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आलेख:आरम्भिक हिंदी उपन्यासों में चित्रित मुस्लिम समाज/खुशबू

                       आरम्भिक हिंदी उपन्यासों में चित्रित मुस्लिम समाज
     
(गूगल से साभार)
हिंदी साहित्य में उपन्यास लेखन की परंपरा उस दौर में शुरू हुई, जब भारत पूरी तरह अंग्रेजों का गुलाम हो चुका था और भारतीय समाज राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों एवं धार्मिक-सांस्कृतिक संघर्षों के दौर से गुजर रहा था। यह ऐसा दौर था, जब विभिन्न आंदोलनों द्वारा भारतीय जनता को संगठित किया जा रहा था।इस प्रयास में एक तरफ जातीय गौरव को जगाया जा रहा था, तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय चेतना को विकसित करने का प्रयास जारी था। इस सब के पीछे एक मात्र उद्देश्य स्वाधीनता आन्दोलन में आम जनता की सहभागिता को सुनिश्चित करना था। ऐसी तमाम कोशिशों में सामाजिक चिंतकों के साथ-साथ  साहित्यकारों द्वारा भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई गयी।इसके परिणामस्वरूप हिंदी साहित्य में अंग्रेजों की लुट, शोषणवादी व्यवस्था, सामाजिक अंधविश्वासों पर गम्भीरता से लिखा गया। लेकिन बहुत जल्दी ही धर्म के सवाल ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच खाई पैदा की। धर्म के इस सवाल ने समाज के साथ-साथ भाषा को भी बाँट दिया। जिसका शिकार हिंदी साहित्य को होना पड़ा। हिंदी के अनेक साहित्यकारों द्वारा आम बोलचाल की भाषा  (हिन्दुस्तानी)से अरबी-फारसी की बोलचाल के सहज शब्दों को भी बाहर किया गया।इसकी जगह पर संस्कृतनिष्ठ हिंदी को प्रमुखता दी गई। इस षड्यंत्र से हिंदी साहित्य में खेमेबाजी भी शुरू हुई। हिंदी और उर्दू में भाषा को लेकर एक दूसरे को नीचा दिखने की मनोवृत्ति पैदा हुई।इस संबंध में वीर भारत तलवार लिखते हैं-‘‘उन्नीसवीं सदी के नवजागरण में हुए हिंदू-मुस्लिम धार्मिक सुधार आंदोलनों को शुद्धतावादी और फंडामेंटलिस्ट किस्म की प्रवृत्तियों ने भी दोनों समुदायों के बीच अलगाव की भावना को बढ़ाया। पश्चिमोत्तर प्रांत में हिंदू भद्र वर्ग की अलगाव की भावना न सिर्फ हिंदी को संस्कृतनिष्ट बनाकर उसे बोलचाल की जुबान से अलग और दूर करने के प्रयास में सफल हुई, बल्कि सीधे-सीधे मुस्लिम विरोध के रूप में भी प्रकट हुई।’’


      हिंदी उपन्यासों में मुस्लिम समाज का चित्रण सर्वप्रथम 1881 ई० में राधाकृष्ण दास  द्वारा निस्सहाय हिंदू  नामक उपन्यास में देखने को मिलता है। यह उपन्यास गोकशी की समस्या पर केन्द्रित है।जिसमें गोकशी को हिंदू समाज के पतन और लाचारी के रूप में दिखाया गया है।1857 की क्रांति के बाद गोकशी को एक व्यापक मुद्दा बनाया गया। इस उपन्यास में दो तरह केमुस्लिम वर्ग हैं। एक वर्ग गोकशी का समर्थन करता है और उसे अपने धार्मिक अधिकार के अंतर्गत बताता है। उपन्यास में इस वर्ग का प्रतिनिधित्व हाजी अताउल्लाहनामक पात्र करता है।वहीं दूसरे वर्ग का मुसलमान जो गोकशी का विरोध करता है और इसे धर्म की मनमानी व्याख्या बताता है।इस वर्ग का प्रतिनिधि मौलवी अब्दुल अजीजनामक पात्र करता है।उपन्यास में एक गोहितकारिणी सभाकी भी स्थापना की गई है। जिसका नेता अब्दुल अजीज को बनाया गया है।उपन्यासकार अब्दुल अजीज के मुख से यह कहलवाता है कि कुरान में गोकशी वर्जित है।देखा जाये तो यह कथन उपन्यासकार के मन की उपज है,क्योंकि कुरान में गोवंश के सम्बन्ध में कहीं कोई जिक्र ही नहीं है। उपन्यास में लेखक ने अब्दुल अजीज की हत्या दूसरे वर्ग के मुसलमानों द्वारा करा कर उसे एक आदर्श चरित्र के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। 

