Latest Article :
Home » , , , » कविताएँ :अखिलेश औदिच्य

कविताएँ :अखिलेश औदिच्य

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, अक्तूबर 16, 2013 | बुधवार, अक्तूबर 16, 2013

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका 
अपनी माटी
अक्टूबर अंक,2013 
छायांकन हेमंत शेष का है



युवा कवि
रंगकर्मी 
और एस्ट्रोलोजर 
साकेत,चौथा माता कोलोनी,
बेगूं-312023,
चित्तौड़गढ़(राजस्थान) 
मो-9929513862
ई-मेल-astroyoga.akhil@gmail.com

दूब सी कविता

कलम उकेरती
पन्नों पे

हरीदूब
से अक्षर

कितना भी
कुचलो काटो

फिर उग आते हैं

मेरी कविता
फिर हरी हो जाती है
---------------------------------


जिनका घर ही है अंधेरा                                                         


अंधेरा निगलने लगा है
दुनिया के एक हिस्से को

इसके साथ ही
निकल जाएंगे भेड़िये भी
अपनी अपनी मांद से

हर वक़्त इन्हें तलाश होती है
शिकार की
इनका झुण्ड झपट लेता है
रास्ते में आने वाली हर चीज़ को

ये बस भूख़े होते हैं हर वक़्त
और पूरी दुनिया का ख़ून भी
भूख नहीं मिटा सकता इनकी

इनकी सूर्ख आंखें चमकती हुईं
सबकुछ देख लेती हैं अंधेरे में

दुनिया के एक हिस्से ने
अंधेरा ही भोगा है हमेशा

ख़ुदा नहीं संभाल सकता
पूरी दुनिया के भेड़िये एक साथ

तभी तो हमेशा
आधी दुनिया में
पहुंच नहीं पाती रोशनी

और अभिशप्त हैं हम
इसी आधे हिस्से में रहने को
ठीक बीच भेड़ियों के

......................

धूप


आखि़र बुज़ुर्गों को ही
निभाने होते हैं
बच्चों के खेलतमाशे

बूढे़ बरगद ने
हाथ फैलाकर
समेटी धूप

उड़ेला उस पर काला रंग
पटक दिया
ज़मीन पर

वो कलमुंही
कराह रही थी
औंधे मुंह

और उस पर
बच्चे करने लगे
खेलतमाशे
...................


पिता

लिखना मेरे बस का नहीं रहा कभी

मैं तो सिर्फ वो कहता हूं
जो आपने सिखाया हर क़दम
और लिखा नहीं कभी

ये बस जैसे
अंधेरे को रोशनी में मिलाना ही है

हां मुझे लिखना नहीं आता
बस आपको उकेर देता हूं
कागज़ पे

हर दिन के साथ
कमज़ोर होता शरीर
एक आरामकुर्सी
दादाजी की दी हुई रामायण
एक ढाई नम्बर का चष्मा
और एक सत्तर का टेबल लैम्प

जब नींद नहीं आती थी मुझे
आप चिपका लिया करते
अपने सीने से
और थपकियां देते
गुनगुनाते थे हमेशा एक ही
अपनी पसंदीदा धुन

होश संभालने से आज तक
मुझ निपट अंधेरे में
आपने ही जलाया एक लैम्प
चश्मे में पिरोई धुंधलाई आंखें
और आरामकुर्सी पर बैठ
सिखाईं अपनी पसंदीदा चौपाइयां

अब हर दिन के साथ
कमज़ोर हो रहा मेरारीर
छाती में रमाए
आपकी सौंपी हुई रामायण
लिख रहा है लगातार आपको

बाबा सोए तो नहीं
मैं वो कर रहा हूं जो
मेरे बस का नहीं रहा कभी

आपने जो जीना सिखाया था
मैं सजा रहा हूं उसे
आपकी पसंदीदा धुन में

इतने शोर में
जीवन के इतने पथराए पन्नों पे
मैं बस लिख रहा हूं
लिख रहा हूं आपको

बाबा सोए तो नहीं
देखते हो
सब सुन रहे हैं आपको...
Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template