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कहानी:'संत महिमा' / डॉ.मनोज मोक्षेंद्र

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, नवंबर 15, 2013 | शुक्रवार, नवंबर 15, 2013


साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका 

अपनी माटी


डा. मनोज 'मोक्षेन्द्र'
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में 
सहायक निदेशक है.
अंग्रेज़ी साहित्य में
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
वाराणसी से स्नातकोत्तर
और पीएच.डी.

लिखी गईं पुस्तकें
पगडंडियां(काव्य संग्रह),
अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),
चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),
धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),
पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),
परकटी कविताओं की उड़ान
(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता
सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोड
पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,
मोबाईल नं० 09910360249
ई-मेल drmanojs5@gmail.com)
लोकमानस में गहराई से रचे-बसे और आम जीवन में अमिट आस्था के प्रतीक के रूप में स्थापित संत बंधु पाजी के चमत्कारिक कारनामों का बखान यह मामूली जिह्वा क्या कर पाएगी? काशी, प्रयाग, पांडिचेरी जैसी संत-पीठ तो उन्हें सर्वकालिक श्रेष्ठतम संत के रूप में मान्यता प्रदान कर ही चुकी हैं। बड़े-बड़े नेता चुनाव-संग्राम में शिरकत करने से पहले बंधु पाजी के आगे मत्था टेकने ज़रूर जाते हैं। नामचीन एम.पी. और अफ़सर किसी भी सरकारी प्रोजेक्ट का श्री गणेश करने से पहले बंधु पाजी की इज़ाज़त लेना कभी नहीं चूकते। दिग्गज बिल्डर और कॉलोनी-डेवलपर इस सिद्ध-संत के पाँव पूजकर ही भूमि-पूजन-स्थल पर नारियल फोड़ने जाते हैं। कलक्टर-एसपी की क्या मजाल कि वे अपने-अपने जिलों में कोई बदलाव लाने के लिए वित्तीय मंजूरी लेने से पहले इनके आगे घुटने टेकने न जाएं? नामी-गिरामी समाज-सेवी और सेठ-सेठाड़िए उनके आशीर्वाद-प्रसाद के बिना कोई जन-कल्याण करने की बात सोच तक नहीं सकते।

कहते हैं कि चाहे कितना ही दुष्कर कार्य हो, संत पाजी के अभयदान के लिए उठे हाथ सब कुछ आसान कर देते हैं! दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से छुटकारा दिला देते हैं।सो, इतने बड़े सिद्ध-महात्मा के आश्रम में विआइपियों का मज़मा लगा ही रहता है। बंधु पाजी के दूर-दराज़ गए होने पर, इनके वरिष्ठ भक्तजन आश्रम में जनपीड़ा हरने का महती कार्य-भार सम्हालते हैं। लिहाजा, बंधु पाजी आम आदमी से कोई परहेज़ नहीं रखते हैं। इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि अपना दुखड़ा सुनाने और अपनी विपत्तियों से दरकिनार करने आए दुःखीजन इनके दरबार से कृतार्थ होकर ही जाते हैं।

इसलिए, जनसेवा का जीवन-पर्यंत बीड़ा उठाए संत पाजी का काम इतना फैला हुआ है कि इसके लिए उन्हें भक्तजनों की सेना नियुक्त करनी पड़ी है। वरना, देश-विदेश में भक्त-दरबारों का बंदोबस्त करने का काम बिल्कुल असंभव हो जाता, जहाँ बंधु पाजी ऊँचे मंचों पर स्थापित स्वर्णासनों पर आसीन होकर पीड़ितजनों की व्यथा-कथा सुनते हैं ।

बहरहाल, सांसारिक सुखों से विरक्त हो चुके इतने बड़े महात्मा पर एक एयर होस्टेज़ द्वारा कीचड़ उछाला जाना किसे हैरत के समंदर में गोते लगाने के लिए विवश नहीं कर देगा! इस घटना को गुजरे कोई हफ़्ते-भर से ज़्यादा नहीं हो रहा है। बंधु पाजी विदेश में जनोद्धार के लिए अपने चुनिंदा सेवकों के साथ एक भक्त-दरबार में उपस्थित होने के लिए हवाई यात्रा कर रहे थे। जब विमान मास्को हवाई अड्डे पर उतरा तो यात्रियों के उतरने से पहले एक अज़ीबोग़रीब हड़कंप मच गया। जैसेकि विमान में छिपाकर रखे गए किसी बम की शिनाख़्त होने के बाद सनसनी फैल गई हो। तभी एक भद्र महिला के चींखने-चिल्लाने के आर्त रुदन ने किसी अनहोनी की ओर संकेत किया। कुछ मिनट में हड़कंप के थमने के बाद महिला की अस्फुट आवाज़ साफ़ समझ में आने लगी,
"इस ढोंगी साधु ने मुझे झाँसे में डालकर मेरा सब कुछ लूट लिया है; पहले इसने प्रसाद में कुछ खिलाकर मुझे बेहोश किया, फिर उसी हालत में मेरा बलात्कार...अरे, मेरी मेडिकल जाँच कराओ...इस वहशी राक्षस को सज़ा दिलाओ..."

