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''जैनेन्द्र का कथा-साहित्य भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का संवाहक रहा है । ''-डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, फ़रवरी 29, 2012 | बुधवार, फ़रवरी 29, 2012


“ जैनेन्द्र के कथा-साहित्य में सांस्कृतिक पृष्ठभूमि ”

‘संस्कृति’ एक व्यापक शब्द है, जिसकी धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, आर्थिक एवं साहित्यिक व्याख्या की जा सकती है । समग्र दृष्टिकोण से यह स्पष्ट है कि संस्कृति एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति, जाति, समाज, राष्ट्र और विश्व-जीवन के अंतरबाह्य उत्थान का क्रम क्रियमाण रहता है । इसका सीधा संबंध मानवीय चेतना से है, जो युग-जीवन के प्रभावों को आत्मसात् करती हुई अभ्युत्थान मूलक होती है । डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने जीवन के नानाविध रूपों के समुदाय को संस्कृति की संज्ञा दी है । मलिनोवास्की ने संस्कृति को परिभाषित करते हुए लिखा है कि इसमें पैतृक निपुणताएँ, श्रेष्ठताएँ, कलागत प्रियता, विचार, आदतें और विशेषताएँ सम्मिलित रहती हैं । अतः संस्कृति का संबंध दर्शन और धर्म से लेकर सामाजिक संस्थाओं तथा रीति-रिवाजों तक मानव-जीवन की समस्त विचारपूर्ण प्रणालियों से माना जा सकता है । 

‘भारतीय संस्कृति’ मूल रूप से सामासिक संस्कृति है । जिसके रूप-संयोजन में शताब्दियों से विश्व की अनेक संस्कृतियों का योगदान रहा है । इसने समन्वयवादी प्रवृति के कारण विश्व की समस्त संस्कृतियों को आत्मसात् कर लिया है तथापि उसका निजी रूप अक्षुण्ण और विशिष्ट रहा, इसमें कोई संदेह नहीं । जबकि आज संसार की अनेक प्राचीन संस्कृतियाँ अतीत के गर्भ में लुप्तप्रायः हो गई हैं या उनका रूप परिवर्तित हो गया है, परंतु आज भी भारतीय संस्कृति का अक्षुण्ण स्वरूप भारतीय जीवन-पद्धति, आचार-विचार, कला-काव्य एवं जाति संस्कारों में सुरक्षित है ।

महान् कथाकार जैनेन्द्रजी का कथा-साहित्य भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का संवाहक रहा है । उन्होंने अपनी संस्कृति और परंपरा के परिप्रेक्ष्य में ही भारतीय मानस का पहचान की है । उन्होंने अपने उपन्यासों ओर कहानियों में अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं मसलन- ईश्वर, आस्तिकता-नास्तिकता, बुद्धि बनाम भावना, अंतःप्रेरणा बनाम तर्क, हिंसा-अहिंसा, प्रेम और वासना, पति और पत्नी, सतीत्व, शरीर की पवित्रता, पाप-पुण्य, समर्पण आदि । ये प्रश्न निश्चय ही हमारी भारतीय संस्कृति के वर्तमान स्वरूप से संबद्ध हैं और इसलिए सामयिक भी हैं । ये प्रश्न हमारी संस्कृति, आचरण तथा जीवन-पद्धति के मूल में समाविष्ट हैं, जिनका हल होना अभी शेष है । जैनेन्द्रजी ने कथा-साहित्य में इन प्रश्नों को उठाकर जाग्रत मानस को सोचने पर विवश कर दिया है । वस्तुतः संस्कृति और समाज से संबद्ध मूलभूत प्रश्नों को उठाना और एक बौद्धिक वातावरण में हलचल पैदा करना महान् साहित्यकार का दायित्व भी होता है, जिसे जैनेन्द्रजी ने सफलतापूर्वक निभाया है । 
जैनेन्द्रजी रचित उपन्यासों और कहानियों के आधार पर उनके सांस्कृतिक चिंतन का विवेचन निम्नलिखित बिंदुओं में व्यक्त किया जा रहा है-

