शोध आलेख : रेणु की कहानियों में लोक-जीवन की संवेदना / डॉ. केदार सिंह एवं युगल रजक

 रेणु की कहानियों में लोक-जीवन की संवेदना
- डॉ. केदार सिंह एवं  युगल रजक

शोध सार : फणीश्वरनाथ रेणु को अपने समकालीनों से जो चीज़ अलग करती है- वह है उनकी कहानियों में लोक-जीवन की साधना। लोक-जीवन की असंख्य छवियाँ, विविधता एवं विशेषताएँ इन कहानियों को लोकग्राह्य बनाती हैं। साथ ही इन्हें स्थायित्व भी प्रदान करती हैं। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि वे ग्रामीण-जीवन में रचे-बसे थे। वहाँ के लोगों से उनका संबंध उसी प्रकार था, जिस प्रकार मिट्टी और पौधे का होता है। वे अंचलवासियों के जीवन की मार्मिकता, उनके प्रेम, आशा-निराशा, हर्ष-विषाद और मानवीयता को अपनी विभिन्न कहानियों में बड़ी आत्मीयता से प्रस्तुत करते हैं। मानव की प्रबल जिजीविषा एवं संवेदनशीलता इनकी कहानियों को अमरता प्रदान करती हैं। घनघोर विरोधी परिस्थितियों में भी रेणु के पात्र टूटते-बिखरते नहीं और ही कहीं घुटने टेकते नज़र आते हैं। इनमें परिस्थितियों से संघर्ष करने का अदम्य साहस और निर्णय लेने की शक्ति है।उच्चाटनके रामविलास, ‘रसप्रियाके पंचकौड़ी मृदंगिया, ‘संवदियाके हरगोबिन, ‘ठेसके सिरचन मानवीय तेज से भरे पात्र हैं। ये लोक-जीवन के जीते-जागते पात्र हैं। ये अशिक्षित, गरीब, बेरोजगार होने के बावजूद अपने विवेक और संवेदनशीलता को नहीं खोते। रेणु आँचलिक जीवन की सामंतवादी कुरीतियों पर जहाँ प्रहार करते हैं, वहीं साधारण लोगों के जीवन की परंपरा, सहजता, सरलता तथा मानव-मूल्यों को पोषित एवं संरक्षित करते हैं। लोक-जीवन के मूल्यों को समाहित करने के कारण इनकी कहानियाँ आत्मीय और जीवंत हैं।

        रेणु का लोक-जीवन अशिक्षित लोगों का जीवन है। ये रूढ़ियों, अंधविश्वासों एवं जड़ताओं के शिकार हैं। भूमि का असमान वितरण, जमींदारी प्रथा प्राकृतिक प्रकोप, आर्थिक असमानता, लोक-जीवन को नारकीय बनाने में सदियों से भूमिका निभा रहे हैं। भयंकर गरीबी, बेरोजगारी, समय पर होने वाले रोगों के हमले से किसान, मज़दूर, युवा, कारीगर त्रस्त हैं। रेणु इन कारीगरों जिनमें सिरचन, रसूल मिसतिरी, कालु कमार शामिल हैं इन्हें अपनी कहानियों में नायकत्व प्रदान करते हैं। वे इनकी मुक्ति की लड़ाई संवेदना की धरातल पर लड़ते हैं। रूढ़िग्रस्त एवं जड़ होते समाज मेंपंचलाइटजैसी कहानियाँ लिखकर साधारण ग्रामीण लोगों में वैज्ञानिक चेतना पैदा करते हैं। सामाजिक चेतना में परिवर्तन लाने का यह सूक्ष्म कौशल उनके समकालीनों में सर्वथा अभाव दिखता है। इनकी शैली अपनी और विलक्षण है। भाषा-विन्यास कहानियों को प्राणवान बनाता है।

बीज शब्द : आंचलिक, पंचलाइट, सिंहावलोकन, सार्वभौमिक, संवेदना, फाल, श्रीपंचमी, खुरपी, जाजिम

मूल आलेख : लोक साहित्य का अभिप्राय उस विशिष्ट साहित्य से है जिसकी रचना लोक करता है। यह सामान्य जनजीवन से उत्प्रेरित जन साहित्य है, यह लोक का दर्पण है। यह मानव जाति के प्रत्येक पक्ष अर्थात् शैशवावस्था से लेकर मृत्युपर्यन्त सभी पक्षों को प्रतिबिम्बित करता है। लोक साहित्य में अवस्था, वर्ग, समय, जनमानस की प्रकृति, संस्कृति आदि लिपिबद्ध होती है। ऐसे ही लोक के चितेरे कहानीकार फणीश्वरनाथ रेणु हैं।

