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व्यंग्य:ऑडिटास्त्र / एम एल डाकोत

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, सितंबर 15, 2013 | रविवार, सितंबर 15, 2013

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका 
अपनी माटी
 सितम्बर अंक,2013 

व्यंग्य:ऑडिटास्त्र / एम एल डाकोत 

शिक्षाविद एम एल डाकोत 
पूर्व प्राचार्य
109,स्कीम-छ ,कुम्भा नगर,
चित्तौड़गढ़-3012001
(राजस्थान
)
मो-09414778189
देवराज इंद्र चौंक पड़े । देवलोक में गम्भीर अनियमितताएं । भ्रष्टाचार ।। गबन ।।। असंभव ! और उन्होंने उस प्रार्थना पत्र को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया । दरअसल यह प्रार्थना पत्र नर्क में आये एक ऑडिटर ने भेजा था । लिखा था कि जब वह भूलोक के भारत में था उसने बहुत सारे प्रमाण इकट्ठे कर लिए थे । नर्क में रह कर भी वह स्वर्ग पर उपकार करना चाहता था । कोई टी.ए., डी.ए., अलाउन्स या कमीशन की माँग नहीं की थी । यहाँ तक कि नर्क में बैठे बैठे भी वह लेखों जोखों की जाँच करने को तैयार था ।

देवराज को अपनी शासन व्यवस्था पर गर्व था । लम्बे समय से उन्होंने मंत्रीमंडल में कोई फेरबदल नहीं की थी । कुबेर को वित्त, अश्विनीकुमार स्वास्थ्य, कार्तिकेय रक्षा, सरस्वती देवी को शिक्षा, सूर्य को ऊर्जा मंत्रालय दिया हुआ था । वृष्टि एवं विदेशी मंत्रालय  उन्होंने अपने पास रखे हुए थे । यमराज को केबिनेट मिनिस्टर बनाया गया था । महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी यथोचित था । असंतुष्टों को सब प्रकार से संतुष्ट किया हुआ था । फिर उस आडिटर का यह दावा कि इंद्र के देव लोक में भारी घपला है उनके समझ में नहीं आया । कुछ देर तक टहलते रहे इन्द्र! फिर सोचा जाँच करवा ही ली जाय । आडिटर पर खर्च कुछ नहीं करना पड़ रहा है और यदि आडिटर ने वास्तव में कुछ मामले ढूँढ निकाले तो मंत्रियों की गोपनीय फाइल खुलवा देंगे । उन्हें भी लगने लगा कि उनके कुछ मंत्री जरूरत से ज्यादा मुखर हो गये हैं । उन पर इस अस्त्र का प्रयोग सर्वथा उचित होगा । उन्हें लगा कि यदि वे इस “आडिटास्त्र” का सही प्रयोग कर सके तो असंतुष्टों के आउटडेटेड सत्य के ब्रह्मास्त्र को आसानी से काबू में ला सकेेगें । अन्वेषणास्त्र में सांख्यिकीय झूठ का तेज और असंवेदनशील नियमों के मंत्रों की शक्ति विद्यमान होती है । इस अस्त्र को अपने चहेते चहेतियों को दोषमुक्त सिद्ध करने के भी काम में लिया जा सकता है । 

देवनीति से राजनीति और राजनीति से कूटनीति पर उतर आये देवेन्द्र । एक सदस्यीय जाँच आयोग बैठाने का तय किया । रद्दी की टोकरी से प्रार्थना पत्र उठाया और लगे नाम पता ढूँढने । अन्वेषणानन्द उर्फ “घोटालचन्द”। इन्द्र को नाम में कुछ घपले का आभास हुआ पर सत्य के आभास को दबाना उन्होंने सीख लिया था । वरना अहिल्या केस में आत्मा ने चीत्कार कर कहा था “376 आइपीसी” के तहत धर लिए जाओगे । पर इंद्र ने आत्मा की चीत्कार को अनसुना कर दिया । खुद तो डूबे ही चंद्रमा को और डुबो दिया । 

चित्रगुप्त को आदेश भिजवा दिया गया कि अन्वेषणानन्द उर्फ घोटालचन्द को स्वर्ग में इन्द्र के सामने हाजिर किया जाय । चित्रगुप्त हतप्रभ हो गये । इतिहास में अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ । सत्यवान के केस में सावित्री के तर्कजाल में यमराज फँस गये । और फँसते कैसे नहीं भैसा जो सवारी दी हुई है । यमराज को केबिनेट मिनिस्ट्री तो उनके “एबसेन्ट माइन्डेड” होने की वजह से ही दी गई   है । सब प्रकार से प्रतिनिधित्व भी हो जाये और उनकी आड़ में इन्द्र की मनमानी भी छिप जाय । भले ही चित्रगुप्त डिप्टी मिनिस्टर हो पर समझ सब जाते थे । वैसे सत्यवान के उस समय भी प्राण ही लौटाये थे स्वर्ग तो फिर भी नहीं भेजा था ।