1. सामाजिक विषमताएँ संस्कृति को प्रभावित करती हैं, अतः युगीन सुदर्भ में उनका चित्रण और संवेदना का उद्घाटन आवश्यक हो जाता है । जैनेन्द्रजी ने समाज की विषमताओं और विसंगतियों का गहराई से अध्ययन किया, उसे अपने तर्क और मौलिकता के वातावरण में प्रस्तुत कर बौद्धिक-जगत् को समस्या पर चिंतन के लिए मजबूर कर दिया । उदाहरणार्थ- जैनेन्द्रजी के नारी-पात्र सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से पीड़ित दृष्टिगोचर होते हैं । ‘परख’ की कट्टो, ‘तपोभूमि’ की धरणी, ‘कल्याणी’ की श्रीमती असरानी, ‘त्यागपत्र’ की मृणाल आदि । ‘कट्टो’ युवती विधवा है और इसी कारण उसका प्रेमी उससे विवाह नहीं करता । ‘धरणी’ विवाह पूर्व गर्भवती हो जाती है । ‘श्रीमती असरानी’ पति द्वारा पीड़ित है, तो, ‘मृणाल’ अनमेल विवाह की नारकीय यातना भोगती है । 

इन नारी पात्रों ने समाज और संस्कृति की बलिवेदी पर अपना आत्मबलिदान किया है । जैनेन्द्रजी ने न तो इनका आदर्शवादी समाधान दिया और न ही मार्क्सवादियों की तरह क्रांति का आह्वान किया, बल्कि बुद्धिजीवी वर्ग पर ही यह प्रश्न अनुत्तरित छोड़ दिया । उनके ये नारी पात्र आत्म-बलिदान करते हुए पाठकीय संवेदना को जाग्रत करने में सफल हो गए हैं । यहाँ जैनेन्द्रजी ने सटीक चित्रण कर सांस्कृतिक परिष्करण को हमारे समक्ष एक आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत कर दिया । इन स्त्रियों की पीड़ा सामाजिक विषमता जनित होते हुए भी उन्होंने समाज की महत्ता को स्वीकार किया । मृणाल कहती है- “ मैं समाज को तोड़ना फोड़ना नहीं चाहती । समाज टूटा कि फिर हम किसके भीतर बनेंगे या किसके भीतर बिगड़ेंगे?” अपनी ओर से नितांत निरपराध होते हुए भी वेदना और कवकलता में इन नारियों का घुलना पाठकीय संवेदना को जाग्रत करने और सहानुभूति प्राप्त करने में सफल रहा है । इससे समाज और संस्कृति की विसंगतियों को जैनेन्द्रजी ने उजागर करके भी इनके महत्त्व को नकारा नहीं । 

2. जैनेन्द्रजी के कथा साहित्य में फलक परिमित है । उनका संसार सीमित क्षेत्र में प्रस्तुत हुआ । अतः पात्र भी सीमित जगत् में ही विचरते हैं । फिर भी उनके पात्र व्यक्तिमुखी प्रतीत होते हैं, जिनके हृदय का संघर्ष उनकी अत्यधिक संवेदनशीलता का परिणाम है । त्याग, कष्ट-सहिष्णुता आदि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को उन्होंने इन पात्रों में यत्र-तत्र भर दिया है। विभिन्न स्थितियों का निर्माण करके उनके चरित्रों का प्रकाशन हुआ है । उन्होंने अपने मौलिक उद्भावना प्रकट करते हुए यह अवश्य स्पष्ट किया कि नारी प्रत्येक स्थिति में प्रेम करने के लिए स्वतंत्र है । ‘सुनीता’ ‘सुखदा’ और ‘विवर्त’ की नारी दांपत्त्य मर्यादाओं को तोड़कर प्रेम तो करती है, लेकिन यह पति की उदारता के कारण ही संभव हो सका है । अतः पुरूष प्रधान समाज में पुरूषों की भूमिका पर प्रश्न चिह्न उठाते हुए जैनेन्द्रजी ने नारी को मुक्ति देकर भारतीय संस्कृतिनिष्ठ मौलिक चिंतन प्रस्तुत किया है ।

3. भारतीय संस्कृति में अहिंसा, प्रेम और त्याग, मानवतावादी दृष्टि को अत्यंत महत्त्व दिया गया है । ‘पत्नी’ कहानी में उन्होंने आतंकवादी जीवन की व्यर्थता और उदासीनता प्रदर्शित करते हुए हिंसा का विरोध किया । ‘जयसंधि’ में घृणा और महत्त्वाकांक्षा पर प्रेम व त्याग की विजय दिखाकर अपनी मानवतावादी दृष्टि का परिचय तो दिया ही, साथ ही भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को आगे भी बढ़ाया । अध्यात्म भारतीय संस्कृति का सनातन तत्त्व है । अध्यात्मक से परे भारतीय संस्कृति शून्य-स्वरूप है । जैनेन्द्रजी की कहानियों में भारतीय दार्शनिक चिंतन की विभिन्न दृष्टियों का समावेश हुआ है । ‘तत्सत्’ उनकी दार्शनिक कहानी है, जिसमें संसार के माध्यम से ईश्वर के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है । ‘सर्ववाद’ के अनुसार जो कुछ दिखाई देता है, वह सब मिलकर ईश्वर है । इन दोनों ही कहानियों में अद्वैतवाद की प्रतिष्ठा हुई है । ‘नीलम देश की राजकन्या’ में राजकन्या को आत्मा की शाश्वत पुकार समझना न्यायसंगत होगा । इस तरह का तात्त्विक चिंतन उनके भारतीय संस्कृति से ‘प्रेम’ को प्रकट करने वाला है ।

