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कविताएँ :माणिक

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, अक्तूबर 16, 2013 | बुधवार, अक्तूबर 16, 2013

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका 
अपनी माटी
 अक्टूबर-2013 अंक
छायांकन हेमंत शेष का है



इतनी आसानी तो कभी नहीं थी

इस दौर में आसान हो गया है
रिश्तों के रेतने की तरह
बेमतलब की कविता करना

इससे भी सरल
कुकविताओं का छप जाना
मित्र पत्रिकाओं में

पढ़े बगैर पुस्तकों पर
टिप्पणी करना सरल हो गया है
औरतों के अधिकारों को
देह की आज़ादी में तब्दीलने की तरह

कितना कुछ शामिल हो गया है
आसान कामों की फेहरिश्त में
इन सालों

ईरोम की हालत पर चुप रहने से लेकर
जंगल-ज़मीनें हड़पना
खदेड़ना वनवासियों को कहीं दूजी जगह
पहाड़ों-खदानों को बेचना
बेचना-खरीदना लड़कियों को
एकदम आसान हो गया है
ज़रूरी मुद्दों को बहसों-विमर्शों में
उलझाने की तरह

कितना कम मुश्किलभरा काम है
खेत में  खपती एक स्त्री पर
एक ठाले आदमी का अकारण झेंपना
छोड़ देना बीमार को खुले आम
जेवड़ी-ताबीज और मन्तरे हुए काले-हरे डोरों के भरोसे

सीधे हाथ का खेल है
बस्तियां जलाना
जंगल खाली कराना
और उजाड़ना गाँव के गाँव

कहे पर मुकर जाना और
दबे को और दबाने की तरह
सबकुछ सरल

सहसा आसान हो गया है
कवियों को पढ़े बगैर कवि हो जाना
कहानियां लिखना हुआ सुगम
पहले से छपी कहानियां पढ़े बगैर
वर्णों के बजाय लकीरें खींचने की अनुमति की तरह
चौतरफा आसानी हो गयी है

सच में सबकुछ कितना सहज हो गया है
परिवार समेटने की जुगत में
माँ-पिताजी को अकेले छोड़ देने की तरह
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आदिवासी-आठ 

हदें पार करना नहीं आता उन्हें
तुम्हारी तरह
लूटने-खसोटने सहित
बदन नोचना उन्हें नहीं आता

जितना जिया जीवन उन्होंने
सीमाओं के भीतर ही जिया
घटित हुए  उनके सारे संस्कार
सीमाओं के भीतर

वे जब भी खुलकर खिलखिलाए
उनकी अपनी बोली में उपजे ठहाको के आसपास
टहलते दिखे

बतियाए बेहिचक जब भी
वे मिले बीड़ी-तम्बाकू पीते
हमजात बिरादरी के बीच
किसी चबूतरे या घने पेड़ के नीचे
सधी हुई गोलाकार सभा में
उन्हीं की बातों पर हुंकारे भरते सुने गए

दूर-दूर तक
उल्लासभरे उनके चेहरों पर
नहीं था मौत का डर
वे महफूज ही थे
तुम्हारी घुसपेठ से ठीक पहले तक
राजीखुशी थे वे सभी
जंगलों,गुफाओं और पहाड़ों में
अब तक

लकीरें खींच गयी हैं उनके माथों पर
कुछ सालों से
हाथों में आ गए हैं उनके अनायास
तीर-कमान और देसी कट्टे
अपने बचाव में
तन गए हैं वे सभी

वे ज़रूर बचाएँगे
अपनी आज़ाद दुनिया को
बेवज़ह कुतरे जाने से
लुटने और छिन जाने से
जैसे हर गरीब रखता है बचाकर
अपनी इज्ज़र-आबरू
येनकेन
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इधर इन दिनों

इधर
सम्पादकीय विवेक के नाम पर
एक मठाधीश का हो हल्ला है बस
ठीक सामने एक दृश्य है
जिसमें
आज़ाद अभिव्यक्ति को चौतरफा नोचा जा रहा है
अकारण जेल में धकेल दिया गया है एक विचारक
अचरज ये कि बाकी तमाशबीन मौन है

चित्र में बहसें जारी हैं इधर
सालों से चिंतन के नाम पर
एक मंच की
जिसमें आए वक्ताओं से ज्यादा
न आए विद्वानों पर चर्चा जारी है
बैठा है इस बीच सिकुड़े हुए मूँह के साथ
कौने में सुबक रहा उसी आयोजन का केन्द्रीय मुद्दा
एकदम बेबस आदमी की तरह

मत पूछो मित्र
इन दिनों इधर का हाल
इतने कवि हो गए हैं कि
जोड़ना नाम में कवि सरीखा शब्द
बेइज्जती से ज्यादा और क्या हासिल
और ढूंढना असल कवि तो और भी मुश्किल

इलाके में इधर
अपराधियों ने स्कूल खोल लिए हैं
चापलूसों ने छापेखाने
ठेकेदार पत्रिका निकालता है आजकल
लेखन करने वालों की शक्लें
टेंडर भरने वालों या फिर थोक व्यापारियों से मिलने लगी है

ऐसे में
इकलौती ज़बान कुछ भी नहीं कहती
दो सजग आँखें बार-बार बंद होती है
एक कर्मठ आदमी का शरीर होता है अब शिथिल
पगथलियां एकदम ठण्डी हुई जाती है
नींद आती हुई सूझती है मगर
नींद आती नहीं
इधर इन दिनों
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बचा हुआ 