हिंदी उपन्यास की परंपरा को विकसित करने में देवकीनंदन खत्री की भी विशेष भूमिका रही है।1887 ई०में चंद्रकांतानामक उपन्यास से हिंदी में तिलस्मी और ऐयारी उपन्यास लेखन की परंपरा दिखाई देती है।यह परम्परा इतनी प्रसिद्ध हुई कि आगे चलकर उन्होंने चंद्रकांता संततिचौबीसभाग में और भूतनाथनामक उपन्यासछःभागों में लिखा। खत्री जी ने इन उपन्यासों में चुनार,नौगढ़, विजयगढ़, जमानिया, रोहतासगढ़ आदि स्थानों के  राजकुमारों और राजकुमारियों के प्रेम सम्बन्ध को कथा के रूप में प्रस्तुत किया है। खत्री जी के  उपन्यासों में केवल स्थान के नाम ही वास्तविक हैं, जबकि सम्पूर्ण कथा और उसके पात्र पूर्णरूप से काल्पनिक हैं। खत्री जी ने अपनी रचनाओं में हिन्दू पात्रों के साथ-साथ मुस्लिम पात्रों का भी चित्रण किया है, जिसमें मुस्लिम पात्रों के प्रति असामाजिकता, चरित्रहीनता और षड्यंत्रकारी भावलेखक का मुसलमानों के प्रति मनोदशा को व्यक्त करता है। गोपाल राय लिखते हैं-‘‘खत्री जी ने अपनी कथा-पुस्तकों में मुसलमान पात्रों को चुन-चुनकर धोखेबाज, दगाबाज, चरित्रभ्रष्ट और षड्यंत्रकारी रूप में चित्रित किया है।उपन्यासों में वर्णित वेश्याएं, नागर, गौहर  आदि सभी मुसलमान हैं। हिंदू राजा अपनी मुसलमान प्रजा से सदा सावधान रहते हैं।यदि भूल से कोई पात्र किसी मुसलमान लड़की से प्रेम कर बैठता है तो उसकी जाति का पता चल जाने पर अफसोस जाहिर करता है और फिर उसके साथ कोई संबंध नहीं रखता।’’ 

 प्रेमचंदपूर्व उपन्यासकारों में किशोरी लाल गोस्वामीको एक ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्धि मिली है।गोस्वामी जी ने मुगलकालीन नवाबों और रानियों को अपने कई उपन्यासों का आधार बनाया है। इन उपन्यासों में तारा वा क्षात्र कुल कमलिनीकनक कुसुम वा मस्तानी, सुल्ताना रजिया बेगम वा रंग महल में हलाहल, हृदयहरिणी वा आदर्श रमणी, लवंगलता वा आदर्शबाला, मल्लिका देवी वाबंग सरोजिनी, सोना और सुगंध वा पन्नाबाई, गुलबहार वा आदर्श मातृस्नेह, लखनऊ की कब्र या शाही महलसरा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन सभी उपन्यासों में मुस्लिम राजाओं, स्त्रियों तथा अन्य सभी पात्रों को चरित्रहीन, धोखेबाज तथा क्रूर दिखाया गया है।किशोरी जी तत्कालीन हिंदूवादी आंदोलनों से प्रभावित रहे हैं।साहित्य में ऐतिहासिक तथ्यों, घटनाओं को मनमानी तरीके से प्रस्तुत किया है। गोस्वामी जी के यहां मुस्लिम स्त्रियां कामुक, चरित्रहीन, षड्यंत्रकारी रूप में प्रस्तुत की गई हैं।इस संबंध में गोपाल राय लिखते हैं-‘‘हिंदू गौरव की स्थापना के उत्साहातिरेक मेंगोस्वामी जी ने हिंदू पात्रों की तुलना में मुसलमान पात्रों को नीच, खुदगर्ज, विश्वासघाती और चरित्रहीन रूप में प्रस्तुत किया है।मस्तानी को छोड़कर गोस्वामी जी के ऐतिहासिक रोमांसों का कोई भी मुसलमान पात्र, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, सच्चरित्र नहीं है।अकबर और दारा जैसे ऐतिहासिक पात्रों को भी, जिनके बारे में इतिहासकारों की धारणा ऊंची है; गोस्वामी जी ने कपटी, धूर्त, क्रूर और चरित्रहीन व्यक्तियों के रूप में चित्रित किया है।
  
