आत्मकथ्य: संदेहों के कपोल /राय बहादुर सिंह - अपनी माटी

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मंगलवार, मार्च 17, 2020

आत्मकथ्य: संदेहों के कपोल /राय बहादुर सिंह

                                       संदेहों के कपोल

बी.ए. की पढ़ाई के दौरान भारतीय धर्म और संस्कृति का पाठ्यक्रम पढ़ते समय जब पहली बार मेरे शिक्षक ने कहा कि जिसका ईमान मजबूत है वो हर एक व्यक्ति मुसलमान है। यह बात सुनकर बड़ी हैरत हुई क्योंकि आज तक तो मैंने मुसलमान शब्द का प्रयोग लोगों को केवल एक सम्प्रदाय विशेष के लिए करते सुना था। मग़र यह शिक्षक ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इस शब्द को सार्वभौमिक माना। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में आगे कहा कि  ये देश कर्म प्रधान लोगों का है। यहाँ मात्र पंडित के घर या मुसलमान के घर पैदा हो जाने से कोई पंडित या मुसलमान नहीं हो सकता है। यहाँ कुछ होने के लिए कर्म सबसे महत्वपूर्ण है।

यह वही शिक्षक थे जिन्होंने मेरी क्लास के एक छात्र की बात काटते हुए कहा कि उर्दू मुसलमानों की भाषा नहीं है और न कभी रही है। भाषा कभी-भी किसी धर्म विशेष की नहीं होती बल्कि वो संस्कृतियों की वाहक होती हैं। भाषाओं में लोगों के दिल धड़कते हैं। उनसे आगे चल कर क्लास से बाहर बातचीत के दौरान पता चला कि वो पहले हिन्दू थे,पर उन से पहले उनकी 22 वी पीढ़ी ने धर्म परिवर्तन कर लिया था। मैंने जिज्ञासा स्वरूप एक बार उनसे पूछ लिया था कि मुसलमानों में भी हिंदुओं की तरह जातियाँ क्यों होती है। तो उन्होंने ने बताया कि वो जिस इमाम के पीछे खड़े होकर नमाज़ पढ़ते हैं वो जाति से दलित था जिसकी किसी पीढ़ी ने कभी धर्म परिवर्तन कर लिया था। इस्लाम में जाति की कोई व्यवस्था नहीं है। हाँ, शिया और सुन्नी का मामला जरूर है मगर उसके पीछे एक दूसरी कहानी है।

मेरी जिज्ञासा से वो कभी भागे नहीं और न ही मेरे जामिया का कोई और शिक्षक भागा। वह सभी हमेशा रुचि के साथ मेरे सवालों का जवाब दिया करते। आई.एस को लेकर एक बार क्लास में बातचीत के दौरान इस्लाम क्या है और उसे मानने वाले कौन लोग हैं यह भी पता चला। मेरे कक्षा के शिक्षक ने बताया कि जो लोग इस्लाम की रक्षा करने निकले हैं। वो लोग भटके हुए हैं। किसी धर्म को किसी से क्या ख़तरा हो सकता है ? इस्लाम को मानने वालों के लिए यह लोग ख़तरा बनकर उभर रहे हैं। इन लोगों के कारण मुसलमान शब्द का जो चेहरा दुनिया के लोगों के जेहन में बन रहा है। वास्तव में वो इस्लाम के लिए खतरा है। इस्लाम कभी-भी नहीं कहता कि औरतों और बच्चों को क़त्ल करो। बेगुनाहों का खून बहाओ। ऐसे करने वाले कभी -भी मुसलमान नहीं हो सकते। इन लोगों के कारण जिस नज़र से एक मुसलमान को देखा जा रहा है वो सही नहीं है। जिस चीज़ को उस रोज़ मेरे शिक्षक ग़लत ठहरा रहे थे। उसको एक दम सही बताने की कोशिश करते मैंने कई लोगों को स्कूल के समय से ही देखा था। जब कोई मुझसे पूछता तुम कहाँ पढ़ते हो। तो ज़्यादातर लोग जामिया का नाम सुकर अपना मुंह बना कर कहते। वो तो मुसलमानों का कॉलेज है न? तो मैं जवाब में कहता जी नहीं वो केंद्र सरकार द्वारा चलाया जाने विश्विद्यालय है। मुसलमान शब्द को विशेष अर्थों में समाज में किस प्रकार रूढ़ करने का प्रयास किया जाता रहा है। उपन्यासकार शिव मूर्ति ने अपने उपन्यास त्रिशूल में भरसक इसे उकेरना चाहा है।

जिसे पढ़ते हुए मुझे समझ में आया कि इंसानों की एक अजीब मानसिकता होती है। हमें सकारात्मक चीज़े ज़्यादा देर तक याद नहीं रहती हैं। मग़र नकारात्मक चीज़ें हमें बहुत जल्दी याद हो जाती हैं, और हम उसे मरते दम तक नहीं भूलते।