4. भारतीय संस्कृति में नारी को पूजनीय माना गया है । कहा गया है ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।’ लेकिन समय के साथ यह स्थिति विपरीत हो गई है । नारी प्रताड़ना का शिकार हुई है । जैनेन्द्रजी ने युगीन संदर्भ को यथार्थ की पीठिका पर उतारते हुए समसामयिक चारित्रिक पतन को उजागर भी किया है, तो समाज के दोषों को भी उजागर किया है । ‘सुनीता’ और ‘मृणाल’ इसी प्रकार के औपन्यासिक पात्र हैं, जो हमारी मानसिक चेतना को हिलाकर रखनेवाले पात्र हैं । ‘सुनीता’ को लेकर साहित्य जगत् में सर्वाधिक चर्चा हुई । सबसे अधिक विवाद हरिप्रसन्न के सामने सुनीता के निर्वसन होने को लेकर हुआ । कुछ विद्वानों ने इसे भारतीय शालीनता के विरूद्ध बताया, तो कुछ ने इसे सनसनी या उत्तेजना पैदा करने वाली घटना बताते हुए नैतिकता का प्रश्न उठाया । परंतु विचारणीय यह है कि वासना लोलुप हरिप्रसन्न था न कि सुनीता । उसकी कुत्सित लालसा को विफल करने और वासना का दमन करने का उसके पास एक यही उपाय बचा था । ऐसी स्थिति में हमें यह मानना चाहिए कि जैनेन्द्रजी ने अपने कथ्य में भारतीय संस्कृति के मूल तत्त्व ‘वासना से विरक्ति’ का विधान किया है । 

5. जैनेन्द्रजी के संपूर्ण कथा-साहित्य में एक तथ्य स्पष्ट रूप से प्रकट होता है कि उनके पात्र भारतीय समाज से प्रेम करने वाले तथा उसके मूल्यों के प्रति समर्पित हैं । उनके लगभग सभी उपन्यासों में ‘घर’ केन्द्र में है । ‘त्यागपत्र’ की मृणाल घर छोड़कर भी भतीजे जज के माध्यम से घर से जुड़ी हुई है । देखा जाए तो उसका सारा संघर्ष ही ‘घर’ को बचाने को लेकर है । अन्य पात्रों का अवलोकन करें तो स्पष्टतः देखा जा सकता है कि घर को छोड़नेवाली ‘सुखदा’ रोगी है, घर को न बचा पाने वाली ‘कल्याणी’ मर जाती है तो दूसरी ओर घर की रक्षा करने वाली ‘सुनीता’ ओर ‘भुवनमोहिनी’ सुखी हैं । ‘जयवर्द्धन’ घर के लिए प्रधानमंत्री का पद छोड़ देते हैं । इससे स्पष्ट होता है कि जैनेन्द्र ने ‘घर’ को भारतीय संस्कृति व समाज का अभिन्न घटक माना । यही कारण है कि उनके कथा-साहित्य में आए हुए पात्र अपनी वैयक्तिक विशिष्टता रखते हुए भी समाज से कटे हुए नहीं है । 

6. साहित्य को समाज का दर्पण माना गया है । हमारे देश की जातीयता अगर कहीं प्रकट होती है, तो वे दो कथाकार हैं- प्रेमचंद और जैनेन्द्र । प्रेमचंद ने आदर्शोन्मुख यथार्थवादी दृष्टि रखी, किंतु जैनेन्द्रजी ने मनोजगत् का सहारा लेकर सूक्ष्मता से भारतीय परंपरा का निर्वहन किया । जैनेन्द्रजी के पात्र जिस अंर्तजगत् को उठाए घूमते हैं, उसके रेशे-रेशे में भारतीयता परिलक्षित होती है । ‘परख’ के बिहारी, ‘सुनीता’ के श्रीकांत, ‘सुखदा’ के स्वामीकांत, ‘विवर्त’ के नरेशचंद्र अथवा ‘जयवर्द्धन’ के जयवर्द्धन के अतिरिक्त कट्टो, सुनीता, भुवनमोहिनी, इला आदि को समझने के लिए भारतीय संस्कृति को ही आधार में रखना पड़ेगा, अन्यथा एकाकी दृष्टिकोण ही विवेचित होगा ।

