कविताएँ:विपिन चौधरी - अपनी माटी

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शुक्रवार, नवंबर 15, 2013

कविताएँ:विपिन चौधरी


साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका 

अपनी माटी


निशानी

पृथ्वी ने अपने गर्भ की तरफ ऊँगली की

स्त्री के अपने
हाथ में सने गीले पलोथन
और पांवों में फटी बवाइयां की ओर इशारा किया

हरियाले पेड़ ने अपनी उदासी दर्शाते हुए अपना पीला पत्ता झाड़ा

थके-मांदे सूरज ने
पसीने से भरा अपना अंगोछा चाँद के कंधे रखा
तब उसके श्रम ने आकार लिया 

चीज़ें जब तक अपनी निशानदेही न दिखलाये
उन्हें समझे कौन 
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भीतर का मज़मा

भीतरी साम्राज्य में स्तिथ
मील के पत्थर
नक़्शे, हवेलियाँ 
सभी दर ओ दीवार
सभी चूने, पत्थरों, ईंटों के ढ़ेर 
मेरी निगाह में चाक-चौबंद 

सांझ को जन्म लेने वाली
भीतरी छौंक से भी परिचय मेरा
मध्याहन की चुहल से भी  

दो मगों में औटायी जायेगी   
रात की मीठी शीतलता
यह भी मुझे मालूम

हर रोज़ भीतर एक नयी राह पकड़ी 
बाहर की राह को भूल जाने के लिये

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जब भी वह आता है 

वह जब भी घर के भीतर प्रवेश करता
एक नयी भाषा उसके बगल में होती

उस भांप छोड़ती हुयी ताज़ा भाषा को
गुनगुनाती हुयी स्त्री सिलबट्टे पर पीस
अपनी देह पर देर तक मलती

वह फिर घर से बाहर जा कर एक नयी भाषा ईजाद करता
सौंपता उसे
स्त्री फिर उस नयी भाषा का हरसंभव बेहतर इस्तेमाल करती

कायल होती अपने मर्द के हुनर पर
होती अपनी बेबसी पर हैरान

बरसों-बरस
बर्तन-भांडों, झाड़ू-पौछा, बिस्तर-मेज़-कुर्सी के बीच रह कर स्त्री  
अपनी कोई भाषा नहीं बना सकी 
एक दिन जब उसने अपनी भाषा बांचने की ठानी 
उस दिन उसका मर्द समुंदर के बीचों बीच था
और वह स्त्री समुंदर के उस पार 
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नाव, उदासी, जीवन

हलकी नीली लहरों पर सवार खाली
नाव को दूर जाते हुए देख

मुझे अपनी उदासी बेतरह याद आने लगी
दूर चली जाने वाली चीजों से उदासी यूँ न गुंथी होती
तो जीवन हरा होते-होते यूँ न रह जाता 
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 पुराना रूप


नामालूम दिशा में आया हुआ
पत्थर
अपनी लय में बहती नदी की देह को
अशांत किया 
नामालूम दिशा में आये हुए पत्थर ने
देर तक नदी
अपनी पुरानी लय-ताल को ढूँढती रही

प्रेम ने जीवन के मस्तक पर
हौले से दस्तक दी
और जीवन के पुराने ज़ायके से विदा ले ली
फिर जीवन अपने उन पुराने जूतों को तलाशता रहा
जिसे पहन वह सीटी बजाते हुए चहलकदमी किया करता था

 तयशुदा चीज़े एक बार अपना पुराना अक्स खो दें 
तो फिर उनका
खुदा ही मालिक होता है
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कविता का आकाश

धरती पर झड़ें हुए
उदासी के पीले फूल
और ख़ुशी के सलमे-सितारे लेकर 
मुलायम हरी अमरबेल के सहारे
होते हुए कुछ शब्द
ऊपर चढ़ने में सफल हो सके

देखते ही देखते
कविता का आसमान नीला हो गया
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ज्ञान

मुझे बताया गया 
सौरमंडल, सात सप्तऋषि,
गंगा, यमुना सरस्वती और देश की बाकी दम तोड़ती हुयी नदियों के बारे में
ईस्ट इंडिया कंपनी के उदय और अस्त होने का भेद
गांधी की अहिंसा और सत्य
मदर टेरसा की ममता
और सुभाष और भगत सिंह की ज़ाहिनियत और देशभक्ति 

अशोक, बाबर, जहाँआरा का इतिहास मुझे रटाया गया
पाइथागोरस, अल्फा, बीटा, गामा
लाइट ईयर से लेकर सुभाषतानि के
सूत्र मेरे गले से नीचे उतारे गए 

पर मुझे प्रेम के ढ़ाई आखर के बारे में मुझे कुछ नहीं बताया
युवावस्था के पहले चरण 
जिससे मेरा पाला पड़ा और
मेरे सारे ज्ञान ने अपनी दिशा बदल ली

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प्रेम विषयक नन्ही कविताएँ
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प्रेम की सफ़ेद रोशनी
आत्मा के बीच से हो कर गुजरी
और वह मेरा जीवन सात रंगों में बिखर गया
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प्रेम,
पहले एक बिंदु पर
ठहरा
फिर
यकायक भगवान् हो गया
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प्रेम के पास अक्सर समय कम ही रहा
चुपचाप से आकर
वह गुज़र गया
और बजरबट्टू सी दुनिया अपनी पलकें झपका कर
टूटते हुए तारों को देखती रह गयी 
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कोई पूछ बैठता है
आज भी लिखती हो प्रेम कविताएँ
तो इस प्रश्न पर मैं एकदम मौन हो जाया करती हूँ
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विपिन चौधरी 
(पढ़ाई-लिखाई हिसार,हरियाणा में हुई.कविता का युवा स्वर हैं और इन दिनों के अपने अनुवाद कार्यों से भी चर्चा में हैं.देशभर की तमाम चर्चित पत्रिकाओं के साथ ही इंटरनेटी साहित्यिक वेब पत्रिकाओं में भी छप चुकी हैं.माया अन्ज़ेलो की जीवनी 'मैं रोज उदित होती हूँ' शीर्षक से दख़ल प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य है.संपर्क ई-मेल:vipin.choudhary7@gmail.com)
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