गोदानः किसानों की त्रासदी की महागाथा/ बबली गुर्जर

त्रैमासिक ई-पत्रिका
अपनी माटी
(ISSN 2322-0724 Apni Maati)
वर्ष-4,अंक-25 (अप्रैल-सितम्बर,2017)
किसान विशेषांक
गोदानः किसानों की त्रासदी की महागाथा/बबली गुर्जर    

               
 ‘गोदान’ प्रेमचन्द का चिर अमर कीर्ति स्तम्भ है। यह उनकी प्रौढ़तम कृति है। ‘गोदान’ में प्रेमचन्द का सम्पूर्ण जीवन-अनुभव सिमट कर केन्द्रीभूत हो गया है। प्रेमचन्द ने अपने जीवन के अन्तिम पड़ाव में इस ख्यातिपूर्ण ग्रन्थ की रचना की। प्रेमचन्द ने सन् 1934 में ‘गोदान’ लिखना प्रारम्भ किया था और सन् 1936 में इसका लेखन पूरा हुआ। दो वर्षों तक एक ही सृजनात्मक मानसिकता में किसी लेखक का रहना भी असम्भव लगता है लेकिन प्रेमचन्द किसानों की त्रासदी से इतने त्रस्त थे कि ‘गोदान’ में उनकी समस्याओं को उठाया और उनका समाधान ढूँढ़ने की कोशिश की।

                चूंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की जनता करीब-करीब 60-70 प्रतिशत प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। इस कारण से प्रेमचन्द के कृषक-समस्या सम्बन्धी ‘गोदान’ कृति का विश्लेषण समय की जरूरत है। जंतर-मंतर पर किसानों का मूत्र पीकर प्रदर्शन, मध्य प्रदेश में बेकसूर किसानों पर गोलीबारी, किसानों की आत्महत्या, भूखमरी, यह सब किसानों की त्रासदी बयान करता है। जो समस्याएं प्रेमचन्द के युग में थी वे समस्याऐं आज भी भारतीय किसानों को त्रस्त करती हैं। प्रेमचन्द का ‘गोदान’ उपन्यास किसानों की इसी त्रासदी की महागाथा है जो युगों-युगों तक चीखती-चिल्लाती किसानों की समस्याओं को उजागर करती रहेगी।

                यूँ तो प्रेमचन्द किसानों के जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर उपन्यास लिख चुके थे - ‘प्रेमाश्रम’ में बेदखली और इजाफा लगान पर, ‘कर्मभूमि’ में बढ़ते हुए आर्थिक संकट और किसानों की लगान बंदी की लड़ाई पर - लेकिन ‘गोदान’ लिखकर उन्होंने किसानों की सम्पूर्ण समस्याओं को मानों उसमें समाहित कर दिया हो। डा. रामविलास शर्मा अपनी पुस्तक ‘प्रेमचन्द और उनका युग’ में लिखते हैं कि-

                ‘‘‘गोदान’ में किसानों के शोषण का रूप ही दूसरा है। यहाँ सीधे-सीधे राय साहब के कारिंदे होरी का घर लूटने नहीं पहुँचते, लेकिन उसका घर लुट जरूर जाता है। यहाँ अंग्रेजी राज के कचहरी-कानून सीधे-सीधे उसकी ज़मीन छीनने नहीं पहुँचते लेकिन ज़मीन छीन जरूर जाती है। होरी के विरोधी बड़े सतर्क हैं। वे ऐसा काम करने में झिझकते हैं जिससे होरी दस-पाँच को इकट्ठा करके उनका मुकाबला करने को तैयार हो जाए। वह उनके चंगुल में फँसकर तिल-तिल कर मरता है लेकिन समझ नहीं पाता कि यह सब क्यों हो रहा है। वह तकदीर को दोष देकर रह जाता है, समझता है; यह सब भाग्य का खेल है, मनुष्य का इसमें कोई बस नहीं’’।

                इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि कैसे सामंतवादी और पूँजीवादी कुव्यवस्था दीमक की तरह किसान को अन्दर से खोखला कर देती है और उसे पता तक नहीं चलता अन्त में वह ढहकर गिर ही जाता है।

