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शोध आलेख:डॉ. नगेन्द्र की आलोचना में प्रगतिशील मूल्य / रचना शुक्ला (पाण्डेय)

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, जुलाई 15, 2013 | सोमवार, जुलाई 15, 2013

जुलाई-2013 अंक 

डॉ. नगेन्द्र
डॉ. नगेन्द्र ने अंग्रेजी साहित्य के संस्कारों को आत्मसात् करके हिन्दी साहित्य में प्रवेश किया। इसलिए साहित्य के संबंध में उनकी धारणाओं का मूल आधार अंग्रेजी साहित्य के कवियों और आलोचकों की मान्यताओं से प्रेरित है। उन्होंने उच्चतर हिंदी अध्ययन शोधकार्य एवं समीक्षा के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। वे विद्वता के प्रतिमान हैं। संस्कृत के आचार्यों में भट्टनायक और अभिनवगुप्त से, हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से आप विशेष रूप से प्रभावित हुए। डॉ. नगेन्द्र ने स्वयं कहा है--- ""आरंभ में ही आचार्य शुक्ल के प्रभाववश मेरे मन में भारतीय रस सिद्धान्त के प्रति गहरी आस्था हो गयी। शुक्ल जी का मेरे मन पर विचित्र आतंक और प्रभाव रहा है। मेरे अपने संस्कार शुक्ल जी के संस्कारों से सर्वथा भिन्न थे। उनके निष्कर्षों को मानने के लिए मैं बिल्कुल तैयार नहीं था। परन्तु उनके प्रौढ़ तर्क और अनिवार्य शैली मेरे ऊपर बुरी तरह हावी हो जाते थे और मैं यह मानने को विवश हो जाता था कि इस व्यक्ति की काव्य दृष्टि चाहे संकुचित हो लेकिन फिर भी अपनी सीमा में यह महारथी अजेय है।""1 पाश्चात्य आलोचकों में डॉ. नगेन्द्र आई.ए.रिचर्ड्स और क्रोचे से प्रभावित हुए। प्राय: सभी काव्य दृष्टियों के समन्वित प्रभाव के आधार पर विकसित इनकी काव्य दृष्टि "रस", "सौन्दर्य" और "आनन्द" की आत्म निष्ठ स्थिति को महत्त्व देती है। अपने को निरन्तर विकसित और सुसंस्कृत करते रहने के बावजूद डॉ. नगेन्द्र रस सिद्धान्त के प्रति अपनी आस्था में अपराजेय रहे हैं। डॉ. नगेन्द्र पश्चिमी अवधारणाओं से अधिक प्रभावित रहे परंतु भारतीय जीवन मूल्यों के अनुरूप ही उन्हें ढालकर आत्मसात किया। 

डॉ. नगेन्द्र की आलोचना पद्धति को आचार्य शुक्ल की पद्धति का ही विकसित रूप कहा जा सकता है। वे रस सिद्धान्त को युगानुकूल व्याप्ति देना चाहते हैं तथा विकसित जीवन मूल्यों के साथ शास्त्रीय सीमाओं को भी विकसित देखना चाहते हैं। डॉ. निर्मला जैन के शब्दों में---- ""स्वभाव से डॉ. नगेन्द्र विरोध सहने के आदी नहीं थे वे अपने विरोधियों से डटकर लोहा लेते हैं पर विरोध की संभावना और उपस्थिति को कभी नकारा नहीं वे भीतर से अत्यंत मानवीय कोमल स्वभाव के थे।""2  चिरकाल से उपेक्षित कवि व्यक्तित्व की ओर नगेन्द्र ही पहले पहल आकृष्ट हुए और इसी आधार पर उन्होंने कवि की अनुभूति के साधारणीकरण को महत्ता प्रदान की साथ ही कवि तथा सहृदय दोनों में ही रस की स्थिति मानी। रस शब्द का अर्थ विकास, कामसूत्र से लेकर "आनन्द" के रूप में किया। ""वे शास्त्रीय इन अर्थों में थे कि प्राचीन संस्कृत काव्य शास्त्र का परिमार्जन एवं प्रस्तुतीकरण उन्होंने अधिक किया, आधुनिक इन अर्थों में कि उन्होंने नवीन प्रश्नों और नवीन उपलब्धियों के प्रति अधिक जागरूकता दिखायी।""3 उन्होंने शास्त्रीय विषयों को ऐसी स्वच्छ शैली के साथ हाथ लगाया कि उनके विरोधी समीक्षक भी उनके सिद्धान्तों की तरफ आकृष्ट हुए। उनकी समीक्षा में न्यूनाधिक मात्रा में तीन तत्वों ने योग दिया--- संस्कृत काव्यशास्त्र, पाश्चात्य काव्यशास्त्र और युग सचेष्ट अन्तर्दृष्टि। भारतीय काव्य शास्त्र में साधारणीकरण के सिद्धान्त को वे मानव मूल्यों की स्वीकृति का सिद्धान्त ही मानते हैं। ""नगेन्द्रजी ने शास्त्र के अध्ययन को जड़ ज्ञान की प्राप्ति का साधन न बनाकर उसे काव्य भाव के भीतर निहित अनुभूतिमूलक एकता की खोज का साधन बनाया किन्तु लेखक की ओर से अपनी बात शास्त्र पर लादी नहीं गई है वरन् वह शास्त्र के भीतर से खींची गई है।""4 जहाँ इनकी शास्त्र चर्चा में शास्त्रीय दृष्टि और भाषा की उपर्युक्तता, वस्तुगता और पारिभाषिकता प्राप्त होती है, वहीं एक सौन्दर्य खोजी दृष्टि का लालित्य और अपनापन भी दिखाई पड़ता है।

