'' संतोष चौबे ने कहीं भी वैचारिकता को मूल प्रकृति पर हावी नहीं होने दिया है''- - अपनी माटी

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सोमवार, फ़रवरी 04, 2013

'' संतोष चौबे ने कहीं भी वैचारिकता को मूल प्रकृति पर हावी नहीं होने दिया है''-

(ये समीक्षा भोपाल से निकलने वाली कला समय पत्रिका के अगस्त -सितम्बर 2012 अंक में 
जीवन की गहरी छापें शीर्षक से छप चुकी है। इसके सम्पादक साथी विनय उपाध्याय से पूछते हुए साभार यहाँ छाप रहे हैं।-सम्पादक)


“ प्रकृति के मध्य विचारों के संतुलन की कविता ”

डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

संतोष चौबे 
मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् द्वारा ‘दुष्यन्त पुरस्कार’ से पुरस्कृत संतोष चौबे का कविता संग्रह ‘कोना धरती का’ स्वमेव प्रकृति धरती के किसी कोने में अर्थात् कवि के विचारों से संवाद करता दिखाई देता है । किसी विशिष्ट विचारधारा से बिल्कुल अलग अपने भावों को सीधी सपाट शब्दावली में अभिव्यक्त करते हुए कविवर चौबे ने कहीं भी वैचारिकता को मूल प्रकृति पर  हावी नहीं होने दिया है, इसी कारण यह कृति विशिष्ट बन गई है ।

इस कविता संग्रह में जहाँ प्रकृति की आत्मीयता व बचपन की स्मृतियाँ हैं, वहीं प्रेम व दोस्ती के संग स्वयं को खुश करने की प्रक्रिया भी है । यह प्रक्रिया कभी ‘एक दोपहर धूप के संग’ गुजरती है, तो कभी ‘झरने के किनारे’; कभी ‘गाँव’ की गलियों में तो कभी ‘रेलगाड़ी के द्वार पर’ । इसी आत्मीयता के कारण कवि अपनी माँ में उत्सवमयी छवि देखता है । माँ को भावना व स्पर्शों का त्योहार कहकर कवि ने नवीन संवेदना को अभिव्यक्त किया है । 

कविवर संतोष चौबे आज के गहमागहमी भरे वातावरण में विचलित नहीं हैं, बल्कि दृढ़ता से सामना करते हुए दिखाई देते हैं । उनकी कविताओं में कहीं भी कुंठा प्रकट नहीं हुई और न ही त्रासद वेदना । आशावादी दृष्टि में वे ‘पत्र का इंतजार’ करते हैं तो ‘काम के क्षण’ में आनंद तलाशते हैं वहीं ‘पैसा कहाँ से आता है’- इसका उत्तर श्रम में ढूँढ़ते हैं । यह आस्थावादी दृष्टि उनकी कविताओं में नये रंग भरती है ।

चूंकि कवि संवेदनशील प्राणी होता है, फलतः अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से विमुख नहीं हो सकता । जब वह जीवन की यथार्थ भूमि को अपनी संवेदना भरी दृष्टि से देखता है तो पाता है कि उसका ‘महानगर का दोस्त’ कैसा है ? ‘पत्थरों के नीचे’ रोते हुए आदमी को देखता है । उसे जब ‘सफलता आक्रांत करती है’ तो वह निश्चय करता है कि ‘सच नहीं बदलता अविश्वास से’ । इसके साथ ही विस्थापित होते हुए आदिवासियों की मर्म व्यथा को व्यंग्यात्मक लहज़े में व्यक्त करते हुए कहता है- ‘मेरे अच्छे आदिवासियों’ । यह सब कुछ कवि को कल्पना लोक से उतारकर यथार्थ की भूमि पर खड़ा कर देता है ।

कवि की चिन्तन परक दृष्टि कुछ-कुछ दार्शनिक अंदाज में भी अभिव्यक्त हुई है, जहाँ सामाजिक व वैचारिक संघर्ष प्रतिफलित होता है । ‘विद्यादेवी का स्वप्न’, ‘गोआ के चर्च में’ ‘उभरना पूरे आदमी की तरह’, ‘ताजी हवा की खोज में’ ‘आदमी और सूरज’ ‘किरणों पर सवार लड़का’ आदि ऐसी ही कविताएँ हैं । ये कविताएँ कवि की गहन चिन्तनात्मक दृष्टि का फल है, जो किसी न किसी का समस्या का समाधान देती है ।

शिल्प की दृष्टि से कवि द्वारा प्रयुक्त नये बिम्ब व प्रतीक आकर्षक लगते हैं तो कविता को नया आकार देते हैं । कुछ कविताएँ लम्बी व तो कुछ छोटी अवश्य हैं, परन्तु वैचारिक गंभीरता व शाश्वत संदेश प्रदान करती दिखाई देती है । मूल प्रकृति व वैचारिक दृष्टि के संघर्ष का स्वर उक्त काव्य संग्रह को अतिरिक्त ऊर्जा भी प्रदान करता है । समग्रतः प्रत्येक कविता एक-दूसरे की पूरक है, जो शृंखला रूप में है, कहीं भी अलगाव नहीं ।


डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

महाराणा प्रताप राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय

चित्तौड़गढ़ में हिन्दी प्राध्यापक हैं।
आचार्य तुलसी के कृतित्व और व्यक्तित्व पर शोध भी किया है।
स्पिक मैके ,चित्तौड़गढ़ के उपाध्यक्ष हैं।
अपनी माटी डॉट कॉम में नियमित रूप से छपते हैं। 
शैक्षिक अनुसंधानों और समीक्षा आदि में विशेष रूचि रही है।
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