                ‘गोदान’ का होरी भारतीय किसान का प्रतिनिधित्व करता है। होरी उन तमाम गरीब किसानों की विशेषताएं लिए हुए है जो जमींदारों और महाजनों की धीमे-धीमे लेकिन बिना रूके हुए चलने वाली चक्की में पिसा करते हैं। डा.रामविलास शर्मा इस सन्दर्भ में कहते हैं कि ‘गोदान’ की गति धीमी है, होरी के जीवन की गति की तरह। यहाँ सैलाब का वेग नहीं है, लहरों के थपेड़े नहीं हैं। यहाँ ऊपर से शांत दिखने वाली नदी भँवरें ही जो भीतर-ही-भीतर मनुष्य को डुबोकर तलहटी से लगा देती हैं और दूसरों को वह तभी दिखाई देता है जब उसकी लाश ऊपर आती हुई बहने लगे।’’

                होरी के रूप में किसान की दारूण दशा का वर्णन प्रेमचन्द में अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। गोदान में सामाजिक-आर्थिक शोषण की कई परते हैं। ‘गोदान’ उस पूरे तंत्र की वृहद आलोचना प्रस्तुत करता है। दरअसल प्रेमचन्द राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन को समाज के वंचित तबकों-किसान, महिला, दलित, मजदूर आदि के हित की दृष्टि से देखते थे। उनकी स्पष्ट समझ थी कि जब तक इन वंचित तबकों का शोषण खत्म कर इन्हें राष्ट्रीय स्वाधीनता की लड़ाई में शामिल नहीं किया जाता तब तक मुकम्मल आज़ादी पाना और बेहतर राष्ट्र बनाना संभव नहीं है। राजनैतिक स्तर पर एक सीमा तक यही काम महात्मा गाँधी ने किया। गाँधी स्वाधीनता आंदोलन को गाँवों और कमज़ोर तबकों तक ले गए। प्रेमचन्द ने यह काम रचनात्मक स्तर पर ज्यादा बारीकी और संवदेनशीलता के साथ किया।

                ‘गोदान’ के होरी का जीवन इतना दयनीय है कि वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता। उसकी अनुकूल परिस्थितियाँ भी प्रतिकूल हो गई हैं वह धनिया से कहता है- ‘‘जब दूसरे के पाँवों-तले अपनी गर्दन दबी हुई है, तो उन पाँवों के सहलाने में ही कुशल है।’’

यहीं से होरी के शोषण की शुरूआत होती है। वह सामंती और पूँजीवादी व्यवस्था के सामने इतना मजबूर है कि उसका जीवन सामंतों के हाथ में न होकर पैरों में पड़ा है। एक किसान की जिन्दगी कितनी सस्ती है। सामंतों के पैरों में पड़ी है। पैर हटाया तो जीवन गया और पड़ा रहा तो मर-मरकर जिन्दगी चलती रहे। ऐसा मार्मिक कथन दिल में इतनी कचोट पैदा करता है कि जो किसान हमारा अन्नदाता है, हमारे जीवन का पोषी है उसी की जिन्दगी इतनी मजबूर और लाचार है। लेकिन यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि पराधीन भारत में पूरे देश का अंतिम बोझ किसान उठा रहा था। जमींदार और महाजन उसका शोषण अवश्य करते थे लेकिन उसे जिलाए रखते थे। होरी जब-जब आर्थिक संकट में फँसता है, महाजन उसे कर्ज देने के लिए पहुँच जाते हैं। कर्ज में डूब जाने पर भी होरी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचता, क्योंकि आत्महत्या भारतीय किसान और लोकजीवन की प्रवृत्ति नहीं रही है। सामंतवाद में व्यक्ति जातिगत भेदभाव, बेगार, बेदखली आदि के रूप में सामाजिक और आर्थिक शोषण में जरूर फँसा रहता है लेकिन उसके जीवन में उल्लास के तत्व बचे रहते हैं। जो जीवन में उसका विश्वास खत्म नहीं होने देते।

