आलेख: गुलज़ार-एक शर्मीला परिन्दा / सुरेन्द्र डी. सोनी - अपनी माटी

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मंगलवार, अप्रैल 30, 2013

आलेख: गुलज़ार-एक शर्मीला परिन्दा / सुरेन्द्र डी. सोनी

मई -2013 अंक 
गुलज़ार साहेब (चित्र साभार )
लोकतन्त्र ने जहाँ आज़ादी के बाद के हिन्दुस्तान की जवान होती नस्लों को अपने हक के लिए आईन की हदों में लडऩा सिखाया है, वहीं सिनेमा ने इसे समाजी बन्दिशों को तोडक़र मस्ती भरे अल्हड़पन से प्यार करना सिखाया है। यह प्यार केवल दो मचलते दिलों की रोमानियत तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसके इतर इस प्यार ने देश और दुनिया की धर्म, जाति और भाषा-सम्बन्धी  दीवारों को भी ढहा दिया। यह अलग बात है कि सिनेमा जैसे सरल माध्यम से अद्भुत इस प्यार को वतन के कालेजों में पढऩे वाले करोड़ों युवक-युवतियों के अकादमिक पाठ्यक्रम में कहीं जगह नहीं मिली! बावजूद इसके सिनेमा या फ़िल्म के रंगीन संसार ने इन युवाओं के सपनों में अपना शोभन उजाला भरा! देश का युवा जितनी सहजता से ‘प्यार किया तो डरना क्या’ का आह्वान करता दिखाई देता है, उतनी ही सहजता से वह ‘कजरारे, कजरारे’ गाकर झूमता हुआ भी दिखाई देता है। 

हम देखते हैं कि ‘मेरे देश की धरती सोना उगले’ जैसे गीत की राष्ट्रीय भावना उसे जितनी अभिभूत करती है, उतनी ही अभिभूत उसे ‘दिल तो बच्चा है जी’ गीत की धुन करती है, जिसमें डूबकर वह अपने बचपन की मासूमियत को फिर से पा लेना चाहता है। हमने यह भी देखा कि ‘यह देश है वीर जवानों का - अलबेलों का, मस्तानों का’ गीत जब तक न बजे, तब तक हिन्दुस्तान में कोई शादी सम्पन्न नहीं होती है, वहीं दूसरी ओर ‘जय हो’ का उदघोष करके देश का युवा सारी दुनिया को अपने सक्षम भारतीय होने की पहिचान कराता है। ‘कजरारे-कजरारे’, ‘दिल तो बच्चा है जी’ और ‘जय हो’ जैसी हर ज़बान पर चढ़ जाने वाली रचनाएँ जिस $कलम से निसृत हुई हैं, उस $कलम का धनी एक ऐसा व्यक्ति है, जो अपने सीने में संवेदना का एक सागर भरकर चलता है और दुनिया जिसे ‘गुलज़ार’ के नाम से जानती है। हिन्दी सिनेमा का चहेता ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जिसे गुलज़ार ने जीवन में कभी प्रभावित न किया हो। 

गुलज़ार को हिन्दुस्तान के सिनेमा-जगत में एक संवाद-रचयिता, पटकथा-लेखक, निर्माता और निर्देशक के रूप में भी उतनी ही शिद्दत से शामिल किया जाता है, जितनी शिद्दत से एक गीतकार के रूप में शामिल किया जाता है। इसके अलावा गुलज़ार ने महान् शायर गालिब पर भी एक प्रामाणिक व मर्मस्पर्शी टीवी सीरियल बनाया है। लोग ग़ालिब की जीवनी पढऩे के बजाय नसीरुद्दीन शाह के अभिनय से सजा यह सीरियल देखना अधिक पसन्द करते हैं। गुलज़ार के व्यक्तित्व की विशालता का एक और पहलू यह है कि वे हिन्दी-उर्दू कविता में भी अदब के बड़े मकाम पर हैं। भारतीय सिनेमा और साहित्य के इस लाडले के ड्राइंगरूम में आप पद्मभूषण, साहित्य अकादेमी, फ़िल्मफेयर व नेशनल अवार्ड्स की आभा के अलावा आस्कर की शानदार चमक भी देख सकते हैं। सपनों की नगरी मुम्बई में रहने वाले गुलज़ार ने अनेक साहित्यिक रचनाओं का अनुवाद करके अपने ताज में कुछ और रत्न भी जड़ लिए हैं। सफेद झक्क कुर्ता-पायजामा, आँखों पर सुनहरी फ्ऱेम का चश्मा और हमेशा कुछ तलाश करती-सी नज़रों का धनी छरहरे बदन का यह शालीन व्यक्ति उम्र के सातवें दशक में भी जिस सक्रियता से देश के सिनेमा और साहित्य के प्रेमी समुदाय में छाया हुआ है, यदि इसी तरह स्वस्थ-प्रसन्न रहते हुए सरस्वती की इबादत में लगा रहा तो तो एक दिन निश्चय ही वह भारत के चलचित्र व साहित्य-जगत के पितामह का दर्ज़ा पा जाएगा।