एयर होस्टेज़ आक्रोश-आवेश में बेकाबू होकर बंधु पाजी की ओर तेजी से झपटी ही थी कि सेवकों ने उसे धर-दबोचा।
तत्क्षण, एक सेवक का स्वर बुलंद हो गया, "भक्तों, इस डायन की बातों में मत आना। मुझे अभी-अभी पॉयलट एंटनी ने बताया है कि इस एयर होस्टेज़ को जब दौरे पड़ते हैं तो यह ऐसी ही बहकी-बहकी बातें करती है। आख़िर, हिस्टीरिया से पीड़ित इस एयर होस्टेज़ को सर्विस से बर्ख़ास्त क्यों नहीं किया जाता? आप सभी मिलकर पायलट एंटनी से इसके लिए दरख़्वास्त कीजिए..."

तभी संत बंधु पाजी के सेवकों से घिरा हुआ, डरा-सहमा पायलट एंटनी हकलाते हुए सामने नज़र आया,

"हाँ, हाँ, मिस शालिनी ऐसी हरक़तें पहले भी कर चुकी है। मैं इसके सस्पेंशन की दरख़्वास्त हायर अथारिटीज़ से करूंगा..."

एयर होस्टेज़ मिस शालिनी के तो होश ही उड़ गए। वह पायलट की बातें सुनकर बदहवास-सी हो गई। उसकी जबान को तो जैसे लकवा मार गया हो। उसने पायलट से ऐसी उम्मीद नहीं की थी।
"अरे, मैं पूरे होशो-हवास में हूँ। मेरे साथ जो वारदात हुई है, उसका मैं साक्षात गवाह हूँ। मैं दर्द से बेहद पीड़ित हूँ। मुझे सारे हालात समझ में आ रहे हैं। मैंने खुद इस पाखंडी साधु के सेवकों को पायलट को उसके केबिन में डराते-धमकाते हुए देखा था। दरअसल, पायलट को डरा-धमका कर कहलवाया जा रहा है कि मुझे दौरे पड़ते हैं। मेरा सर्विस रिकार्ड देख लीजिए। मैं खुद को बदनाम क्यों करना चाहूंगी? आख़िर, मैं एक औरत हूँ।"

संत बंधु पाजी हाथ उठाकर सभी को शांत करते हुए बोल उठे, "हरि ओम तत्सत, हरि ओम तत्सत! आप सभी भक्तजन गलत कह रहे हैं कि इस औरत को दौरे पड़ते हैं। मैं अपनी तीसरी आँख से देख रहा हूँ कि इस बिचारी पर किसी दुष्ट आत्मा का साया है जिसे मुझ जैसे साधक महात्मा से घोर दुश्मनी है।"
सभी सेवक एक स्वर में बोल उठते हैं, "अंतर्यामी महात्मा बंधु पाजी की बलिहारी हो, इनके दिव्य नेत्र के क्या कहने, ये तो साक्षात ब्रह्मज्ञानी हैं..."
बंधु पाजी फिर अपने अंदाज़ में हाथ उठाकर सभी से मुखातिब होते हैं, "भक्तजन, यह समय निरर्थक आलाप-प्रलाप करने का नहीं है। मुझे तो इस निरीह अबला पर तरस आ रहा है। इस पर एक काली छाया का भीषण प्रकोप है जो इसकी जान तक ले सकती है।"

बंधु पाजी बंद-आँख कुछ मंत्र बुदबुदाते हुए उस पर कमंडल का पानी छिड़कते हैं। पीछे से एक सेवक खुद को रोक नहीं पाता है, "भगवन, इस निर्दोष स्त्री का उद्धार अब आप ही कर सकते हैं।"
सेवकों से जकड़ी हुई एयर होस्टेज़, जो नाटकीय ढंग से बदल चुके पूरे परिदृश्य को देखकर अवाक और हतप्रभ थी, अचानक फट पड़ती है,