बचा हुआ रहना

अच्छा लगता है
पीहर जाते वक़्त
उसका रह जाना
कुछ
मेरे पास

फाके के दिनों में
बरनी में बचे अचार की तरह
निहायती ज़रूरी

और
ससुराल से वापसी में
ससुरजी के पास
अंशत:
छूट जाना पत्नी का
अच्छा लगता है

सास की छाती से लिपट जोर से
रोने के बाद
सुबकते हुए
उसका आना मेरे घर

आते में
पीछे मुड़-मुड़
अपने जड़ों को
छूटते हुए की तरह
निहारना उसका
अच्छा लगता है

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लौटी हुई कविताएँ 

चार कवितायेँ
जो अलग-अलग लम्बाई में थीं
आखिर लौट आई
आज भोपाल की डाक से

एक भी ढ़ंग की नहीं थी
छपने के लख्खण से रहित
बेचारी चार कविताएँ
अकाल मरी पड़ी है कवि के आँगन में

मौलिक सृजन के गाल पर
अब भी चमक रहा है लाल निशान
सम्पादकीय टिप्पणी वाले
तमाचे का

चारोंमेर एलान कर दो
अब कुछ दिन चुप रहेगा
उन कविताओं का बाप
उठावने तक बतियाना मत
कविताओं की जननी से
ग्यारहवें बाद सोचेंगे
घर में
राय-मशवरे कर लिखेंगे
आगे की कविताएँ

तब तक कुछ भी नहीं दिखेगा
सिवाय
चार अकाल मरी हुई कविताओं के

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किला

मैं जब भी किला देखता हूँ।
तो असल में 
मैं 'किला' नहीं देखता।

देखता हूँ
एक अख्खड़ इंसान को झुकते हुए
बने बनाए सिद्धांतों  के अपवाद 
और तयशुदा नियमों का गलन 
देखता हूँ 
लगातार और अबाध

आलीशान जीवन का अवसान 
दिखता है मुझे
धीरे-धीरे
जीवन में बदलाव और वक़्त के थपेड़ों से
एक रुतबे में घटाव
दिखता है मुझे किले में 

इस तरह 
मैं जब भी किला देखता हूँ।
तो असल में 
मैं 'किला' नहीं देखता।
--------------------------------------

दुकानदारी 


पास रख्खा था एक गोल-मटोल पत्थर
मुठ्ठीभर सिंदूर, कुछ मारीपन्ने

कभी एक बूढ़ा भोपा 
रख्ख छोड़ गया था घर मेरे
थोड़ी सी अगरबत्तियां
जो बची हुई थीं 
तब से अब तक
ज्यों-की-त्यों रख्खी थीं 
पिलास्टिक में

हाँ बारिश से बमुश्किल बची 
एक माचिस भी थी पास
वैसे इतना काफी था 
एक देवरे के शिलान्यास के लिए 

बाउजी के मरे के बाद से अब तक
भगवान् वाले आलिये में अकेला पड़ा दीया और 
अलग-थलग पड़ा था
परेशान आदमी की शक्ल का-सा
एक अनुपयोगी अगरबत्ती स्टेण्ड 
और तो और टांड पर अब तक रख्खा था 
एक टनटोकरिया
एक मोरपंखी झाडू, एक ताम्बई लौटा
सफ़ेद जक रुई के दो बण्डल और घी-दानी


इतना काफी था
एक देवरे की प्लानिंग
और मुक्कमल मूर्ति स्थापना के लिए
घटत-बढ़त में कुछ आस्थावान साथी भी थे
कब काम आते आखिर 

जातिगत गणित देख मुहल्ले का
ईजाद कर ही लिया हमने 
एक देवरा
बाक़ी देवरों से अधिक सुविधायुक्त
भोपाजी के भाव पर हो मोहित
जातरी आने लगे
प्रायोजित जातरियों का तो कहना ही क्या
जितना समझाया उसे कहीं आगे
दे-लम्बी फेंकते रात-रातभर
देवरे में मजमा जमा रहता 

हमारे बावजी के पोस्टर बने
पम्पलेट छपे, बावजी वेबसाइट पर दिखे
मान-मनवारों के बीच
एक दोस्त ने जबरन डोक्यूमेंट्री बना दी
हमारे बावजी पर
भोपाजी, भोपण, हजुरिए क्या 
देवरे सहित सब-के-सब छा गए

हमारे देवता की फेसबुक प्रोफाइल बनी
अलग से पेज बना
कमेन्ट और लाइक आने लगे
फ़ॉलोवर बढ़ने लगे
नाम को लेकर अब शक नहीं रहा 

बारह महीनों के बीतते ही
पाटोत्सव की फसल आई
सीधी कमाई से
देवरे के चौंतरे सहित भोपाजी का घर बना
प्रसादी, रतजगे, जागण की पाँतियों के बीच
हम जैसे बाबाजी की आनंद-मौज
मतलब 
केसरिया-सफ़ेद कपड़ों के ओढ़ावे में
धंधा चल निकला 

मामला बैठ गया लगभग
दूकान चल निकली थी
फाके के दिनों के बीच
कपड़े-लत्थे, घी-शक्कर, गेहूं-मक्की आवक शुरू

एक ठाले के दिमाग की उपज से 
और कितना कुछ आशा करेंगे आप
एक ठाला इससे ज्यादा क्या धंधा कर सकेगा?


माणिक 
अध्यापक
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