अपना नाम ‘गुलज़ार’ भी इस भावुक इंसान ने खुद रखा है, जिसका अर्थ होता है- फूलों का बाग या उद्यान। माँ-बाप ने जो नाम रखा, वह तो सम्पूर्णसिंह कालरा था। प्रारंभ में गुलज़ार ने स्वयं को ‘दीनवी’ अर्थात् ‘धर्म में विश्वास करने वाला’ भी कहा था। शायद सम्पूर्णसिंह ने सोचा कि लोग उसके विषय में धर्म पर विश्वास करने वाले ‘दीनवी’ पर य$कीन करें या न करें, लेकिन वे ‘गुलज़ार’ अर्थात् फूलों के बा$ग पर ज़रूर यकीन करेंगे - जो सब को समान रूप से खुशबू व खूबसूरती बाँटता रहता है। 

‘चड्डी पहन के फूल खिला है’ या ‘लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा’ जैसे अमर गीत लिखकर गुलज़ार ने सिद्ध किया कि उन्हें बाल-मनोविज्ञान की भी गहरी समझ है। ‘चड्डी पहन के फूल खिला है’ 1990 का बालगीत है, जिसे गुलज़ार ने दूरदर्शन के ‘मोगली’ सीरियल के लिए लिखा था और जो जोसेफ रुडयार्ड किपलिंग के अँगरेजी कहानी-संग्रह ‘जंगल बुक’ पर आधारित था। विशाल भारद्वाज के संगीत से सजे इस गीत के बोल गुलज़ार की अद्भुत कल्पनाशीलता के परिचायक हैं -

जंगल-जंगल बात चली है, पता चला है।
अरे! चड्डी पहन के फूल खिला है!
... एक परिन्दा, होए शर्मिन्दा, था वो नंगा
भइया! इससे तो अंडे के अंदर था वो चंगा
सोच रहा है बाहर आ के क्यूँ निकला है?
चड्डी पहन के फूल खिला है!

1983 में शेखर कपूर के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘मासूम’ में गुलज़ार ने बच्चों के लिए जो खूबसूरत नग्मा रचा, उसे जितना बच्चों ने गाया, उससे भी कहीं अधिक बड़ों ने गुनगुनाया-

लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा
घोड़े की दुम पे मारा जो हथौड़ा
दौड़ा-दौड़ा-दौड़ा, घोड़ा दुम दबा के दौड़ा!

इसके अतिरिक्त 2002 में प्रदर्शित ‘मकड़ी’ के लिए - जो शिकागो समारोह में ‘जूनियर आस्कर अवार्ड’ से नवाज़ी गई थी - श्वेता प्रसाद पर फिल्माया गया गीत ‘पापड़ वाले पंगा न ले’ भी अत्यधिक मकबूल हुआ। यही क्यों! इससे बहुत पहले ‘गुड्डी’ के लिए उन्होंने बच्चों के लिए जो प्रभात-गान लिखा, वह आज भी देश के अनेक तालीमी इदारों का प्रार्थना-गीत है-

हम को मन की शक्ति देना, हम विजय करें!
दूसरों की जय से पहले  खुद  की जय करें!

यदि किसी को गुलज़ार की आवाज़ सुनने का मौका मिला है, तो उसने यह ज़रूर महसूस किया होगा कि एक परिपक्व आयु में जैसे एक अबोध बालक अपने अतीत की कच्ची समझ को मन में लिए सारी दुनिया को मासूमियत समझाने आया है। 2004 में एक फ़िल्म सामने आई थी - ‘रैनकोट’। संभवत: ऐश्वर्या राय ने अपनी जि़न्दगी की सबसे उम्दा अदायगी इसी फ़िल्म में की थी। देबज्योति मिश्रा के संगीत-निर्देशन में जब गुलज़ार शास्त्रीय संगीत की मशहूर गायिका शुभा मुद्गल के साथ अपना गीत ‘पिया तोरा कैसा अभिमान’ प्रस्तुत करते हैं, तो उनकी आवाज़ की निर्दोषता को सहज ही अनुभव किया जा सकता है -

पिया तोरा कैसा अभिमान ...
किसी मौसम का झोंका था
जो इस दीवार पर लटकी तसवीर को तिरछी कर गया है
गए सावन में ये दीवारें यूं सीली नहीं थीं
न जाने इस द$फा क्यूं इनमें सीलन आ गई है
दरारें पड़ गई हैं
और सीलन इस तरह बहती है जैसे
खुश्क रुखसारों खसारों पर गीले आंसू चलते हैं!

अगर सिनेमा से दूर की बात करें, तो अपने अदबी सफर में गुलज़ार ने अपने चाहने वालों को न जाने कितनी बार अपनी आवाज़ उपहार में दी है। कई वर्षों पहले गायक सुरेश वाडेकर व संगीतकार विशाल भारद्वाज के साथ ‘इन बूढ़े पहाड़ों पर’ नाम से गुलज़ार का एक एलबम आया था। इसका शीर्षक-गीत सुरेश वाडेकर के साथ स्वयं गुलज़ार ने प्रस्तुत किया था। इस गीत को सुनकर जहाँ एक तरफ भारत के मुकुट कश्मीर के प्रति हमारा प्रेम उमड़ पड़ता है, वहीं दूसरी तर$फ इसकी दहशत में डूबी पर्वत-शृंखलाओं के मार्मिक चित्रण से आँखें कब आँसुओं से भर उठती हैं, पता ही नहीं चलता -

इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला
सदियों से गिरी बर्फें
और उन पे बरसती हैं
हर साल नई बर्फें
इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला
घर लगते हैं कब्रों से
खामोश सफेदी में
कुत्बे-से दरख्तों के ...
तारीख का कहना है
रहना चट्टानों को
दरियाओं को बहना है
अब की तुग्य़ानी में
कुछ डूब गए गाँव
कुछ बह गए पानी में ...
नानी की अगर मानें
तो भेडिय़ा जि़न्दा है
जाएँगी अभी जानें ...
इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला!