"अरे, आप सभी इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं; पर, अंधविश्वास के अंधकूप में डूबकर अपना विवेक खो चुके हैं। क्या आप लोगों में से कोई भी ऐसा आदमी नहीं है जो मुझ जैसी मज़बूर औरत की बातों पर यक़ीन करे?"
यात्रियों में चल रही फ़ुसफ़ुसाहट के बीच बंधु पाजी पुनः बोल उठते हैं, "हरि ओम, हरि ओम! इस पर सवार दुष्टात्मा कैसे-कैसे तर्क कर रही है? मैं सिद्ध दिव्यात्मा, आप सभी को आदेश देता हूँ कि आप इस निरीह अबला पर सवार दुर्दांत दुष्टात्मा से दूरी बनाकर ही खड़े रहें। अन्यथा, यह आपका भी अनिष्ट कर सकती है। देखो! मैं किस तरह इसका उद्धार करता हूँ।"

यात्रियों में फ़ुसफ़ुसाहट बढ़ जाती है, "ओफ़्फ़ोफ़! यह औरत कितनी बेशर्म है कि संत-महात्माओं को भी नहीं बख़्श रही है"... "नहीं, नहीं, दरअसल, इस पर सवार इविल इस्पिरिट इसे संत पाजी के ख़िलाफ़ भड़का रही है" ... "हाँ, हाँ, इतने बड़े महात्मा पर ऐसा लांछन लगाया जा रहा है, घोर कलियुग आ गया है"... "मेरा तो मानना है कि इस स्त्री के पाप का बोझ यह धरती कैसे बर्दाश्त कर रही है" वग़ैरह, वग़ैरह ...

एयर होस्टेज़ सेवकों की पकड़ से ख़ुद को भरसक छुड़ाने की कोशिश करती है।
बंधु पाजी फिर कोई कर्मकांड करने की मुद्रा में उस पर अपनी दृष्टि जमा देते हैं, "मेरे प्रिय शिष्यों! इसे मुक्त मत करना, नहीं तो इस पर आई दुष्टात्मा इसे अब शर्तिया आत्महत्या के लिए विवश करेगी..."
एयर होस्टेज़ सेवकों की जकड़ में बिलबिला उठी, "हाँ, हाँ, अगर आप सभी मेरी बातों पर यक़ीन नहीं करेंगे तो मेरे पास अब आत्महत्या करने के सिवाय कोई और चारा नहीं होगा।"
उसके चेहरे पर एक ख़तरनाक निर्णय तैरने लगता है।

बंधु पाजी के चेहरे की झुर्रियाँ मुस्कराने के अंदाज़ में गहरी हो जाती हैं, "सत्य वचन, सत्य वचन। इस पर आई दुष्टात्मा अत्यंत बलशाली है। उसके चंगुल से इसे बचाना असाध्य-सा लगता है। अरे, अब मैं क्या करूँ? कहीं यात्रियों पर कोई बुरी बला न आ जाए! अच्छा होगा कि इतनी ज़िंदगियों के बदले में सिर्फ़ एक जान जाय--सिर्फ़ इस औरत की। अब इस स्त्री का मरना तय है।"

बंधु पाजी की जबान से ये शब्द निकलते ही एयर होस्टेज़ पर से सेवकों की पकड़ ढीली पड़ जाती है। वह पूरा जोर लगाकर उनसे मुक्त हो जाती है और विमान की सीढ़ियों से उतरकर व्यस्त रन-वे पर बेतहाशा भागने लगती है। वह दहाड़ें मार-मारकर दौड़ती है, "हाँ, हाँ, मुझ पर वाक़ई किसी दुष्टात्मा का प्रकोप है। पर, वह दुष्टात्मा कौन है, यह किसी को समझ में नहीं आएगा। वह दुष्टात्मा मेरे भीतर नहीं, मेरे बाहर है जो इस ढोंगी बंधु पाजी के भेष में बेबस लोगों को अपना शिकार बना रही है। इसके पाखंड के आगे तर्क और बुद्धि का कोई वश नहीं चलता..."

तभी वह रन-वे पर सामने से दौड़ रहे एक विमान की चपेट में आ जाती है और एक हृदय-विदारक चीत्कार के साथ सारा माहौल ख़ामोशी के घुप्प जंगल में समा जाता है।

अगले दिन, हिंदुस्तान के अख़बारों में एक ख़बर छपती है जिसका लब्बो-लुबाब यह रहता है कि दिव्य-शक्ति-संपन्न संत बंधु पाजी की महिमा से मास्को जा रहे एक विमान के यात्रियों को एक ख़तरनाक़ प्रेतात्मा से मुक्त कराया गया और सैकड़ों यात्रियों को मौत का ग्रास बनने से बचाया जा सका।
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