यह नकारात्मकता किस्से, कहानियों में एक से दूसरे तक पहुँच जाती है। और शक्ल इख़्तियार करती हैं पूर्वा ग्रहों का। जिसे चाह कर भी आप कभी मिटा नहीं सकते। मगर उस पूर्वा ग्रह से जुड़ा कोई संकेत भर कर दे। एक दम से उससे ग्रसित लोगों के कान खड़े हो जाएंगे। चुनाव के दौरान हमारे यहां मुसलमान शब्द को जिन अर्थों में प्रयोग करके मतों का ध्रुवीकरण किया जाता है। वह इन पूर्वा ग्रहों का ही नतीजा है। मेरे जो मुसलमान दोस्त हैं। उन्होंने राजनीतिक बहसों के दौरान कई बार कहा कि हमारे वालिद ने बचपन से बताया है कि इस्लाम कहता कि आप जिस भी मुल्क में रहते हो उसकी उन्नति आपका फ़र्ज़ है। आपका धर्म आपका व्यक्तिगत मामला है। आपके लिए देश पहले है । पर बुरा लगता है कि लोगों की एक मुसलमान को लेकर सोच बहुत नकारात्मकता बनी हुई है।

मुसलमान शब्द को जिन अर्थों में मेरे जेहन में ठूसा गया था। मुझे लगता था कि मैं अकेला ही ऐसा हूँपर जब मेरे साथ पढ़ने वाली मेरी दोस्त जो जाति से पंडित है। उसने एक मर्तबा बताया था कि लोग कभी-कभी हद कर देते है। जैसे ही मेरे रिश्तेदारों को पता चला कि मैं एक मुस्लिम अल्पसंख्यक विश्विद्यालय में पढ़ने जा रही हूँ। तो मेरे घर वालों को भड़काने लगे कि मेरा धर्म परिवर्तन कर दिया जाएगा। वो लोग चाहते थे कि यहाँ पढ़ने से अच्छा है कि मैं घर बैठू। बिना कभी ऐसी जगहों पर गए, बिना लोगों से मिले कोई धारणा बना लेना बहुत खतरनाक है उन लोगों के साथ भी यही हुआ है | यह वही तरीका है जिसे हम बचपन से ही सीखते आते हैं यह सीखना हमें हमारे अनुभवों से नहीं बल्कि हमारे बड़ों के अनुभव से होता है।  हमारे बड़े ही बताते हैं कि क्या गलत है और क्या सही उनके बताए को हम अपनी आँखों से देखे बिना सच मान लेते हैं इस प्रकार के शिक्षण के बारे में प्रो. कृष्ण कुमार लिखते हैं कि बच्चे से माँ कहती है कि वो गंदा है मत छूओ तुम गंदे हो जाओगे यह बात बच्चा एक लंबे समय तक सुनता है और कालांतर में उसके अंदर छूआ-छूत गहरे तक अपनी जगह बनाता जाता हैं।  इस के आगे वह कहते हैं कि कहते हैं कि माँ बच्चे को दूध पीने के दौरान कहती है, इसे फिनिश करो, नहीं तो मम्मा इसे फिनिश कर जाएगी कभी कहती है पानी पीओ नहीं तो अंकल से खत्म कर देंगे यहाँ से एक बच्चे के अंदर संसाधनों के खत्म होने और जल्दी से जल्दी उसकी प्राप्ति न करने पर अभाव का बीज रोपा जाना शुरू कर दिया जाता है जिस कारण बच्चा  आसानी से उन धारणाओं को ग्रहण करता चला जाता है जो उसे प्रति दिन कहीं न कहीं से सुनने को मिलती है फलां बुरे हैं या फलां लोग बुरे होते हैं ये  उसने सुन भर रखा है पर क्यों बुरे हैं? इस पर उसके स्वयं का कोई अनुभव नहीं होता है जिस कारण बच्चा बड़ा होकर समझदारों वाली बात नहीं करता बल्कि वही बात करता है जो मेरी दोस्त के रिश्तेदार उसके घर वालों को कह रहे थे

पर यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि मुसलमान शब्द का अर्थ क्या है आज जिन अर्थों में इस शब्द को  समाज में रूठ किया गया है। उसको मिटाने के लिए देश की सरकार और मीडिया को अहम भूमिका अदा करनी चाहिए, परंतु ऐसा होता दिख नहीं रह है। बीते दिनों जामिया में मेरे वरिष्ठ रहे साथी ने एक घटना के बारे में बताया कि मेट्रो में मुझे घर से फोन आ गया और मैंने फोन उठाते ही अस्सलामुअलयकुम कहा और इसके साथ ही मेरे साथ एम.जी रोड से बैठे आदमी ने अपनी सीट बदल ली।