डॉ. नगेन्द्र को रस की मूल चेतना की सार्वभौमिकता तथा चिरन्तनता को प्रतिष्ठित करने के लिए एक ही साथ कई विरोधी दिशाओं से जूझना पड़ा। उन्होंने तर्क तथा प्रमाण देकर यह स्थापित किया कि रस ही सतकाव्य का प्राण है चाहें वह काव्य किसी काल या देश का हो। उन्होंने बड़ी ईमानदारी से आलोचकों के आक्षेपों को प्रस्तुत कर उनका निराकरण किया तथा आधुनिक काव्य का सौन्दर्य रस में देखा। डॉ. नगेन्द्र की प्रगतिशीलता इस अर्थ में सिद्ध की जा सकती है कि उन्होंने कहीं भी रस के शास्त्रीय रूप का आग्रह न कर उसकी मूल चेतना और गतिशीलता को ही महत्व प्रदान किया। उन्होंने नई आलोचना की संरचनात्मकता को उसके मूल और सही रूप में पहचानते हुए प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र से लेकर इसके बिन्दु को इलियट और रिचर्ड्स में ढूंढे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि वे परंपरा को रूढ़ अर्थ में स्वीकार नहीं करते वरन् उसके गतिशील और प्रगतिशील तत्वों को नवीन यात्राओं में योग देते हुए देखते हैं।