क्या कारण है कि यह समझाइश गुलज़ार की रचनाओं से शहद की तरह टपकती है, क्यों गुलज़ार पाठक या श्रोता को अपनी हस्ती का हिस्सा बना लेते हैं और क्यों उनके शब्दों में इतना सम्मोहन है कि लोग उनकी रचनाओं को बार-बार पढऩा या सुनना चाहते हैं? इन प्रश्रों के उत्तर ढूँढऩे हों, तो गुलज़ार क्या किसी भी रचनाकार के जीवन के उस दौर को देखना चाहिए, जिसमें वह बालक से किशोर बना है। 1947 ई. में जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था - गुलज़ार की उम्र केवल ग्यारह बरस थी। 18 अगस्त 1936 को वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब सूबे के झेलम जि़ले के एक स्थान दीना में गुलज़ार का जन्म हुआ था। गुलज़ार का नाज़ुक हृदय विभाजन की पीर से विलग रहा हो, ऐसा कभी नहीं हुआ। उनकी रचनाओं से साफ झलकता है कि उनके भीतर का शरणार्थी अभी मरा नहीं है। अपनी एक गज़ल में गुलज़ार की यह पीर कुछ इस तरह बयान हुई है -

जि़क्र झेलम का है, बात है दीने की।
चाँद पुखराज का,  रात  पश्मीने की।
कैसे   ओढ़ेगी   उधड़ी   हुई   चाँदनी
रात कोशिश में है चाँद को सीने की।
कोई ऐसा गिरा है  नज़र  से  कि बस
हमने सूरत न देखी  फिर  आईने की।

और दिल में उतर जाती है उनकी यह ‘त्रिवेणी’ भी -

जला के फूला नहीं समाता जो बस्तियों को
वह रू-सियाह आसमान को छूने लग गया है -
धुएँ के चोले पे खून की बू के दाग भी हैं!

गुलज़ार की परवरिश और बच्चों की तरह नहीं हुई। उनके पिता श्री माखनसिंह कालरा ने तीन शादियाँ की थीं। गुलज़ार की माँ का नाम सुजान था। अनेक सौतेले भाई-बहिनों के बीच पले-बढ़े गुलज़ार ने उन सभी इंसानों की भावना को शब्द दिए, जिन्होंने अपने जीवन में ‘प्यार’ को बँटते देखा। गुलज़ार की एक कविता ‘साहिल’ निश्चय ही मर्मस्पर्शी है -

चौक से चलकर, मण्डी से, बाज़ार से होकर
लाल गली से गुज़री है, का$गज़ की कश्ती
बारिश के लावारिस पानी में बैठी बेचारी कश्ती
शहर की आवारा गलियों में सहमी-सहमी पूछ रही है
कश्ती का साहिल होता है
मेरा भी कोई साहिल होगा ...
एक मासूम बच्चे ने
बेमानी को मानी देकर
रद्दी के कागज पर कैसा ज़ुल्म किया है...

गुलज़ार यदि ‘गुलज़ार’ न होते तो सम्पूर्णसिंह कालरा होते...। लेकिन नहीं! वे सरदार सम्पूर्णसिंह कालरा होते। गुलज़ार की पैदाइश सिक्ख परिवार में हुई थी। गुलज़ार को सादे वेश में देखकर कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता कि यह आदमी सिक्ख है, लेकिन सिक्खों की सूफियाना फितरत उनकी रचनाओं में बार-बार उभरकर सामने आई है। उनका यह ‘मर्सिया’ आप सीधे अपने हृदय तक उतरते हुए महसूस करेंगे -

क्या लिए जाते हो तुम कन्धों पे यारो
इस जनाज़े में तो कोई भी नहीं है,
दर्द है न कोई, न हसरत है, न गम है
मुस्कराहट की अलामत है न कोई आह का नुक्ता
और निगाहों की कोई तहरीर न आवाज़ का कतरा
कब्र में क्या द$फन करने जा रहे हो?
सिर्फ मिट्टी है ये मिट्टी -
मिट्टी को मिट्टी में दफनाते हुए
रोते हो क्यों ?

