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'शिवमूर्ति' के लघु उपन्यास 'तर्पण' की डॉ राजेश चौधरी द्वारा समीक्षा :“ हम अब ऊ चमार नहीं है ”

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, मार्च 02, 2013 | शनिवार, मार्च 02, 2013

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।

             (चित्तौड़गढ़ के एक सजग पाठक,समीक्षक और कोलेज प्राध्यापक डॉ राजेश चौधरी की लिखी 'शिवमूर्ति' के लघु उपन्यास 'तर्पण' की ये समीक्षा  अपनी माटी के ही एक आयोजन संगोष्ठी 'हाशिये के लोग और उपन्यास परम्परा' में पढ़ी गयी।यहाँ हमारे पाठकों के हित में फिर से-सम्पादक,अपनी माटी ई-मेगजीन )

“ हम अब ऊ चमार नहीं है ” 

'शिवमूर्ति'
यदि हाशिये के समाज यानी दलित जीवन पर लिखने के लिए दलित होना अनिवार्य शर्त न हो तो औपन्यासिक कृति के रूप में निराला के बिल्लेसुर बकरिहा से बात शुरू करनी होगी । उसके बाद रांगेय राघव का ‘कब तक पुकारूँ’ उल्लेख्य है । लेखकीय दृष्टि का क्रमिक विकास इस रूप में देखा जाना चाहिए कि दलित समुदाय के प्रति सहानुभूति, तीव्र संवेदना के चरणों को पार करते हुए अब अन्याय के प्रखर प्रतिकार तथा प्रतिशोध-भाव के अंकन तक आ पहुँची है । शिवमूर्ति के तद्भव अप्रैल-2002 में प्रकाशित लघु उपन्यास ‘तर्पण’ को दलित चेतना के मौजूदा स्वरूप का प्रमाण समझना चाहिए । सातवें दशक से लेखन आरंभ करने वाले शिवमूर्ति अपनी लम्बी कहानियों, यथा- कसाई बाड़ा, तिरिया चरित्तर से चर्चा में आए । ऐसा लगता है कि इन कहानियों में उनकी औपन्यासिक प्रतिभा का सूत्र था । आखिर नामवर जी की तिरिया चरित्तर के संदर्भ में यह टिप्पणी कि ‘इसे उपन्यास क्यों नहीं बनाया?’ यों ही नहीं थी । अब त्रिशूल, तर्पण और आखिरी छलांग- तीन लघु उपन्यास शिवमूर्ति के खाते में हैं जिनमें से तर्पण (जिस पर फिल्म निर्माणाधीन है) विशेष चर्चित है । 

तर्पण की कथा भूमि उत्तर भारत के किसी गाँव की है तो काल-बोध मायावती के प्रथम शासन का । मुख्य कथा वर्ण-संघर्ष-सवर्ण बनाम दलित की है जिसका आरंभ दो परिवारों- धरमू पंडित बनाम पियारे चमार के संघर्ष से होता है । गाँव के अधिसंख्यक दलित पियारे सहित सवर्णों के खेतों में मजदूरी करते रहे हैं और पिछले दिनों मजदूरी बढ़ाने का सफल आंदोलन कर चुके हैं। अतः वर्ग-संघर्ष मुख्य कथा की पृष्ठभूमि में है । उपन्यास के पात्रों के व्यवहार में इसकी सफलता- असफलता की प्रतिक्रिया भी झलकती है ।

