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टिप्पणी :बदलते ग्राम्य और शहरी जीवन के गीत Vaya टुकड़ा कागज़ का (गीत-संग्रह)-अवनीश सिंह चौहान By डॉ ममता कुमारी

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, जुलाई 15, 2013 | सोमवार, जुलाई 15, 2013

जुलाई-2013 अंक 
टुकड़ा कागज़ का (गीत-संग्रह)
ISBN 978-81-89022-27-6
प्रकाशन वर्ष : प्रथम संस्करण-2013, 
पृष्ठ : 11, मूल्य 125/-, 
प्रकाशक : विश्व पुस्तक प्रकाशन, 
304-ए,बी.जी.-7, 
पश्चिम विहार, नई दिल्ली-63

समीक्षक: डॉ ममता कुमारी, आगरा 

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने आधुनिक कविता को छंद के बंधन से मुक्त किया। उन्होंने ही नव-गीत, लंबी कविता और हिंदी में ग़ज़लों की परंपरा डाली। उत्तर आधुनिक युग में नवगीत विधा में कुछ आवश्यक तत्व और भी जुड़ते चले गए हैं, लेकिन उसका लोक-संस्कृति का भाव सदैव विद्यमान रहेगा क्योंकि गीतों का आदिम रूप लोक-गीत ही रहे हैं। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल ने इस लोकगीत की लय में कविताएं रच कर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। इसी
क्रम में अवनीश सिंह चौहान की सद्यः प्रकाशित पुस्तक भी नव-गीतों के साथ उपस्थित हुई है। कवि गीतकार ने दो धरातलों पर इन गीतों को प्रस्तुत किया है-ग्राम्य  और शहरी। दोनों ही धरातलों पर कवि की दृष्टि यथार्थवादी है।

बदलते गांव के कुछ परिदृश्य है तो ग्राम्य रस से भीगे हुए भी कुछ गीत हैं। गीतकार की रचनाओं में प्रेम है तो विरह का लोकभाव भी। शहरी धरातल पर यथार्थ की नई जमीन भी दिखाई देती है तो राजनीति के लोक दृष्टि का निरूपण भी। नए बिम्ब, प्रतीक दिखते हैं तो अभिधात्मक शब्दों के साथ अंग्रेजी शब्दों की प्रयोग भी छौंक भी है। ‘असंभव है’ गीत से कवि ने गीतों का अर्थ विस्तार कर उसे कविता से एकरूप कर दिया है-
        चौतरफा है जीवन ही जीवन
        कविता मरे असंभव है

इस गीत से गीताकार में जो आशावादी दृष्टि है वह पूरे संग्रह में अंतःसलिला के रूप में बहती है। ‘आदिम नाच’ ‘वे ठौर ठिकाने’ जैसे प्रेमगीतों में कहीं प्रतीकात्मकता है तो कहीं यथार्थ।

        रजनीगंधा-
        दहे रात भर, जागे हंसे चमेली
        देह हुई निष्पंद
        कि जैसे
        सूनी पड़ी हवेली
        कौन भरे
        मन का खालीपन?
        कौन करेगा बात?

कवि का नए प्रतीकों का चुनाव उम्दा बन पड़ा है।  ‘उम्र तंबूरा’ ‘रेल जिंदगी’ ‘टुकड़ा कागज़ का’ ‘शहर-अजगर’ सूनी हवेली’ आदि। कुछ मिथकीय प्रतीकों का भी नए संदर्भों में प्रयोग रुचिकर है-

        तकली मैं
        अब लगी रूई है
        कात रही है
        समय सूई है
        कबिरा-सा
        बुनकर बनने में
        लगते कितने साल?

लोक भूमि पर रचे गए कुछ गीत यथार्थवादी परिप्रेक्ष्य में उल्लेखनीय है-‘पगडंडी’ ‘अपना गांव समाज’ ‘पंच गांव का’ आदि। ये पंक्तियां ध्यान खींचती हैं-

        पगडंडी जो
        मिल न सकी है
        राजपथों से, शहरों से
        जिसका भारत
        केवल केवल
        है खेतों से, गांवों से।

इसी प्रकार ‘अपना गांव-समाज’ की पंक्तियां है-

        बड़े चाव से
        बतियाता था
        अपना गांव-समाज
        छोड़ दिया है
        चौपालों ने
        मिलना जुलना आज।

ग्रामीण अंचल से जुड़े प्रकृति संबंधित भी कुछ गीत हैं। ‘फगुआ ढोल बजा दे’ की कुछ पंक्तियां है-

        हर कड़वाहट पर
        जीवन की
        आज अबीर लगा दे
        फगुआ-ढोल बजा दे

        ....अकड़ गई जो
        टहनी मन की
        उसको तनिक लचा दे।

गांव शहर के बीच झूलते मन की व्यथा भी यथार्थवादी रूप में प्रस्तुत की गई है-

        पिता की जिंदगी थी
        कार्यशाला सी
        जहाँ निर्माण में थे
        स्वप्न, श्रम, खांसी

        कि रचनाकार असली वे
        कि हम तो बस अजायबघर

        ...कहां बदलाव ले आया
        शहर है कि या कि है अजगर।

शहरी भावभूमि पर कुछ अच्छे गीत रचे गए हैं- ‘बाजार समंदर’ ‘विज्ञापन की चकाचौंध’ ‘रेल जिंदगी’ ‘बच्चा सीख रहा’ ‘चिड़िया रानी’ ‘मन का तोता’, ‘कैटवाक’, ‘बदला अपना लाल’ आदि। कैटवाक की कुछ पंक्तियां हैं-

        ‘कैटवाक करती सड़कों पर
        पढ़ी पढ़ाई चिड़ियारानी
        उघरी हुई देह के जादू
       से इतराई चिड़ियारानी’

अवनीश सिंह चौहान
संग्रह का प्रथम गीत ‘टुकड़ा कागज का’ एवं ‘एक तिनका हम’ अच्छे बन पड़े हैं। कवि की सबसे बड़ी विशेषता है उसका अभिधात्मक शब्दों का प्रयोग एवं बिम्बात्मक संप्रेषण। इन दोनों विशेषताओं के कारण संग्रह साधारण पाठकों के लिए भी पठनीय बन पड़ा है। अभिधात्मक भाषा की अपनी शक्ति होती है तो गहन अनुभव की सीमा भाषा की भी सीमा बन जाती है। हम फिर वापस निराला पर लौटते हैं निराला की पंक्ति है-

        ‘बाहर मैं कर दिया गया हूं
        भीतर तक भर दिया गया हूं’

जिंदगी के कितने अनुभव भाषा में कितनी परतें निर्मित कर देती है और अभिधात्मक शब्द कविता के लिए कैसे सर्वोत्तम बन जाते हैं निराला की इन पंक्तियों से जाना जा सकता है। अवनीश सिंह चौहान का संग्रह असीमित संभावनाएं जगाता है एवं पठनीय बन पड़ा है।
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