शोध आलेख : तुलसी-साहित्य के प्रचार प्रसार में नवल किशोर प्रेस की भूमिका/ हिमांशु बाजपेयी - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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शोध आलेख : तुलसी-साहित्य के प्रचार प्रसार में नवल किशोर प्रेस की भूमिका/ हिमांशु बाजपेयी

      तुलसी-साहित्य के प्रचार प्रसार में नवल किशोर प्रेस की भूमिका 

शोध सारांश

प्रस्तुत शोधपत्र तुलसीदास के साहित्य के प्रसार-प्रसार में लखनऊ की ऐतिहासिक नवल किशोर प्रेस के योगदान की पड़ताल करता है. तुलसीदास भारत के सबसे बड़े कवियों में से एक है. हिन्दी अपने सैकड़ों सालों के विकास क्रम में हज़ारों कवियों से होकर गुज़री है, मगर तुलसीदास से ज़्यादा लोकप्रिय कवि हिन्दी में कोई नहीं. तुलसीदास का साहित्य उनके जीवनकाल में लोगों के बीच अपनी जगह बनाने लगा था. मगर इसके प्रचार प्रसार में मुद्रण तकनीक का भी बड़ा योगदान है. हिन्दू और इस्लाम दोनो ही धर्मों के भक्ति साहित्य को आम जन तक पहुंचाने के लिए नवल किशोर प्रेस ने बड़ा काम किया है. नवल किशोर प्रेस ऐसी पहली प्रेस थी जो तुलसीदास के साहित्य को योजनाबद्ध तरीक़े से छापकर लोगों के बीच ले गयी. प्रस्तुत शोधपत्र तुलसी साहित्य के सन्दर्भ में प्रेस के प्रकाशन कार्य का आलोचनात्मक अध्ययन करताहै.


प्रस्तावना-


हिन्दुस्तानी अदब की दुनिया में मुंशी नवल किशोर और उनके प्रेस का नाम कभी भुलाया नहीं जा सकता. उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में मुंशी नवल किशोर प्रेस ने भारतीय साहित्य के क्षेत्र में अनुपम योगदान दिया है. उर्दू के बड़े शाइरों का दीवान छापना हो या संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों का उर्दू और अरबी फारसी में अनुवाद छापना हो
, या उर्दू अरबी फारसी ग्रंथों को हिन्दी और संस्कृत में छापना हो या कुरआन शरीफ के अलग अलग भाषाओं में सस्ते संस्करण छाप कर इसे आम मुसलमान के लिए सुलभ बनाना हो अथवा अपने अख़बारों के ज़रिए सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना फैलाना हो..नवल किशोर प्रेस ने ये काम कुछ इस तरह से अंजाम दिए हैं कि ये अपनी मिसाल खुद हैं. हिन्दुस्तानी साहित्य में इसी महान योगदान के लिए इतिहासकार महमूद फारूक़ी ने उन्हे अद्भुत व्यक्तित्व बताया है.(फारूक़ी,2010) नवल किशोर प्रेस का एक कारनामा भक्ति साहित्य का विपुल प्रकाशन भी है. हिन्दी भक्त कवियों में तुलसीदास सबसे प्रमुख हैं. भक्ति साहित्य के प्रकाशन की कोई भी परियोजना तुलसीदास का साहित्य प्रकाशित किए बिना नहीं हो सकती थी. साथ ही नवल किशोर प्रेस लखनऊ यानी कि अवध क्षेत्र में स्थित थी, तुलसी जहां के लोक में रचे-बसे हैं, इसलिए भी प्रेस का तुलसीदास के साहित्य पर ख़ास तवज्जो स्वाभाविक है.  
 
शोध उद्देश्य-

प्रस्तुत शोध का उद्देश्य तुलसीदास के साहित्य के प्रचार प्रसार में नवल किशोर की भूमिका को तलाशना है.

शोध-प्रविधि-
प्रस्तुत शोध-पत्र के लेखन में गुणात्मक अन्तर्वस्तु विश्लेषण शोध प्रविधि का इस्तेमाल किया गया है.