7. जैनेन्द्र का समग्र कथा-साहित्य आख्यानपरक नहीं, बल्कि विमर्शपरक है । कुछ सीमा तक इन्हें विचारपरक भी कहा जा सकता है । इनमें विचारों के अनुरूप ही पात्र की कल्पना और स्थितियों की रचना की गई है, जो कि पूर्णतः भारतीय चिंतन पर आधारित है । सुनीता, परख, त्यागपत्र आदि उपन्यास उनकी विचार दृष्टि को ही रेखांकित करने वाले हैं । इनमें स्त्री-पुरूष संबंधों की जो यथार्थपरक मौलिक व्याख्या हुई है, वह विचारणीय है । यह जरूर कहा जा सकता है कि जैनेन्द्रजी की मान्यता स्त्री की स्वतंत्रता में अधिक थी, जो कि मानसिक अधिक और सामाजिक कम आँकीजा सकती है, तथापि हमें  यह भी ध्यान रखना होगा कि क्या मानसिक मुक्ति के बिना सामाजिक मुक्ति संभव है? जैनेन्द्रजी ने अपने उपन्यासों और कुछेक कहानियों में स्त्री-पुरूष संबंधों की व्याख्या की है । उन्होंने यह मौलिक प्रश्न भारतीय स्त्री के बारे में उठाया है, जो अपने परिवार, विवाह और दांपत्य के नाम पर अपनी पहचान और अस्मिता को मिटा देती है । विवाह के बाद उसका नाम व परिचय तक बदल जाता है । इस स्थिति को जैनेन्द्रजी ने ‘सुनीता’ उपन्यास में हरिप्रसन्न की जिज्ञासा के रूप में उठाया है- ‘विवाह और पत्नीत्व ऐसी क्या वस्तु है कि स्त्री अपने ऊपर छत्र लेकर उसके नीचे उसकी संपत्ति होकर रहे?’

8. यद्यपि जैनेन्द्रजी ने अपने कथा-साहित्य में अंतर्जगत् को महत्त्व प्रदान किया, किंतु उनका कोई भी पात्र सामाजिक अथवा सांस्कृतिक दृष्टि से विद्रोह करता हुआ या भिन्न नजर नहीं आता । जैनेन्द्रजी के मूल्यों में भी सबसे कटा हुआ अकेलापन मूल्य है । उदाहरणार्थ- यदि हरिप्रसन्न मुक्त रहना चाहता है तो वह उद्देश्य क्रांतिकारिता के प्रति समर्पित भी है ............. फिर भी श्रीकांत और सुनीता उसे समाज की मुख्य धारा की तरफ लाने का प्रयत्न करते हैं, उसके लिए सुनीता अपनी समस्त वर्जनाएँ भी तोड़ देती है । इससे यह तो स्पष्ट होता है कि जैनेन्द्रजी के उपन्यास यथार्थ हैं, वायवा नहीं 

9.साहित्य का उद्देश्य जैनेन्द्रजी की दृष्टि में प्रेम और अहिंसा द्वारा ऐक्य का अनुभव कराना था । उनके मतानुसार इस सनातन ऐक्य अर्थात् परमात्मा की लब्धि का साधन है-प्रेम । यह प्रेम अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग रूप में प्रकट होता है । तत्काल की सीमा का अतिक्रमण करके यह प्रेम जितना चिरस्थायी, अखिलव्यापी, सूक्ष्मजीवी तथा उत्सर्गजीवी होता है, उतना ही व्यक्ति परमात्मा के अधिक निकट पहुँचता है । किंतु यह भी सत्य है कि काल और देश के द्वंद्व में व्यक्ति उलझता ही रहता है । यह द्वंद्वावस्था ही जीवन की चेष्टा का और साहित्य का क्षेत्र है । संभवतः इसी सांस्कृतिक चिंतन की पृष्ठभूमिपर जैनेन्द्रजी का समग्र कथा-साहित्य दृष्टिगत होता है । जैनेन्द्रजी के पात्रों का संघर्ष मूलतःव्यक्ति और व्यक्ति का संघर्ष है, फिर समस्याएँ चाहे कोई भी क्यों ने हो? ‘अंतराल’, ‘विवर्त’, ‘सुखदा’ इसी प्रकार की रचनाएँ हैं ।

