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आलेखमाला:इक्कीसवीं सदी की कविताओं में रस – आरले श्रीकांत

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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आलेखमाला:इक्कीसवीं सदी की कविताओं में रस – आरले श्रीकांत

 “मौसम चाहे जितना खराब हो,
  उम्मीद नहीं छोड़तीं कविताएँ।”             
                         - केदारनाथ सिंह

चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
“मैं यह मानता हूँ कि रस की सत्ता से इनकार करना काव्य की सत्ता से ही इनकार करने के समान है।” [संकलनकर्ता एवं संपादक - अज्ञेय, तीसरा सप्तक, वक्तव्य (केदारनाथ सिंह), पृ. 115]

कवि केदारनाथ सिंह द्वारा ऐसा कहा जाना (इक्कीसवीं सदी में) विचारणीय हो जाता है। काव्य की सत्ता का संबंध समाज-सत्ता से होता है। तब रस-सत्ता का संबंध अप्रत्यक्ष रूप से समाज-सत्ता से होता है। किसी भी देश या प्रदेश के साहित्य के मूल में जनता की चित्तवृत्ति ही होती है। यह चित्तवृत्ति संस्कार, मूल्य तथा आस्था से युक्त होती है। इसमें आए परिवर्तन का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ता दिखाई देता है। इसका प्रमाण संपूर्ण भारतीय साहित्य है, न केवल हिंदी। साहित्यिक प्रवृत्ति की प्रधानता के मूल में भावों की ही प्रधानता होती है। प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व साहित्य में उत्साह, रति, हास, विस्मय भावों की प्रधानता देखने को मिलती है, किन्तु उसके पश्चात् मनुष्य विरोधी, क्रूर और कठिन समय के चलते शोक, भय, घृणा की प्रधानता। ऐसा सामाजिक संस्कार, मूल्य तथा आस्था में आए विघटन के कारण हुआ है।

कवि इन्हीं सामाजिक परिस्थितियों के परिवर्तन को अनुभूति रूप में ग्रहण करता है। उसकी यह अनुभूति की प्रामाणिकता उसे चैन से बैठने नहीं देती। यह अनुभूति ही कवि को संस्कारी बनाती है। दूसरे की वेदना को देखकर तो सामान्य जन भी संवेदित हो जाते हैं, परंतु उस वेदना के साथ-साथ अनुभूति की प्रामाणिकता ही कवि की शक्ति होती है। इस काव्यरूपी अनुभूति से पाठक, दर्शक या श्रोता एकरूप होकर उपस्थित भाव का आस्वाद लेता है। यह सामाजिक अनुभूति कवि व्यक्ति-विशेष में संभव होती है। इसी को ‘काव्यरस का लोकमंगल’ कहते हुए गजानन माधव मुक्तिबोध ने लिखा है कि “...परिष्कृत अनुभूतियाँ ही हमारे उन नूतन संस्कारों को बनाती हैं जिनसे उपलब्धि होती है। उपलब्धि ही उस वर्चस्व स्वत्व को काव्य में प्रस्फुटित करती है। जो कि बृहत्तर मानवीय संवेदनाओं को व्यक्ति विशेष में संभव करती है, और यही काव्यरस का लोकमंगल है। अतएव श्रेष्ठ काव्य के लिए वर्चस्वप्रिया उपलब्धि अत्यावश्यक है। स्वानुभूति का सह-अनुभूति होना ही काव्य का श्रेष्ठ तत्व है।” (संपादक- अपूर्वानंद, आलोचना त्रैमासिक- सहस्राब्दी अंक- 55, जुलाई-सितंबर 2015, मुक्तिबोध पर केंद्रित, ‘काव्य की रचना-प्रक्रिया’ लेख से) इस प्रकार कवि की स्वानुभूति काव्य के माध्यम से सबकी अनुभूति बनकर उभरती है। यह अनुभूति सामाजिक चेतना का रूप धारण करती है। कारणरूपी विभावादि उपकरणों के प्रयोग से ही कवि की स्वानुभूति काव्य रूप में प्रस्फुटित होती है जिसे पढ़कर या देखकर पाठक या दर्शक अपनी अनुभूति का आस्वाद लेता है। जब किसी काव्य-निर्मिति के मूल में रस के उपकरण ही रहते हैं तब काव्य में रस की सत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता है। अर्थात् रस सामाजिक चेतना का अभिन्न अंग है। 
हमारे देश का वर्तमान समय अनेक प्रकार की सामाजिक समस्याओं से युक्त है। इन विभिन्न प्रकार की सामाजिक समस्याओं से प्राप्त कवि व्यक्ति-विशेष की अनुभूति भी विभिन्न काव्य विषयों से लैस है। जैसे – वैश्वीकरण या बाज़ार, प्रजातंत्र या सत्ता, वर्तमान यथार्थ, पूँजीवाद, सांप्रदायिकता, आतंकवाद, प्रदूषण, विस्थापन, स्त्री-विमर्श, किसान, गरीबी, भूख और प्रतिरोध आदि। इससे स्पष्ट होता है कि वर्तमान समय भयावहता, शोक तथा घृणा और निराशा का समय है। अधिकांश कवियों की कविताएँ इन्हीं भावों को अभिव्यक्ति देती हैं। वर्तमान समय के इन भावों को भारतीय भाषाओं में लिखी जा रही सभी कविताओं में देखा जा सकता है।