                आज के समय में देखें तो किसान आत्महत्या कर रहा है और यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे बहुत बढ़ गई है। आज का किसान होरी की तरह धैर्यवान और संन्तोषी नहीं है इसी वज़ह से तो तमाम आन्दोलनों के बावजूद प्रेमचन्द का होरी आत्महत्या नहीं करता। इस सन्दर्भ में डा. नामवर सिंह लिखते हैं -

                ‘‘ ‘प्रेमाश्रम’ के बलराज और मनोहर जैसे किसानों को उन्होंने (प्रेमचन्द) बहुत अधिक विद्रोही दिखाया था, लेकिन होरी को उन्होंने सन्तोष, धैर्य, सहनशीलता तथा अंधविश्वास का पुंज दिखलाया, जो भारतीय किसानों की जातीय विशेषता है। यदि किसान आन्दोलन की ओर ध्यान दें तो ‘प्रेमाश्रम’ के सत्रह-अट्ठारह वर्षों के बाद लिखे हुए ‘गोदान’ में किसान को अधिक विद्रोही दिखाना चाहिए था लेकिन वास्तविकता यह थी कि तमाम आन्दोलनों के बावजूद भारतीय किसान काफी सन्तोषी, भाग्यवादी और धैर्यवान रहा है। अपने अनुभवों से प्रेमचन्द ने इस तथ्य को अन्त में समझा और होरी के रूप में उन्होंने ऐसे ही किसान का चित्रण किया जो तमाम किसानों का प्रतिनिधि हो सका।’’

                प्रेमचन्द की सम्पूर्ण कला चेतना भारतीय किसान की जीवन पद्धति से प्रभावित और निर्धारित हुई है। प्रेमचन्द किसान को ही समाज के मुख्य केन्द्र में रखते हैं । प्रेमचन्द्र मानते हैं कि किसान की स्थिति हमारे समाज की आर्थिक स्थिति निर्धारित करती है। इस सन्दर्भ में डा. रामबक्ष अपनी पुस्तक ‘प्रेमचन्द्र और भारतीय-किसान’ में लिखते हैं कि -‘‘किसान समाज का आधार होता है। समाज का उत्पादक वर्ग किसान है उसी की उन्नति से देश की उन्नति संभव है। उसकी बदहाली देश की बदहाली।’’

                प्रेमचन्द ने ‘गोदान’ के सभी पात्रों को समाज के किसी न किसी प्रतिनिधि के रूप में  रखा है जैसे- राय साहब, जमींदार वर्ग के प्रतिनिधि, होरी- किसान वर्ग का प्रतिनिधि, खन्ना- पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधि, दातादीन- पुरोहित वर्ग का प्रतिनिधि और मालती, मेहता आदि - शहरी जन के प्रतिनिधि।

                रायसाहब जमींदार वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए किसान की शोषण प्रक्रिया की पोल खोलते है। रायसाहब कहते है- ‘मैं इसे स्वीकार करता हूँ कि किसी को भी दूसरे के श्रम पर मोटे होने का अधिकार नहीं है। उपजीवी होना घोर लज्जा की बात है। कर्म करना प्राणिमात्र का धर्म है। समाज की ऐसी व्यवस्था, जिसमें कुछ लोग मौज करें और अधिक लेाग पिसे और खपे, कभी सुखद नहीं हो सकते। हम अपने आसामियें को लूटने के लिए मजबूर हैं।’’ रायसाहब ज्ञानवान होते हुए, स्थितियों को समझते हुए विवश है। यह प्रवृत्ति जमींदारों के पास कूट-कूट कर भरी है जो अपनी व्यवहार कुशलता से किसानों को मूर्ख बनाते हैं। जमीन उनकी श्रम और संघर्ष किसान का। गोदान का होरी मानता भी है कि हमारा जन्म इसीलिए हुआ है कि अपना रक्त बहाएँ और बड़ों का घर भरें।

                भारतीय किसान इस जमींदारी कुव्यवस्था में निरन्तर पिसता रहता है और अपने को बैल स्वीकार करता है और जुतता चलता है। गोदान का होरी यह स्वीकार भी करता है और कहता है- ‘‘हम लोग तो बैल हैं और जुतने के लिए पैदा हुए हैं।’’