        लोक-जीवन में पारंपरिक रूप से अपार ज्ञानानुभव संचित है। यह ज्ञानानुभव लोगों के जीवन एवं दैनिक व्यवहार में प्रकट होता है। लोक-जीवन एक प्रकार से अलिखित चलता-फिरता इनसाइक्लोपीडिया है। इस लोक ज्ञान को वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, जो इस जीवन के प्रति सहानुभूति रखता है। इस विराट लोक-जीवन के अनुभव रेणु की कहानियों को भारतीय ग्राम्य सभ्यता, परंपरा और मानवीय इतिहास से भी जोड़ते हैं। कृत्रिम भावों की जगह यहाँ के लोग कैसे जीते हैं, उनका उठना-बैठना कैसा है, कैसी उनकी दिनचर्या हैं, उनकी बोल-चाल का कैसा लहजा है। अपने गाँव-घर, टोला-पड़ोस, रिश्ते-नातों के प्रति उनमें कितना प्रेम और विश्वास है, इनका यथार्थ-चित्रण रेणु की कहानियों में है। एक तरह से अपनी संपूर्णता में रेणु की ये कहानियाँ लोक-जीवन का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक विस्तार है। कहानियों में लोक-जीवन के चित्रण संबंधी रेणु के विचारों को भारत यायावर इन शब्दों में स्पष्ट करते हैं- “मैं किसी भी आदमी, पेड़-पौधा, चिड़िया, जानवर या वस्तु की कल्पना उसके रंग के बगैर नहीं कर सकता। फिर हर चीज़ की एक गन्ध होती है। तो जब मैं लिख रहा होता हूँ तो रंगों और गन्धों के बारे में बताना भी ज़रूरी समझता हूँ। फिर उन रंगों और गन्धों का हमारी इंद्रियों पर भी प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। वे प्रभाव किस प्रकार के हैं,  इसे भी बताना होता है। ध्वनियों का चित्रण एक खास तरह की गीतात्मकता ही नहीं, कथा को गतिमयता में भी बदलता है। जिस तरह हर शब्द की ध्वन्यात्मकता होती है, प्रकृति की हर इकाई, जिसमें सक्रियता या गतिशीलता है, उसकी ध्वनि भी है। और हर समय यह ध्वनि एक जैसी नहीं होती है। उसमें बदलाव होता रहता है, मैं जब लिखने बैठता हूँ तो पूरे परिवेश पर मेरा ध्यान होता है। एक असली कथाकार में चित्रकार और संगीतकार की आत्मा भी बैठी होती है।1 रेणु की कहानियों का संसार इन्हीं रसों, गन्धों एवं ध्वनियों की लय और रस से निर्मित है। साधारण आदमी के दुख, पीड़ा, आशा, निराशा, प्रेम, संघर्ष, स्वप्न खुशी जैसे अनंत भावों का इनकी कहानियों में सहज-सरल किन्तु प्रभावशाली ढंग से प्रकटीकरण हुआ है। लोक-जीवन में इतनी गहराई एवं व्यापकता के साथ हिन्दी में प्रेमचंद के बाद संभवतः और कोई कथाकार नहीं दिखाई पड़ता। आलोचक डॉ. रणधीर सिन्हा ने रेणु के रचना संसार के संबंध में ठीक ही कहा है- “वह सामाजिक सामान्य जन-जीवन को अपना साध्य मानते हैं और एक वस्तुनिष्ठ यथार्थवादी रचनाकार के लिए महत्तर लोक-जीवन ही प्राथमिक महत्त्व और मूल्य के रूप में स्वीकार्य होता है। आर्थिक,  राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक दृष्टियों से पिछड़ा हुआ लोक-जीवन यथार्थवादी लेखक को इसलिए प्रभावित करता है कि वह उसके बाहरी और भीतरी सोपानों का सिंहावलोकन कर उसकी समस्त छिपी हुई समस्याओं को उद्दीप्त कर सके और मार्मिक बोध से उनके समाधान का मार्ग खोजने के लिए समाज को बाध्य कर सके, ताकि वास्तविकता से प्रस्फुटित उसकी चेतना निस्तार पा सके। पिछड़ा हुआ लोक-जीवन मानवता का प्राण है। बहुसंख्यक की उपेक्षा कर व्यक्तिपरकता के आधार पर मानवता की संरचना करना और उसकी दुहाई देना, तो सार्वभौमिक सत्य है, सार्वकालिक। रेणु ने अपने चित्रण में बहुलता का ही पक्ष ग्रहण किया है, और सामान्य जन की पीड़ा को देखा-परखा है।2 लोक-जीवन की यह सार्वभौमिकता रेणु को अपने समय का सबसे बड़ा कथाकार बनाती है। हिन्दी कहानी की परंपरा में उनका यह सर्वोपरि स्थान कोई नहीं ले सकता। इन्हें आँचलिकता की सीमा में बाँधकर देखने की कोई विद्वान भूल करे। यहाँ मैं रेणु की उन कहानियों पर विचार करना चाहता हूँ जिसमें लोक-जीवन की संवेदना घनिष्ठता के साथ अभिव्यक्त हुई है।