प्रेमचंदपूर्व अन्य ऐतिहासिक उपन्यासकारों में गंगा प्रसाद गुप्त, जयरामदास गुप्त, मथुरा प्रसाद शर्मा,ब्रजनंदन सहाय आदि ने मुगलकालीन मुस्लिम समाज का चित्रण किया है।गंगा प्रसाद गुप्त ने नूरजहांउपन्यास में मुगलकालीन शासन व्यवस्था तथा नूरजहां के चरित्र को दर्शाया है। जयरामदास गुप्त ने नवाबी परिस्तान वा वाजिद अलीशाहतथा मल्का चांदबीबीनामक उपन्यास लिखा है।नवाबी परिस्तान वा वाजिद अली शाह उपन्यास में लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह को एक विलासी, क्रूर, हिंसक नवाब के रूप में दिखाया गया है।मथुरा प्रसाद शर्मा ने नूरजहां बेगमजहांगीरनामक दो ऐतिहासिक उपन्यास लिखे हैं।उनके उपन्यासों में ऐतिहासिक तथ्यों पर विशेष रूप से ध्यान रखा गया है।दक्षिण के शासक गयासुद्दीन के जीवन संघर्ष की कथा को बाबू ब्रज नंदन सहाय ने अपने उपन्यास लालचीनमें दिखाया है।प्रेमचंद से पहले जितने भी उपन्यासकर हुए हैं, उनमें से अधिकांश की रचनाओं में  हिंदू गौरव का गान किया गया है तथा उसके बरख्श मुस्लिम समाज को प्रस्तुत करते हुए मुसलमानों को क्रूर, हिंसक, बर्बर तथा हिन्दू विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।वास्तव में इन उपन्यासकारों का उद्देश्य मुस्लिम समाज को अपने उपन्यास की विषय वस्तु बनाना नहीं रहा है,बल्कि यह साबित करना ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है कि मुगलकाल में मुस्लिम राजाओं ने हिंदुओं पर बहुत अत्याचार किया है तथा वर्तमान में मुस्लिम समाज किस प्रकार हिंदू संस्कृति के लिए घातक है।अपने इस प्रयोजन की सिद्धि के लिए इन उपन्यासकारों ने ऐतिहासिक तथ्यों को नकारा है और मनगढ़ंत ऐतिहासिक घटनाओं की कल्पना की है। 

हिंदी साहित्य में सर्वप्रथम प्रेमचन्द द्वारा हिंदी कथा साहित्य को यथार्थ के धरातल से जोड़ने का काम किया गया।प्रेमचन्द तत्कालीन सामाजिक समस्याओं विशेषकरकिसान जीवन की विसंगतियों को अपने कथा साहित्य में प्रमुखता से उठाया है। हिंदी में उनका प्रथम उपन्यास सेवासदन  को माना गया है।यह उपन्यास वेश्यावृत्ति की समस्या पर आधारित है। इस उपन्यास में अब्दुल वफा और अब्दुल लतीफ जैसे पात्रों के माध्यम से प्रेमचंद ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि वेश्यावृत्ति हिंदू और मुसलमान दोनों समुदाय में समान रूप से प्रचलित है। वहीं प्रेमाश्रमउपन्यास किसान जीवन के संघर्ष पर आधारित है,जिसमें प्रेमचंद द्वारा  मुसलमान जमींदार के रूप में गौस खांनामक पात्र का चित्रण  किया गया है और सर्वहारा मुस्लिम पात्र के रूप मेंकादिरको दिखाया गया है, जो उपन्यास में शोषणवादी व्यवस्था के विरोध के प्रति संघर्षरत दिखाई देता है। प्रेमचंद के उपन्यासों में हिन्दू समाज के साथ-साथ मुस्लिम समाज का भी प्रमुखता से चित्रण दिखाई देता है।कर्मभूमिनामक उनके उपन्यास में मुस्लिम समाज को अपेक्षाकृत अधिक विस्तार से दिखाया गया है। इसमें पठानिनबनारस के गोवर्धन सराय मोहल्ले में रहने वाली एक विधवा मुस्लिम स्त्री है, जो अपनी बेटी सकीना के विवाह के लिए चिंतित है। 