एरिया इंचार्ज ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने जब त्रिशंकु को सदेह स्वर्ग “डिस्पेच” कर दिया तो इन्द्र को अपने व्यक्तिगत प्रभाव का उपयोग कर “फ्लाइट” को अधर में ही लटकवा दिया पर स्वर्ग में नहीं आने दिया । आज तक केस पेंडिग है और फ्लाइट का खर्च राजकीय कोष से “पे” करना पड़ रहा है । कितने ही अन्य मसले जिन्हें राजर्षि या ब्रह्मर्षियों ने समय पर डिस्पेच किया पर अभी तक अंतरिक्ष में घूम रहे हैं ।

चित्रगुप्त ने अपना पूरा लेखा फिर से देखा पर कोई “पेरेलल केस” में उन्हें अपने “केबिनेट मिनिस्टर” बनने की सीढ़ी नजर आने लगी । मिनिस्टर में और कुछ हो न हो “आज्ञाकारिता प्रथम आवश्यकता है” सूत्र के तहत् उन्होंने घोटालचन्द नाम से नर्कप्रिय आडिटर को स्वर्ग भिजवा दिया ।

“पाँय लागी सरकार ।” सुना इन्द्र ने । पीछे मुड़कर देखा । द्वारपाल के साथ आया छोटी कद काठी का, छोटी छोटी आँखों वाला मनुष्य साष्टांग दण्डवत की मुद्रा में लेटा था । 

“ये अन्वेषणानन्द हैं देव ।” द्वारपाल ने सूचित किया । “स्वर्ग में आपका स्वागत है घोटालचन्द। यहाँ आने में कोई कष्ट तो नहीं हुआ?” इन्द्र ने स्वागत किया । 

“हमें तो जीवन में और उसके बाद भी कष्ट मिलते ही रहते हैं । श्रीमान् आदेश करें । सेवक तैयार हैं ।” घोटालचंद ने एक गहरी दृष्टि इंद्र पर डालकर कहा ।

“आप आडिट में माहिर है । आपने पत्र में भी संकेत किया है कि आप मेरे लिए कुछ करना चाहते हैं । क्या कर सकते हैं आप?” इंद्र ने टटोला ।

“जैसा आप चाहें सर । मेरा भूलोक का अनुभव किस काम आयेगा ।” “ठीक है । तीन माह तुम स्वर्ग में रह कर अन्वेषण कर सकते हो । मुझे मेरे इन्द्रासन की निरंतरता चाहिए और सब प्रकार से नियंत्रण । वैसे तुम भी काफी फायदे में रहोगे । आज से ही अपना काम शुरू कर दो । तुम्हारे निर्बाध आवागमन की व्यवस्था कर दी जायेगी ।” इंद्र उठ कर चल दिये ।

अन्वेषणानन्द ने भूलोक में सुने केसज की सूची बनाई और लग गये तथ्य जुटाने में । सबसे पहले उन्होंने वित्त को ही लिया । कमीशन के आधार पर दूसरों के संसाधनों पर कब्जा करवा कर कुबेर ने अथाह संपत्ति अर्जित कर रखी थी । अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस ने 15 प्रतिशत पर सौदा तय किया हुआ था । प्राकृतिक संसाधन न होते हुए भी इनका गुलछर्रे उड़ाने का रहस्य घोटालचन्द ने पकड़ ही लिया । कुबेर का गोपनीय खाता नम्बर और कौन सा “लोक” अथवा “लोकर” पता लगाना था ।

स्वास्थ्य मंत्री की खुद की नकली दवाइयों की फेक्ट्री थी । सरस्वती देवी के पास कोई डिग्री या डिप्लोमा नहीं था । चंद्रमा अपनी मर्जी से चांदनी सप्लाई में अनियमित कटौती कर घर भर रहा   था । सूर्य भी “चेरनोमेबिल” कांड की तरह अघोषित घातक विकिरण दूसरे लोकों में फेंक रहा था । उर्वशी, रम्भा ने अपने चिर यौवन का राज एक “फेयरनेस” क्रीम को बताया था । कार्तिकेय रक्षा तैयारी का कुछ भी नहीं बता पाये । कितने सैनिक देवसेवा में है कोई नहीं बता पा रहा था क्योंकि हजारों सालों से “देत्यों” के स्वरूप का निर्धारण न हो पाने से कोई युद्ध ही नहीं हुआ । उनको भूलोक की आक्रामक तैयारी का भी आभास नहीं था । 

इंद्र के कितने सेवक “एरावत” है? वृष्टि का पूरा “कोटा” रिलीज होने पर अनावृष्टि क्यों? अन्य निहारिकाओं के “ब्लेक होल” “ब्लेक मेल” की स्थिति में कैसे आ गये ? इन्द्र भी नहीं बता पाये । प्रश्नों से परेशान इन्द्र ने अधूरी रिपोर्ट अपने कब्जे में ली । अपने विरोधी अंशों को फड़वाया । शेष पर गोपनीय फाइलें खोली । घोटालचंद को स्वर्ग से रूक्सत किया । यहाँ तक कि उसे नर्क में भी नहीं रखा, ए.पी.ओ. की तर्ज पर अगले आदेश तक भूलोक भेज दिया । 
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