कविताएँ:रामनिवास बांयला - अपनी माटी

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गुरुवार, अगस्त 15, 2013

कविताएँ:रामनिवास बांयला

अगस्त-2013 अंक

उत्सव

तड़पता तट
भागती मीन
बिसुरती नदी
पसीने-पसीने पानी
बता रहा-
फ़िर उत्सव
विसर्जन ?
विष-अर्जन ?
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अर्थ

अर्थ के अर्थ में
जीवन के क्या अर्थ हुए

रसोइयाँ हुई स्याह / वीरान
और बाज़ार सज गए,
दो जिस्म, थे एक जान,
नदी के तट-बंध हुए

चिता पर सिकतीं रोटियाँ,
मज़ार पर बाज़ार लगे,
मज़लूमों की मज़बूरी,
ओहदेदारों के शौक हुए

अर्थवान समृद्ध बनने,
खण्डित कर घर परिवार,
नोटों का झाड़ उगाने,
हम घाणी के बैल हुए

अनाचार, दंभ, विलासिता,
परिवेश जनित जन्म-घुट्टी,
बचपन बना मशीन ,
और खिलौने बंदूक हुए

छोड़ संस्कार, शालीनता, शाँति,
जुटाते रुतबा, ताकत,
मन-रंजन, मति-भंजन से,

आदर्श सब रावण हुए


राम निवास बांयला
ग्राम सोहन पुरा, पोस्ट : पाटन
जिला : सीकर (राजस्थान)
केन्द्रीय विद्यालय मे वरिष्ठ शिक्षक
बोनसाई (कविता संग्रह),
             हिमायत (लघु कथा संग्रह)
मो.        : 09413152703

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