प्रेमचंद उसके पारिवारिक स्थिति का वर्णन करते हुए लिखते हैं-‘‘द्वार एक पर्दे की दीवार में था।उस पर एक टाट का फटा-पुराना पर्दा पड़ा हुआ था।द्वार के अंदर कदम रखते ही एक आंगन था, जिसमें मुश्किल से दो खटोले पड़ सकते थे।सामने खपरैल का एक नीचा सायबान था और सायबान के पीछे एक कोठरी थी, जो इस वक्त अंधेरी पड़ी हुई थी, सायबान में एक किनारे चूल्हा बना हुआ था और टिन और मिट्टी के दो चार बर्तन, एक घड़ा और  एक मटका रखे हुए थे।चूल्हे में आग जल रही थी और तवा रखा हुआ था।’’ उपन्यास में सलीम एक युवा पात्र है, जो न्याय के लिए लड़ने वाला तथा गरीबों का हमदर्द है।अन्य मुस्लिम पात्रों में काले खांजो एक सामान्य व्यक्ति हैं तथा गजनवीजो एक सरकारी मुलाजिम है, का नाम लिया जा सकता है।प्रेमचंद के उपन्यासों में मुस्लिम समाज का चित्रण अधिक तो नहीं हुआ है लेकिन जितना भी हुआ है, वह यथार्थ रूप में चित्रित है।प्रेमचंद ने अपने अनुभव संसार में आम जनजीवन की समस्याओं को जितना अधिक प्रश्रय दिया है, उतना उनसे पहले किसी भी साहित्यकार के यहां नहीं दिखता।रामविलास शर्मा लिखते हैं- ‘‘प्रेमचंद अपने उपन्यासों में बराबर इस चीज पर जोर देते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों की बुनियादी समस्याएं एक हैं। इसलिए मिलकर उन्हें हल करना चाहिये।” 

प्रेमचंदयुगीन अन्य उपन्यासकारों में जी० पी० श्रीवास्तव, पांडेय बेचन शर्मा उग्र और वृंदावन लाल वर्मा का नाम लिया जा सकता है जिनके यहाँ मुस्लिम समाज का चित्रण दिखाई देता है। जी० पी० श्रीवास्तव के गंगा जमुनीउपन्यास में तत्कालीन सांप्रदायिक समस्याओं पर विचार करते हुए हिंदू मुस्लिम एकता पर बल दिया गया है। वहीं पांडेय बेचन शर्मा उग्र के दो उपन्यास चंद हसीनो के खतूतऔर बुधूआ की बेटीमें चित्रित मुस्लिम समाज के आंशिक रूप को देखा जा सकता है। जहाँ उग्र जी की दृष्टि मुस्लिम समाज के प्रति सकारात्मक नहीं दिखती। उन्होंने अपने उपन्यासों में सांप्रदायिक मुद्दों को उठाने का प्रयास तो किया है,परन्तु उसमें पक्षपात और एकांगीयता को साफ-साफ देखा जा सकता है।बुधूआ की बेटीउपन्यास में वे दिखाते हैं कि किस प्रकार मुस्लिम युवकों का एक गिरोह पुत्र प्राप्ति की कामना करने वाली हिंदू महिलाओं के साथ छल-कपट का व्यवहार करता है। इस पूरे उपन्यास में मुस्लिम युवकों को चरित्रहीन, धोखेबाज तथा कपटी साबित किया गया है। इसी प्रकार चंद हसीनों के खतूतमें भी उग्र जी ने हिंदू और मुस्लिम पात्रों के प्रेम सम्बन्ध और विवाह को समस्या के रूप में दिखाया  है तथा इसे सांप्रदायिकता की समस्या से भी जोड़ा है।