किसी रचनाकार को कोई समाज क्यों प्यार करे, ...क्यों उसके एक-एक शब्द को हृदयंगम करने के लिए लोग उसकी अगली रचना का इन्तज़ार करें, ...क्यों जब वह सामने आ जाए, तो उसके पास जाकर, उसे छूकर किसी को आत्मतोष हो? सीधा-सा प्रत्युत्तर है कि उस रचनाकार ने किसी के मन के उन भावों को सुन्दर अभिव्यक्ति प्रदान की है, जिन्हें कोई महसूस तो कर सकता है, लेकिन ज़ाहिर नहीं कर सकता! फिल्मों के माध्यम से विगत एक सदी से अव्यक्त को व्यक्त करने की, अमूर्त को मूर्त बनाने की जो कोशिशें हुई हैं - उनमें एक बात साफ तौर पर दिखाई देती है कि कोई भी फ़िल्म किसी व्यक्ति के एक उद्यम का नतीज़ा नहीं होती! $िफल्म एक सामूहिक प्रयास होता है, जिसमें मनोरंजन को केन्द्र में रखते हुए समाज की स्थितियों का इतनी खूबसूरती से चित्रण किया जाता है कि इंसान के भीतर करवटें ले रहा सच और झूठ परदे पर किरदारों का रूप लेकर एक तरह से जीवित ही हो उठता है। यह भारतीय उपमहाद्वीप ही है, जहाँ के सिनेमा में इन किरदारों को गीतों और संवादों के माध्यम से पूरी तरह से लौकिक स्वरूप प्रदान करके अभिव्यक्ति के नए व  नक्काशीदार  दरवाज़े खोले गए। गुलज़ार इन्हीं दरवाज़ों के भीतर भावनाओं के शिल्पी बनकर कभी मुस्कराते हुए तो कभी उदास होते हुए आते-जाते रहे हैं। बीच-बीच में उनका ठहराव शुद्ध साहित्य की बस्ती में गहरी जड़ें जमाकर प्रतिष्ठित हुए बरगदों के साथ भी होता रहा है। 1960 के दशक में आई ‘काबुलीवाला’ के लिए उनका रचा गीत ‘गंगा आए कहाँ से’ उन्हें फ़िल्मकारों का चहेता गीतकार बना गया और उसके बाद तो ‘मोरा गोरा अंग लई ले’, ‘तुम्हें ज़िंदगी के उजाले मुबारक’, ‘वो शाम कुछ अजीब थी’ और ‘हमने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू’ जैसे नग्मे - जो क्रमश: ‘बंदिनी’, ‘पूर्णिमा’, ‘सफर’ और ‘खामोशी’ से थे - हिन्दुस्तान का सारा युवा-वर्ग प्रेम और मस्ती से गुनगुनाने लगा।

1975 में आई ‘आँधी’ - जिसका निर्देशन गुलज़ार ने किया था और जिसके कथानक के लिए वे सियासी गलियारों में भी चर्चित हुए थे - का संजीव कुमार व सुचित्रा सेन के मर्मस्पर्शी अभिनय से प्रदीप्त यह गीत 

तेरे बिना जि़न्दगी से कोई शिकवा तो नहीं
... तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं
रात को रोक लो
रात की बात है और जि़न्दगी बाकी तो नहीं...!
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1980 के दशक में ‘थोड़ी-सी बेवफाई’, ‘मासूम’, ‘सदमा’, ‘लिबास’ आदि फिल्मों के गीत लिखकर गुलज़ार ने फिर साबित किया कि सिनेमाई माध्यम साहित्यिक प्रयोगधर्मिता को बहुत ही कद्र के साथ कबूल करता है बशर्ते रचनाकार अपने हुनर में दक्ष हो। खय्याम की माकूल संगीत-कला से सजा किशोर व लता का गाया हुआ और राजेश-शबाना की अदाकारी से मंडित फ़िल्म ‘थोड़ी सी बेवफाई’ का यह गीत बार-बार सुनने का दिल करता है-

आँखों में हमने आपके सपने सजाए हैं।
पलकें उठा के आपने जादू जगाए हैं।
सपना भी आप हैं, हकीकत भी आप हैं
बस आप आप आप ही मुझमें समाए हैं।
आँखों का रंग ढूँढ़ा है हीरे तराश कर,
दिल में सजाएँगे ये रंग यूं  ही उम्र भर,
मुश्किल से जि़न्दगी के रंग हाथ आए हैं!

भारतीय चित्रपट ने 1990 के दशक के आते-आते अपनी रूप-सज्जा और आत्माभिव्यक्ति के तरीकों में वक़्त के बदलते धरातल पर कुछ ऐसे परिवर्तन कर लिए कि सिनेमा से सच्चा प्यार करने वाले लोगों को यह चिन्ता सताने लगी कि उद्देश्यपूर्ण और भावों से भरे गीतों का दौर कहीं चला न जाए, लेकिन गुलज़ार ने - कम से कम गीतों के क्षेत्र में तो - उन्हें निराश न होने दिया। ‘रुदाली’ के लिए 1993 में उन्होंने ‘मौला ओ मौला’ गीत रचा। भूपेन हजारिका की आवाज़ में जब इस गीत की स्वर-लहरी देश में गूँजी, तो जैसे चारों तर$फ असम के लोक-गान की छाया तैरती हुई दिखाई दी -

मौला हो मौला
ज़िंदगी की आग में काहे को जलाते हो
कागज़ी शरीर का झोला
भूख मिटाए रे, प्यास बुझाए रे
पानी प्रीत का घोला....

इस गीत से गुलज़ार का सूफियाना मिज़ाज और अधिक परिपुष्ट हुआ। ‘का$गज़ी शरीर का झोला’ कोई मामूली बिम्ब नहीं है...! उसी बात को कि शरीर माटी का एक पुतला है, गुलज़ार ने अपने विशिष्ट अंदाज़ में ही कहा। इसके अलावा नब्बे के ही दशक में गुलज़ार ने फ़िल्म ‘सत्या’ के लिए एक ऐसा गीत लिख डाला, जो अपने अलग प्रकार के शिल्प के कारण नौजवानों के दिलों में घर कर गया -

ऐ गोली मार भेजे में
घिचकऊँ, कि भेजा शोर करता है
भेजे को सुनेगा तो मरेगा कल्लू
अरे तू करेगा, दूसरा भरेगा कल्लू
मामा कल्लू, हे मामा कल्लू ...