विज्ञान और औद्योगिकीकरण के चलते चीजों का वैश्वीकरण हो गया है। ऐसे में हर किसी को अपने विकास की पड़ी है। किंतु इस वैश्वीकरण से समाज तथा सृष्टि के विकास के स्थान पर विनाश ही अधिक हुआ है। विकास को औद्योगिकीकरण तक ही सीमित कर दिया गया है। ऐसे में संपूर्ण विश्व ही गलत दिशा में आगे बढ़ता हुआ दिखाई देता है। समाज में भयावहता का वातावरण फैल गया है। कवि केदारनाथ सिंह को इसकी चिंता सताती है। अपनी इस विश्वदृष्टि से प्राप्त अनुभूति को ‘बुनने का समय’ शीर्षक कविता में अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं कि – “उठो / मेरे सोये हुए धागों उठो / .... / उठो कि कहीं कुछ गलत हो गया है / उठो कि इस दुनिया का सारा कपड़ा फिर से बुनना होगा /.... उठो कि बुनने का समय हो रहा है।” (समकालीन भारतीय साहित्य, मई-जून, 2014)  यहाँ केदारनाथ सिंह ने संपूर्ण विश्व के भयावह समय को अपनी कविता का विषय बनाया है। विनाश की ओर बढ़ रही दुनिया को देखकर वह चिंतित हो जाते हैं। जिस प्रकार आश्रयरूपी कवि इस भयावह समय से चिंतित है, उसी प्रकार इस काव्य को पढ़कर सहृदय पाठक भी चिंतित हो जाता है। अर्थात् उसके हृदय में वासनारूप में स्थित भय स्थायी भाव जागृत होकर आश्रयरूपी कवि से एकरूप हो जाता है और भयानक रस का आस्वाद लेता है।

वर्तमान प्रजातंत्र प्रजा की चिंता करना छोड़ इसी वैश्वीकरण के गर्त में खो गया है। औद्योगिकीकरण ने लघु उद्योगों को निगल डाला है। तेलुगु कवि एन. गोपी ने अपनी इस अनुभूति को प्रतीकात्मक रूप में ‘सेफ्टीपिन’ नामक कविता में वर्णित किया है- “उन दिनों / इंतजार करते थे / बिसाती राजम्मा का / जो सुनाती थी जीवन-संगीत / मीठी आवाज में - / रबड़ की चूड़ियाँ, रिबन, कंघी, पिन... / अब किस लोक में हैं वे सब?.../ छोटे उद्योगों को / निगलने लगा है अजगर।” यहाँ सेफ्टीपिन अर्थात् लघु उद्योग सामान्य मनुष्य का तो अजगर पूँजीपति तथा प्रजातंत्र का प्रतीक है। सामान्य मनुष्य की स्थिति भयावहता से ग्रस्त है। कवि की यह अनुभूति सहृदय पाठक के हृदय में भय भाव जागृत करती है।

