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आलेखमाला:नुक्कड़ नाटक : समय की एक जरूरत – मोनिका नांदल

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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आलेखमाला:नुक्कड़ नाटक : समय की एक जरूरत – मोनिका नांदल

चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
मनुष्य की प्रगतिशीलता का परिवेश समय और माँग के समन्वय से निर्मित होता है। समय के परिवर्तित होने के साथ-साथ माँग की अवधारणा में भी परिवर्तन हो जाता है। समय के बदलते परिप्रेक्ष्य में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश और परिस्थितियों के साथ मनुष्य की जीवन जीने की विचारधारा में भी परिवर्तन होता है, यह परिवर्तन सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूप से ही समाज को प्रभावित करता है। कोई भी परिवेश जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जीवन मूल्यों से निर्मित और प्रभावित एक सजीव वातावरण होता है। गोविन्द चातक के शब्दों में "परिवेश को हम ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक गतिविधियों तथा स्थितियों से निर्मित एक प्रकार के वातावरण को कह सकते है। जिसमें व्यक्ति अपने आप को देख पाता है और उसकी तीव्रतम अनुभूतियाँ उसे आलोकित किये बिना नहीं रहती, जो उसके निर्माण और कारण बनती है।" परिवेश की इन परिस्थितियों से समाज में नए सांस्कृतिक मूल्यों, परम्पराओं, नयी विचारधाराओं, नए प्रयोगों और नए समाधानों की माँग बढ़ जाती है। आज समाज का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, जिसमें मनुष्य भूमंडलीकरण, आधुनिकता, व्यवसायिकता, यंत्रीकरण और व्यैक्तिकता के दौर से गुज़र रहा है, जिसने उसकी जीवन-शैली, विचारधारा, अनुभूति व नीतियों को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में प्रभावित किया है। ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के विभिन्न साधनों ने मानव के जीवन को सरल, सहज और साधनपरक बना दिया है। इस दौड़ती-भागती दुनिया में हमारे मूल्य, संस्कृति और कला कहीं पीछे छूटते नज़र आ रहे हैं। आज भी जहाँ समाज के विभिन्न क्षेत्रों की समस्याएँ ज्यों की त्यों बनी हुई हैं, वहीं इस आधुनिकतावादी दौर में मूल्यहीनता, अराजकता, आत्मकेंद्रीकरण, यंत्रीकरण, व्यवसायीकरण, पारिवारिक विघटन, पीढ़ी-संघर्ष और संस्कृति व कला विघटन की नयी समस्याएँ समाज में उपजाने लगी हैं। इन समस्याओं ने आज समाज में नए स्वरूप और प्रयोग के साथ साहित्य, संस्कृति और कला की आवश्यकता को प्रबल कर दिया है। साहित्य सदैव ही समाज परिवर्तन का माध्यम रहा है। इसकी नाट्य विधा ने रंगमंचीय नाटक, लोक नाटक, नुक्कड़ नाटक के रूप में समाज के परिमार्जन में तत्पर भूमिका अदा की है।