                प्रेमचन्द के होरी किसान से सारा पाठक वर्ग इस तरह जुड़ जाता है कि मानों यह भोगे हुए यथार्थ की महागाथा है। प्रेमचन्द ने भोगे हुए यथार्थ के साथ ही देखे गए यथार्थ का भी वर्णन किया है। उनकी रचनाओं में शोषित और दलितों के प्रति सहानुभूति और शोषक व पूँजीवादी वर्ग के प्रति आक्रोश है। उनका समूचा साहित्य वर्ग संघर्ष और वर्गीय चेतना पर आधारित है लेकिन केन्द्र बिन्दु ‘किसान’ ही है।

                प्रेमचन्द महाजनी सभ्यता के शोषण का अनुभव कर चुके थे। ‘गोदान’ में उन्होंने इनके शोषण के तरीकों को चित्रित किया है। डा. रामबक्ष अपनी पुस्तक में महाजनों की कुछ मूलभूत विशेषताओं को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि एक तो यह बला के कंजूस होते हैं। ‘तगादा’ के महाजन की मनोवृत्ति का चित्रण प्रेमचन्द ने यूँ किया है- ‘लहने का बाप तगादा है। इसी सिद्धांत के वह अनन्य भक्त थे। जलपान के बाद संध्या तक वह बराबर तगादा करते रहते थे।’’

                सामंतवाद शोषण को आत्मसात करने की व्यवस्था है। आज भी जहाँ सामंतवाद के अवशेष बचे हैं वहाँ आत्महत्याएँ कम हैं। पूँजीवादी होड़ में हार से निराश मानस आत्महत्या की तरफ बढ़ता है। आज के समय में किसानों को बस दो रोटी के बारे में नहीं सोचना। बच्चों की खर्चीली शिक्षा और मँहगी शादी के बारे में सोचना है। खेती घाटे का सौदा बन चुकी है। आज़ादी के बाद खेती की चिंता का दायित्व ‘जनतांत्रिक सरकार’ को उठाना था और किसानों की मदद करनी थी लेकिन सरकार को अपना वोट बैंक बढ़ाना है तो वह चुनाव के समय वायदों तक सीमित रह जाती है और जीत दर्ज करने के बाद लाटरी के रूप में कर्ज माफी कर देती है, मरे किसान को मुआवजा दे देती जो किसानों की समस्या का स्थायी उपाय नहीं है वह मात्र बहकावा है। किसानों को अपने सहानुभूति जाल में फँसाने का। प्रेमचन्द का होरी किसान जानता था कि उसका सिर जमींदारों के पैरों तले दबा है। वह उसे अपनी नियति अैर भाग्य मान लेता है लेकिन आज का किसान थोड़ा शिक्षित हो गया है, उसे सरकार के खोखले वादों का पता है जिसका जीता-जागता उदाहरण है, जंतर-मंतर पर किसानों का विरोध-प्रदर्शन, मध्य प्रदेश किसानों का विरोध आंदोलन और उसकी लहर अन्य राज्यों तक फैलना। यह सब आज के किसान की जागरूकता का परिणाम है लेकिन फिर भी प्रेमचन्द के होरी की तरह आज का किसान धैर्यवान व सन्तोषी नहीं है जिस कारण से वह आत्महत्या की तरफ विवश होता है।
                प्रेमचन्द तमाम कठिनइयों और बाधाओं को पार करती हुई भारतीय जनता से कहते हैं -

                ’’यह अंत नहीं है, और आगे बढ़ो और आगे बढ़ो जब तक कि रंगभूमि में विजय न हो, जब तक कि देश का कायाकल्प न हो, जब तक कि इस कर्मभूमि में गबन और गोदान के होरी और रमानाथ का त्रस्त होना बन्द न हो और हमारा देश एक नई तरह का सेवासदन, एक नई तरह का प्रेमाश्रम न बन जाऐ।’’  प्रेमचन्द का किसानों के प्रति यह आशावादी दृष्टिकोण जाहिर करता है कि वो किसानों को संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं और बिना रूके जीवन को जीने की प्रेरणा देते हैं।