देश के प्रजातंत्र में फैले इस भयावह स्थिति के कारण प्रजा दुःखी है। समाज में अंधाधुँध फैली है। प्रजा को मौत के घाट उतारा जा रहा है। समाज में व्याप्त इस दुःख को देखकर कवि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी भी दुःखी हो जाते हैं। प्रजातंत्र के इस दुर्बल पक्ष को कवि ने ‘दुःख’ शीर्षक कविता में प्रकट किया है – “... चारों ओर दुःखों की दहाड़ में / सहम जाता अपना दुःख / .... फैली हथेलियाँ / लटकते शव / जलती बेटियाँ / बिकते बेटे / अस्पताल भरें दुःखों से / पटीं सड़कें / आदमी-आदमी से उठ रहीं / दुःख की लपटें / ... दुःख विरोध की युक्ति तो है / पर मुक्ति नहीं है दुःख से” जिधर देखो उधर कवि को समाज दुःख से भरा पड़ा दिखाई देता है। कवि ने इस दुःख को ही अपने काव्य का विषय बनाया है। इस दुःख की अनुभूति समाज के प्रत्येक मनुष्य में प्राप्त होती है। ऐसे में सहृदय पाठक काव्य को पढ़कर करुण रसास्वाद से अछूता कैसे रह सकता है? 

हमारे समाज में एक ऐसा तबका भी है जो सभी चीजों, बातों तथा घटित कार्यों से अन्जान है। इस प्रजातंत्र ने उन्हें सूअर बनाकर रख दिया है। ऐसे तबके के तीन बच्चों को विषय बनाकर कवि रामदरश मिश्र ने प्रजातंत्र की विडंबना को उजागर किया है – “मैले शरीर वाले तीन कबाड़ी बच्चे सामने से जा रहे थे / ... वे जाने लगे तो / ठोकर खाकर एक गिर पड़ा / दोनों उसे उठाने लगे / तब तक एक प्रत्याशी नेता की कार गुज़री / और उसमें से एक गाली उछली / अबे सूअर के बच्चों हटो रास्ते से!” (‘एक बचपन यह भी’ कविता से) इस काव्य को पढ़ते हुए उन बच्चों की दयनीय अवस्था को देखकर पाठक का शोक भाव जागृत हो जाता है। अर्थात् पाठक करुण रस का आस्वाद लेता है जिससे उसके हृदय में राष्ट्रीय चेतना का भाव भी उत्पन्न होता है।

हमारे इस प्रजातंत्र वाले देश में मूल्यों को ताक़ पर रखा गया है। सत्ता और प्रतिष्ठा के लिए सत्य, धर्म आदि जीवन मूल्यों के साथ धोखा किया जा रहा है। लोग निराश होकर उसी राह पर चलने के लिए मजबूर हो रहे हैं। गुजराती कवि मंगल राठौड़ कुछ पाने की संभावनाओं के समक्ष प्रतिबद्ध खड़े हैं – “कितने ही लोगों ने / सत्य के साथ धोखा किया / और बदले में उनको सत्ता मिली! / कितने ही लोगों ने / बेच डाला धर्म / और बदले में उनको मिली प्रतिष्ठा! / ..... मैं भी छोड़ दूँ निजत्व तो मिल सकता है मुझे भी। / ऐसी संभावनाओं के समक्ष खड़ा हूँ प्रतिबद्ध!” (‘प्रतिबद्ध’ कविता से) ऐसी व्यवस्था की विडंबना की अनुभूति से किसी को भी घिन आने लगेगी। इसे पढ़ते हुए पाठक का हृदय जुगुप्सा भाव से पूर्ण होकर वीभत्स रस का आस्वादन करने लगता है। 