पियारे की विवाहित बेटी रजपतिया घात लगाए बैठे धरमू पंडित के बेटे चंदर द्वारा मटर के खेत में पकड़ ली जाती है- आरोप मटर की चोरी का है- नीयत बदमाशी की है जिसके बारे में आगे चलकर पंडिताइन का कहना है कि यह नीयत वंशानुगत है और जिसके बारे में यह स्थापित है कि ‘चंदरवा का चरित्तर तो अब तक दो तीन बच्चों की माँ बन चुकी गाँव की लड़कियाँ तब से बखानती आ रही हैं जब वह इन बातों का मतलब भी ठीक से समझने लायक नहीं हुई थी।’ पकड़ी गई रजपतिया के प्रतिकार से प्रथमतः चंदर का अहं आहत होता है ‘नान्हों की छोकरियाँ’ खबरदार बोलना कब से सीख गई ? फिर परेमा की माई, मिस्त्री बहू व रजपतिया की संयुक्त शक्ति से भयभीत हो भाग छूटता चंदर पुरूषोत्तम अग्रवाल की ‘बिल्ली और कबूतर’ कविता की याद दिलाता है जिसमें कबूतर की खुली आँख की तेज चमक से बिल्ली घबरा जाती है, चकरा जाती है । 

यह मामूली सी और लगभग स्वीकार्य समझी जाने वाली घटना दलितों की अब तक की संचित पीड़ा को विस्फोटक क्रोध में बदल देती है । सन् 2002 में इस रूपान्तरण के कारण स्पष्ट है- 1. दलित राजनीति का सत्ता केन्द्र तक पहुँचना 2. शिक्षा 3. कानून की जानकारी ।दलित सामाजिक कार्यकर्ता भाईजी की अगुवाई में दलित युवा पीढ़ी रजपतिया के साथ हुई छेड़छाड़ को बलात्कार की शिकायत में तब्दील कर थाने में दर्ज कराने पर आमादा है क्योंकि भाईजी के मुताबिक 366 बटा 511 दर्ज हुई तो इन्क्वायरी अफसर उसे गिराकर 354 पर ले आएगा अतः चंदर को सजा दिलाने के लिए 376 लगाना जरूरी है इसलिए स्ट्रेटेजी बनाना होगा, लिखाना होगा-रेप हुआ है ।

पियारे की असहमति; जो कि असत्य भाषण के संभावित पाय जन्मी है और रजपतिया, रजपतिया की माँ-यानी स्त्री की राय जाने बगैर बलात्कार की शिकायत दर्ज होती है- इस संदर्भ में आगे चलकर हरिजन एक्ट का इस्तेमाल किया जाता है ।धरमू पंडित के पास पैसा है, ऊँचे रसूख हैं, दलित उभार से आहत अहं है तो दलित समुदाय के पास चंदे का, दलित एम.एल.ए. का, रजपतिया से जबरन दिलवाए गए झूठे बयान का सहारा है । पंडित-पुत्र चंदर महाशय रिश्वत के बल पर पहली बार थाने से छूटकर घर आते हैं तो विजय-दर्प में कंधे पर बंदूक टांगकर चमरौटी के तीन चक्कर लगाते हैं । भाईजी की कोशिशों से चंदर की फिर गिरफ्तारी होती है तो उसके डेढ़ महीने के जेल-वास के उपलक्ष्य में चमरौटी में सूअर कटता है, दारू चलती है- झमाझम नाच होता है जिसके चलते रजपतिया के भाई मुन्ना पर हजार रूपये का कर्ज हो जाता है । पंडित पार्टी महँगा वकील खड़ा करती है तो दलित पार्टी भी पीछे नहीं । कुल मिलाकर दोनों तरफ नीति नहीं-सिर्फ रणनीति है । अंधायुग के मुताबिक दोनों ही पक्षों में विवके है हारा/किसी में कम किसी में ज्यादा ।

चूंकि बलात्कार की रिपोर्ट झूठी है और सी.ओ. ठाकुर हैं, चंदर की माता श्री पंडिताइन द्वारा प्रति पचास रू. खरीदी गई निजी हलवाहिन लवंगलता व उसकी बटन कौरह के झूठे बयान हैं; अतः अन्ततः चंदर बरी हो जाता है पर प्रतिशोध भावना से बरी नहीं है सो बंदूक से हवाई फायर करने, भाईजी को डराने के इरादे से निकलता है पर बदले में मुन्ना के हाथों नाक कटा बैठता है । इस घटना का न कोई गवाह है न कोई नामजद आरोपी, शक जरूर मुन्ना पर है । ऐसे में मुन्ना का पिता पियारे स्वयं को आरोपी के रूप में अपने वकील को से यह कहकर गिरफ्तार करवाता है कि ‘यह सही है कि मैंने नहीं मारा पर मन ही मन न जाने कितनी बार मारा है । अब जब बिना मारे ही ‘जस’ लेने का मौका मिल रहा है तो आप कहते हैं इंकार कर दूँ ?