मुंशी नवल किशोर प्रेस: एक परिचय-

        मुंशी नवल किशोर भारतीय साहित्य जगत के अमर पुरूष हैं. उन्होने 22 साल की अल्पायु में लखनऊ में जो प्रेस शुरू किया उसने अगले 92 साल तक ऐसी ऐसी चीज़ें छापीं कि पूरी दुनिया आज इसका लोहा मानती है. ग़ालिब ने अपने एक पत्र में लिखा है कि मुंशी नवल किशोर के छापेखाने का क्या कहना जिसका दीवान छापते हैं, आसमान पर पहुंच जाता है.(ग़ालिब,2010)
अपने छापेखाने के साथ साथ अपने सामाजिक राजनैतिक सरोकारों के लिए भी विख्यात मुंशी नवल किशोर का जन्म 3 जनवरी 1836 को अपनी ननिहाल मथुरा के रीढ़ा गांव में हुआ था.(स्टार्क,2012). उनका परिवार एक समृद्ध ज़मीनदार परिवार था. 1858 में नवल किशोर ने लखनऊ में अपना खुद का छापाखाना शुरू किया. मुंशी नवल किशोर ने जब अपना प्रेस शुरू किया तो सरकारी काम उन्हे जल्द मिलने लगा. अवध अख़बार की इशाअत भी इसी साल शुरू हुई.

         अब्दुल हलीम शरर ने अपनी मशहूर किताब गुज़िश्ता लखनऊ में भी नवल किशोर प्रेस का ज़िक्र किया है. शरर के मुताबिक अरबी फारसी की जैसी किताबों को जिस व्यावसायिक स्तर पर छाप दिया उसे छापने के लिए हिम्मत चाहिए.(शरर,1965). नवल किशोर प्रेस ने उर्दू-अरबी फारसी ही नहीं बल्कि हिन्दी-संस्कृत की किताबें भी छापना शुरू किया जो लखनऊ में नया चलन था. लखनऊ आने के बाद नवल किशोर ने अपनी प्रेस सबसे पहले आगा मीर ड्योढ़ी पर लगाई. नाम हुआ-  मतबा-ए-अवध अख़बार. फिर काम बढ़ने पर इसे रकाबगंज और गोलागंज में स्थानांतरित किया. 1861 में नवल किशोर प्रेस को पहली बार इंडियन पीनल कोड का उर्दू तर्जुमा छापने का ऑर्डर मिला. इसकी 30,000 प्रतियां छपीं और इसके बाद से नवल किशोर की गणना बड़े प्रकाशकों में होने लगी.(भार्गव,2012). नवल किशोर प्रेस को बड़ी मज़बूती कुरआन एवं दूसरे धर्मग्रंथों को छापने से भी मिली. पाठ्य पुस्तकें, रजिस्टर और दूसरे कानूनी काग़ज़ात तो अंग्रेज़ों के आदेश पर वे छापते ही थे. इसके अलावा उन्होने लखनऊ में पहली बार हिन्दी और संस्कृत पुस्तकों को भी बड़े पैमाने पर छापना शुरू किया. हालांकि उस वक्त भी लखनऊ में हिन्दी और संस्कृत की किताबें छापने वाली ये अकेली प्रेस नहीं थी. पंडित बृजनाथ की समर-ए-हिन्द प्रेस और पंडित बिहारीलाल की गुलज़ारे हिन्द प्रेस हिन्दी संस्कृत की किताबें छाप रहीं थीं.इस प्रेस की सबसे ज़्यादा शोहरत हिन्दू एवं इस्लाम धर्म के धर्मग्रंथों और भक्ति साहित्य को एक समान श्रद्धा और प्रतिबद्धता के साथ छापने के कारण हुई. इसमें तुलसीदास का साहित्य सर्वप्रमुख था.