10. जैनेन्द्रजी महान् चिंतक थे और भारतीय मूल्यों के प्रति प्रगाढ़ आस्थावान् भी । इसी कारण उनके कथा-साहित्य में समस्याएँ मूलतः नैतिकता से और नैतिकता ईश्वर के अस्तित्व से जुड़ी हुई लगती है । किसी एक घटक को छूते ही समग्रता के सभी तार बजने शुरू हो जाते हैं । ‘अंतराल’ में पारिवारिक इकाई पर ध्यान देते हुए भी विश्व के घटक उलझे हुए हैं । दूसरी ओर ‘अनामस्वामी’ पूर्वाग्रहों को छोड़कर पढ़नेवालों के लिए वैचारिक चुनौती है । यह कृति हमारी सांस्कृतिक एवं पारिवारिक विचारधाराओं का पुनःपरीक्षण करने को उकसाती है । ‘अनामस्वामी’ व्यक्ति दर्शन नहीं अपितु संस्कृति दर्शन है, जो कि आधुनिकता के समस्त स्वस्थ उपादेय तत्त्वों से संयुक्त है । इसी प्रकार ‘मुक्तिबोध’ में जैनेन्द्रजी ने सामाजिक जीवन की कतिपय बौद्धिक जिज्ञासाओं को अभिव्यक्ति देकर प्रगल्भ मन के भावना-संसार को सहज रूप में प्रकट किया है । ‘व्यतीत’ में भी प्रेम को बहुत ऊँचे धरातल पर प्रस्थापित किया गया है । 

समग्रतः उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि जैनेन्द्र का संपूर्ण कथा-साहित्य यदि अंतर्जगत् पर केंद्रित भी है, जब भी सामाजिक-सांस्कृतिक पक्षों को महत्ता प्रदान करने वाला है । डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने लिखा है- ‘यह सत्य है कि वे जीवन के कटु सत्य से दूर है, उन्होंने पतनोन्मुख मध्यवर्ग का चित्रण किया है, किंतु उन्होंने मन की जिस गहराई में प्रवेश किया है वह समाज की विषमता के कारण ही है ।’ इसी कारण उनके उपन्यास और कहानियाँ नए और अजीब ढंग से उपादेय जीवन का चित्रण हमारे समक्ष रख देते हैं । उन्होंने अपने कथा-साहित्य में भारतीय सांस्कृतिक चिंतन की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए युगानुरूप मौलिक उद्भावनाएँ कीं, जो समयानुकूल और प्रासंगिक भी हैं तथा नई दिशा की संवाहक भी ।

नारी की विसंगत स्थिति का रेखांकन, समाज का चारित्रिक पतन, मन की उद्दाम लालसाएँ, कुंठित मस्तिष्क आदि विषय उनके कथा-साहित्य में छाए रहे, किंतु इन सबसे मुक्त होने का उपाय भी उन्होंने ही दिया, जो कि भारत की सांस्कृतिक परंपरा की समृद्धि का पर्याय है । संस्कृति और समाज से संबद्ध प्रश्न उठाकर उन्होंने जो भी समाधान दिए, वे हमारी संस्कृति की परिधि में ही हैं और उसकी विराट् सत्ता का उद्बोधन कराने वाले हैं ।

समष्टि रूप में जैनेन्द्र का कथा-साहित्य भारतीय संस्कृति के तत्त्वों को संरक्षण करनेवाला, युगानुरूप परिष्करण करने वाला और भावी साहित्यकारों के लिए मौलिक चिंतन के द्वार खोलने वाला रहा है । साहित्यकार के दायित्व का जैनेन्द्रजी ने निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए भारतीय सांस्कृतिक गौरव को गतिमान किया, अतः मेरी दृष्टि में वे प्रेमचंद के बाद युगांतरकारी कथाकार माने जाने चाहिए । 
 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी
(अकादमिक तौर पर डाईट, चित्तौडगढ़ में वरिष्ठ व्याख्याता हैं,आचार्य तुलसी के कृतित्व और व्यक्तित्व पर ही शोध भी किया है.निम्बाहेडा के छोटे से गाँव बिनोता से निकल कर लगातार नवाचारी वृति के चलते यहाँ तक पहुंचे हैं.वर्तमान में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की चित्तौड़ शाखा के जिलाध्यक्ष है.शैक्षिक अनुसंधानों में विशेष रूचि रही है.'अपनी माटी' वेबपत्रिका के सम्पादक मंडल में बतौर सक्रीय सदस्य संपादन कर रहे हैं.)

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