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धर्माचरण की युगानुकूल व्याख्या: आज की आवश्यकता: डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी Vaya ‘सेज पर संस्कृत’

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, जनवरी 22, 2013 | मंगलवार, जनवरी 22, 2013

                          यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हो रही है।


पुस्तक समीक्षा
धर्माचरण की युगानुकूल व्याख्या: आज की आवश्यकता
डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

‘सेज पर संस्कृत’ उपन्यास जैन धर्म व जैन समाज की जीवन-शैली पर केन्द्रित यथार्थवादी उपन्यास है, जिसमें लेखिका मधु काँकरिया ने इस प्रश्न को उठाया है कि महावीर के निर्वाण के 943 वर्षों बाद सिर्फ स्मृति आधार पर लिपिबद्ध साधु आचार संहिताओं को समय की गतिशीलता के साथ परीक्षण की जरूरत क्यों नहीं है? लेखिका का कथन है- “महावीर ने जो अमृत-वचन दिए थे, वे टनों भूसों के बीच कहाँ बिला गए । क्योंकि अन्तर्जगत की समस्याएँ शाश्वत हो सकती हैं । भीतर की दुष्ट प्रवृत्तियों को शमित करने के सवाल शाश्वत हो सकते हैं, भीतर के शून्य से उपजी जिज्ञासाएँ शाश्वत हो सकती हैं; पर बाहरी आवरण, जैविक समस्याएँ एवं मानवीय नियति एवं अस्तित्व की समस्याओं के वे समाधान जिनके तार गतिशील समाज और व्यवस्था के तान-बानों से जुड़े हैं..... युगों-युगों तक कैसे अपरिवर्तित रह सकते हैं ?

उपन्यास के कथानक के केन्द्र में हैं- ‘छुटकी’ की दीक्षा, दीक्षा पूर्व आध्यात्मिक सम्मोहन, दीक्षा के बाद सांसारिक आकर्षण, साधु जीवन का परित्याग और उसके पश्चात् नारकीय जीवन । संपूर्ण कथानक को ‘द अहिंसा टाइम्स’, सेज पर संस्कृत, वजूद, अन्वेषण तथा एक असमाप्त दुस्वप्न आदि अध्यायों में विभक्त किया गया है ।

इस शाश्वत सत्य को स्वीकार करना चाहिए कि भारत की आर्हत् मार्गी धर्म-परम्परा में जैन धर्म की विशिष्टता इसकी वैज्ञानिक दृष्टि के कारण रही है । ‘अनेकांत दर्शन’ आज भी वैचारिकता के धरातल पर पूर्ण लोकतांत्रिक एवं आधुनिक है; फिर भी ‘पूर्णिमा’ जैसी श्राविका प्रत्येक जैन परिवार में मौजूद है, जो धर्म के मर्म को न समझकर अंध-श्रद्धा व आडम्बरों को प्रश्रय देकर न केवल स्वयं का, बल्कि अपनी संतान का जीवन भी दाँव पर लगा देती है । साध्वाचार भी धर्म के मूल सिद्धांतों की मौलिकता को समयानुकूल संदर्भों से दूर ले जा रहा है, फलतः समाज को भी प्रगतिगामी दिशा नहीं मिल पा रही है । लेखिका ने समयानुकूल मानवीय संवेदना से भरे हुए पक्षों को जिस साफगोई से उठाया है, वह विचारणीय है । 

प्रस्तुत उपन्यास को ‘स्त्री-विमर्श’ की परिधि में बाँधना एकांगी होगा, क्योंकि ‘छुटकी’ व ‘संघमित्रा’ की पीड़ा मात्र स्त्रीमन की पीड़ा नहीं है, बल्कि अंध-विश्वासों तथा धार्मिक जड़ताओं के व्यामोह में फँसे प्रत्येक मानव-मन की पीड़ा है । इस उपन्यास का उद्देश्य निश्चित रूप से बेहतर समाज के निर्माण का है, जहाँ ‘जीवन’ केन्द्र में है व मानवीय भावनाओं की रक्षा है । साथ ही धर्म के प्रति वितृष्णा नहीं, बल्कि युगानुकूल व्याख्या की चाह है । 