देखा जाए तो यह गीत अपने भीतर कहीं कोई संदेश छुपाए हुए दिखाई नहीं देता, लेकिन दिशा को तलाशती युवा पीढ़ी अनेक बार अर्थ को सीधे-सीधे ग्रहण करने के बजाय परोक्ष रूप से - फ़िल्म की कहानी के संदर्भ को टटोलते हुए - ग्रहण करती है। युवाओं की रुचि का $खयाल रखते हुए बीच-बीच में गुलज़ार ने इस पृष्ठभूमि में कुछ अन्य प्रयोग भी किए, यद्यपि इसके लिए उन्हें आलोचना सहन करनी पड़ी। फ़िल्म ‘ओमकारा’ के ‘बीड़ी जलाई ले जिगर से पिया, जिगर में बड़ी आग है’, ‘झूम बराबर झूम’ के ‘किस ऑफ लव’, ‘बिल्लू’ के ‘मरजानी-मरजानी’ आदि गीतों की समीक्षकों ने काफी मज़म्मत की। इस तरह की और रचनाएँ भी हो सकती हैं, जिन्हें गुलज़ार की शास्त्रीय छवि के अनुरूप नहीं माना, लेकिन उनका अपने सृजन के पाँच दशकों में इतना श्रेष्ठ काम है कि इस तरह के कुछ गीतों को - सिनेमा की व्यावसायिक चारित्रिकता को देखते हुए - नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। 1996 में आई फ़िल्म ‘माचिस’ में जब वे ‘छोड़ आए हम वो गलियाँ’ और ‘चप्पा-चप्पा चरखा चले’ लिखते हैं, तो अपनी मूल फितरत को ही शब्दों में ढालते दिखाई देते हैं। यह कटु सत्य किससे छुपा है कि बाज़ारवाद के इस अंधे युग में गुणवत्ता को बरकरार रखते हुए अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखना किसी रचनाकार के लिए कितना चुनौतीपूर्ण कार्य है! इस दौर में भी गुलज़ार ने अपनी भावप्रवण रचनाओं से बार-बार साबित किया कि नए प्रतीकों को गढऩा कोई उनसे सीखे। फ़िल्म ‘नो स्मोकिंग’ के लिए लिखे इस गीत में उनका यह बिम्ब अन्तर्मन की गहराई तक जा ठहरता है -

हवा से फूँक दे, हयात फूँक दे
साँस से सीला हुआ लिबास फूँक दे...

फ़िल्म ‘कमीने’ के लिए 2009 में उन्होंने जो बिम्ब-विधान पेश किया, निश्चय वो कमाल का है -

जिसका भी चेहरा छीला, अंदर से और निकला
मासूम-सा कबूतर नाचा तो अंदर से मोर निकला
कभी हम कमीने निकले, कभी दूसरे कमीने....

जिस गुलज़ार ने विभाजन के पश्चात् भारत आकर पेट भरने के लिए गराज में काम किया हो, उस गुलज़ार की कलम से इतना भावपूर्ण सृजन सामने आना कि रचनाकार भारतीय सिनेमा का ‘पितामह’ बनने की स्थिति में आ जाए, कोई मामूली बात नहीं है। विमल राय और ऋषिकेश मुकर्जी जैसे महान् निर्देशकों के सहायक के तौर पर काम करके स्वतन्त्र रूप से ‘मेरे अपने’, ‘परिचय’, ‘आँधी’, ‘मौसम’, ‘अंगूर’, ‘इजाज़त’, ‘लेकिन’, ‘हु तू तू’ जैसी फिल्मों का निर्देशन करना गुलज़ार जैसा व्यक्तित्व के ही वश की बात थी, जबकि एक से बढक़र एक प्रतिभाशाली निर्देशक उस समय सिनेमा के रंगीन माध्यम में अपना काम कुशलता से कर रहे थे। स्वतन्त्र रूप से निर्देशित की हुई अपनी अनेक फिल्मों की कथाएँ व संवाद भी गुलज़ार ने खुद ही लिखे। ऐसी अनेक इतिहास का हिस्सा बनने योग्य फ़िल्में हैं, जिनसेवे सम्बद्ध रहे हैं। गीतकार के रूप में तो उनके रुतबे का कहना ही क्या! जिस दौर में शैलेंद्र, साहिर, शकील, मज़रूह, आनंद बख्शी जैसे शायर व गीतकार हुए हों, उस दौर में एक गराज के मिस्त्री का ‘गुलज़ार’ बन जाना सिर्फ किस्मत का खेल नहीं था! इसके पीछे गुलज़ार की अनवरत साधना थी, जो उनसे मुहब्बत करने वाले लाखों लोगों के भरोसे से प्रतिफलित हुई। इस साधना को, इस तपस्या को, इस समर्पण को एक रवानी देने में, एक मुकाम तक पहुँचाने में सलिल चौधरी, शंकर जयकिशन, एस.डी.बर्मन, हेमंत कुमार, खय्याम, मदनमोहन, लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल, भूपेन हजारिका, ए.आर. रहमान, विशाल भारद्वाज आदि सुर-साधकों का योगदान भी कम नहीं था, जिनसे गुलज़ार को प्रोत्साहन मिला। हिंदुस्तान के नौज़वानों ने भी गुलज़ार को भरपूर प्यार दिया, इस प्यार का ही तो सुफल था कि गुलज़ार की कलम से शब्दों के सितारे कागज़ पर उतरते रहे और सिनेमा के सुनहरे परदे को जीवन्त करते रहे। ऐसा हो भी क्यों नहीं? गुलज़ार ने युवाओं की भावनाओं का पूरा-पूरा खयाल रखा और उनकी नब्ज़ पकड़े रखी। 1971 की फ़िल्म ‘मेरे अपने’ में ‘हालचाल’ गीत लिखकर तो जैसे उन्होंने बेरोज़गार युवाओं के दिलों से खुद को जोड़ ही लिया -

हाल-चाल ठीक-ठाक है
सब कुछ ठीक-ठाक है
बी.ए. किया है, एम. ए. किया
लगता है वो भी ऐं वें किया
काम नहीं है वरना यहाँ
आपकी दुआ से सब ठीक-ठाक है...