                प्रेमचन्द के पात्र शहर में जाकर भी गाँव के मोह को नहीं छोड़ पाते। होरी का पुत्र गोबर जब शहर से वापस गाँव आता है तो उसे घर की हीनावस्था खलती है। गोबर को थोड़ी देर में ही घर की परिस्थिति का अन्दाजा लग जाता है। प्रेमचन्द का मन शहर की अपेक्षा गाँवों में ही रमा है। जिसका कारण उनका किसानों के प्रति लगाव और सहानुभूति था। उनकी रचना-यात्रा किसान केन्द्रित ही ज्यादा है। वे किसानों की समस्या के साथ-साथ उनका निराकरण भी खोजते हैं। प्रेमचन्द यथार्थवाद और आदर्शवाद का समन्वय, समाजवाद और पूँजीवाद का समन्वय तथा क्रांति और रूढ़िवादिता का समन्वय करते हुए चलते थे। इस दृष्टिकोण के कारण प्रेमचन्द प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थिति में भी अनुकूल समझौता करा देते थे। एक तरह से 1931 का गाँधी-इरविन-पैक्ट उनके जीवन दर्शन या दृष्टिकोण की राजनैतिक आधारशिला थी। उनके भीतर का उमड़ता हुआ आदर्शवाद इतना प्रखर है कि वह उनसे ऐसे नायक की सृष्टि करवा लेता है जो शुद्ध रूप से मानवीय आदर्शों से प्रेरित हो। प्रेमचन्द ने ‘गोदान’ में एक जगह किसान के आर्थिक शोषण का बड़ा ही व्यंगपूर्ण प्रसंग उद्धृत किया है।

                महाजन उसे पाँच रूपये देता है और कहता है कि ये दस रूपए हैं, घर जाकर गिन लेना। किसान जब जिद करता है तो महाजन बताता है-

                ‘‘--- एक रूपया, नजराने का हुआ कि नहीं -?’’
                                ‘हाँ, सरकार!’
                ‘‘एक तहरीर का -?’’
                                हाँ सरकार!
                ‘‘एक कागज का -?’’
                                ‘हाँ सरकार!’
                ‘‘एक दस्तूरी का -?’’
                                ‘हाँ, सरकार!
                ‘‘एक सूद का -?’’
                                ‘हाँ, सरकार!’
                ‘‘पाँच नकद, दस हुए कि नहीं?’’

                आधी रकम महाजन पहले से ही हड़प जाता है। उसके बाद किसान के पास आधी (पाँच) रकम भी नहीं बचती। क्योंकि कुछ और रस्में भी होती हैं। हास्य का पुट देते हुए किसान कहता है- ‘‘नहीं सरकार, एक रूपया छोटी ठकुराइन के नजराने का, एक रूपया बड़ी ठकुराइन के नजराने का, एक रूपया छोटी ठकुराइन के पान खाने का, एक रूपया बड़ी ठकुराइन के पान खाने का। बाकी बचा एक, वह आपकी क्रिया-करम के लिए’’

                अंतिम वाक्य में व्यंग्य और कटाक्ष का तीखापन गजब का है। प्रेमचन्द किसानों के कष्टों और शोषण से इतने अधिक पिघल गए हैं कि वे अपनी उमड़ती हुई भावनाओं को ऐसी ही भयानकता से व्यक्त करते है। डा.इन्द्रनाथ मदान लिखते हैं- ‘‘प्रेमचन्द पहले ऐसे भारतीय लेखक है, जिन्होंने गहराई से किसानों के जीवन का अध्ययन किया हो और जिन्होंने उसे इतनी सजीव कल्पना तथा अद्भुत कौशल के साथ चित्रित किया हो। उनका यह कार्य हिन्दी कथा-साहित्य में बेजोड़ है। ‘गोदान’ किसान के जीवन का काल्पनिक प्रतिनिधित्व करता है और अत्याचारी सरकार के साथ उसने जो मोर्चा लिया है उसका जीता-जागता स्वरूप प्रस्तुत करता है।’’