सौंन्दर्य को मूल्य मानते हुए तथा महत्व देते हुए पंत के भाव जगत की निर्माण शक्तियों पर विचार करते समय वे पन्त काव्य में ऐन्द्रियता को सौन्दर्योपासना का एक गुण मानते हैं। वे जीवन प्रद सौन्दर्य को ही सौन्दर्य की कोटि में स्थान देते हैं जो वासना से रहित है ।  "भारतीय सौंन्दर्य शास्त्र की भूमिका" (1955 ई.) में उन्होंने सौंन्दर्य को निरपेक्ष स्वतंत्र मूल्य मानने से इंकार किया है और कहा है ""स्वतंत्र मूल्य होने पर भी सौन्दर्य की सत्ता निरपेक्ष नहीं है, वह जीवन के अन्य वृहत्तर मूल्यों के साथ--- पुरुषार्थ, आध्यात्मिक तथा नैतिक सामाजिक मूल्यों के साथ अनिवार्य रूप से सम्बद्ध है।""5  वास्तव में सौन्दर्य काव्य कला का आन्तरिक मूल्य है परंतु जीवन के व्यापक परिवेश के साथ सम्बद्ध होने के लिए उसे अन्य वृहत्तर मूल्यों के साथ जुड़ना ही पड़ता है।  सौन्दर्य कला का पर्याय है जिसमें कल्याण की शक्ति होती है। "नयी समीक्षा नए संदर्भ" में नगेन्द्र लिखते हैं ""छायावादी कवि नारी के अंगों की मांसलता के प्रति आकृष्ट न होकर उसके मन और आत्मा के सौन्दर्य पर मुग्ध होता है, वह रूप के माध्यम से अभिव्यक्त उसके हृदय के माधुर्य को अनावृत्त करता है।""6 सौंन्दर्यानुभूति व्यक्ति को गतिशील, क्रियाशील, चिन्तनशील, संवेदनशील तथा मननशील एवं कल्पनाशील बनाती है। ""नगेन्द्र का सौन्दर्य सामंजस्य का स्वामी है विघटन का दुश्मन है, लगाव का सहयोगी और अलगाव का विरोधी है।""7  डॉ. नगेन्द्र के मतानुसार आधुनिक काल के छायावादी काव्य में, प्रकृति में, नारी में, मानव में भी सर्वत्र सौन्दर्य का अन्वेषण किया गया। सूक्ष्म और स्थूल सौंन्दर्य के मध्य सुन्दर सामंजस्य प्राप्त होता है। जिस कविता ने नवीन सौंन्दर्य चेतना जगाकर वृहत्त समाज की अभिरूचि का परिष्कार किया, उस कविता का गौरव अक्षय है। ""छायावादी काव्य में नारी अपने पंचभूत के शरीर का "पोस्टमार्टम"  करवाने नहीं आती, जैसा कि हम रीति युग के कतिपय कवियों के काव्य में पाते हैं बल्कि यहाँ नारी एक शक्ति लेकर, भावनापूर्ण हृदय लेकर, स्नेह और दुलार देने आती है।""8 छायावादी कविता में जीवन के प्रति, जगत के प्रति, प्रकृति के प्रति, ब्रह्म के प्रति, नारी के प्रति, समाज के प्रति एक कौतूहल और हित की भावना अन्तर्निहित रही है, कवि सत्य की खोज में सतत प्रयत्नशील रहा है। छायावाद के प्रति डॉ. नगेन्द्र की यह दृष्टि उन्हें प्रगतिशील मूल्यों के प्रति जागरूक सिद्ध करती है। "साकेत एक अध्ययन" (1939 ई.) में इन्होंने कवि के काव्य पर गाँधीवाद का प्रभाव दिखाया है। ""उर्मिला का विरह सूर की गोपियों के विरह से भिन्न है, उर्मिला अन्य प्रोषित पत्रिकाओं से भी सहानुभूति रखती है अर्थात् दु:ख के साथ--साथ दूसरों के दु:खों का भी ध्यान रखना गाँधीवादी विचारों का प्रभाव है। इसी प्रकार कैकेयी के चरित्र का जो उज्ज्वलीकरण किया गया है उस पर गाँधीजी के "पाप से घृणा करो किन्तु पापी से प्रेम" सिद्धान्त का प्रभाव दिखाई पड़ता है।""9 

नगेन्द्र इस स्थिति पर क्षोभ व्यक्त करते हैं कि भारतीय साहित्य में रीतिकाल की भाँति हिन्दी साहित्य के इतिहास में रीतिकाव्य भी अत्यन्त अभिशप्त काव्य माना गया है। "रीतिकाव्य की भूमिका" और "देव और उनकी कविता" रीतिकाव्य को प्रतिष्ठित करने के लिए ही लिखा गया। वे मानते हैं कि ""रीतिकाव्य सामाजिक चेतना की दृष्टि से कमजोर है, उसकी काव्यवस्तु भी एक सीमित क्षेत्र से बाहर व्यापक संसार में किसी रुचि का प्रमाण नहीं देती लेकिन कवियों की निश्छल आत्माभिव्यक्ति द्वारा जिस परिष्कृत आनन्द की सृष्टि यह काव्य करता है उसकी उपेक्षा करना गलत है। नैतिक और सामाजिक मूल्य से अलग इस आनन्द का भी अपना एक मूल्य है।""10  आनन्द और सौन्दर्य की जो सृष्टि करता है, उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। इन कवियों का शास्त्र ज्ञान और लोकानुभव दोनों खूब समृद्ध हैं।