उपन्यास के कतिपय अंश जैसे- शिखरजी में डोलीवाले की पीड़ा के साथ सहानुभूति, ‘पंचम’ को अपना मकान दे देना, ‘छुटकी’ की बाल-दीक्षा का लगातार विरोध करना और अंत में “ऋषि-कन्या” के माध्यम से नवीन चेतना का लक्ष्य निर्धारित करना आदि लेखिका की प्रगतिवादी दृष्टि को अभिव्यक्त करते हैं । ‘संघमित्रा’ व ‘मालविका’ जैसी बुद्धिमती नारियाँ यदि अपने दायित्व के प्रति सजग हैं तो सामाजिक उत्थान तीव्र गति से होना तय है ।

देश-काल-वातावरण की दृष्टि से यह उपन्यास यथार्थ व कल्पना के मिश्रित रूप में है। साधु जीवन शैली व जैन परिवारों के वातावरण का चित्रमय वर्णन यथार्थपरक है, वहीं उत्तरार्द्ध में वर्णित घटनाएँ यथा- मुनि का व्यभिचार एवं उसकी हत्या अतिरंजना पूर्ण प्रतीत होती है, लेकिन संभवतः लेखिका के उक्त वर्णन के पीछे मंतव्य रहा होगा कि समय से पूर्व यदि आत्मावलोकन नहीं किया गया तो ऐसी घटनाएँ भी हो सकती हैं । उपन्यास के पात्र स्वाभाविक हैं, जो ‘अजीमगंज’ ही नहीं, किसी भी भारतीय समाज में हो सकते हैं । उनकी संवेदनाएँ व प्रतिक्रियाएँ लगभग साधारण भारतीय जन-मानस की हैं, जिनका चित्रण लेखिका ने बहुत ही गहराई से किया है । 

संवाद पात्रों के स्तर को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं, साथ में लेखिका का दृष्टिकोण भी व्यक्त होता है, इससे गतिशीलता व वैचारिकता का साथ-साथ संचलन हो रहा है । भाषायी दृष्टि से लेखिका ने जहाँ पात्रों के अनुकूल शब्दावली का प्रयोग किया है, वहीं कहीं-कहीं चलते हुए शब्दों, जिसमें आहत मन की अभिव्यक्ति होती है, को भी स्वाभाविक रूप से प्रकट कर दिया है । 

समग्रतः कान्ति कुमार जैन के उक्त कथन का समर्थन किया जाना चाहिए- 

 “मधु काँकरिया के पास धर्म और समाज को समझने की बेहद संवेदनशील दृष्टि है । वे धर्म और समाज की संधियों में छिपे झींगुरों एवं तिलचट्टों को प्रकाश में लाती है।” 

मेरी दृष्टि में यह उपन्यास जैन धर्म व समाज को एक नई दिशा दे सकता है, यदि तटस्थ दृष्टि से वर्तमान जीवन-शैली व धर्म की मूल संकल्पनाओं को आधार बनाकर स्वयं धर्माचार्य आगे आकर जैन धर्म को ‘जन धर्म’ बनाने का प्रयास करे व युगीन संदर्भों के आधार पर इसे मानव-कल्याण का वाहक बनाएँ । 


डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

महाराणा प्रताप राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय

चित्तौड़गढ़ में हिन्दी प्राध्यापक हैं।
आचार्य तुलसी के कृतित्व और व्यक्तित्व पर शोध भी किया है।
स्पिक मैके ,चित्तौड़गढ़ के उपाध्यक्ष हैं।
अपनी माटी डॉट कॉम में नियमित रूप से छपते हैं। 
शैक्षिक अनुसंधानों और समीक्षा आदि में विशेष रूचि रही है।
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मो.नं. +91-9828608270
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