नवोदित:रामनिवास बांयला की कविताएँ - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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नवोदित:रामनिवास बांयला की कविताएँ

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 दिसंबर-2013 
किसने देखा

अनहोनी घटना को
घटती दुर्घटना को
आँखों से देखा
इसने देखा, हमने देखा
उसने देखा, सबने देखा
मगर जब कुछ होना था
पर्दाफ़ाश जो होना था
तब किसने देखा ?
छू हो गया, कहीं खो गया
नहीं रहा, मूक हो गया
जिसने कहा था-
मैने देखा ।
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नेपथ्य मे

मंच की है पीड़ घनेरी
हो गई जो भीड़ घनेरी
यदि अब कुछ करना है ?
करने को कुछ करना है ?
तो -
चलो -
नेपथ्य में जगह तलाशें ।
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मीरा
परिजनों के प्रयास
और
विलास वैभव
ना बना सके उसको
एक की
जो
एक की हुई
मीरा -
ज़माने की हो गई ।

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जीवन
जीवन
है तो
पल-पल
इसी पल है,
नहीं तो
सिर्फ़
कल ही कल है ।

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कबीर

मृत्यु शैय्या पर
अपनों ने ही
कुरेद दिया
मज़हब कबीर का,
जो
ताउम्र
मानवता से
मज़हब को ढाँकता रहा ।

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उत्सव

तड़पता तट
भागती मीन
बिसुरती नदी
पसीने-पसीने पानी
बता रहा-
फ़िर उत्सव
विसर्जन ?
विष-अर्जन ?

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अर्घ्य

शस्य
पल्लव परिवेष्ठित
पूज्य
प्राण वायु प्रदाता
इस पर्व पर
अर्घ्य चढ़ाने / पुण्य कमाने
कर दिया गया निपात,
अब-
सहमा-सा
खड़ा है-नीरव
आँगन का बिरवा ।
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क्रान्तिवीर

समता लाने
आजादी पाने
वे भूखे उदर
जो पचा गए
विदेशी गोला बारूद,
उनकी पौध
भूखे पेट
बरगदों तले
उजास को तरस रही है ।
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पेट के लिए

पेट के लिए भी
जब
होना पड़ा
पेट से
तो
पेट पड़ने को
कोसती रही
अभागिन
पेट पकड़ कर
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बाँटते लोग

खींच कर
लकीरें ज़मीं पर
बाँटते लोग,
खेलते
मौत का खेल
मनाते जश्न
बाँटते तमगे
कहते-
देश
देशभक्ति
और शहादत
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बूढा पेड़

आज
बिलख पड़ा
बूढा पेड़
मुझ कवि का
लेखन देख
बोला-
और पुतेंगे कागज़
और कटेंगे पेड़

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तू बच जाएगा

छोड़
कोसना अंधेरा
उलीचना अंधेरा
थक जाएगा
चुक जाएगा
जला
चिराग प्यारे
तम स्वत: हारे
तभी
पथ पाएदा
सच पाएगा
तू
बच जाएगा
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रूप

हे दाता !
मत देना
गुरबत में रूप
गरीब यौवन
बनता दुश्मन
बटोरता लार
पाता दुत्कार,
ना मिलता काम
ना मिलती भीख
हे दाता !
मत देना
गुरबत में रूप  
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राम निवास बांयला
केन्द्रीय विद्यालय मे वरिष्ठ शिक्षक
ग्राम सोहन पुरापोस्ट : पाटन
जिला : सीकर (राजस्थान)
बोनसाई (कविता संग्रह),
हिमायत (लघु कथा संग्रह)
मो. : 09413152703

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