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“ काशी मरणान्मुक्ति-आत्म प्रकाश की अभिव्यक्ति ”

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, जुलाई 12, 2012 | गुरुवार, जुलाई 12, 2012

  


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हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल में औपन्यासिक साहित्य की उज्ज्वल परम्परा रही है, किंतु पौराणिक उपन्यासों का अभाव सदैव खटकता ही रहा समय के साथ-साथ विमर्शात्मक उपन्यासों का दौर शुरू हो गया, वहाँ ऐसे दौर मेंकाशीमरणान्मुक्तिजैसा पौराणिक उपन्यास का लेखन पठन दोनों विस्मयकारी है भारत भूमि परकाशीमुक्ति प्रदाता नगरी के नाम से विख्यात रही है, जहाँमहानायक चांडाल को मुक्ति मिली, यह स्वाभाविक घटना है, कारण यह है कि हमारी आध्यात्मिक परम्परा में सदैव कर्तृत्व आचरण को महत्त्व दिया गया, कि कुल या जाति को यदि श्रद्धा से आसक्त पवित्र मन हो तो चेतन तत्त्व स्वमेय प्राप्त हो जाता है

काशी मरणान्मुक्ति के नायक का चरित्र संघर्ष से भरा हुआ है, वीभत्स से जीवन शुरू हुआ और ब्रह्मरसत्व को प्राप्त करने का अधिकारी बना यही कर्तृत्व उसे महानायक बना देता है। यह मात्र दैवीय सद्इच्छा ही नहीं, वरन् नायक के कर्म प्रयास भी हैं उसकी असीम श्रद्धा भी प्रेरणादायक है

उपन्यास पौराणिक होते हुए भी सामयिक परिस्थितियों में संदर्भवान प्रतीत होता है वर्णनात्मक शैली के साथ प्रवाहमयी धारा में लिखित यह उपन्यास तत्समनिष्ठ शब्दावली से तत्कालीन युगीन परिदृश्य को उपस्थित कर देता है फलक की दृष्टि से इसे वृहत् उपन्यास माना जा सकता है ।मनोज ठक्कर रश्मि छाजेड़ कृत इस उपन्यास का खासियत इसमें निहित दार्शनिक चिन्तन है, लेखक द्वय का प्रगाढ़ चिन्तन इसमें अभिव्यक्त हुआ है जहाँ आत्मतत्त्व का प्रकाश-स्रोत, आध्यात्मिक मुक्ति का कथारूप, रोमांचकारी परिस्थिति निर्माण कल्पना का सौन्दर्यमयी शब्दावली में चित्रण करते हुएकाशीको महिमामण्डित करने का अनूठा प्रयास है आशा है यह उपन्यास हिन्दी पाठकों को रोमांचित करेगा एवं हिन्दी प्रेमियों को आकर्षित ही करेगी

समीक्षक 
(अकादमिक तौर पर डाईट, चित्तौडगढ़ में वरिष्ठ व्याख्याता हैं,आचार्य तुलसी के कृतित्व और व्यक्तित्व पर ही शोध भी किया है.निम्बाहेडा के छोटे से गाँव बिनोता से निकल कर लगातार नवाचारी वृति के चलते यहाँ तक पहुंचे हैं.शैक्षिक अनुसंधानों में विशेष रूचि रही है.राजस्थान कोलेज शिक्षा में हिन्दी प्राध्यापक पद पर चयनित हुए हैं।-मेल:singhvi_1972@rediffmail.com,मो.नं.  9828608270

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