तुलसीदास साहित्य एवं नवल किशोर प्रेस
: एक विश्लेषण-

      गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि हैं. वे भक्त कवियों में शिरोमणि हैं. उनकी साहित्यिक कृतियों को हिन्दी समाज में अविश्वसनीय आदर मिला है. उनके बारे में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है कि यह एक कवि ही हिन्दी को प्रौढ़ साहित्यिक भाषा सिद्ध करने के लिए काफी है. आचार्य़ शुक्ल के अनुसार-
तुलसीदास जी के रचना विधान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपनी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा के बल से सबके सौन्दर्य की पराकाष्ठा अपनी दिव्य वाणी में दिखाकर साहित्य क्षेत्र में प्रथम पद के अधिकारी हुए. हिन्दी कविता के प्रेमी मात्र जानते हैं कि उनका व्रज और अवधी दोनो भाषाओं पर समान अधिकार था. व्रजभाषा का जो माधुर्य हम सूरसागर में पाते हैं, वही माधुर्य और भी संस्कृत रूप में हम गीतावली और कृष्णगीतावली में पाते हैं. ठेठ अवधी की जो मिठास हमें जायसी के पद्मावत में मिलती है, वही जानकी मंगल, पार्वतीमंगल, बरवै रामायण और रामललानहछू में हम पाते हैं. यह सूचित करने की आवश्यकता नहीं कि न तो सूर का अवधी पर अधिकार था और न जायसी का व्रजभाषा पर.” (शुक्ल,2015) तुलसीदास द्वारा लिखे गए प्रमुख ग्रंथों में दोहावली, गीतावली, कवितावली, रामचरित मानस, विनय पत्रिका, रामलला नहछू, वरवै रामायण, पार्वती मंगल, जानकी मंगल और हनुमान बाहुक आदि हैं. मुद्रित माध्यमों के ज़रिए जनता के बीच जाने से पहले तुलसीदास का तमाम साहित्य वाचिक परंपरा और हस्तलिखित प्रतियों के माध्यम से जनता के बीच पहुंचा. तुलसी साहित्य के प्रेस द्वारा छपने का आरंभ 1810 में कलकत्ता से माना जाता है.(स्टार्क, 2012) जब उनका सबसे महानग्रंथ सबसे पहले छपे हुए स्वरूप में लोगों के सामने आया. इसके बाद कई दूसरी प्रेसों ने भी तुलसीदास की रचनाएं छापीं. मगर तुलसी साहित्य के प्रकाशन में उल्लेखनीय काम पहली बार तब हुआ जब लखनऊ के नवल किशोर प्रेस ने इसको योजनाबद्ध तरीके से छापना शुरू किया.  

           लोकमान्यताओं के अनुसार लखनऊ लक्ष्मण का बसाया हुआ शहर है. ये उस मशहूर अवध भूभाग की राजधानी है राम और रामचरित मानस जहां के लोक में रचे बसे हैं. तुलसीदास से इस शहर का अटूट रिश्ता है. ऐसा माना गया है कि तुलसीदास ने अपने महान ग्रंथ रामचरित मानस का एक हिस्सा यहीं छाछी कुआं मंदिर में बैठकर पूरा किया. तुलसीदास ने ख़ुद इस शहर में रामलीलाओं का आयोजन शुरू करवाया. (प्रवीन,2003) लखनऊ में प्रेस स्थापित करने के बाद मुंशी नवल किशोर के लिए तुलसीदास से निरपेक्ष रह पाना संभव नहीं था. यूं भी मुंशी नवल किशोर तमाम भाषाओं के साहित्य एवं संस्कृति के विद्वान थे. अंग्रेज़ों की तरफ से मिले छपाई के ठेकों और अवध अख़बार के साथ धार्मिक साहित्य का प्रकाशन नवल किशोर प्रेस की सबसे प्रमुख परियोजना थी. जो कालांतर में उसकी शोहरत की भी सबसे बड़ी वजह बनी.ऐसे में व्यवसायिक और साहित्यिक दोनो दृष्टियों से तुलसीदास को नज़र-अंदाज़ नहीं किया जा सकता था. मुंशी नवल किशोर और उनके प्रेस के लिए तुलसीदास कितने महत्त्वपूर्ण थे इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब मुंशी नवल किशोर ने अपने प्रेस में हिन्दू भक्ति साहित्य के प्रकाशन की परियोजना शुरू की तो इसके अन्तर्गत सबसे पहली किताब उन्होने तुलसीदास की रामचरित मानस ही छापी.यक़ीनन इस परियोजना की शुरुआत किसी दूसरी किताब से की भी नहीं जा सकती थी. नवल किशोर प्रेस ने पहली बार रामचरित मानस 1863 में छापा. ये लिथोग्राफिक छपाई वाला एक इलस्ट्रेटेड संस्करण था. इसकी किताब प्रेस के सबसे बेहतरीन कातिबों में से एक पंडित मुरलीधर से करवाई गयी थी. नवल किशोर प्रेस का ये पहला रामचरित मानस पाठकों द्वारा पसंद किया गया. इसके दो साल बाद ही यानी 1865 में प्रेस ने रामचरित मानस का एक नया लिथो संस्करण प्रकाशित किया. इसके प्रायोजक पंडित दीन दयाल त्रिपाठी और कातिब पंडित मुरलीधर थे. यद्यपि 1863 और 1865 के संस्करण एक ही कातिब ने तैयार किए थे फिर भी दोनो अपनी किताब की शौली और शान में निराले थे. प्रेस द्वारा इस बात का ख़ास ध्यान रखा गया था कि इन्हे पढ़ते वक़्त पाठकों को नएपन का अहसास होता रहे. तुलसी साहित्य का अधिक से अधिक प्रचार प्रसार हो सके, साथ ही वो आम आदमी के घरों में किसी धर्मग्रंथ की तरह प्रतिष्ठित हो सके इसके लिए नवल किशोर प्रेस ने एक रणनीति के तहत रामचरित मानस का दाम सामान्य से काफ़ी कम रखा. रामचरित मानस के प्रचार प्रसार के लिए नवल किशोर प्रेस किस हद तक प्रतिबद्ध थी इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1869 में उस समय की अत्याधुनिक टाइपसैट तकनीक से छपी 600 से अधिक पन्नों की इलस्ट्रेटेड हार्ड-बाउंड रामचरित मानस का दाम सिर्फ तीन रूपए था.(स्टार्क,2012)