इस प्रजातंत्र ने लोगों में ऐसा भय पैदा कर दिया है कि वे बोलने से भी कतरा रहे हैं। उन्हें भय है कि उन्हें किसी भी पल दंडित किया जा सकता है, एक छोटे से कारण को लेकर। प्रजातंत्र की इसी भयावहता ने ओड़िया कवि राजेंद्र किशोर पंडा को भी भयभीत कर दिया है। उन्हें भय है कि – “मैं किसी भी पल गिरफ्तार हो सकता हूँ, / देशद्रोह के आरोप में / किसी भी भजन मंडली को सशस्त्र सेना में बदल सकता है गणतंत्र / .... किसी भी पल दंडित किया जा सकता है मुझे / ‘नागरिक’ के बदले ‘मनुष्य’ कहकर अपना परिचय देने के / जघन्य अपराध के लिए।” (‘मैं किसी भी पल’ कविता से, समकालीन भारतीय साहित्य, मार्च-अप्रैल 2014) इसी से जुड़ी मलयालम कवि ए. अरविंदाक्षण की कविता ‘इतिहास की गलती’ को भी देखा जा सकता है – “इतिहास में लुटेरे / क़त्ल करने वाले षड्यंत्रकारी / समय के अंतराल के बाद / बादशाह, महाराज बन जाते हैं । / ... जहर पीने वाला सदाशिव / कथा कहानियों के / मिथक बनकर रह जाते हैं ।” उसी प्रकार अरुण कमल की ‘मैं उनमें नहीं था जो मारे गए कल रात’ शीर्षक कविता भी भारत के प्रजातंत्र की भयावहता को उजागर करती है।

देश का वर्तमान यथार्थ अति भयावह है जो नकली विकास से दूर रहकर जंगलों में जीवन-यापन करना चाहते हैं, उन्हें भी इसका दंश झेलना पड़ रहा है। विकास के नाम पर उन्हें उनके जंगलों से भी खदेड़ा जा रहा है। यथार्थ इन दिनों अतियथार्थ का रूप धारण किए हुए है। कवि मंगलेश डबराल ने अपनी इस अतियथार्थ की अनुभूति को ‘यथार्थ इन दिनों’ कविता में प्रकट किया है- “मैं जब भी यथार्थ का पीछा करता हूँ /.... एक आदिवासी को उसके जंगल से खदेड़ने का खाका बन चुका है / विस्थापितों की एक भीड़ / अपनी बची-खुची गृहस्थी को पोटलियों में बाँध रही है। /.... नीचे घाटी में एक दस्ता / अपने सुंदर नौजवान शरीरों पर बम और मिसाइलें बाँधे हुए है /.... यथार्थ इन दिनों बहुत ज्यादा यथार्थ है।”

कवि ने आदिवासियों के इस दंश रूपी यथार्थ को काव्य का विषय बनाकर सभी सहृदय पाठकों को इस अतियथार्थ से वाक़िफ़ कराया है। सहृदय पाठक इससे केवल वाक़िफ़ ही नहीं होता बल्कि उसके हृदय में भी कवि की भाँति ‘भय’ स्थायी भाव जागृत हो जाता है।

आदिवासियों के पहाड़ों, नदियों आदि को औद्योगिकीकरण के नाम पर नष्ट किया जा रहा है। आदिवासियों का विस्थापन हो रहा है। उनके दुःख की अनुभूति को संताली युवा कवि गणेश कुमार हाँसदा ने ‘बदलाव’ कविता के माध्यम से व्यक्त किया है- “गाँव वहीं पर है / जहाँ पहले था / लेकिन वह स्थान बदल गया है / कल तक वह गाँव पहाड़ी पर था / और आज - / कारख़ाने के पास है /...कल तक वह नदी के किनारे था / और आज -/ बाँध के ऊपर है।...”

