लघुकथा: सुधीर मौर्य 'सुधीर' - अपनी माटी

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रविवार, मार्च 31, 2013

लघुकथा: सुधीर मौर्य 'सुधीर'

अप्रेल-2013 अंक 
                             (यह रचना पहली बार 'अपनी माटी' पर ही प्रकाशित हो रही है।)

दंगे की लूट
दंगाई आग लगाते हुए बाज़ार में घुसे और लूटमार करने लगे।जलेबी खाने का शौकीन बारह साला पिंटू इस अफरा-तफरी में छन्नू हलवाई की दूकान से जलेबी का थाल ले कर रफूचक्कर हुआ। छन्नू ने भी पूरी ताकत से पिंटू का पीछा किया और जलेबी का थाल बरामद कर लिया।छन्नू के लौट आने तक उसकी दूकान के साथ-साथ बाजार की सारी दुकाने लुट चुकी थी। उसे देख कर उसका पड़ौसी दूकानदार शंकर जिसका एक हाथ दंगाईयों ने तोड़ दिया थाकराहते हुए बोलाक्या छन्नू सारी दूकान छोडकर एक जलेबी के थाल के पीछे भाग खड़ा हुआ । जलेबी के थाल को वापस दूकान में सजाते हुए छन्नू बोला तभी मेरी पूरी दूकान में ये जलेबियाँ बच गयी नहीं तो मै भी तुम्हारी तरह पूरी दूकान लुट्वाता और साथ में बांह भी तुडवाता 

बीवी का भाई
दो लुटेरों में लूट के माल को लेकर झगड़ा हो गया। झगड़ा इतना बढ़ा की एक लुटेरे ने अपने पिस्तौल से दूसरे पर गोली चला दी।गोली सनसनाती हुई दूसरे लुटेरे के कान को हवा देती हुई निकल गयी। पहला हँसते हुए बोला खैरकर तू मेरी बीवी का भाई है नहीं तो गोली सीधे सर से टकराती। चल तेरा एक हिस्सा और मेरा तीन हिस्सा।
कुछ दिन बाद वापस लूट के माल को लेके वो फिर झगड़ बैठे। अबकी बार पिस्तौल दूसरे लुटेरे के हाथ में थी। वो पहले के सीने में गोली मरते हुए बोला तुझसे कितनी बार कहा अपनी बहन को मेरी बीवी बना दे। पर तू मेरी बात मजाक में टालता रहा।  तीन, एक।अब सारा हिस्सा मेरा।



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