                ‘गोदान’ के होरी की महत्वपूर्ण बात यह है कि वह जीवन-पर्यन्त संघर्ष करता है। वह हारता नहीं है उसमें जिजीविषा बेजोड़ है, वह धनिया से कहता है- ‘‘तो क्या तू समझती है, मैं बूढ़ा हो गया? अभी तो चालीस भी नहीं हुए। मर्द साठे पर पाठे होते है।’’ होरी की यह जिजीविषा उसे स्फूर्ति और जोश प्रदान करती है, जीवन में संघर्ष व श्रम करने की। प्रेमचन्द का नायक होरी ही ऐसी अदम्य जिजीविषा रख सकता है मृत्यु के अलावा उसके जीवन-संग्राम का कोई अन्त नहीं कर सकता और मृत्यु भी ऐसी जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। डा. इन्द्रनाथ मदान इस सन्दर्भ में लिखते हैं-

                ‘‘होरी ऋण के बोझ से बुरी तरह दबा हुआ है। जीविका चलाने के लिए वह तीन साहूकारों से रूपया उधार लेने पर विवश हो जाता है। ऋण दिन-पर-दिन बढ़ता चला जाता है। ऋण चुकाने और मितव्ययिता से दिन काटने के लिए वह अपनी शक्ति से भी अधिक काम करता है। बहुत दिनों तक अधभूखा रहने के बाद एक दिन वह सड़क पर गिर पड़ता है और उसकी जीवनलीला समाप्त हो जाती है।’’ बावजूद इसके क्रूरता तब होती है जब रूपया माँगने वाले उसके पास आ धमक पड़ते हैं और उसकी पत्नी धनिया रोती-बिलखती हुई घर में रखे बीस आने ब्राह्मण के पवित्र हाथों पर रखती हुई कहती है- ‘‘महाराज, घर में न गाय है न बछिया, न पैसा। यही पैसे हैं, यही इनका ‘गोदान’ है।’’

                भारतीय किसान कैसे पैदा हुआ, कष्ट भोगता रहा और मर गया। वह अपनी मृत्यु द्वारा भी पीड़ित होता है। प्रेमचन्द की यह कृति युगों-युगों तक किसानों की महागाथा कहती रहेगी और किसानों को समाज के उत्पादक वर्ग के रूप में पहचानकर देश की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करेगी और समाज व साहित्य में किसानों की भूमिका को भी रेखांकित करेगी।

संदर्भ 

1.            प्रेमचन्द और उनका युग - डा॰ रामविलास शर्मा, पेज नं॰ - 97
2.            वहीं, पेज सं॰ 97
3.            गोदान - प्रेमचन्द, वाणी प्रकाशन, पेज नं॰ 5
4.            आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तिया, पृ॰ 144 - डा॰ नामवर सिंह, लोकभारती प्रकाशन,इलाहाबाद, चतुर्थ      संस्करण -   1960

5.            प्रेमचन्द और भारतीय किसान - रामबक्ष, पेज सं॰ 176,
6.            ‘गोदान’, प्रेमचन्द  - पेज नं॰ सं॰ 53
7.            ‘गोदान’, प्रेमचन्द, - पृ॰ सं॰ - 24
8.            वहीं, पृ॰ सं॰ - 24
9.            प्रेमचंद और भारतीय किसान - डा॰ रामबक्ष, पेज सं॰ 197
10.          प्रेमचन्द अैर उनका युग - डा॰ रामविलास शर्मा, पेज सं॰ - 17
11.          प्रेमचन्द एक विवेचना - इन्द्रनाथ मदान पृ॰ स॰ - 39
12.          गोदान, पृ॰ सं॰ 182
13.          प्रेमचन्द एक विवेचन - इन्द्रनाथ मदान, पृ॰ सं॰ 102
14.          गोदान, प्रेमचन्द, पृ॰ सं॰ - 6
15.          प्रेमचन्द एक अध्ययन, इन्द्रनाथ मदान- पेज सं॰-97,
16.          गोदान प्रेमचन्द, पृ॰ सं॰ – 371

                   बबली गुर्जर,शोधार्थी,जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

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