सम्पादकीय : डॉ. नीलम राठी - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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सम्पादकीय : डॉ. नीलम राठी

                          सम्पादकीय : डॉ. नीलम राठी 

   
तुलसीदास महाकवि, काव्यसृष्टा और जीवनदृष्टा थे। वे धर्मनिष्ठ समाज सुधारक थे। अपने साहित्य में उन्होंने समाज का आदर्श प्रस्तुत किया, ऐसा महाकाव्य रचा, जो हिन्दी भाषी जनता का धर्मशास्त्र ही बन गया। तुलसी की लोक दृष्टि अलौकिक थी। उन्होने आदर्श की संकल्पना को यथार्थ जीवन में उतारा। उनके द्वारा रचे गए गौरव ग्रंथ हिन्दी साहित्य के रत्न हैं। सौन्दर्य और मंगल का, प्रेय और श्रेय का, कवित्व और दर्शन का असाधारण सामंजस्य उनके साहित्य की महती विशेषता है। यह तुलसी साहित्य की विराटता ही है कि उसकी सबसे अधिक टीकाएँ रची गई हैं। सबसे अधिक आलोचना ग्रंथ और सबसे अधिक शोध प्रबंधों का प्रणयन तुलसी पर ही है। तुलसीदास के युग का प्रभाव, काव्य सिद्धान्त, काव्य सौष्ठव, प्रतिपाद्य विषय, समन्वय साधना उनके गौरव ग्रंथों से अभिव्यक्ति पाती हैं। नारी भावना पर अभिव्यक्त विचारों के लिए तुलसीदास जी आलोचना के केंद्र रहे हैं। तुलसीदास जी अपने ग्रन्थों में अभिव्यक्त भावों, विचारों और काव्य सौंदर्य एवं भक्ति दर्शन और राम राज्य की परिकल्पना के कारण आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। यही कारण है कि मैंने भारतीय संस्कृति के उन्नायक लोकनायक तुलसीदास विषय पर गहन - गंभीर शोधरक लेखों के प्रकाशन करने की योजना बनाई है।

      गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म 1553 वि0 स0 को बाँदा जिले के राजापुर ग्राम में हुआ था। जिसके पक्ष में शिव सिंह सेंगर, रामगुलाम द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी, माताप्रसाद गुप्त, उदयभानु सिंह और अमृत लाल नागर जी खड़े हैं। बेनीमधाव जी ने गोसाईं चरित में इनके जीवन काल के विषय में लिखा है :

पंद्रह सौ चौवन विषै, कालिंदी के तीर।
सावन शुक्ला सप्तमीतुलसी धरयो सरीर।।

एवं मृत्यु के विषय मे लिखा :

संवत सोलह सो असि, असि गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमीतुलसी तज्यो शरीर।।
अथवा

श्रावण श्यामा तीज शनि तुलसी तज्यो शरीर ।

तुलसीदास जी ने एक दर्जन ग्रन्थों की रचना की जिनमें - रामचरितमानस, रामलला नहछू, वैराग्य संदीपनी, बरवै रामायण, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामाज्ञा प्रश्न, कवितावली, गीतावली, कृष्ण गीतावली, विनय पत्रिका, दोहावली प्रमुख हैं। तुलसीदास जी भारतीय संस्कृति के बहुत बड़े पोषक रहे ,धार्मिक दृष्टा रहे, वहीं उन्होने समाज की भी अनदेखी नहीं की, समाज के कष्टों से भी रूबरू हुए। उस समय भारतीय समाज ऊँच–नीच, जाति, वर्ग, इस्लामी शासकों के आतंक और बाल विवाह, पर्दा प्रथासती प्रथा तथा जीवन से पलायनवादी दृष्टिकोण आदि ने जहां समाज को खोखला बना दिया था, वहीं जन सामान्य की जर्जर आर्थिक स्थिति,निर्धनता,विपन्नता और मजबूरी को चित्रित करते हुए उन्होंने कहा :