        रेणु की पहली कहानीबटबाबामें ही लोक-जीवन की घनीभूत संवेदना अभिव्यक्त हुई है। रेणु की इस कहानी में ग्रामीण जीवन की आस्था है। प्रेम है। विश्वास है। पूरे गाँव के सुख-दुख का केंद्रबटबाबाहै। कथ्य और संवेदना की दृष्टि से यह एक बड़ी कहानी है। लोक-जीवन के विविध रूप और भाव-विचार का इसमें प्रकटन हुआ है। मौसम बदलने के कारण पेड़-पौधों में परिवर्तन आता है। पत्ते हरे होते हैं। फूल-फल लगते हैं। लेकिन गाँव भर के लोगों के आश्चर्य और निराशा का कारण है इस वर्षबटबाबामें कोई परिवर्तन नहीं आना। अर्थात् उसका सूख जाना। गाँव वालों के लिएबटबाबाका अचानक इस प्रकार सूखना अपशगुन जैसा है। क्योंकि यह पूरे गाँव का देवता है। लोक-जीवन में पेड़-पौधों, पत्थर, नदी आदि प्राकृतिक रूपों की पूजा-अर्चना बहुत पहले से चली रही है। साधारण लोगों के लिए ये सुखदाता और कष्ट निवारण करनेवाला है। सुहागिन अपने सुहाग की रक्षा की प्रार्थना करती हैं तो अविवाहित लड़कियाँ दुल्हे ढूँढ़ने को कहती हैं। पढ़ी-लिखी युवती हो या अशिक्षित कोई भीबटबाबाके लिए अपशब्द नहीं बोलती। उन्हें विश्वास है कि ऐसा करने पर उनकी जिन्दगी में बुरी घटना घटेगी। संपूर्ण गाँव के विश्वास और आस्था के केंद्र होने के कारण इसके पास ही हर प्रकार के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक अनुष्ठान किया जाता है। लेकिन इस वर्ष बटबाबा में पतझड़ के बाद एक पत्ता नहीं फूटा है। इसे लेकर गाँव के निरधन साहू की दुकान पर शाम को गाँव के किसान मजदूर मंडली सब सूखे बरगद को लेकर चर्चा करते हैं।

        ग्रामीण देवता होने के कारण बटबाबा की पूजा-अर्चना हर जाति और धर्म के लोग करते थे- चाहे वह हिन्दू हो या मूसलमान लेखक के अनुसार- “एकादशी पूर्णिया आदि पर्व त्योहारों पर उसकी पूजा भी होती- सिन्दूर-चंदन, अक्षत, बेल पत्र, धूप-दीप, पान-सुपारी से। वह देवता था हिन्दुओं का भी, मुसलमानों का भी।3 लोक-जीवन का ऐसा गहरा संबंध रेणु के समकालीन कथाकारों की कहानियों में नहीं मिलता। पेड़-पौधे भी वरदान देते हैं। लोगों की मनोकामना पूरा करते हैं। गाँव की कुँवारी लड़की अपने जीवन-साथी चुनने के लिए मन्नत मानती है और पूरा होने पर उसे पूरा करती है। निरधन साहू की बेटी कुँवारी है। उसका नाम लछमनिया है। लेखक कहता है- “निरधन साहू की बेटीलछमनियारो आयी थी- “बाबा”! गाँव-मुहल्ला, टोला-पड़ोस तथा जाति-बिरदारी के लोग हँस रहे हैं। मैं इतनी बड़ी हो गयी,  कोई दूल्हे का बाप एक हज़ार से नीचे तिलक की बात ही नहीं करता है। बाबू और घर की दशा तुमसे छिपी नहीं है। दुनिया के लिए तुम सूख गये हो, पर तुम्हारा प्रताप तो नहीं सूखा है बाबा! यदि किसी दूल्हे के बाप का मन फेर दो तो मैं आठ आने की मिठाई और नयी बाती जला दूँ।4 लोगों की आस्था कितनी गहरी होती है।तुम दुनिया के लिए सूख गये हो पर तुम्हारा प्रताप तो नहीं सूखा हैयह भावबोध लोक को एक जगह संगठित होकर रहने,  सुरक्षा और आत्मविश्वास का भाव भरता है। रेणु इस पहली ही कहानी में लोक-जीवन की ईमानदारी,  विश्वास और प्रेम को अपनी लोक दृष्टि और पारंपरिक ज्ञान-बोध से चित्रण करते हैं। यह लोकशक्ति लोक-चेतना का अभिन्न अंग बन जाती है। छोटे-छोटे भाव एवं विचार इस कहानी को लोक-संवेद्य बनाते हैं। इसे भले ही अंधविश्वास कह सकते हैं। लेकिन लोक-जीवन में अंधविश्वास भी होता है जिसके माध्यम से मन की सीधी सरल बात प्रकट होती है।