डॉ. नगेन्द्र का मानना है कि जीवन के उदात्त आदर्शों के प्रति उपेक्षा का दृष्टिकोण अपनाने के कारण प्रगतिवाद उतना अधिक सफल नहीं हो सका जितनी कि आशा थी। ""प्रगति का साधारण अर्थ है बढ़ना, जो साहित्य जीवन को आगे बढ़ाने में सहायक हो वही प्रगतिशील साहित्य है, इस दृष्टि से तुलसीदास सबसे बड़े प्रगतिशील हैं, भारतेन्दु बाबू, मैथिलीशरण गुप्त भी इस अर्थ में प्रगतिशील लेखक हैं। परन्तु आज का प्रगतिवादी इनमें से किसी को भी प्रगतिशील नहीं मानेगा--- ये सभी तो उसके मतानुसार प्रतिक्रियावादी लेखक हैं।""11  प्रगतिवाद का वर्ण्य विषय "जीवन कैसा है" तक ही रहा "जीवन कैसा होना चाहिए" तक उसकी दृष्टि नहीं गई। नगेन्द्र को "प्रगति" पसंद है पर वह जो वर्ग चेतना से ऊपर होती है, जो राजनीतिक पार्टी विचारधारा के सीमित दायरे से ऊपर होती है। दूसरी तरफ वे इस मूल्य को भी अस्वीकार नहीं करते कि प्रगतिवादी काव्य धारा सर्वत्र दलित वर्ग की सहानुभूति के प्रवाह में विचरित होती रही, यथार्थ उसकी श्वास रही।

आनन्द की एक नई व्याख्या पाते हुए हम डॉ. नगेन्द्र में प्रगतिशील मूल्यों को पुष्ट होते हुए देखते हैं। आनन्द को वे काव्य के प्रयोजन के रूप में स्वीकार करते हैं निष्प्रयोजन कर्म तो वही होगा जो निरर्थक होगा। ""धन, यश, प्रचार ये सब स्थूल प्रयोजन है। "आनन्द" ही काव्य का आत्यान्तिक प्रयोजन है। "आनन्द" के समानान्तर वे "लोक--कल्याण" और "चेतना" प्रयोजनों को भी विचारणीय मानते हैं। "लोकहित" को प्रयोजन मानकर चलनेवाला साहित्यकार "लोक" में अपने "स्व" का विस्तार करके आनन्द लाभ ही करता है।""12  वह "आत्मन: कामाय" लोक कल्याण में अनुरक्त होता है। इसी प्रकार "चेतना के परिष्कार" की परिणति भी आनन्द की अनुभूति में ही होती है। काव्य के आस्वाद का आनन्द रसानुभूति का ही आनन्द है। काव्य मूल्यों के संबंध में डॉ. नगेन्द्र  का मानना है कि ""काव्य मूल्य का अर्थ है वह गुण या गुण समवाय, जिसके द्वारा काव्य की सिद्धि का निर्धारण किया जाता है। इस दृष्टि से मूल्य का आधार अन्तत: प्रयोजन ही सिद्ध होता है। जिस काव्य में रागात्मक आस्वाद प्रदान करने की क्षमता जितनी अधिक होगी उतना ही उसका मूल्य होगा।""13 उन्होंने आनन्द और कल्याण को अभिन्न दिखलाने की चेष्टा की है। उनके अनुसार आनन्द कोई सार्वजनिक वस्तु नहीं है। लेखक की आत्माभिव्यक्ति के द्वारा जो परिष्कृत आनन्द प्राप्त होता है उसका नैतिक एवं सामाजिक मूल्य से स्वतंत्र भी एक महत्व है। सामाजिक दायित्व के निर्वाह में यदि लेखक त्रुटि करता है तो वह नैतिक दृष्टि से अपराधी है। नगेन्द्र ने ""साहित्य में मूल्यों की बहुत चिंता नहीं की है उनके मत से काव्यानंद में ही मूल्य पर्यवसित हो जाते हैं।""14 काव्य के भावना का अर्थ ही अव्यवस्था में व्यवस्था स्थापित करना है और अव्यवस्था में व्यवस्था ही आनन्द है। जीवन के कटु अनुभव भी काव्य में अपने तत्व रूप संवेदन के समन्वित हो जाने से आनन्दप्रद बन जाते हैं। ""आनन्द और कल्याण को परस्पर विरोधी मानना असंगत है पर इन दोनों में सापेक्षिक मूल्य आनन्द का ही अधिक है। आनन्द की व्यापक परिधि में हित की भावना अंतर्भूत है और हित की परिणति भी आनन्द ही है।""15 नगेन्द्र आनन्द को सभी रसों में अनिवार्य मानते हैं। ""परिष्कृत आनन्द जीवन में रस उत्पन्न करता है, पराजय और क्रान्ति की अवस्था में शांति और माधुर्य का संचार करता है। इस प्रकार की निश्छल आत्माभिव्यक्तियों ने सामाजिक चेतना का कितना संस्कार किया है इसका अनुमान लगाना आज कठिन है।""16