हूबनाथ पांडे ने जिस रूप में एक मुसलमान के हृदय के अंतर्द्वंद को 'मुसलमान' कविता में उकेरा है। वह साफ करता है कि इस पंथ निरपेक्ष व्यवस्था में मुसलमान शब्द को देश की राजनीति ने कभी चुनाव के समय तो कभी राम मंदिर के नाम पर स्वहित के लिए प्रयोग किया हैपर हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यासकार कमलेश्वर ने लिखा है "क्या धर्म बदलने से खून और नस्ल दोनों बदल जाते हैं"? इस सवाल का जवाब समाज के हर एक व्यक्ति को ख़ुद से नहीं पूछना चाहिए जो धार्मिक उन्माद स्वप्न लोक में विचरण कर रहा है। यह पूछा जाना जरूरी भी है क्योंकि यह संक्रामण के भांति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बिना पैर पहुँच रही एक धर्म विशेष के बारे में जो सोच दिल्ली में रह रहे लोगों की बनी है। ठीक वैसी ही कुछ वागड़ के स्कूली छात्रों की जान पड़ती है अब इसे  विडम्बना ही कह सकते हैं कि कक्षा 5 का छात्र अपनी पाठ पुस्तक के बारे में बहुत कुछ न जानते हो पर मुसलमान बुरा है यह जरूर जानता हैं यह बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती बल्कि इसका विस्तृत रूप कक्षा 12 के बच्चों के बीच और ज़्यादा उभर के आता है  कक्षा 12 के छात्रों को शिक्षण के दौरान कुछ छात्रों को उनकी लंबाई के आधार पर फौज में शामिल होने का मशवरा मैंने पेश किया साथ ही साथ अच्छे वेतन की भी बता मैंने जोड़ी, तो प्रतिउत्तर आया कि सर पैसा महत्वपूर्ण  नहीं है | हम तो देश के लिए अपनी जान देना चाहते है। यह देख के बड़ा अच्छा लगा कि इन बच्चों में देश के लिए कुछ कर गुजरने की  चाह है।  हमारे बीच संवादों का दौर कुछ देर चला मैंने कहा कि जान देना तो आसान काम है मुश्किल जान बचाना है अगर तुम देश के लिए कुछ करना चाहों तो किसी की जान बचा लो। मैंने उनके सामने उदाहरण रखा जैसे तुम्हारे ही यहाँ बाज़ार में तीन लोगों को मार दिया गया अगर कोई उन्हें बच्चा लेता तो वो होती सच्ची देशभक्ति मेरे कहने के साथ ही छात्र ने कहा कि सर वो तो मुसलमान थे, उनको कौन बचाए यहाँ यह समझा बेहद जरूरी है कि उस छात्र के विचार ऐसे कैसे बने ? वो देश के लिए तो मारना चाहता है, पर देश के अपने लोगों से बनाता है यह नहीं जानता हम एक धर्म निरपेक्ष देश में रहने वाले लोग हैं पर यहाँ के लोगों में धर्म निरपेक्षता का भयंकर रूप से अभाव नज़र आता है एक व्यक्ति में दूसरे व्यक्ति की स्वीकारिता नदारत रहती है। 

आज समाज में एक व्यक्ति दूसरे को कपड़े के आधार पर खाने के आधार पर संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है जिसका शिकार मैं भी हुआ हूँ। मुझे मुझे स्वतंत्रता दिवस के दिन कुर्ता पहने देख मेरे ही छात्र जाने कितने आशंकाओं से भर गए कि स्कूल के समारोह के  दिन ही मुझ से पूछने लगे कि क्या मैं मुसलमान हूँ कक्षा में पुनः इसी सवाल के पूछे जाने पर हुई चर्चा के दौरान मैं जान पाया कि बच्चों में जो संदेह के बीज थे, वो अंकुरित होकर घृणा के कपोल बनने की तैयारी में हैं इस प्रक्रिया को समझा जाना जरूरी है कि बच्चों की किताबों से जुड़ा यह विषय उनके अंदर व्यक्ति की स्वीकारिता को बढ़ाने के लिए था  वो पूरी तरह गैर मानवीय होकर उन तक कैसे पहुँच रहा है वो क्या है ? जो हमारे अंदर किसी के प्रति संदेह को घृणा का रूप देकर  हमारे अंदर के मनुष्य को मार देना चाहता हैं ? इन सब बातों के बरक्स हमने अपनी पूरी व्यवस्था से और 5000 हज़ार साल पुरानी संस्कृति से यह प्रश्न करना चाहिए कि क्या हमारी किताबें और हमारे शिक्षक बच्चों में एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास कर पा रहे हैं जिसके लिए वो जवाब दे हैं?




राय बहादुर सिंह
(लेखक अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, बाँसवाड़ा में शिक्षक प्रशिक्षक हैं)
संपर्क 9910693349, ईमेल rajs68979@gmail.com

           अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) शिक्षा विशेषांक, मार्च-2020, सम्पादन:विजय मीरचंदानी, चित्रांकन:मनीष के. भट्ट

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