प्रेमचंदयुगीन उपन्यासकारों में वृंदावनलाल वर्मा का भी प्रमुख स्थान रहा है। इनकी  कई रचनाओं में मुस्लिम समाज को देखा जा सकता है। उनके उपन्यास गढ़कुंडारमें दिल्ली के सुल्तान बलबनके शासन काल का चित्रण हुआ है। वहींविराटा की पद्मिनीमें मुगल शासक फर्रुखसियर का उल्लेख मिलता है। वृदावनलाल वर्मा अपनी इन दोनों रचनाओं में मुस्लिम शासकों का नाम मात्र वर्णन किया है। 

स्वतंत्रता के बाद हिंदी उपन्यासों में मुस्लिम समाजका चित्रण पहले की अपेक्षा व्यापक रूप में दिखाई देता है। इस दौर के अधिकांश उपन्यासों में विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिकता को केंद्र में रखकर आवश्यकतानुसार मुस्लिम पात्रों और घटनाओं का चित्रण किया गया है।इसदौर की रचनाओं में यशपाल का झूठा सचविशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है। ठीक इसी प्रकार कमलेश्वर द्वारालौटे हुए मुसाफिरउपन्यास में भी सांप्रदायिकता को एक गम्भीर समस्या के रूप में देखा गया है।इस उपन्यास में पाकिस्तान के नाम पर मुसलमानों को छले जाने और उससे उत्पन्न मोह भंग की स्थिति को दिखाया गया है।कमलेश्वर द्वारा  पाकिस्तान से लौटे मुसलमानों की विवशता और राजनीतिक षड्यंत्र के प्रभाव को हिन्दुओं और मुसलमानों के सन्दर्भ में बड़ी समस्या के रूप में दिखाया गया है। मुस्लिम रचनाकार के रूप में  गुलशेर खां शानीको भी प्रमुख माना गया है।काला जलनामक उपन्यास को इसके उदाहरणस्वरूप देखा जा सकता है। इस उपन्यास में पहली बार आदिवासी मुसलमानों का चित्रण हुआ है। इसमें यथार्थपरक ढंग से बस्तर के आदिवासी मुसलमानों के जीवन संघर्ष को दिखाया गया है। 

इस प्रकार हम देखते हैं कि आरम्भिक दौर के हिंदी उपन्यासों में मुस्लिम समाज को नकारात्मक रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। चूँकि मुसलमान बाहर से आये थे और यहाँ शासक के रूप में खुद को स्थापित कर चुके थे।उनकी संस्कृति, स्थापत्यकला, खान-पान से भारतीय समाज प्रभावित हुआ।लेकिन एक खास वर्ग द्वारा इसे सिरे से नकारा गया।अंग्रेजी हुकुमत द्वारा शासन की बागडोर सँभालने के बाद हिंदूवादी समझ रखने वाले वर्गों के बीच मुसलमानों के परास्त होने की आशा जगी। इसका प्रभाव आरम्भिक दौर के हिंदी उपन्यासों में भी दिखाई देता है। जहाँ मुसलमानों को बर्बर, हिंसक, व्यभिचारी, कुसंस्कृत, असामाजिक रूप में चित्रित किया गया है। लेकिन यह स्थिति प्रगतिशील रचनाकारों के आने से बदली है और मुस्लिम समाज की समस्याओं और उनकी पहचान को लेकर मुस्लिम रचनाकारों तथा गैर मुस्लिम रचनाकारों के बीच लेखन का कार्य जारी है। 


 सन्दर्भ ग्रन्थ
1.  वीरभारत तलवार, रस्साकशी, सारांश प्रकाशन दिल्ली, संस्करण 2006,पृष्ठ 255
2.  गोपाल राय, हिंदी उपन्यास का इतिहास, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, दूसरी आवृत्ति 2010 ,पृष्ठ 75
3.   वही, पृष्ठ 83
4.   प्रेमचन्द, कर्मभूमि, सरस्वती प्रेस बनारस, पृष्ठ 41
5.  रामविलास शर्मा, प्रेमचन्द और उनका युग, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, तेरहवां संस्करण 2016,पृष्ठ 82 


खुशबू
शोधार्थी,हिंदी विभाग, मानविकी संकाय,हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
ई-मेल –khushboo18121989@gmail.com

              अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-5, अंक 30(अप्रैल-जून 2019) चित्रांकन वंदना कुमारी

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