हिन्दू समाज के पतन का सबसे बड़ा कारण ये धर्मशास्त्र ही रहे हैं, जिनका लोग बिना सोचे समझे अनुकरण कर रहे हैं। ‘नो बार’ एवं ‘बिट्टन मर गई’ कहानी इसी ओर संकेत करती हैं कि धर्मशास्त्रों के चंगुल से मुक्त होने पर ही हिन्दू समाज अंतर्जातीय विवाह के प्रति स्वच्छ एवं सकारात्मक दृष्टिकोण अपनायेगा और तभी जातिप्रथा को खत्म करने के लिए अंतर्जातीय विवाह कारगर साबित हो पाएगे।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि ‘तलाश’ कहानी संग्रह की कहानियां में जयप्रकाश कर्दम जाति एवं शोषण रहित समाज की तलाश करते हुये नज़र आते हैं। एक ऐसे समाज की तलाश जिसमें घृणा, हिंसा, भेदभाव एवं शोषण की जगह प्रेम,करुणा, समता एवं सद्भाव की भावनाएं हो। इस संदर्भ में कहानी संग्रह की भूमिका में कथाकार कमलेश्वर लिखते हैं-“जयप्रकाश कर्दम को इसी बात की ‘तलाश’ है कि वह जाति, ऊँच-नीच और शोषणरहित समाज हैं कहाँ?’’38 एक खुशबू जो आजादी, अपनेपन एवं भाईचारे की भावना का अहसास कराये। इसी खुशबू की तलाश में उनकी कहानियों में छटपटाहट, आक्रोश एवं संघर्ष के स्वर अभिव्यंजित होते हैं। उनकी कहानियां डॉ.अम्बेडकर के स्वतंत्रता, समता एवं भातृत्व पर आधारित आदर्श समाज की परिकल्पना को साकार रूप देती हैं। उनकी कहानियाँ मार्क्सवाद के दोहरे चरित्र का पर्दाफाश करती हैं। दलित समाज की विसंगतियों को भी उजागर कर आत्मशोध एवं आत्मबोध के लिए विवश करती हैं,साथ ही शिक्षित दलित समुदाय को दलित समाज के उत्थान एवं विकास के लिए दायित्वबोध कराती हैं। डॉ.एन.सिंह के शब्दों में कहा जाये तो ‘जयप्रकाश कर्दम की कहानियां दलित आन्दोलन के वैचारिक दस्तावेज हैं, जो अम्बेडकर के जीवन-संघर्ष एवं दर्शन से वैचारिक ऊर्जा ग्रहण करती हैं’।

संदर्भ स्त्रोत:
1. ज्योतिराव फुले, अनुवादक- डॉ.एल.जी. मेश्राम ‘विमलकीर्ति’, ‘गुलामगिरी’ सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, चतुर्थ संस्करण-2009, बुक कवर फलैग से संदर्भित 
2. जयप्रकाश कर्दम, ‘तलाश’ (कहानी संग्रह), विक्रम प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण-2005, पृ. 26-27 
3. वही, पृ.103 
4. वही, पृ. 95 
5. वही, पृ. 96 
6. वही, पृ. 113 
7. वही, पृ. 96 
8. बाबासाहेब डॉ.अम्बेडकर :सम्पूर्ण वांग्मय, खंड-17, डॉ.अम्बेडकर प्रतिष्ठान नई दिल्ली, द्वितीय  संस्करण-2011
9. जयप्रकाश कर्दम, ‘तलाश’ (कहानी संग्रह), पृ. 52 
10. वही, पृ. 52 
11. वही, पृ. 50 
12. वही, पृ.27-28 
13. वही, पृ. 125 
14. वही, पृ. 71 
15. वही, पृ. 97-98 
16. वही, पृ. 31 
17. वही, पृ. 73  
18. वही, पृ. 71 
19. वही, पृ. 106 
20. वही, पृ. 17 
21. वही, पृ. 35 
22. वही, पृ. 16 
23. वही, पृ. 90 
24. वही, पृ. 88 
25. वही, पृ. 30 
26. वही, पृ. 15 
27. वही, पृ. 44 
28. वही, पृ. 44 
29. डॉ.बी.आर.आम्बेडकर, अनुवादक- आचार्य जुगल किशोर बौद्ध, ‘जातिभेद का बीजनाश’ सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2010, पृ. 44 
30. जयप्रकाश कर्दम, ‘तलाश’ (कहानी संग्रह), पृ. 139-140 
31. वही, पृ. 44 
32. वही, पृ. 44-45 
33. वही, पृ. 110-111 
34. वही, पृ. 122 
35. वही, पृ. 45 
36. डॉ.बी.आर.आम्बेडकर, अनुवादक- आचार्य जुगल किशोर बौद्ध, ‘जातिभेद का बीजनाश’,पृ.-56 
37. जयप्रकाश कर्दम, ‘तलाश’ (कहानी संग्रह), पृ. 45 
38. वही, पृ. 15 


ओमप्रकाश मीना (शोधार्थी)
पी.एच.डी. हिन्दी,भारतीय भाषा केन्द्र,जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
नयी दिल्ली-110067,omi.meena1992@gmail.com,9968545904
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2 टिप्‍पणियां:

  1. बधाई ओमप्रकाश मीणा जी, आपने 'तलाश' को काफी गंभीरता से तलाशा है। इसे बनाए रखें। शुभकामनाएँ।

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