 नुक्कड़ नाटक का स्वरूप जनपक्षीय कला के रूप में जनता के बीच जाकर जनता के संघर्ष को स्वर देता है। नुक्कड़ नाटक समय की उपज है, जो 70-80 के दशक में देश के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, साम्प्रदायिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में फैली समस्याओं, कुरीतियों, विसंगतियों, विषमताओं, अराजकता, वैमनस्यता के कारण उपजा। उस समय देश में 'इप्टा', 'प्रलेस' और 'पृथ्वी थिएटर' जैसी संस्थाओं ने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय आन्दोलन, किसान-मज़दूर आंदोलन, महिला-दलित उत्पीड़ित आन्दोलन, आपातकालीन आन्दोलन जैसे जनांदोलनो को नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से संघर्षमय समसमायिक जन जीवन को जोड़कर नुक्कड़ नाटक को एक जीवंत दस्तावेज़ के रूप में समाज में पहचान दिलाई। नुक्कड़ नाटक सामान्य जनता की माँग रहा है। इसके जन्म के पीछे ऐतिहासिक और राजनैतिक कारणों को आधार माना जाता है। इस संदर्भ में सफदर हाशमी का मत है कि "आधुनिक, राजनैतिक नुक्कड़ रंगमंच एक सामाजिक ज़रूरत की पैदाइश है। जनवादी आंदोलन से जो जन-संस्कृति पैदा होती है, नुक्कड़ नाटक उसी का एक अंग है। पूँजीवादी सामंती व्यवस्था ने जो सांस्कृतिक 'नेटवर्क' खड़ा किया है, वह जनवादी संस्कृति के प्रचार का माध्यम नहीं बन सकता। जनवादी वैज्ञानिक और प्रगतिशीलता के प्रचार के लिए समाज के शोषित तबकों में सर्वहारा के क्रान्तिकारी जीवन दर्शन के प्रसार के लिए जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन जो विधाएँ अपनाता है, नुक्कड़ नाटक उनमें से एक है।"2 नुक्कड़ नाटक ने एक छोटी-सी अवधी में जन सामान्य के बीच एक सशक्त पहचान बना ली थी| यह एक ओर परिस्थितिगत अनिवार्यता का परिणाम रहा है तो दूसरी ओर रियलिस्ट थिएटर, एब्सर्ड थिएटर, ग्रीक थिएटर, शेक्सपीयरियन थिएटर, अमेरिकन ग्रुप थिएटर, एपिक थिएटर, दरिद्र थिएटर, थर्ड थिएटर और नया थिएटर की परम्पराओं, व्याकरण, गठन और अनुशासन ने नुक्कड़ नाटक के कथ्य, रूप-शैली और टेकनीक को समय-समय पर प्रभावित किया है। नुक्कड़ नाटक की रचना और मंचन में सफदर हाशमी की संस्था 'जन नाट्य मंच' का विशेष योगदान रहा है। इसने अपने नाटकों के माध्यम से जनता के संघर्षों को जनता के बीच उठाकर जनता को अपने  अधिकारों के प्रति जागरूक किया। दिल्ली, बिहार, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश आदि जैसे राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में 'निशांत नाट्य मंच', 'सहमत', 'युवा मंच', 'रंगभारती', 'प्रयोग', 'जनवादी रंगमंच', 'सर्जना', 'हस्ताक्षर', 'समन्वय थिएटर' जैसी संस्थाओं ने भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। ८वें दशक में देश में विकराल रूप से उत्पन्न गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, असुरक्षा, भ्रष्टाचार, घूसखोरी, मंहगाई, भूख, नैतिक मूल्यों का पतन, मौलिक अधिकारों का हनन, तानाशाही, किसान-मजदूरों का शोषण, दहेज-प्रथा और साम्प्रदायिकता की समस्याएँ गंभीर सवाल बनकर उभरीं। ऐसे में नुक्कड़ नाटक जैसी जनवादी कला की आवश्यकता को महसूस किया गया| सफदर हाशमी, असगर वजाहत, गुरुशरण सिंह, शिवराम, राजेश कुमार, रमेश उपाध्याय, स्वयं प्रकाश आदि नाटककारों, निर्देशकों व रंगकर्मियों ने अपने नुक्कड़ नाटकों में इन मुद्दों को विषय बनाकर संघर्षशील जनता में जनचेतना को जागृत करने का प्रयास किया था। नुक्कड़ नाटक अपनी प्रतिबद्धता और जनपक्षधरता के आधार पर अपनी सार्थकता को सिद्ध करता रहा, लेकिन इस जनवादी कला की रचना और प्रस्तुति को लेकर कुछ रंगालोचकों ने इसके अस्तित्व पर सवाल उठाए, जिससे समाज में इसकी तस्वीर धुंधली पड़ने लगी है। आज के बदलते दौर में भी इस जनवादी कला के अस्तित्व को बचाए रखना चिंता का विषय बन गया है। राजाराम भादू ने अपने लेख 'प्रतिरोध का रंगमंच' में नुक्कड़ नाटक की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है "पूर्व का नुक्कड़ नाटक समय, समाज और परिस्थिति की सीधी उपज था। प्रस्तुति के हिसाब से उसका दोहराव ज़रूरत पर आधारित था। इन नाटकों की आवृत्ति के कारण भिन्न हैं, इसलिए कुछ समय बाद इनकी प्रस्तुति मात्र आनुष्ठानिक होकर रह जाती है। अंतर्वस्तु और प्रस्तुति के स्तर पर यह बहुत नकली लग सकता है। यह स्थिति नुक्कड़ नाटक का मौजूदा मुकाम है जो चिंता का विषय है।3 ऐसी स्थिति में इसकी सार्थकता को बनाये रखना अनिवार्य हो गया है। आज के बदलते दौर में ग्लोबलाईज़ेशन का प्रभाव समाज पर बढ़ता जा रहा है, जिसके कारण हमारी कला, साहित्य और संस्कृति के अस्तित्व पर खतरा बढ़ गया है। आज का व्यक्ति इतना आत्मकेंद्रित और यंत्रकेंद्रित हो गया है जैसे उसका समाज के प्रति कोई सरोकार ही ना हो। आज आधुनिकता का पैमाना विस्तृत हो गया है। विज्ञान और तकनीक के साथ भूमंडलीकरण और बाजारवाद का प्रभाव भी समाज में इसके स्वरूप को बदल रहा है। आज समाज पर इस आधुनिकता के नकारात्मक प्रभावों को चर्चा का विषय बनाकर सवाल उठाए जाते हैं कि क्या आज का समाज हमारी कला और संस्कृति की धरोहर से दूर होता जा रहा है? क्या भूमंडलीकरण और बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव ने जन आंदोलनों की संस्कृति को समाप्त कर दिया है? क्या संचार क्रांति व मिडिया के प्रभाव ने आज नुक्कड़ नाटक जैसी जनवादी कला के क्षेत्र, महत्व और आवश्यकता को कम कर दिया है? वहीं इसके कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं जो समाज और संस्कृति के विकास में कार्य कर रहे हैं और समाज में नुक्कड़ नाटक के महत्व को विभिन्न क्षेत्रों में प्रस्तुत कर रहे हैं। संचार के विभिन्न साधनों के माध्यमों से आज नुक्कड़ नाटक को जन समाज तक पँहुचाया जा रहा है। आज का नुक्कड़ नाटक समाज के लिए एक ज़रूरत के रूप में सामने आ रहा है। आज समाज में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक क्षेत्र का रूप बदल रहा है, जिससे समाज के यथार्थ को आम आदमी तक पहुँचाने में नुक्कड़ नाटक जैसी परिवर्तनशील कला की ज़रूरत महसूस की जा रही है।


