महादेवी जी की यादगार कविता ''उत्तर '' - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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महादेवी जी की यादगार कविता ''उत्तर ''

झरोखा:यहाँ हमारे साहित्य जगत के पुरोधाओं का कॉपीराइट फ्री मटेरियल पोस्ट करने का मन है

ब्लॉग्गिंग के ज़रिये सभी अपनी तरह से साहित्य की सेवा कर रहे हैं. ये बात भी सच है कि बहुत सारे साहित्य को बहुत गहरे से समय रहते नहीं पढ़ पाए हैं, मगर लिखने को बहुत आतुर रहे हैं. खैर हम कोशिश करेंगे कि समय-समय पर कुछ प्राचीन साहित्यिक रचनाएँ आपको पढ़वाते रहें. आज महादेवी जी एक कविता सोचा समझ कर पोस्ट कर रहें हैं.
 
महादेवी जी की  यादगार कविता ''उत्तर ''

इस एक बूँद आँसू में

चाहे साम्राज्य बहा दो
वरदानों की वर्षा से
यह सूनापन बिखरा दो

इच्छा‌ओं की कम्पन से

सोता एकान्त जगा दो,
आशा की मुस्कराहट पर
मेरा नैराश्य लुटा दो ।

चाहे जर्जर तारों में

अपना मानस उलझा दो,
इन पलकों के प्यालो में
सुख का आसव छलका दो

मेरे बिखरे प्राणों में

सारी करुणा ढुलका दो,
मेरी छोटी सीमा में
अपना अस्तित्व मिटा दो !

पर शेष नहीं होगी यह

मेरे प्राणों की क्रीड़ा,
तुमको पीड़ा में ढूँढा
तुम में ढूँढूँगी पीड़ा !
 

1 टिप्पणी:

  1. बेहतरीन है आखिरी दो पंक्तियों में महादेवीजी के सारे काव्य का सार छुपा है....

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