        रेणु को पेड़ की भौतिक आवश्यकता की पूर्ति के रूप में इसबटबाबाके प्रति ग्रामीणों की आस्था-विश्वास को तोड़ना भी है। जब जलावन की कमी हो गयी तो इस सूखे बरगद के पेड़ को जमींदार अपने लोगों को काटने का आदेश देता है। आखिर सूखे पेड़ की उपयोगिता जलावन आदि में ही तो हो सकती है। सुबह-सुबह ही जमींदार साहब के हुक्म पाते ही उनके अमले-सिपाही चालीस-पचास मज़दूर लेकरबटबाबाके पास आते हैं और धड़ाधड़ उसे काटने लगते हैं। इसे देखकर पूरा गाँव सहम जाता है। लोगों कोबटबाबाके प्रकोप का भय सताने लगता है। पेड़ आर्तनाद करता गिर पड़ता है। और फिर गाँव में कोलाहाल मच जाता है। बीमार चल रहा निरधन साहु पेड़ गिरने के धमाके से चिहुँक उठा- “आसमान से..... का गिरल रे लछमनि.....! अरे बाप!!”5 यह है रेणु की कहानियों के लोक-जीवन की संवेदना। यह यथार्थ हृदयग्राही और मानवीय संवेदना को झंकृत करनेवाला है। इस कहानी में देखा जा सकता है कि पेड़, पक्षी, पर्व-त्योहार, पूजा-अर्चना, कुँवारी-विवाहितों की मनौती, अनिष्ठ होने का भय, छठ-पूजा, मुंडन, शादी में आभूषण पहनकर बटबाबा को प्रणाम, वर-यात्रा, शव-यात्रा, भरी लाल माँग, धुली माँग, फूल-से कोमल बच्चे का माँ की गोद में किलकारी भरनाचिर-निद्रा में मग्न, नवजात शिशुओं का सोहरगीतये सब लोक-जीवन की गतिविधियाँ हैं। यह परिदृश्य रेणु की कहानियों में ही देखने को मिलता है।बटबाबाकहानी तो एक छोटा-सा उदाहरण मात्र है।

        सिरपंचमी का सगुनरेणु की भारतीय कृषि-जीवन के एक नए स्वरूप को उजागर करती है। यह कहानी गाँव के किसानों में खेती-बाड़ी करने, उसमें शुभ-अशुभ का ख्याल रखने की लोक-भावना को उद्घाटित करती है। कोई भी किसान अपना अहित नहीं चाहता है। खेती-किसानी भी भारतीय समाज मेंयज्ञसमझी जाती है। इसकी शुरुआत पवित्र मन से की जाती है। यदि इसमें सगुन अच्छा रहा तो अच्छी फसल की आशा बलवती हो जाती है। और यदि अपसगुन हो जाए तो किसान साल भर उदास और निराश दिखता है।सिरपंचमी का सगुनकहानी अपशगुन से आरंभ होती है। कालू कमार निहाई पर सिंघाय का फाल टेढ़ा कर देता है, जिससे उसका सगुन बिगड़ जाता है। उसके टेढ़े फाल को देखकर लुहसार में बैठे अन्य किसान भी चौंक उठते हैं। गाँव में हल जोतने का रस्म शुरू होने वाला है। यह काम सिरपंचमी (श्रीपंचमी) के दिन ही किया जाता है। कहानी के आरंभ में लेखक कहता है- “निहाई पर हथौड़े की आखिरी चोट कुछ ऐसी अस्वाभाविक आवाज़ में बजी कि लुहसार मे बैठे हुए सभी गृहस्थ अचकचा उठे। सभी की आँखें कालू कमार की निहाई पर एक ही साथ केंद्रित हो गयीं- यह क्या, टेढ़ा फाल! किसका फाल! सिंघाय का? क्या हुआ?..... ना दिहन्द गृहस्थ।6