मानवता की प्रेरणा से ही इच्छा, ज्ञान, क्रिया अथवा संस्कृति, विज्ञान और राजनीति में सामंजस्य स्थापित हो सकता है। ""रस सिद्धान्त में डॉ. नगेन्द्र ने लिखा है; जीवन की निरंतर विकासशील धारणाओं और आवश्यकताओं का आंकलन मानववाद में ही हो सकता है। जीवन की भूमिका में जब तक मानवता से महत्तर सत्य का आविर्भाव नहीं होता और साहित्य की भूमिका में जब तक मानव संवेदना से अधिक रमणीय सत्य की उद्भावना नहीं होती तब तक रस सिद्धान्त से अधिक प्रामाणिक सिद्धान्त की प्रकल्पना भी नहीं हो सकती।""17 उन्होंने लोकमंगल और लोकहित को भी मानवतावाद के साथ सम्बद्ध किया है। उनका मानना है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, सामूहिक हित उसके अपने व्यक्तिगत हितों से निश्चय ही अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। समाज के संगठन और हितों की रक्षा करने वाले नियमों का संकलन ही नीति है समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उसकी अपेक्षा करनी होगी। ""लेखक मनुष्य रूप में समाज का अविभाज्य अंग है, उसमें प्रतिभा अधिक है, उसका दायित्व भी अधिक है जिस समाज ने उसे जीवन में उपकरण दिए हैं, बौद्धिक और भावगत परम्पराएँ दी हैं उसका ऋणशोध करना उसका धर्म है इससे स्वार्थ साधना की संकुचित भूमि से उठकर उसके अहंभाव का उन्नयन और विस्तार होता है।""18 नगेन्द्र की दृष्टि मानवतावादी है इस बात से भी पता चलती है कि प्रेमचंद के जीवन का मूल तत्व वे मानववाद मानते हैं और उनकी व्यापक सहानुभूति की प्रशंसा करते हैं। प्रेमचंद पराधीन भारत के पूरे शोषण चक्र का चित्रण करते हैं। जिसमें ""उनके व्यक्तित्व का मानव पक्ष अत्यन्त विकसित था। भारत की दीन दु:खी जनता, गाँव के अनपढ़ और भोले--किसान और शहर के शोषित मजदूर, निम्न वर्ग के असंख्य श्रम--श्रान्त वर्ग और वर्ण व्यवस्था के शिकार नर--नारी तो उनके विशेष स्नेह भाजन थे ही परन्तु उनके अतिरिक्त अन्य वर्गों के प्राणी भी उच्च वर्ग के राजा, उद्योगपति, जमींदार और हुक्काम, मध्यवर्ग के व्यवसायी, नौकरी पेशा लोग, समाज के पुराणपंथी पंडित पुरोहित भी उनकी सहानुभूति से वंचित नहीं थे।""19 प्रेमचंद की दृष्टि मानव के सभी भेदों से मुक्त थी कहकर नगेन्द्र ने अपनी मानवतावादी दृष्टि का परिचय दिया है । उन्हें विरोध उस सामाजिक आर्थिक संघर्ष से है जो वर्गीय होता है और जिसमें शोषित वर्ग संगठित होकर शोषक वर्ग को सत्ता से उखाड़ फेंकता है। इसे उन्होंने मानव के प्रति मानव का घृणित संघर्ष कहा है।

