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समीक्षा:'विभ्रम के विचार को तोड़ती कहानियां' वाया 'लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना' / कालुलाल कुलमी

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, सितंबर 15, 2013 | रविवार, सितंबर 15, 2013

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 सितम्बर अंक,2013 
           
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'विभ्रम के विचार को तोड़ती कहानियां'  वाया  'लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना' / कालुलाल कुलमी

सत्यनारायण पटेल
हिंदी कहानी का समकालीन संसार व्यापकता लिए हुए हैं। एक साथ कई तरह की कहानियां लिखी जा रही हैं। बाजार से लेकर स्त्री और दलित, आदिवासी, ग्रामीण जीवन पर लिखा जा रहा है। कहानी जिस मुद्दे पर विचार करती है वह मुद्दा बहुत गंभीरता से चर्चा में आता है। वैसे आज का जीवन कई तरह से गहराई से बदला है वहां कम से कम शब्दों में गंभीर बात कहने की जरुरत है। सत्यनारायण पटेल की कहानियां ग्रामीण जीवन पर बेबाकी से विचार करती है। उनकी कहानी ‘पनही‘ जिस तरह से चर्चित रही वह दलित समाज के विद्रोही तेवर को आगे बढा़ती है। भेम का भेरु मांगता कुल्हाड़ी ईमान के बाद उनका दूसरा कहानी संग्रह ‘लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना‘ पाठको के सामने हैं। सत्यनारायण की रचनात्मकता में मजदूर संघर्ष बेबाकी से आता है। बाजार का प्रभाव और उससे समाज जिस तरह से बदल रहा है वह गहराई से अभिव्यक्त होता है। जाहिर है कि उनके लेखन के केन्द्र में समाज की आर्थिक विषमता का संसार है। बदहाली का संसार है। 

इस कहानी संग्रह में चार कहानियां हैं। पहली कहानी ‘सपने के ठूँठ पर कोंपल‘ है। कहानी में समाज को बदलने का स्वप्न लिए युवक जिस विचार और वर्ग के साथ झुड़ता है वह उससे बहुत प्रभावित होता है। सतीश युवा है। उसके पास सपनों का अथाह संसार है। वह समाज को बदलना चाहता है। उसके लिए वह अपनी पसंद की लड़की से शादी करना चाहता है। जो जाहिर है कि दूसरी जाति की है। उसके लिए वह सब कुछ करता है। पिता की हर बात उसको बुरी लगती है। पिता का उसको टोकना परेशान करता है। इसी कारण वह घर में रहता है पर पिता से बचता रहता है। वह अपने तरीके से काम करना चाहता है और उसके लिए वह अपने मित्र अजय के साथ जुड़ जाता है और तमाम तरह के जनवादी काम करता है। पिता उसको समझाते हैं। ‘अजय कहॉ लगता है! दुनियां में इसके बाप के भी बाप पड़े हैं। कईं मि. महान और कई ऊँची चीज है। तुम्हारी और अजय सरीखी कई पीढ़िया, उनकी झॉटों में, भटकर कहां बिला जाती, आज तक कोई रिसर्च नहीं कर पाया। सुन बेटा, तेरे लिए अच्छा यही होगा, तू शादी कर ले, अपना घर बसा ले और धंधा सॅभाले।‘ पृसं-10

सतीश के पिता उसको इस तरह की बाते रोज कहते हैं जिनको वह सुनना ही नहीं चाहता। उसको अजय के साथ काम करने में आनंद आता है जो कि समाज को बदलने का काम है। दोनों शहर की हर जनवादी घटना में भाग लेते हैं और शाम में खूब पीते हैं। चाहे वह झोपड़पट्टी का मामला हो या फिर कोई अन्य समस्या हो। इस तरह सतीश अपने पिता की हर बात टालकर समाज कार्य करता है। एक दिन पिता से उसकी इस कदर अनबन हो जाती कि वह घर छोड़ देता है और बाहर कमरा लेकर रहने लगता है। इधर मित्र का कारोबर पुताई का है वह मि. महान की सेवा में लगता है और अपना काम निकालता है। मि. महान भी बहुत महान चीज है। उसके हाथ में क्या नहीं है। वह सब कुछ करा सकती है। फिर क्या था सतीश को ये सब बहुत बेकार लगता है पर अजय के लिए वहां सबकुछ है। अजय का वही भविष्य है। मि. महान के बारे में क्या कहा जाएं ‘मि. महान ऐसे सैंकड़ों गुणों से सम्पन्न थे, और ऊँची चीज के इतने करीब थे कि दूरी शून्य थी। मि. महान सॉस लेते, तो ऊॅची चीज के खयालों की महक महसूस करते। उनका रोम-रोम खिल उठता। मूँह से प्रशंसा अनवरत झरती, जैसे पागल कुत्ते के जबड़े से लार गिरना कभी न रुकती,जब कभी मि. महान उनकी न व्यक्त की गई इच्छा हु-ब-हू जाहिर कर देते, तो ऊँची  चीज उनकी मि. महान की काबिलियत की कायल हो जातीं। भीतर कहीं लार सा कुछ रिस जाता।‘पृसं-27