उजड़ते जंगलों, नदियों के कारण पशु-पक्षी भी गायब होते जा रहे हैं, आदिवासी को जिनका संरक्षक माना जाता है। हिन्दी कवि प्रेमरंजन अनिमेष ने ‘मोरनाच’ कविता में इस दुःख को अभिव्यक्त किया है- “या फिर नाचते हैं वे / छुपकर जंगलों में / जो खुद गायब होते जा रहे / जहाँ कोई देखता नहीं” इस प्रकार के काव्य को पढ़कर सहृदय पाठक का हृदय द्रवित होता है। आदिवासियों के इस दुःख-दर्द के प्रति पाठक शोक प्रकट कर करुण रस का आस्वाद लेता है।

भारत एक बहुधर्मी देश है। यहाँ जाति, धर्म को लेकर दंगे-फसाद होना आम बात बनकर रह गयी है। समाज साम्प्रदायिकता से ग्रस्त हो गया है। राजनेता अपनी सत्ता की कुर्सी के लिए आम लोगों में साम्प्रदायिकता का बीज बो रहे हैं, एक-दूसरे के प्रति द्वेष पैदा कर रहे हैं। ओड़िया कवि श्री जयंत महापात्र के द्वारा, जो इस साम्प्रदायिकता को जानता नहीं है उसे भी उसकी अनुभूति करायी जाती है- “बहुत पहले की बात है / उस दिन माँ ने पूछा / कौन है वो? / किसके साथ बात कर रहे थे? / उत्तर दिया मैंने, कालेज का पुराना एक साथी / बहुत दिनों से मिला नहीं था न ! / ईसाई ?/ नहीं, हिंदू लड़का। / न जाने क्यों मुह बिचका दिया / माँ का वह चेहरा हमेशा मन में रहता है /... न जाने क्यों / उस दिन माँ ने मुँह बिचका लिया था / न जाने क्यों / आज एक मित्र ने मुँह बिचका लिया / मुझसे पूछा / आप क्या ईसाई हैं?/ जयंत जानता नहीं।” (‘जयंत जानता जिसे नहीं’ कविता से) घर-घर में इस साम्प्रदायिकता का भय फैला हुआ है। कवि के इस अनुभूति रूपी काव्य को पढ़ते हुए सहृदय पाठक में भी भय उत्पन्न होता है कि अब क्या होगा ? 

साम्प्रदायिकता के साथ-साथ धर्म के नाम पर आतंक फैलाने का कार्य भी किया जा रहा है जिसे वर्तमान समय की भयावह समस्या कहा जा सकता है। आज काश्मीर की क्या स्थिति है, हम देख ही रहे हैं। देश के जनमानस में इसका भय फैला हुआ है। पंजाबी कवयित्री परमिंदर जीत इसे ‘घातक वक्त’ कहती है – “बहुत घातक वक्त में / जी रहे हैं हम / ...एक साथ बह रहा है / तेल और लहू / बारूद बिक रहा है / मनुष्यों के भाव...” (‘घातक वक्त में दुआ’ कविता से) अन्य एक कविता में अपने यहाँ होने वाले दंगे और महाविस्फोट के पश्चात् की स्थिति को अभिव्यक्त करती है - “हर तूफ़ान, जलजले, दंगे, कत्लोगारत / और महाविस्फोट, धमाके के बाद / जब कि बहुत कुछ बिखर जाता है / पड़ जाती हैं तर शक्तियाँ / घर श्मशान हो जाते / लहरें बन जाएँ कब्रें / रेशा-रेशा होकर बदन उड़ते हैं। / ...” (‘मेरी जगह पर’ कविता से, समकालीन भारतीय साहित्य – मार्च-अप्रैल 2014) इन कविताओं को पढ़कर सहृदय पाठक कवि-अनुभूति से तादात्म्य पाता है और अपनी अनुभूति विस्तृत कर लेता है। उस समय आतंकवाद का भय उसमें पैदा हो जाता है। सहृदय पाठक के हृदय में वासना रूप में स्थित भय, शोक तथा जुगुप्सा तीनों भाव क्रमशः उद्बुद्ध होते हैं और वह भयानक, करुण तथा वीभत्स रस का आस्वादन करने लगता है। पंजाबी कवि परमजीत सोहल ने भी इस आतंकवाद के यथार्थ की अनुभूति को ‘नज़्म’ शीर्षक कविता में अभिव्यक्ति दी है – “... वह तो आते हैं / बगूलों की तरह / और एक-एक पल में कर जाते हैं / सब कुछ नेस्तनाबूद...” 