डॉ. नगेन्द्र घटनाओं और व्यक्तियों की अपेक्षा इतिहास की धारा के विकसनशील क्रम को ही अधिक महत्त्व देते हैं। जब जीवन और काव्य मूल्यों का विघटन चरम सीमा पर पहुँचा तब डॉ. नगेन्द्र ने रस सिद्धान्त को विद्वानों और सामान्य पाठकों के समक्ष शाश्वत और सार्वभौम सिद्धान्त के रूप में रखा, ""उनके इस सांगोपांग निरूपण में अतीत का स्वीकार है, वर्तमान का बोध है, साथ ही परंपरा और नवीनता का, आनन्द और कल्याण का, सौन्दर्य तथा नीति का, कला एवं जीवन का, व्यष्टि--समष्टि का कल्पना एवं सत्य का, सत्यं एवं शिव का, यथार्थ एवं आदर्श का वास्तविक समन्वय प्राप्त होता है।""20 उन्होंने अखंड मानव चेतना के आधार पर काव्य शास्त्र को प्रतिष्ठित किया। "शास्त्र" केवल शास्त्र मात्र न रहकर साहित्य भी कहलाने योग्य बना। सैद्धान्तिक दृष्टि से चाहें नगेन्द्र जी ने प्रगतिवाद में अनास्था प्रगट की है किन्तु साहित्य और साहित्यकार को वह स्वभावत: प्रगतिशील मानते हैं। प्रगतिशील आन्दोलन के उन तत्वों को स्वीकार करने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं जो काव्य और कलाओं को अधिक समृद्ध करे, पाठकों और श्रोताओं को इन कलाकृतियों का अधिकाधिक रसास्वादन करने में सक्षम बनाए। रसवादी मान्यताओं की नवीन व्याख्या में जिनसे योग मिल सके तथा मानवता की रक्षा हो। "साकेत एक अध्ययन" में उन्होंने गृहस्थ, सामाजिक संबंध एवं परिवेश आदि के आधार पर पात्रों, स्थितियों एवं मनोदशाओं का जो विश्लेषण किया है वह किसी भी प्रगतिशील समीक्षक की समीक्षा से टक्कर ले सकता है। इनकी समीक्षा पद्धति शुक्ल युगीन समीक्षा का वह विकास है जिसने छायावादी काव्य चेतना को आत्मसात करके सौष्ठववादी मनोवैज्ञानिक एवं मनोविश्लेषणात्मक समीक्षा के तत्वों का भी समाहार कर लिया है। ""डॉ. नगेन्द्र का योगदान मुख्यत: नई बातें उद्घाटित करने में उतना नहीं है जितना उद्घाटित बातों को ही अधिक सघनता और संगति से विश्लेषित करने में तथा नई समझदारी से कृतियों का विवेचन करने में है।""21 

उनके अनुसार रस आज के साहित्य के मूल्यांकन के लिए पर्याप्त और समर्थ है किंतु रस को रूढ़ रूप में न लेकर विकासमान रूप में लेने की आवश्यकता है। मूल्यों को वे देशकाल बद्ध और परिवर्तनशील मानते हैं। ""उनका विश्वास है कि मानवता, मानव कल्याण, मानव मूल्य आदि शब्दों के निरंतर और सर्वव्यापी प्रयोग से यह सिद्ध हो जाता है कि मानव प्रकृति में कुछ तत्व ऐसे हैं जो सार्वभौम तथा सार्वकालिक हैं जो विभिन्न देशकाल के मानव प्राणियों में मूलत: समान है।""22  इन्हीं तत्वों की अभिव्यक्ति जीवन के नाना रूपों में होती है काव्य भी उनमें से एक है और अपनी परिष्कृति तथा प्रभाव के कारण उसका विशिष्ट गौरव है। नवीन यात्राओं की पहचान का प्रयत्न उनके शास्त्रीय आधार को नूतन रंग देता चलता है और शास्त्रीय आधार नवीन यात्राओं के स्वरूप को मूर्त्त रूप में देखने की दृष्टि देता है। उन्होंने काव्य शास्त्र जैसे शुष्क, नीरस विषय को जिस रचनात्मक कल्पनाशक्ति द्वारा रोचक और आकर्षक बनाया, उससे उनके शास्त्रीय अनुसंधानों के मानवीय और साहित्यिक मूल्यों में बहुत अधिक मात्रा में परिवृद्धि हो गई। सिद्धांतत: वर्तमान की समस्याओं को अपने विवेचन में गौण स्थान दिया यह उनकी सीमा मानी जा सकती है--- पर इससे यह भी सिद्ध है कि वे हिपोक्रेट नहीं है। अपनी मान्यताओं के प्रति उनमें अटूट निष्ठा है। यथासंभव प्रयास नगेन्द्र की आलोचनात्मक दृष्टि में प्रगतिशील मूल्यों को निर्धारित करने का रहा। 