        नवल किशोर प्रेस ने जो सिलसिला तुलसीदास की रामचरित मानस छापकर शुरू किया था वो तुलसीदास की अन्य महान कृतियों के प्रकाशन के साथ आगे बढ़ता रहा. तुलसी साहित्य को उच्च गुणवत्ता के साथ, कम दाम में बड़े स्तर पर छापना मुमकिन हो इसलिए प्रेस ने ख़ासतौर पर उस ज़माने के धनाढ्य साहित्य रसिकों को प्रायोजक भी बनाया. ऐसे प्रायोजकों में लखनऊ के पंडित दील दयाल त्रिपाठी और अयोध्या के महाराजा मानसिंह प्रमुख थे. नवल किशोर प्रेस पहली ऐसी प्रेस थी जिसने हिन्दी के दो सबसे बड़े भक्त कवियों सूरदास और तुलसीदास के सम्पूर्ण वांग्मय को जनता के सामने लाने की परियोजना को पूर्ण किया. ये परियोजना तुलसीदास से होते हुए सूर-साहित्य तक पहुंची. स्टार्क के मुताबिक-
‘’तुलसीदास और सूरदास पर केन्द्रित नवल किशोर प्रेस की परियोजना किसी व्यावसायिक प्रकाशन संस्थान द्वारा मध्यकालीन वैष्णव साहित्य के इन दो महान हस्ताक्षरों की संकलित रचनाओं को जनता तक पहुंचाने के सबसे पहले प्रयासों में थी.’’ (स्टार्क,2012). रामचरित मानस के प्रकाशन की सफलता के बाद नवल किशोर प्रेस ने एक के बाद एक तुलसीदास की कई रचनाएं छापीं. 1864 में दोहावली, 1868 में हनुमान बाहुक, 1870 में गीतावली, 1874 में कवितावली और कवित्त रामायण 1876 में विनयपत्रिका और इसी साल विनयपत्रिका की शिवप्रसाद सिन्हा कृत टीका रामतत्वबोधिनी भी प्रकाशित की. हर किताब के प्रथम प्रकाशन के बाद कई संस्करण और कई वर्ज़न निकले. प्रेस ने अलग अलग रंग-रूप, साज सज्जा और कलात्मकता वाले एक ही किताब के कई संस्करण निकाले. ये पहली बार था जब किसी मुख्यधारा की किसी व्यावसायिक प्रेस ने तुलसी साहित्य को इस स्तर पर छापा था. 