वर्तमान समस्याओं में प्रदूषण भी महत्त्वपूर्ण समस्या के रूप में उभर कर सामने आ रही है। औद्योगिकीकरण, विकास के चलते समाज प्रदूषित होता जा रहा है। भूगोल में प्रदूषण का ही पाठ पढ़ाया जा रहा है। कन्नड़ कवि एम. एन. व्यास राव इसी पाठ को पढ़ाते हैं – “अरे बेटे, तुम इस धरती के बारे में पूछते हो?/ कहता हूँ सुनो, / ... चूसता है अब तुम्हें / बस, कार जो फेंकते हैं धूल! / बढ़ना है तुम्हें / उस धुएँ में, जो कारखाने उगलते हैं, / ... अब ज़बानी याद करो / ‘ब’ माने बदबू / ‘धू’ माने धूम्र / ‘सि’ माने सिगरेट” (‘नया भूगोल का पाठ’ कविता से, समकालीन भारतीय साहित्य, मई-जून 2014) उसी प्रकार असमिया कवि एम. कमालुद्दीन अहमद ने फैलते प्रदूषण पर लिखा है – “रास्ते के बगल में चले आते हैं वे / शॉपिंग मॉल से निकलने वाला धुआँ  / बेतरह धूसरित करता है उनकी ओर।” (‘जगत सभा की ओर’ कविता से) तथा  “गर्द-गुबार बटोरकर रखता हूँ / सीने में एक पहाड़ बनाने के लिए।” (‘संचय’ कविता से, समकालीन भारतीय साहित्य- मार्च-अप्रैल 2014) संताली युवा कवयित्री सुष्मिता हेम्ब्रम की ‘विलुप्ति’ कविता – “गाड़ी मोटर मशीन / चारों ओर शहर-नगर / उसी वायु के प्रदूषण से / मैं जाती मौत के कगार / ... रिंग रिंग उसका / मारा रोम भी वैसा / विकिरण उसका / मेरे लिए यमराज जैसा।” आदि कविताओं में फैलते प्रदूषण की भयावहता दिखाई देती है। सहृदय पाठक इन कविताओं को पढ़ते हुए मृत्यु के भय से सहम जाता है।

स्त्री-अस्मिता को केंद्र में रख कर बाङ्ला की सुष्मिता भट्टाचार्य ने ‘अजात कन्या’ तथा ‘यशोदा के प्रति योगमाया’ जैसी कविताएँ लिखी हैं। स्त्री की करुण कथा का चित्रण बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है – “विहग-पंख सा भारहीन तैरता था तन / जन्म-जल में फैला-गहन, गर्भ अंधियार। / नभ ने भेजा था मुझको नीलिम संदेश / माता-पिता के जीन ने दिया आकार। / ... मुझे पता नहीं था कि अगले ही पल, / मेरी भाग्य-रेखा मेट दी जाएगी।” (‘अजात कन्या’ कविता से) तथा  “… होठों पर मेरे बार-बार क्यों मृत्यु का विष / कब देगी मुझे तू पुत्री का अधिकार बोध?” (‘यशोदा के प्रति योगमाया’ कविता से) स्त्री की इस करुण कथा को पढ़कर सहृदय पाठक को करुण रस का आस्वाद आए बगैर नहीं रहता। 