 खेती न किसान को ,भिखारी को न भीख बलि ।

बणिक को बनिज न चाकर को चाकरी ।

जीविका विहीन लोग सिद्धमान सोच बस ,

कहें एक एकन सौं ,कहाँ जाय का करी।

तुलसीदास जी ने समाज की इस स्थिति का सबसे बड़ा कारण तत्कालीन शासकों का विलासी और पाप पूर्ण जीवन व्यतीत करने को बताया। सत्ता और तलवार के बल पर इस्लाम शासक इस्लाम फैलाने के लिए कृत संकल्प थे। जिस कारण जनता और अधिक आक्रांत थी। इसीलिए तुलसीदास जी ने लोक मंगल की कामना से युक्त भगवान राम जैसे मर्यादा के रक्षक तथा प्रजा पालक राजा राम तथा राम राज्य की कामना की। तुलसीदास जी जहां समाज चिंतक और समाज सुधारक थे वहीं बहुत बड़े धार्मिक तथा दार्शनिक जीवन दृष्टा भी थे। उनके समय तक हिन्दू समाज अनेक धार्मिक संप्रदायों में बंट गया था यथा - सिद्धोंनाथ योगियों, शैवशाक्तअद्वैतवादी वैष्णव, द्वैतवादी वैष्णवों के आपसी विरोधों ने धार्मिक आस्था में पूरी तरह वैमनस्य ला दिया था। इसके उपचार स्वरूप तुलसीदास जी ने परस्पर विरोधी विचारों को अपने जीवन दर्शन से एक साथ लाने का प्रयास किया। उन्होंने अपनी रामचरित मानस में राम तथा शिव को परस्पर एक दूसरे का प्रशंसक दिखाया ,जिससे शैव तथा शाक्तों को एक दूसरे के निकट लाया जा सके। उन्होंने अपनी दार्शनिक मान्यताओं में सगुण, निर्गुण,ज्ञान भक्ति तथा कर्म का औचित्य तथा महत्व स्थापित किया।

सगुनहि अगुनहि नहि कछु भेदा ,गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा ।
अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥

  इन्होंने राम भक्ति के माध्यम से न केवल ज्ञान भक्ति और कर्म का समन्वित दर्शन प्रस्तुत किया अपितु समस्त संसार को सियाराममय ही कर दिया-

सिया राम मय सब जग जानी
करउ प्रणाम जोरि जुग पानि ॥

जो शुद्ध रूप से मानवतावादी दर्शन है।

तुलसीदास के आविर्भाव से बहुत पहले भारतीय जनमानस में रामका चरित्र व्याप्त था महर्षि वाल्मीकि से पूर्व वाचिक और श्रुति परम्परा में राम की कथा और उनका चरित्र रचा बसा था। महर्षि वाल्मीकि कृत रामायणमें राम का स्वरुप मानवीय गुणों से युक्त पुरुषोत्तम के रूप में चित्रित है। ‘अध्यात्म रामायण में राम ब्रह्म-स्वरुप थे। पुराणों में राम विष्णु के दस अवतारों में से एक माने गए। संत कबीरदास ने राम को निर्गुण ब्रह्म का प्रतीक माना। इन सबके बाद आने वाले महाकवि तुलसीदास ने अपने पूर्ववर्ती कवियों के काव्य में व्यक्त राम की अवधारणा से प्रेरित और प्रभावित होते हुए राम की कथा और उनके स्वरुप को तद्युगीन सन्दर्भों में पुनर्व्याख्यायित करने का प्रयास किया।

      तुलसी-काव्य के मर्म को समझने और समझाने की यात्रा निरंतर जारी है। तुलसी की पहुँच घर-घर में है, या वे व्यापक समाज में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। तुलसीदास के सम्पूर्ण कृतित्व में अब भी वह प्रेरक और सम्मोहिनी शक्ति विद्यमान है जो पहले लिखे और कहे गए से आगे बढ़कर सोचने और उसे अभिव्यक्त करने के लिए पाठकों और आलोचकों को निरंतर प्रेरित करते हुए सक्रिय बनाए रखे हुए है। भक्ति के कारण अंत:करण को जितनी भी शुभ वृत्तियाँ प्राप्त होती हैं, उन सबको विनयपत्रिकामें देखा जा सकता है। तुलसी की रचनाओं के प्रचलित होने का एक कारण यह भी है कि उनमें संगीत के प्रति गहरा रुझान दिखाई देता है। उनकी राग-रागिनियाँ रसानुकूल, समयानुकूल, भावानुकूल और शास्त्र-सम्मत हैं। शब्द-विधान लय-ताल से परिपूर्ण एवं वर्ण-विन्यास सुमधुर हैं। इनकी रचनाओं में भावनाओं का तीव्र आवेग संगीत के यथोचित प्रयोग से संभव हुआ है। संगीत में राग और ताल दोनों का ही महत्त्व है। तुलसी ने प्रत्येक राग के स्वरूप के अनुसार ही छंदों का भी उपयुक्त विधान किया। इनकी संगीत मर्मज्ञता का साक्षात् प्रमाण विनयपत्रिकाहै जिसमें गीति-तत्वों का सुंदर-सरस निर्वहण हुआ है। इसमें गीतिकाव्य की समस्त विशेषताएं संगीतात्मकता, आत्माभिव्यक्ति, संक्षिप्तता, अनुभूति की एकता और भावानुरूप-भाषा शैली मौजूद हैं। राग-रागिनियों के आधार पर काव्य सृजन ने इसमें अद्भुत संगीतिकता और गेयता प्रदान की है। एक प्रसंग में भगवान नारद से कहते हैं, जहां मेरे भक्त प्रेमपूर्वक मेरा कीर्तन करते हैं, वहीं मैं निवास करता हूँ ।

नाहं बसामी वैकुंठे योगिनां हृदये न च ।
 मद्भक्ता यत्र गायन्ति यत्र तिष्ठामि नारद ।।