शिवमूर्ति ने निरपराध पियारे के जेल-गमन में उसके अत्याचार सहन करने वाले पुरखों का तर्पण देखा है, मुक्ति देखी है पियारे के इस कृत्य को शहादत का दर्जा दिया है पर मेरी दृष्टि में पियारे के जेल-वरण का यह कारण सटीक नहीं है । उपन्यास में एकमात्र मूल्य बोधी चरित्र पियारे है जो बड़ी बेटी सूरसती के द्वारा यौन-शोषण के परिणामस्वरूप किए आत्मघात की दोहरी दुर्घटना के बावजूद छोटी बेटी रजपतिया से छेड़छाड़ के दोषी को दंडित करने की प्रबल इच्छा के बावजूद बलात्कार वाले असत्य भाषण का समर्थक नहीं था । यह सही है कि उसकी आवाज अनसुनी कर दी जाती हैं यह भी सही है कि आगे चलकर वह खुद भी कभी-कभी अपनी आवाज अनसुनी करने लगता है पर उसके जेल-वरण का मूल कारण उक्त मनःस्थिति से उपजा प्रायश्चित भाव है- उपन्यास में इसी भाव को विकसित किया जाना अधिक उचित होता । 

शिवमूर्ति ने कौरव-पांडव संघर्ष से दिखते घटनाक्रम में दलित समुदाय के प्रति पूर्ण सहानुभूति रखते हुए, उसकी विजय की सद्भावना के बावजूद, छेड़छाड़ को बलात्कार बताने, कर्जा लेने, भाईजी की राजनीतिक लाभ उठाने की मंशा, को आलोचनात्मक दृष्टि से देखा है पर इसे अपेक्षित विस्तार नहीं दिया है । हम जिससे लड़ते हैं, लड़ते-लड़ते उस जैसे हो जाना हमारी नियति क्यों हो ? इसे प्रश्नांकित किया जाना चाहिए और यह भी विचारणीय होना चाहिए कि उपन्यास में विधमान गोलबंदी क्या अंतिम सत्य है ? दुष्यंत के शब्दों में-

आप दीवार गिराने के लिए आए थे
आप दीवार उठाने लगे- ये तो हद है ।

उपन्यास में कई सूक्ष्म एवं प्रामाणिक सूत्र उपकथाओं के संकेतक मौजूद है- मसलन पंडित परिवार की हलवाहिन लवंगलता जाति से चमार है पर छोटे-छोटे तात्कालिक हितों के लिए अन्यायी पंडित परिवार के लिए मुखबिरी करती है । भाईजी के वर्ग संघर्ष के पीछे व्यक्तिगत प्रतिशोध भावना भी है क्योंकि बहुत पहले चंदर ने उन्हें लात मारी थी । चंदर तीस साल से ऊपर अनब्याहे हैं क्योंकि ब्राहमणों की जिस उपजाति में वे हैं, उसके रिश्ते बड़ी मुश्किल से आते हैं यानी जिस जातिभेद के चलते वे चमारों को नीचा समझते हैं, उसी जातिभेद के कारण वे कुआँरे डोल रहे हैं । धर्म के प्रतीक उदासी जी महाराज चरित्र-भ्रष्ट चंदर की रिहाई के लिए हवन करते हैं ।इन सबके साथ उपन्यास की कसावट श्लाघ्य है । 
    
प्राध्यापक (हिन्दी)

महाराणा प्रताप राजकीय महाविद्यालय,
चित्तौड़गढ़-312001,राजस्थान 
ईमेल:-rajeshchoudhary@gmail.com
मोबाईल नंबर-09461068958
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