          नुक्कड़ नाटक के जनतांत्रिक स्वरूप को बदलने की ज़रूरत है। आज समाज में भ्रष्टाचार के मुद्दों के रूप में किसानों की आत्महत्या के केस, मिलावट के कारण भोजन में पौष्टिकता की कमी, यू.पी, पंजाब, हरियाणा में खाप पंचायत का बढ़ता वर्चस्व, ऑनर किलिंग, कन्या-भ्रूण हत्या, महिला बलात्कार कांड, दहेज प्रथा, क्षेत्रवाद,जातिवाद, दलित-आदिवासियों के अधिकारों के हनन की समस्या, इनके अतिरिक्त उपभोक्तावादी संस्कृति, व्यवसायिकता, नैतिक मूल्यों का हनन, पर्यावरण व स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ  विभिन्न रूपों में शोषण के चक्र को तेज़ कर रही हैं। नुक्कड़ नाटक ने अपने जनवादी स्वर को बरकरार रखते हुए, आज भी जनता को नाटकों के द्वारा जागरूक करने का बीड़ा उठाया हुआ है। अपने लेख 'लोक में प्रतिरोध और नुक्कड़ नाटक' में शम्भूजी ने इस संदर्भ में नुक्कड़ नाटक की सार्थकता के महत्त्व को स्पष्ट किया है "सत्ता या शोषक वर्ग द्वारा किए जा रहे इस बर्बर दमन में ही नुक्कड़ नाटक की शक्ति, सार्थकता एवं प्रासंगिकता का एहसास आसानी से किया जा सकता है। वास्तव में जड़ता के इस सक्रांतिकाल में नुक्कड़ नाटक ही वह सटीक सांस्कृतिक औज़ार है जो कि एक ओर व्यवस्था पर हावी राजनीतिक-सांस्कृतिक-आर्थिक माफियाओं की बखिया उधेड़ने में सफल है तो दूसरी ओर वह शोषित-पीड़ित आम आदमी के मन में एक बेहतर जीवन जीने की उत्कट लालसा ओर औदार्य का ओज भी भरता है।4

