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कथाकार हरिराम मीणा ने वर्षों के अनुसंधान के बाद लिखा ‘धूणी तपे तीर’

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, मार्च 05, 2013 | मंगलवार, मार्च 05, 2013



हरिराम मीणा 
सेवानिवृत प्रशासनिक अधिकारी
और विश्वविद्यालयों में 
विजिटिंग प्रोफ़ेसर राजस्थान विश्वविद्यालय में शिक्षा दीक्षा
ब्लॉग-http://harirammeena.blogspot.in
31, शिवशक्ति नगर,
किंग्स रोड़, अजमेर हाई-वे,
जयपुर-302019
दूरभाष- 94141-24101
ईमेल - hrmbms@yahoo.co.in
फेसबुकी-संपर्क 
वर्ष 2012 के ’बिहारी पुरस्कार’ के लिए राजस्थान के जाने-माने कथाकार हरिराम मीणा के उपन्यास ‘धूणी तपे तीर’ को चुना गया है, जो वर्ष 2008 में प्रकाशित हुआ था। बिहारी पुरस्कार के रूप में लेखक को एक प्रशस्ति-पत्र, प्रतीक चिन्ह और एक लाख रूपये की राशि भेंट की जाती है.के.के.बिरला फाउंडेशन द्वारा प्रवर्तित यह पुरस्कार केवल राजस्थान के हिंदी/राजस्थानी लेखकों के लिए है. जिसकी परिभाषा में राजस्थान के मूल निवासियों के अतिरिक्त वे लोग आते हैं जो पिछले सात वर्षों से अधिक समय से राजस्थान में रह रहे हैं. पिछले दस वर्षों में प्रकाशित राजस्थान के किसी लेखक की उत्कृष्ट हिंदी/राजस्थानी कृति को प्रतिवर्ष दिया जाने वाला पुरस्कार महाकवि बिहारी के नाम पर दिया जाता है.


बिहारी पुरस्कार के चयन का उत्तरदायित्व एक निर्णायक समिति का है जो कि बिहारी पुरस्कार नियमावली के अनुसार कार्य करती है. जिसके अध्यक्ष हिन्दी के वरिष्ठव साहित्य कार प्रो. नंदकिशोर आचार्य हैं, उनके अतिरिक्त इस समिति के अन्य सदस्य- श्रीमती अलका सरावगी, प्रो. रामबक्ष, नंद भारद्वाज, गिरधर राठी तथा निर्मलकांति भट्टाचार्जी हैं फाउंडेशन के निदेशक, सदस्य-सचिव हैं.

पुरस्कृत कृति ‘धूणी तपे तीर’ बांसवाड़ा राजस्थान के मानगढ़ पर्वत पर 17 नवम्बर सन् 1913 के दिन घटी ऐसी घटना पर आधारित उपन्यास है। जिसमें अंग्रेजी फौजों ने जलियांवाला कांड से चार गुना अधिक आदिवासियों को मशीनगनों एवं बन्दूकों से गोलियों से मारा था। यह उपन्यास आदिवासी शोषण, संघर्ष व बलिदान के साथ-साथ आदिवासी जीवन एवं संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को आधिकारिक और रोचकता के साथ प्रस्तुत करता है। औपनिवेशिक अंग्रेजी शासन एवं देसी सामंती प्रणाली के विरूद्ध आदिवासियों के संघर्ष की इस अप्रतिम गाथा को उपन्यासकार मीणा ने वर्षों के अनुसंधान के बाद लिखा है। इस घटना की पृष्ठभूमि में विशेष रूप से दक्षिणी राजस्थान तथा सीमावर्ती गुजरात की तत्कालीन ईडर व संतरामपुर रियासतों के आदिवासियों पर आये दिन होने वाले रियासती शासकों व फिरंगियों द्वारा किये जाने वाले जुल्मों तथा अनेक प्रकार के शोषण थे, इसके विरूद्ध गोविन्द गुरू के नेतृत्व में सम्पसभा नामक संगठन के माध्यम से आदिवासियों ने आन्दोलन किया। इस आन्दोलन के दौरान सरकारी शोषण के विरूद्ध जागृति तथा समाज सुधार के लिए प्रयास किये गये। स्वयं गोविन्द गुरू को आरम्भ में फांसी की सजा तत्पश्चात् आजीवन कारावास एवं फिर देश निकाला दिया गया। गोविन्द गुरू मरणान्त आदिवासियों के लिए कार्य करते रहे। इस उपन्यास में अंचल की भौगोलिकता, संस्कृति, जीवन के विभिन्न पक्षों, प्रकृति चित्रण के साथ स्थानीय भाषिक मुहावरा, लोकगाथाओं व गीत आदि का सुन्दर समावेश किया गया है। 

हरिराम मीणा का जन्म 1 मई, 1952 को राजस्थान के जिला सवाई माधोपुर के वामनवास ग्राम के एक साधारण किसान आदिवासी परिवार में हुआ। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा कस्बा गंगापुर सिटी में हुई। इन्होंने स्नातक की डिग्री राजस्थान कॉलेज एवं स्नातकोत्तर की डिग्री राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से प्राप्त की। अब तक इनके दो कविता-संकलन, एक उपन्यास, एक प्रबंध काव्य, एक यात्रा-वृत्तान्त तथा विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में कविता लेख व साक्षात्कार प्रकाशित हुए हैं। मीणा जी ने आदिवासी केन्द्रित पत्रिका ’अरावली उद्घोष’ का सह सम्पादन एवं ’युद्धरत आम आदमी’, दस्तक एवं अकार के आदिवासी विशेषांकों के सम्पादन में महत्वपूर्ण भमिका निभाई है। मीणा जी को राजस्थान साहित्य अकादमी के सर्वोच्च ’मीरा पुरस्कार’ के अतिरिक्त अन्य सम्मानों से भी सम्मानित किया गया है।
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