गुलज़ार, जो स्वयं एक ज़िंदादिल व खूबसूरत इंसान हैं, का विवाह भी अपने ज़माने की प्रतिभाशाली व रूपवती अभिनेत्री राखी से हुआ। संयोग से राखी का परिवार भी विभाजन के समय पाकिस्तान से आकर भारत में बसा। गुलज़ार का परिवार पाकिस्तान के पंजाब से आया, तो राखी का परिवार पूर्वी पाकिस्तान से आया - जो बाद में बांग्लादेश बना। राखी, जो हिन्दी सिनेमा में आने से पूर्व बांग्ला सिनेमा में काम करती थी, का विवाह किशोरावस्था में ही बांग्ला फिल्मों के निर्देशक अजय विश्वास के साथ हो चुका था - लेकिन यह विवाह अपने अंजाम तक नहीं पहुँचा। दुर्योग ही कहा जाना चाहिए कि गुलज़ार व राखी - इन दो अद्भुत प्रतिभाओं का संगम भी अधिक दिनों तक भारतीय सिनेमा के प्रेमी नहीं देख पाए। यद्यपि दोनों के विवाह का विधिवत विच्छेद आज तक नहीं हुआ है - और राखी अब भी ‘राखी गुलज़ार’ के नाम से जानी जाती है - लेकिन दोनों अलग-अलग ही अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि गुलज़ार इस रिश्ते के टूटने से आहत नहीं हैं। उनकी रचनाओं से उनके भीतर का दर्द छलकता हुआ दिखाई देता है -

मुझको भी तरकीब सिखा कोई, यार जुलाहे!
अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया या खत्म हुआ
फिर से बाँध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमें
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गाँठ गिरह बुनतर की
देख नहीं सकता है कोई
मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
सा$फ नज़र आती हैं, मेरे यार जुलाहे!

इसी परिपे्रक्ष्य में यह भी देखा जाना चाहिए कि राखी ने भी गुलज़ार के लिए अपने मन में इज़्ज़त कम न होने दी। ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ फ़िल्म में अपने सराहे जाने वाले योगदान के लिए जब गुलज़ार को ऑस्कर मिला तो राखी ने यह कहा कि उनके पति सर्वश्रेष्ठ हैं। राखी और गुलज़ार की एक बेटी भी है - मेघना। मेघना भी अपने पिता की तरह संवेदनशील रचनाकार है, लेकिन उसका मूल क्षेत्र गीत, कविता या संवाद लेखन नहीं अपितु फ़िल्म निर्देशन है। ‘माचिस’ व ‘हु तू तू’ में वह गुलज़ार की सहायक रही है और ‘फिलहाल’ व ‘जस्ट मैरिड’ उसकी स्वयं द्वारा निर्देशित फ़िल्में हैं। मेघना ने अपने पिता के लिए एक किताब भी लिखी है। इस किताब का शीर्षक ‘बिकॉज ही इज...’ है, जिसमें गुलज़ार के जीवन के विभिन्न पहलुओं को बड़ी खूबसूरती से छुआ गया है। मेघना, जिसका लाड का नाम ‘बोस्की’ है, को संबोधित करके गुलज़ार ने न केवल अनेक कविताएँ लिखीं अपितु अपने घर का नाम भी ‘बोस्कियाना’ रखा। बोस्की की शादी पर गुलज़ार ने लिखा -

बोस्की ब्याहने का अब वक़्त करीब आने लगा है
जिस्म से छूट रहा है कुछ-कुछ
रूह में डूब रहा है कुछ-कुछ ...!

बोस्की, जिसके लिए गुलज़ार के दिल में एक पिता के साथ-साथ एक फ्ऱैण्ड, फिलोसोफर व गाइड भी धडक़ता रहा है, से उन्होंने कभी नहीं कहा कि वह अपनी माँ राखी से कोई दूरी बनाकर रखे और न ही राखी ने कभी यह चाहा कि वह पिता के साये से महरूम हो। यह भी एक कारण है कि राखी एवं गुलज़ार आज भी भीतर ही भीतर एक-दूसरे से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं। शायद यह अव्यक्त-सा जुड़ाव भी गुलज़ार को ‘गुलज़ार’ बने रहने दे रहा है। गुलज़ार ने ‘जानम’, ‘एक बूँद चाँद’, ‘कुछ नज़्में’, ‘कुछ और नज़्में’, ‘साइलेंसेज़’, ‘पुखराज’, ‘चाँद पुखराज का’, ‘ऑटम मून’, ‘त्रिवेणी’, ‘रात, चाँद और मैं’, ‘रात पश्मीने की’  जैसी बेहतरीन किताबें रचीं हैं, जो आधुनिक कविता के आसमान में हलचल मचाते हुए सितारों की तरह चमकती हुई दिखाई देतीं हैं। ‘चौरस रात’ और ‘रावी पार’ उनके अनमोल कथा-संग्रह हैं तथा ‘मेरा कुछ सामान’ और ‘छैंया-छैंया’ में उनके गीत अपनी जानी-पहिचानी खुशबू बिखेर रहे हैं। इस दौरान गुलज़ार ने कभी अभिजात्यता का आडम्बर नहीं किया। अपनी सादगी के कारण उन्होंने फ़िल्मी और गैर फ़िल्मी जगत् के न जाने कितने लोगों को अपना हमराज़ बनाया। अपने ज़माने की मशहूर अभिनेत्री मीनाकुमारी, जो ‘दु:खान्त चलचित्र-संसार की महारानी’ कही जाती है, ने अपनी मौत से कुछ ही पहले अपनी शायरी का डायरियाँ गुलज़ार को सौंप दी। गुलज़ार ने मीनाकुमारी के भरोसे को एक खूबसूरत किताब - मीनाकुमारी की शायरी - की शक्ल देकर प्रकाशित करवाया।