      मध्यकाल में तुलसी के समय तक काव्य भाषा के रूप में अवधी और ब्रजभाषा का प्रचलन था। तुलसी ने दोनों में काव्य रचना की। तुलसी की काव्य भाषा के सम्बन्ध में शुक्ल जी ने अपना मत इस प्रकार व्यक्त किया है –“सबसे बड़ी विशेषता गोस्वामी जी की है भाषा की सफाई और वाक्य रचना की निर्दोषता जो हिंदी के और किसी कवि में नहीं पाई जाती।  इतनी सधी हुई भाषा और किसी की नहीं है। सारी  रचनाएँ इस बात का उदाहरण हैं।”  तुलसी ने मानस में रामकथा अवधी में कही है। कवितावली, गीतावली  और विनयपत्रिका  की रचना ब्रजभाषा में की।

कवितावली की भाषा में तुलसी ने लोक में प्रचलित मुहावरों, लोकोक्तियों और देशज शब्दों का प्रयोग किया है। लोक में प्रचलित ब्रजभाषा का प्रयोग मिलता है। कवितावली में तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। कवितावली में डिंगल भाषा का भी प्रयोग मिलता है।

‘परहित सरिस धरम, नहि भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधिमाइ’ जैसे एक संस्कारित जीवन को चलाने के लिए आवश्यक जीवन मूल्यों का समावेश भी तुलसी के साहित्य में है।

रामचरितमानस लोक-शिक्षा, लोक-प्रेरणा, लोकोपदेश, लोक-व्यवहार तथा लोकाचार का विश्व कोश हैI गोस्वामी तुलसीदास के इस महान ग्रन्थ में पाठकों को लोकानुभव जन्य अनेक ऐसे सदुपदेश उपलब्ध होतें हैं जिनके द्वारा समाज बुराइयों से सजग रहकर भलाई की ओर सरलता से अग्रसर हो सके और अपने जीवन तथा समाज को सुखी बना सकेI उन्होंने रामचरितमानस में पग-पग पर नीति-निरूपण करते हुए समाज को सदाचार, मर्यादापालन, नियम-पालन आदि की शिक्षा तथा प्रेरणा दी है। भारतीय संस्कृति में सत्य, अहिंसा, धैर्य, क्षमा, मैत्री, अनासक्ति, इंद्रिय निग्रह, पवित्रता, निश्छलतात्याग, उदारता, विराटसत्ता के प्रति गहन आस्था, मानवता, प्रेम, परोपकार लोक-संग्रह आदि जिन सात्विक भावों का सर्वाधिक प्रचार एवं प्रसार दृष्टिगोचर होता है वे सभी भाव तुलसी दास के साहित्य में विद्यमान होने के कारण आज तक प्रासंगिक है।

 इस अंक में चयनित सभी महत्वपूर्ण आलेख हैं। जो तुलसी साहित्य के विभिन्न पक्षों पर केन्द्रित हैं। इस विशेषांक के द्वारा तुलसी के विभिन्न पक्ष और पहलू को समझा जा सकता है. हमारी कोशिश है कि पाठकों को तुलसी से सम्बन्धित एक बेहतर अध्ययन सामग्री उपलब्ध हो. इस अंक को सफल बनाने में जिन लेखकों का योगदान है, मैं उन सभी की आभारी हूँ. तुलसीदास पर आयोजित संगोष्ठी में हमारे विद्वान् वक्ताओं ने जो भाषण दिए, उसमें से कुछ वक्ताओं के भाषण का लिप्यान्तरण इस अंक में मौजूद है. मैं उन सभी विद्वानों के प्रति आभार व्यक्त करती हूँ. भाषणों का परिश्रमपूर्ण लिप्यान्तरण करने वाले मेरे सभी सहयोगियों का भी धन्यवाद जिनके सहयोग से यह अंक अपना अन्तिम रूप ले सका.

इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती (प0)दिल्लीद्वारा 31 जुलाई 2017 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्राप्त शोध आलेखों को पत्रिका में प्रकाशित किया जा रहा है। पत्रिका में संग्रहीत विचार एवं तथ्यों के लिए लेखक स्वयं जिम्मेदार है।

इस अंक हेतु चित्र श्रद्धा सोलंकी ने उपलब्ध कराया है. जिससे अंक की खूबसूरती और बढ़ गई है. मैं इस होनहार चित्रकार श्रद्धा सोलंकी की आभारी हूँ.

मैं ‘अपनी माटी’ पत्रिका और उसकी पूरी टीम को धन्यवाद देना चाहूंगी. जिसने अतिथि सम्पादक के रूप में यह महत्वपूर्ण दायित्व निभाने का अवसर दिया। हिंदी के मशहूर कवि गोपालदास 'नीरज' हमारे बीच नहीं रहे उन्हें श्रद्धांजलि.

                                                डॉ. नीलम राठी

अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-4,अंक-27 तुलसीदास विशेषांक (अप्रैल-जून,2018)  चित्रांकन: श्रद्धा सोलंकी

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