           तुलसी साहित्य को जन जन तक पहुंचाने के लिए लोगों को उसका मर्म समझाना भी ज़रूरी था. तुलसी के ग्रंथ मध्यकाल में लिखे गए थे. उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के बहुत से पाठकों के लिए तुलसी की रचनाओं को समझना मुश्क़िल होता था. आम जन तुलसी साहित्य को आसानी के साथ समझकर उससे आनंदित हो सके इसके लिए नवल किशोर प्रेस ने तुलसी के मूल ग्रंथों के अलावा उनकी किताबों के भावार्थ, टीका, अनुवाद और कथा-रूपांतर भी प्रकाशित किए. ये सारा काम इतने सुनियोजित तरीक़े से किया गया कि आम जनता में तुलसी साहित्य के प्रति एक नई चेतना का निर्माण हुआ.(भार्गव,2012) जानकी प्रसाद की रामनिवास रामायण और रामसखे की नृत्य राघव में तुलसी की रामकथा को ही आधार बनाया गया था. 1882 में नवल किशोर प्रेस ने ही सबसे पहले रामचरित मानस की महंत रामचरणदास कृत टीका प्रकाशित की. ये रामचरित मानस की पहली ज्ञात टीका थी जो जिसका लेखनकाल 1805 माना जाता है. प्रेस ने ख़ासतौर पर अयोध्या के इसके प्रकाशनाधिकार ख़रीद कर पहली बार इसे किताब रूप में छाप कर जनता तक पहुंचाया. तुलसी और रामभक्ति काव्य से सम्बन्धित प्रकाशन में प्रेस को रीवा के राजा विश्वनाथ सिंह से बहुत मदद मिली जो कि रामभक्ति के मर्मज्ञ थे. 1873 तक आते आते नवल किशोर प्रेस सिर्फ तुलसीदास की रामचरित मानस की पचास हज़ार प्रतियां बेच चुकी था. इसके अलावा प्रेस से छपीं मानस की टीकाएं भी बहुत चर्चित हुईं थी. इनमें सुखदेवलाल की मानसहंसभूषण(1866), रघुनाथदास की रामायणसटीक जिसमें 1875 से 60 पेज का रामायण शब्दार्थकोष भी जुड़ गया था, रामानंद लहरी(1882) और ईश्वरमिश्र की मानसद्वीपिका (1894) बहुत मशहूर हुई. इसके अलावा प्रेस ने ख़ासतौर पर तुलसीदास और उनकी रचनाओं से आम आदमी को परिचित कराने के लिए गद्य में भी बहुत सी किताबें छापीं जिनमें तुलसी और उनकी रचनाओं का परिचय गद्य में होता था. इन किताबों ने न सिर्फ तुलसीदास बल्कि उनके साहित्य के बारे में जनता की समझ को बढ़ाने में अमूल्य योगदान दिया. क्योंकि इन किताबों में तुलसीदास पर तो विस्तार से बात होती ही थी साथ ही उनके साहित्य का आलोचनात्मक विश्लेषण भी गद्य में होता था. इस परियोजना की जिम्मेदारी बाराबंकी के पंडित बैजनाथ ने संभाली. नवल किशोर प्रेस को तुलसी के महात्म का अंदाज़ा था. प्रेस इस बात को समझती थी कि तुलसी जनता में इस तरह से रचे बसे हैं कि उनसे जुड़ा कोई भी नया प्रयास जनता हाथो-हाथ ले सकती है. 1878 से 1892 के बीच तुलसीदास की 13 अलग अलग रचनाओं पर नवल किशोर प्रेस ने टीका और आलोचनात्मक ग्रंथ छापे.(स्टार्क,2012). तुलसी साहित्य के प्रचार प्रसार में नवल किशोर प्रेस ने एक और योगदान विभिन्न भाषाओं में तुलसी साहित्य के अनुवाद प्रकाशित करके दिया. प्रेस ने 1880 में रामचरित मानस का एफ.एस ग्रोस द्वारा किया गया बहुचर्चित अंग्रज़ी अनुवाद प्रकाशित किया. इसके साथ ही तुलसी रामायण को आधार बनाकर उर्दू में लिखी गयी ख़ुशतर रामायण, अतहर रामायण, फरहत रामायण का प्रकाशन भी नवल किशोर प्रेस से होता रहा.(नाहीद,2006)

निष्कर्ष- 

उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर ये बात रेखांकित होती है कि तुलसी साहित्य के प्रचार प्रसार में नवल किशोर प्रेस का महान योगदान है. तुलसी साहित्य को सुव्यवस्थित तरीके से मुद्रित रूप में जनता तक पहुंचाने के लिए के सबसे पहला और सबसे मज़बूत प्रयास नवल किशोर प्रेस ने ही किया था. इस तरह तुलसी साहित्य के क्षेत्र में भी नवल किशोर एक उन्नायक की तरह याद रखे जाने योग्य व्यक्तित्व हैं. तुलसी की तकरीबन सभी किताबों का प्रकाशन, हर किताबों के कई कई संस्करण, टीका, परिचयात्मक एवं आलोचनात्मक ग्रंथ एवं अनुवाद आदि के प्रकाशन के साथ नवल किशोर प्रेस ने तुलसी साहित्य के सन्दर्भ में बहुआयामी एवं बहु-प्रशंसनीय योगदान दिया है.       

सन्दर्भ:


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Sharar, Abdul Haleem. Guzishta Lucknow. New Delhi: National Book Trust, 1965.
Stark, Ulrike. An Empire Of Books. Ranikhet: Permanent Black, 2012.

     (हिमांशु बाजपेयी, पीएचडी. शोधार्थी,जनसंचार विभाग, म.गां. अं. हिं. वि. वर्धा- महाराष्ट्र)
अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-4,अंक-27 तुलसीदास विशेषांक (अप्रैल-जून,2018)  चित्रांकन: श्रद्धा सोलंकी

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