      प्रचार ही वह मूल मन्त्र है, जो नुक्कड़ नाटकों के वर्तमान स्वरूप, संरचना और इतिहास से अनिवार्य रूप से जुड़ा है। नुक्कड़ नाटक की सामाजिकता और सामूहिकता ने आज भी जनता के बीच इसे जीवंत रूप दिया हुआ है। आज अभिव्यक्ति की इस कला को स्पष्ट करने के लिए हमें नुक्कड़ नाटकों को कार्यशालाओं, प्रशिक्षण केन्द्रों, पत्र-पत्रिकाओं और शैक्षिक पाठ्यक्रमों में स्थान देने की आवश्यकता है। वर्तमान में नवयुवकों में करियर की महत्वाकांक्षा ने उनकी सोच की दिशा ही बदल दी है, वे रंगमंच को मनोरंजन का साधन मात्र समझने लगे हैं। ऐसे में उन्हें इसे जनवादी कला से जोड़ना आवश्यक हो गया है। संवेदनहीनता और संवादहीनता ने आज रंगकर्मियों के जन जागरण के मार्ग को प्रशस्त कर दिया है, जिससे आज उनमें कलाचेतना और जनचेतना की कमी को देखा जा सकता है। आज सोशल मिडिया में फेसबुक, नाटक विरोधी टी.वी, उबाऊ सीरियल्स, अयथार्थ और कलाहीन फ़िल्मों ने मानव को समाज से दूर कर दिया है। जिसमें मानवतावाद की परिभाषा कहीं खो-सी गई है। ऐसे में आज सवाल उठने लगा है कि मानव के किस वर्ग को आज कला की सबसे ज्यादा ज़रूरत है। इस संदर्भ में बलराज सहनी का कहना है "आज जब मानवता की बात करते हैं तो प्रश्न उठता है कि वह कौन सी मानवता है ,जिसे कला की सबसे अधिक आवश्यकता है। मेरे विचार में कला की सबसे अधिक ज़रूरत उन्हें है, जिनके पास खुशी के कोई साधन नहीं है, जो श्रम करते हैं, हल चलाते हैं। उन्हें हम कुछ दे सकें तो यही हमारी कला की सार्थकता होगी।"5 

      जनता को अपने जीवन परिवेश के प्रति सजग करने में नुक्कड़ नाटक कला का योगदान सराहनीय है। आज भी नुक्कड़ नाटक एक सामूहिक जीवंत कला के रूप में आम आदमी की समस्याओं को समझने में मदद कर रहा है, जिससे इस जनवादी कला से जुड़ने से मानव के अनुभवों में गहनता, विस्तार और प्रौढ़ता आ रही है। आज रंग-चेतना को सघन और व्यापक बनाने, जन-चेतना के स्वर को आम आदमी से जोड़ने के लिए और समाज को परिष्कृत करने के लिए नुक्कड़ नाटक नई तकनीकों, नए कौशलों, प्रशिक्षण के नए तरीकों से अपने रचना और मंचन के द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में एक ज़रूरत के रूप में प्रगति कर रहा है।


संदर्भ सूची –

  1. टूटते परिवेश(आमुख से), गोविन्द चातक, पृ-७,८ 
  2. दीर्घा, सफ़दर हाशमी, अंक-३६, पृ-२६
  3. रंग संवाद, सितम्बर-२०१३, पृ-१७
  4. लोक संस्कृति में प्रतिरोध, प्रकाश त्रिपाठी, पृ.-१६०
  5. रंगकर्म संस्कृति की पहली थिरकन(लेख), अशोक सिंघई, इप्टानामा, पृ-६



 संदर्भ ग्रंथ सूची

1  जन नाट्य मंच - सरकश अफ़साने, जन नाट्य मंच, नई दिल्ली, संस्करण – २०११
2 प्रज्ञा- नुक्कड़ नाटक:रचना और प्रस्तुति, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली,   संस्करण२००६
3 जन नाट्य मंच (संपा.) - सफ़दर,  राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, संस्करण - १९८९    
4 चातक, गोविन्द - रंगमंच : कला और दृष्टि, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण -१९९८  
5 त्रिपाठी, प्रकाश (संपा.) - लोक संस्कृति में प्रतिरोध, श्री रामानंद सरस्वती पुस्तकालय, आजमगढ़, संस्करण – २००५
6  रंगकर्म संस्कृति की पहली थिरकन(लेख), अशोक सिंघई, इप्टानामा
7  दीर्घा पत्रिका, सफ़दर हाशमी, अंक-३६
8  रंग संवाद पत्रिका, सितम्बर-२०१३          

मोनिका नांदल,
प्रोजेक्ट फैलो , दिल्ली विश्वविद्यालय
सम्पर्क:monikanandalkmc@gmail.com,9555245086
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