अभिव्यक्ति के अनेक रूपों से जुडक़र भी गुलज़ार ने अपनी शख्सियत को किसी एक चेहरे में नहीं सिमटने दिया। वे जिस भी रूप में सामने आए - सम्पूर्णता के साथ आए। अपने रचे एक-एक शब्द के साथ उन्होंने उतना ही न्याय किया, जितना परदे पर मचलते चरित्रों को निर्देशित करने में किया। चाँद तो जैसे उनके बिम्बों का प्राणतत्त्व है। चाँद को जितने रूपों में गुलज़ार ने देखा, शायद ही किसी और अदबी शख्सियत ने देखा हो -

हाँ, वहीं वो अजीब-सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोड़ी चूमा करता था -
चाँद से गिरके मर गया है वो
लोग कहते हैं खुदकुशी की है...

चाँद के अलावा आग, धुआँ, चूल्हा, पेड़, बताशे, पंछी, अखबार, जामुन, पानी की बूँद आदि न जाने कितने ही प्रतीक हैं, जिनका इस्तेमाल गुलज़ार ने इतनी खूबसूरती से किया है कि यदि कोई प्रोफेसर अपने विद्यार्थियों को ‘गुलज़ार’ पढ़ाए, तो उसे ‘गुलज़ार’ को गुलज़ार के प्रतीकों से ही स्पष्ट करना पड़े! उन प्रतीकों का कोई और विकल्प पेश करके गुलज़ार को कतई नहीं समझा जा सकता। यह मौलिकता ही किसी शायर को, किसी कवि को, किसी अ$फसानानिगार को वह वैशिष्ट्य प्रदान करती है, जिसके कारण वह इतिहास का एक सुनहरा पन्ना बन जाता है। देखिए - इस ‘त्रिवेणी’ में गुलज़ार कितनी मार्मिकता से एक सैनिक की विधवा की वेदना को व्यक्त करते हैं-

काँटे  वाली  तार  पे  किसने  गीले  कपड़े टाँगे हैं
खून टपकता रहता है  और नाली में बह जाता  है -
क्यों इस फौजी की बेवा हर रोज ये वर्दी धोती है?

‘त्रिवेणी’ शायरी की वह विधा है, जो गुलज़ार ने खुद ईजाद की है। अपनी पुस्तक ‘त्रिवेणी’ की भूमिका में वे कहते हैं - ‘शुरु-शुरु में जब यह फार्म बनाई थी, तो पता नहीं था कि यह किस संगम तक पहुँचेगी? ‘त्रिवेणी’ नाम इसलिए दिया कि पहले दो मिसरे गंगा-जमुना की तरह मिलते हैं और एक खयाल, एक शे’र को मुकम्मल करते हैं! ...लेकिन इन दो धाराओं के नीचे एक और नदी है - सरस्वती, जो गुप्त है - नज़र नहीं आती। ‘त्रिवेणी’ का काम सरस्वती दिखाना है...।’ वे कहते हैं -

चूड़ी के टुकड़े थे, पैर में चुभते ही खूँ बह निकला
नंगे  पाँव  खेल  रहा  था लडक़ा अपने आँगन में -
बाप  ने  कल  दारू पी के माँ की बाँह मरोड़ी थी।

गुलज़ार के रचना-संसार में ‘प्यार’ का प्रत्यय कभी हल्के रूप में उजागर नहीं हुआ। उनकी किसी भी रचना में - जो प्रेम के भाव से पगी है - संवेदना को इंसान के दैहिक आकर्षण से ऊपर उठाकर इस कदर सूफियाना रंग से रंग दिया गया है कि मानवीय प्रेम उस परवरदिगार, उस महबूब से जुड़ता हुआ दिखाई देता है, जिसकी सत्ता की सभ्य समाज में एक संरक्षक के रूप में कल्पना की जाती है -

जब भी ये दिल उदास होता है।
जाने  कौन आस-पास होता है।
आँखें पहिचानती हैं आँखों को,
दर्द  चेहरा-शनास   होता   है।

‘प्यार’ की तरह ‘मौत’ भी गुलज़ार के लिए शब्दों के अनूठे प्रयोगों की आधारभूमि है। वे मौत का खौफ पैदा नहीं करते, बल्कि वे उसे गौरवान्वित कर देते हैं -

जिस्म सौ बार जले तब भी वह मिट्टी का ढेला
रूह इक बार जलेगी, तो भी वो कुन्दन होगी!

