कविता:भूमि पुत्रों का संघर्ष/डॉ.मिनाक्षी तिवारी - अपनी माटी (PEER REVIEWED JOURNAL )

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शनिवार, नवंबर 11, 2017

कविता:भूमि पुत्रों का संघर्ष/डॉ.मिनाक्षी तिवारी

त्रैमासिक ई-पत्रिका
अपनी माटी
(ISSN 2322-0724 Apni Maati)
वर्ष-4,अंक-25 (अप्रैल-सितम्बर,2017)

किसान विशेषांक


                     कविता:भूमि पुत्रों का संघर्ष/डॉ.मिनाक्षी तिवारी


धरती ही जिसका अर्श है, जीवन जहां  संघर्ष है
जो बो दिया वो काट ले, बस इसमें उसका हर्ष है

माटी में है वो बुन रहा, सपने सलोने कल के यूँ
ऐसा परिश्रम कर रहा, दिन रात वो नजाने क्यों

अपना पसीना सींचकर, धरती को वो करता नमन
और लहलहाती फसलों का दिनरात वो करता जतन

सूरज की पहली रश्मिया, ढलती संझा की हो धनक
वो जूझकर खेतों में अपने, दे रहा हमको कनक

शहरों  की  जगमग  रौशनी , उसको  लुभाती  क्यों  नहीं
दिन  रात  का  संघर्ष  ही , क्यों  उसको  लगता  है  सही

हमने  कभी  सोचा  नहीं  की  उसकी  क्या  चिंताएं  हैं
सारी  उम्र  हमने  यूँ  ही , उसके  ही  श्रम  फल  खाये  हैं

जो  ठानले  एक दिन की  वो, अब और हल ना चलाएंगे
तो कैसे इस जीवन की हम, कल्पना कर पाएंगे

पर आज  कुछ  व्याकुल  सा है ,ना जाने  क्या  है आपदा
मौसम  ने  दी  कोई  चोट  है , या  ऋण  के  नीचे  फिर  दबा

उस बोझ को  मन  में  लिए , वो  कब  तलक  जी  पायेगा
भय से यूँ  ही  लड़ते  हुए  , एक  ऐसा  भी  दिन   आएगा

जब हार के जीवन से वो ,कह देगा जग को अलविदा
उस कुल पे आयी आपदा, जिसका हुआ मुखिया जुदा

उसकी दशा को देखकर, गर फिर भी हम ख़ामोश  हैं
तो भूमिपुत्रों की विदाई, में सभी का दोष है

अब भी है मौका चेत लें, वो अन्नदाता है अपना
ऐसा कोई सहयोग दें,की ना टूटेना कोई सपना
 

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