         ऐसा कालू कमार ने इसलिए किया कि सिंघाय ने पाँच साल से उसे खैन नहीं दिया था। अगहन में भी चुटकी-भर धान नहीं दिया था। दरअसल गाँव में खेती-बाड़ी करने के अपने तरीक़े हैं। गाँव में किसानों के साथ भिन्न-भिन्न पेशे के कारीगर होते हैं। साल में एक बार खैन या कमाई दिया जाता है। उसी से इनका साल भर गुजर-बसर होता है। सिंघाय ने कालू कमार का फाल टेढ़ा कर दिया,  क्योंकि उसे पारिश्रमिक नहीं मिली थी। इधर गाँव में यह विश्वास है कि कोई कमार या लुहार टेढ़े फाल को छू नहीं सकता। टेढ़े फाल का सीधा अर्थ है, पूरे गाँव भर का सगुन बिगड़ जाना। जाति की बड़ी सभा में टेढ़े फाल को ठीक करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। शहर के लुहार भी अब यह काम चुप्पा-चोरी नहीं करते।

        यहाँ सिंरपंचमी का सगुन क्या है और इस दिन किसान क्या करते है?  इसे थोड़ा समझ लेना चाहिए। लेखक के अनुसार- “सिरपंचमी के दिन सभी किसान अपने-अपने सगुन की बात सोचते हैं। उस दिन किसी से बेकार रार हो, किसी की नज़र लग जाए, कोई छींक दे। लुहसार से लौटकर बैलों को नहलाकर सींग में तेल लगाया जाता है। हल के हरेस पर चावल के आटे की सफ़ेदी की जाती है। औरतें उस पर सिन्दूर से माँ लक्ष्मी के दोनों पैरों की उँगलियाँ अंकित करती हैं। गाँव से बाहर परती ज़मीन पर गाँव भर के किसान अपने हल-बैल और बाल-बच्चों के साथ जमा होते हैं। नयी खुरपी से सवा हाथ जमीन छीलकर केले के पत्ते पर अक्षत-दूध और केले का मोती-प्रसाद चढ़ाया जाता है। धूप-दीप देने के बाद हल में बैलों को जोतकर पूजा के स्थान से जुताई का श्रीगणेश किया जाता है। फाल की रेफ़ बीच में पड़ें, इसका ख्याल सभी किसान रखते हैं। अपने-अपने हलवाहों को सचेत कर देते हैं- बायें-बायें ज़रा दाहिनें! पाँच चक्कर दक्षिण से उत्तर और पाँच पूर्व से पश्चिम! जुताई के समय जिसका बैल मल-मूत्र त्याग करे, उसको खाद-पानी की कमी नहीं होगी इस साल की खेती में.....7 इस प्रकार किसान खेती की शुरूआत करते हैं। यह दिन उनके लिए शुभ होता है।

         सिंघाय की पत्नी माधो की माँ ने बूढ़े रेलवे मिस्त्री से अपनी दु:-भरी कहानी सुनाई। मिस्त्री ने उसका फाल ठीक कर दिया। माधो की माँ फाल को सीधा हुआ देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ी। वह अपना सगुन बनाकर वापस घर लौटी। बूढ़ा रेलवे मिस्त्री को बदले में दूध-दही देकर चुकता किया। इसे लेकर गाँव वालों को काफ़ी अचरज होता है। कालू कमार ने अपने लुहसार में बात छेड़ी- “अब तो जनाना लोग फाल पिटवाने जाती है, इस गाँव की रेलवे के लुहार के यहाँ।8 यह है लोक-जीवन में आने वाले संकट से उबरने का रास्ता और लोगों के हास्य-व्यंग्य भरी बातों का रस। वहीं सिंघाय बूढ़े रेलवे मिस्त्री के लुहसार से टेढ़ा फाल को