भारत किसान-प्रधान देश कहलाता है। परंतु वर्तमान समय में वैश्वीकरण के चलते किसान अपनी दयनीय अवस्था से गुजर रहा है। मराठी कवि प्रकाश किनगावकर ने महाराष्ट्र में हो रही किसान-आत्महत्या की अनुभूति से काव्य की रचना की है। किसान अपने उद्धार के लिए बापू को गुहार लगा रहा है – “…बापू, / हमारे माथे पर लगा दिया गया है / किसान का ठप्पा / जन्मजात अपराधियों की तरह / उसे पोंछने किसी राम को भेजो / जो हमारा उद्धार कर सके / अहिल्या की तरह।” (‘उद्धार’ कविता से, समकालीन भारतीय साहित्य - मार्च-अप्रैल 2014) किंतु बापू के चेले वैश्वीकरण के भँवर में ही डूब कर रह गए। जब गुहार लगाकर कुछ नहीं हुआ तो किसान गले में फाँसी का फँदा डाल कर स्वयं को ही मिटा लेता है – “उधर खेती की उपज से मिले माल / और बाज़ार भाव से मिली उसकी कीमत को / बायें पलड़े में डाला तो पलड़ा / चुनने से बची कपास की तरह / हल्का होकर अधर में लटक गया। / वैश्वीकरण के शक्तिशाली चुंबक ने / बिगाड़ दिया पलड़ों का संतुलन / और / उसी में खो गया किसान का वजूद / उत्पाद को सही मूल्य देकर / और उत्पादन का खर्च घटाकर / शायद सरकार कम कर सकती थी / यह अंतर / लेकिन नहीं ... / आखिर किसान ने ही / ढूँढ़ लिया इस प्रश्न का उत्तर / बायें पलड़े के हुक में / फाँसी का फंदा डालकर।” (‘उत्तर’ कविता से) जगत् का अन्नदाता, पोषक किसान ही जब भूखा रहने लगता है, तब इससे दयनीय स्थिति और क्या हो सकती है? उसके सामने फाँसी का फंदा डालने वाले उत्तर से बेहतर उत्तर क्या हो सकता है? कवि की इस काव्य रूपी अनुभूति से तादात्म्य पाकर सहृदय पाठक का किसान के प्रति शोक भाव ही प्रकट होता है और वह करुण रस का आस्वाद लेता है। श्री जयंत महापात्र ने भी खेत और किसान की करुण गाथा को ‘पीड़ित खेत’ शीर्षक कविता में अभिव्यक्ति दी है।

हमारा देश कृषि-प्रधान देश तो कहलाता है किंतु देश की जनता को दो वक़्त का खाना भी सही से नसीब नहीं होता। यह हमारे प्रजातंत्र की शर्मनाक हार है। नेपाली कवि मनोज बोगटी ने इस भूख के माध्यम से भारत का चित्र खींचा है – “एक दिन / दीदी पैर पटकते हुए अकेली रोई / और हम सबको रुलाया / क्योंकि / काँपते हुए हाथों से दीदी पहला अक्षर लिख पाई थी / वह था ‘भा’/ बाद में उसमें जोड़ दिया ‘त’ / क्योंकि दीदी को भूख लगी थी। / बहुत बाद में बीच में / उन्होंने जब ‘र’ को डाल दिया / उस वक्त दीदी को पता नहीं कैसा लगा होगा।” (‘दीदी’ कविता से) कवि की इस भाव-भीनी अनुभूति से सहृदय पाठक एकरूप होकर देश की भूखी-पीड़ित करोडों जन के प्रति शोक भाव प्रकट कर आँसू बहाएगा। उससे करुण रस की निष्पत्ति होगी। उसी प्रकार डोगरी कवि ज्ञानेश्वर ने भी ‘काश’ शीर्षक कविता में भूख से पीड़ित जन को काव्य-विषय बनाया है। 