इस तरह अजय मि. महान के सेवक के रुप में अपना नाम दर्ज कराता है और अपने जीवन की तमाम सुविधाएं वहां से प्राप्त करता है। उसके बाद उसके लिए जनवाद और समाज बदलना अपने को सुविधा सम्पन्न बनाना रह जाता है। सतीश के साथ वह बहुत बुरा व्यवहार करता है। उसको किसी बेकार आदमी की तरह डांटता है। सतीश का मन वहां से इस कदर उठता है कि वह अपने को कमरे में बंद कर लेता है और अपने को मिटाना चाहता है। उसको पता नहीं रहता कि दिन कब हो रहा है और रात कब। वह कई दिनों तक कमरे से बाहर नहीं आता। एक दिन अपनी बाईक लेकर निकलता है और इस तरह से निकलता है कि कहीं रेेल्वे फाटक पर जा टकराता है और उसको कुछ पता ही नहीं रहता। वहां से अस्पताल में जहां वह किसी को भी नहीं बुलाता और अपनी बाईक बेच कर वहां का बिल चुकाकर कमरे पर आता है। वहां उसको क्या करना वह नहीं जानता। कहानी एक युवा के तबाह होने की है। उसके पीछे एक विचार के नाम पर जो लोग छल कर रहे हैं उनके पर्दाफाश की भी है। यह मार्क्सवाद के प्रति मोहभंग का समय है। जहां यह विचार अपने ही बनाये हुए कारागृह में तबाह हो रहा। जिसके पास पावर है वह उसका अपने हित में युज कर रहा है। उसको जनता से कोई मतलब नहीं। जहाँ  इनकमिंग है पर आउअगोईंग नहीं है। बाहर गये तो मारे जाओगे। जहां जनवाद के नाम पर हत्या है। जहां जनवाद के नाम पर दलित और आदिवासियों की तबाही। जहां मार्क्स के आगे बाबासाब को कोई नाम ही नहीं है। वैसे भी मार्क्सवाद और गांधीवाद के संघर्ष में अम्बेड़कर का विचार कहीं भी जगह नहीं बनाता। उसको तो जैसे अप्रासंगिक ही करार दिया। जबकि मार्क्सवाद को उसको अपने साथ लेना था। जिससे की वे यहां की जाति व्यवस्था को समझते और इस तरह से अपने ही विचार के शिकार न होते। जो विचार क्रान्ति के साथ आया था वह कैसे खत्म हुआ । जो युवा इस विचार के साथ आता है वह सतीश की तरह की धोखा खाता है। जनवाद के नाम पर वह ठगा जाता है। उसके सपने ठूँठ बन जाते हैं जहां कोंपल कभी नहीं आती।

दूसरी कहानी नकारो है। जिसमें  औरतों की गालियों के माध्यम से मालवा की एक जाति की दशा को अभिव्यक्त किया है। यहां वहां के समाज में अजीब रिवाज है कि बड़ी लड़की को देह व्यापार करना होता है। इसी कारण बांछड़ा गाली के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस कहानी में कंचन और कावेरी की कहानी। कावेरी बहू और कंचन सास। दोनों में किसी बात पर झगड़ा होता है और दोनों भयानक गालियां देती हैं। कहानी स्त्री जीवन के पहलुओं को उजागर करती है। औरत सामाजिक रिवाजों से बाहर जाती है तो उसको समाज नकारता है उसको गाली भी वही देनी है जो पुरुष की अभिव्यक्ति करे। ‘-तू घणी छौला चढ़ी है। थारी जिबान भी ज्यादा लम्बी हुइगी है। थारी जिबान के खेंच के थारी उकमें नी घूसेड़ी दूँ , तो गाम का भंगी भेले सोऊ। पृसं-50  यह सास अपनी बहू को कहती है। कहानी औरतों की लड़ाई की है जो झूठी इज्जत के लिए लड़ती है।