संदर्भ- सूची 
1 रांग्रा रणवीर, डॉ. नगेन्द्र : व्यक्तित्व और कृतित्व, भारती साहित्य मंदिर, दिल्ली, प्रथम संस्करण--1965, जीवनी    और व्यक्तित्व लेख से पृष्ठ-- 21
2 व्यास गोपाल प्रसाद, हिन्दी की आस्थावान पीढ़ी, नेशनल पब्लिसिंग हाउस, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2004,            पृष्ठ-198 पर उद्धृत
3   लक्ष्मी एस, डॉ. नगेन्द्र : विश्लेषण और मूल्यांकन, रंजन प्रकाशन, आगरा, प्रथम संस्करण--1971, पृष्ठ-- 246
4 मिश्र रामदरश, हिन्दी आलोचना प्रवृत्तियाँ और आधारभूमि; नॉर्थ इंडिया पब्लिशर्स, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2002, पृष्ठ--209
5   डॉ. नगेन्द्र, भारतीय काव्य शास्त्र की भूमिका,  ओरिएंटल बुक डिपो, दिल्ली, प्रथम संस्करण--1955,
6   डॉ. नगेन्द्र, नयी समीक्षा नए संदर्भ,  नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, संस्करण-1974, पृष्ठ- 94
7   उपाध्याय पशुपति नाथ, आलोचक डॉ. नगेन्द्र, (कृतित्व के विविध आयाम),  ग्रन्थायन प्रकाशन, अलीगढ़, प्रथम संस्करण--1985, पृष्ठ--95
8 चौबे नारायण प्रसाद, डॉ. नगेन्द्र के आलोचना सिद्धान्त, नेशनल पब्लिसिंग हाउस, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण--1962, पृष्ठ--187
9   त्रिपाठी विश्वनाथ, हिन्दी आलोचना, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण--1970, संस्करण- 2004, पृष्ठ--162
10 मधुरेश, हिन्दी आलोचना का विकास, सुमित प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण-- 2004, पृष्ठ--126
11   डॉ. नगेन्द्र, आधुनिक हिन्दी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ, नेशनल पब्लिसिंग हाउस, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-1951, पृष्ठ-- 99
12   तिवारी रामचन्द्र, आलोचक का दायित्व, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण-2005, पृष्ठ--158
13 डॉ. नगेन्द्र, आलोचक की आस्था, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली 1966, पृष्ठ--5
14  सिंह बच्चन, आलोचक और आलोचना, नेशनल पब्लिसिंग हाउस, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-1984, पृष्ठ- 200
15   शर्मा मक्खनलाल, आधुनिक हिन्दी आलोचना एक अध्ययन, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली, तिथि अप्रकाशित, पृष्ठ-- 249 
16   डॉ. नगेन्द्र, विचार और विवेचन, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण--1949, पृष्ठ-56
17  सुमित्रानंदन पंत (सम्पादक),  डॉ. नगेन्द्र : अभिनंदन ग्रंथ में आर्य बुक डिपो, दिल्ली, प्रथम संस्करण--1975, पृष्ठ--712 सेठ गोविंद दास द्वारा दिया गया वक्तव्य
18 डॉ. नगेन्द्र, विचार और विवेचन, नेशनल पब्लिसिंग हाउस, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-1949, पृष्ठ-57
19 डॉ. नगेन्द्र, आस्था के चरण, साहित्य रत्न भंडार, आगरा, प्रथम संस्करण--1942, पृष्ठ-- 451
20   डॉ. एस लक्ष्मी, (त्रिपुर सुन्दरी), डॉ. नगेन्द्र : विश्लेषण और मूल्यांकन, रंजन प्रकाशन, आगरा, प्रथम संस्करण--1971, पृष्ठ-273
21   पंत सुमित्रानंदन (संपादक), डॉ. नगेन्द्र : अभिनंदन ग्रंथ, में रामदरश मिश्र के लेख से उद्धृत, आर्य बुक डिपो, दिल्ली, प्रथम संस्करण--1975, पृष्ठ-- 270
22   वही, गिरिजाकुमार माथुर के लेख से उद्धृत, पृष्ठ-- 286



रचना शुक्ला (पाण्डेय)
कलकता विश्वविद्यालय 
संपर्क:rachanapandey78@yahoo.com





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