इस प्रकार की अनेक समस्याओं से ग्रस्त समय में निराशा के बीच से प्रतिरोध का स्वर भी उभर कर आता दिखाई देता है। सविता सिंह ने ‘अभी आख्यान नहीं’ शीर्षक कविता में कविता को बोलने का दुस्साहस कहते हुए प्रतिरोध का स्वर प्रदान करती हैं – “बहुत सारा अनर्गल वैसे भी बोला / और लिखा जा रहा है इस समय / अभी बोलने का दुस्साहस है कविता / अभी आख्यान नहीं / सिर्फ प्रतिरोध, अभी ताप है पृथ्वी के गर्भ में / और पृथ्वी स्थिर...” कवि के इस प्रतिरोधी स्वर रूपी अनुभूति से सहृदय पाठक एकाकार होकर उसमे वर्तमान प्रजातंत्र के प्रति क्रोध भाव उद्बुद्ध होगा और वह रौद्र रस का आस्वादन करने लगेगा। उसी प्रकार कवि निदा नवाज़ भी ‘एक बड़ा शोषण’ शीर्षक कविता में साम्प्रदायिकता का प्रतिरोध करते हुए दिखाई देते हैं जिससे सहृदय में प्रतिरोध का स्वर प्रस्फुटित होकर सामाजिक चेतना रूपी क्रोध भाव जागृत होता है। 

संक्षेप में, उपर्युक्त सभी भाषाओं के कवियों की कविताओं में विषय की भिन्नता दिखाई देती है। यह भिन्नता अपनी-अपनी प्रादेशिक, सामाजिक समस्याओं रूपी अनुभूति की भिन्नता को ही दर्शाती है जिससे अलग-अलग भावों की उत्पत्ति होते दिखाई देती है। अधिकांश कविताएँ करुण तथा भयानक रस से युक्त हैं। वर्तमान समय की इन कविताओं में करुण, भयानक, वीभत्स रस की प्रधानता दिखाई देती हैं। सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार ही काव्य की परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं। ये कविताएँ देश एवं समाज में व्याप्त अनेक प्रकार की समस्याओं को विषय बनाकर लिखी गई हैं। इससे विविध प्रकार की सामाजिक चेतना की निर्मिति होती है। यह सामाजिक चेतना सहृदय सामाजिक के रसास्वादन के बिना अधूरी होती है। जब तक सहृदय काव्य में अभिव्यक्त विषय को आत्मसात करके उससे एकरूप नहीं होता है, तब तक उसमें सामाजिक चेतना का आना असंभव है। इक्कीसवीं सदी में बहुत कुछ बदलाव आया है किंतु यह संसार अभी भी वैसा ही है। हम मनुष्य इसी संसार में रहकर बदलते रहते हैं, इसे छोड़कर नहीं – “देखना / रहेगा सब जस का तस / सिर्फ मेरी दिनचर्या बदल जाएगी / साँझ को लौटेंगे पक्षी / लौट आऊँगा मैं भी / सुबह जब उड़ेंगे / उड़ जाऊँगा उनके संग...”  (‘कहाँ जाओगे’ कविता, केदारनाथ सिंह) अर्थात् इक्कीसवीं सदी की कविता की आस्वाद-प्रक्रिया भी प्राचीन रस-सिद्धांतानुसार ही है। यह आस्वाद-प्रक्रिया महज एक प्रक्रिया न होकर सहृदय पाठक की विस्तृत भावोत्पत्ति का औजार है। वर्तमान समय में इस काव्य के मूल्यांकन के लिए उस रसयुक्त काव्य-दृष्टि की कमी नज़र आती है, न कि भारतीय काव्यशास्त्र तथा रस-सिद्धांत की। 

आरले श्रीकांत,संपर्क:-shrikantarale@gmail.com
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