तीसरी कहानी गम्मत है। गम्मत का आशय दिखावा करना,नाटक करना। जनकल्याण के लिए व्यवस्था तरह-तरह के प्रचार करती हैं। उसके लिए वह अपने तमाम अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करती है। जिसके पास राम नाम के अलावा लोगों को देने को कुछ नहीं है वह राम के नाम को ही बदल-बदल कर कहती है। इस कहानी में एक राज्य का मुख्यमंत्री किस तरह से जनता के पास जाता है और अपने को प्रचारित करता है उसकी विस्तृत कथा। सतयनारायण पटेल की कहानियां विस्तृत है। यह कहानी भी है। बंसी उस गाड़ी में बैठा कैमरा मैन है जो सी एम के दौरे पर है। उसके दिमाग में तरह-तरह की बाते आती है। वह जहां जाता है वहां कुछ न कुछ देखता है। यह यात्रा शहर से आदिवासियों के बीच जाती है। वहां भील और निषाद जिनको किसी न किसी तरह फुसलाना है वोट चाहिए तो कुछ करना ही होगा बाकि सत्ता में आना कैसे होगा। ये वही लोग है जिनके पास जल, जमीन और जंगल है। ये यहां के मूल निवासी है और इनकी आज जरुरत है क्योंकि वोट का अधिकार इनको दे दिया गया। बाकि ये बेचारे हैं। इनकी राम को भी जरूरत पड़ी राम ने अपना काम निकाला और छोड़ दिया। शंबूक को मार दिया गया। क्योंकि वह ज्ञान प्राप्त करना चाहता था। शुद्र होकर। ‘भीलड़े अगर विद्रोही हो उठे तो संभालना मुश्किल होगा। आप देख ही रहे हो-देश में जाने कहां...दो....ढाई सौं जिलों में....इन भीलड़ों ने नाक में दम कर रखा है।‘ पृसं-94

एक विचार की अतिवादिता और सत्ता के तिलस्म के बीच ये निर्दोश लोग मारे जा रहे हैं। इनका जीवन हराम हो रहा है। ये विस्थापित हो रहे हैं। इनके घर परिवार तबाह हो रहे हैं। जबकि ये लोग अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं। कहानी व्यवस्था के तिलस्म को बयान करती हैं। 

डॉ.कालूलाल कुलमी
युवा समीक्षक
ई-मेल:paati.kalu@gmail.com
अंतिम कहानी लाल छींट की लूगड़ी का सपना एक सपने की कथा है। एक ऐसे परिवार की जो एक लूगड़ी खरीदना चाहता है उसमें उनकी जीवन भर की मेहनत चली जाती है। डूंगा किसानी करता है। उसके पास जमीन है। वह पुराने मिजाज का आदमी है। मंदिर जाता है और खंजड़ी बजाता है और अपना काम करता है। बदलते समय के बारे में वह कुछ नहीं जानता।  वह जमीन को माता मानता है। उसके लिए वही सब कुछ है। बाजार का युग है। बाजार ने बंजर जमीन को भी लाखों की बना दिया। बंजर में वह जो चाहे कर सकता है। बस यही बात डॅूगा को समझ नहीं आती। पत्नी पारबती के लिए लूगड़ी खरीदना और बेटी पवित्रा का विवाह कराना चाहता है पर पैसा नहीं है। पर उसका खेत गया और बेटी का विवाह हो गया। सपने साकार हो गये। पर डूंगा को यह मंजूर नहीं था। कहानी खेती-किसानी के खत्म होने की है। यह किसान वह किसान है जिसके पास एक ही सपना है खेती करना, उसके अलावा यहां कोई सपना नहीं है। युगीन परिवेश के बदलने के साथ कार्यव्यापार बदलता है। यह इतिहास की अनिवार्यता है। जिसको नकारा नहीं जा सकता है। डूंगा की के पास बेहतर करने को खेती है। वह अपनी बेटी का विवाह करना चाहता है। यही सपना गांव का हर बाप देखता है। बेटी विवाहित होकर अपने घर चली जाए तो वह मुक्त हो जाए। यह कब तक चलेगा। बेटी का घर कहां है? वह किस घर को अपना घर समझे। एक बाप के सपने में बेटी के सपने सदा के लिए खत्म हो जाते हैं। वह विवाह करना चाहे या नहीं कोई मायना नहीं रखता, किससे करना चाहे वह भी  कोई मायना नहीं रखता। वहां तो बस रीति का निर्वाह करना है। कहानी किसान के सपनों के साथ बहुत से सवाल छोड़ जाती है। गांव का जीवन वैसे भी संभावनाओं से रहित होता है। वहां सामाजिक जीवन प्रमुख होता है, व्यक्ति की सोच का ज्यादा महत्व नहीं होता। इसको ऐसे देखा जाना आवश्यक है।

सत्यनारायण पटेल की कहानियां ग्रामीण  परिवेश का चित्रण करती हैं। कहानियां लम्बी हैं। पर बोझिल नहीं करती। भाषा सरल है। जिसके आधार पर कहानियों का सरलीकरण नहीं किया जा सकता। कहानियां अपने समय की विडंबनाओं को अभिव्यक्त करती हैं। सतीश का खत्म होना विचार का खत्म होना है। उसके पास बहुत संभावना थी। पर जिसके साथ वह था वह उसको पचा नहीं पाया। कहानियां आज के युग की हकीकत को अभिव्यक्त करती हैं। मार्क्सवाद और छद्म मार्क्सवाद को अभिव्यक्त करती हैं। इस देश का समाज क्लास कास्ट और जेंडर से समझा जाना चाहिए। किसी एक से उसको समझना अधूरा समझना होगा। 

कहानी संग्रह- 
'लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना'-सत्यनारायण पटेल, अंतिका प्रकाशन,गाजियाबाद,प्रस-2011, मूल्य-110
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