मौत से घबराकर ज़िंदगी के छूटते दामन को कसकर पकड़ लेने के भाव से अब तक न जाने कितनी नज़्में, कितने संवाद लिखे गए होंगे - लेकिन मौत से प्यार करके उसके सीने से लग जाने की ललक लिए अगर कोई कलम चली है, तो वह गुलज़ार की कलम चली है। 1971 में बनी फ़िल्म ‘आनन्द’ में राजेश खन्ना - आनंद सहगल - की भावप्रवणता अगर लोगों को रुला गई, ...अमिताभ बच्चन - बाबू मोशाय - की लयात्मकता अगर दर्शकों को स्तब्ध कर गई तो इसके पीछे गुलज़ार के वे संवाद थे, जो इन दो महान् कलाकारों की जुगलबंदी को हिन्दी सिनेमा के इतिहास की अनमोल धरोहर बना गए। कुछ संवाद द्रष्टव्य हैं -

‘जि़न्दगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में है जहाँपनाह, जिसे ना आप बदल सकते हैं - ना मैं...! ...हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं, जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ बँधी है। ...कब, कौन, कैसे उठेगा? यह कोई नहीं जानता...।’

‘...क्या फ़र्क है सत्तर साल और छह महीने में ...? मौत तो एक पल है बाबू मोशाय! ...ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं...!’

‘मौत तू एक कविता है, ... मुझसे इक कविता का वादा है...! मिलेगी मुझको डूबती नब्ज़ों में, जब दर्द को नींद आने लगे, ज़र्द-सा चेहरा लिए चाँद उफ्फ तक पहुँचे...! दिन अभी पानी में हो... रात के किनारे के करीब... न अँधेरा, ना उजाला हो..., ना आधी रात, ना दिन...! जिस्म जब खत्म हो और रूह को जब साँस आए..., मुससे इक कविता का वादा है...! मिलेगी मुझसे...!’

राजेश खन्ना की मौत पर सारे देश के अखबारों ने, टीवी चैनलों ने जब इन संवादों को श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित-प्रसारित किया, तो यूँ लगा जैसे हर भावुक भारतीय मौत से डर नहीं रहा है, बल्कि उसके जादू को, उसके तिलिस्म को जीते-जी अनुभव कर रहा है...! यह कमाल गुलज़ार के लेखन का है, उनकी दिव्य-दृष्टि का है। 

गुलज़ार को, उनके सृजन की खासियतों को और उनके सिनेमाई व अदबी अवदान को किसी निबन्ध की चौखट में जड़ देना कतई मुमकिन नहीं! इसके लिए तो हज़ार पन्नों की किताब भी छोटी पड़ जाए। इसी तरह यह भी मुमकिन नहीं कि गुलज़ार के लेखन की ऊँचाई, उसकी गरिमा और उसकी अमूर्तता को जैसा अनुभूत किया जाए, वैसा ही प्रकट कर दिया जाए। यह उतना ही असंभव है जितना कि महीनों तपी हुई धरती की देह पर सारी रात बरसे बादलों से उसे जो अनुभूति होती है, जो सुख मिलता है - उसे लफ़्ज़ों की शक्ल में ढाल दिया जाए! गुलज़ार ने जो लिखा, जो रचा - उसकी प्रासंगिकता इसलिए अधिक है कि आज  हम जिस युग में जी रहे हैं, उसमें आत्मीय संबंधों पर गंभीर संकट आ खड़ा हुआ है। हमारे युवाओं ने ‘प्यार’ और ‘लव’ जैसे पवित्र लफ़्ज़ों को बहुत औपचारिक रूप में देखना शुरु कर दिया है। गुलज़ार की $कलम हमें एहसास कराती है कि ‘प्यार’ वस्तुत: हमारी आत्मा का प्रकाश है और इस प्रकाश में जब इंसान डूब जाता है, तो उसके लिए एक व्यक्ति नहीं - समूची कायनात के लिए करुणा उमड़ती है। 
राजकीय लोहिया 
महाविद्यालय स्नातकोत्तर 
चूरू की वार्षिक पत्रिका 
'आलोक' 
से साभार यहाँ छाप रहे हैं।

हमारे युवा प्रेम की इस हकीकत को समझें, इसीलिए गुलज़ार और उन जैसे कलम के दीवाने अपनी भावनाओं को शब्दों से बुनी हुई चुनरियाँ ओढ़ाते रहते हैं। भावनाओं का शृंगार करना कोई आसान काम नहीं है! ...इसके लिए उन्हें अपना हृदय जलाना होता है। गुलज़ार जैसे समस्त रचनाधर्मियों की ओर से उन तमाम जज़्बाती इंसानों के लिए, जिनके मन में यह प्रश्र उठता होगा कि कोई रचनाकार आखिर क्यों अपनी ज़िंदगी में शब्दों का यह धूना रमाता है - तो यह कहना चाहिए कि इंसानियत को जि़न्दा रखने के लिए, एहसासों को ज़बान देने के लिए ज़रूरी है कि कुछ संवेदनशील लोग - जिनके पास एक धडक़ती हुई कलम हो - जीवन को तापस्य में ढाले और अपनी बेचैनियों को शब्द दें! ...और अन्त में मेरी यह छोटी-सी कविता -

हाँ
लिखता हूँ -
इस दिल की 
बेचैनी को
कभी बुझाने के लिए
कभी भडक़ाने के लिए...!

सुरेन्द्र डी सोनी
चूरू  ,राजस्थान के सरकारी कॉलेज में
इतिहास के वरिष्ठ व्याख्याता हैं 
मो-9414465181
ई-मेल-soni.sd@gmail.com




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